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तो क्या अब दंगे नहीं होंगे?

साम्प्रदायिक हिंसा ( निरोधक, रोकथाम और पीड़ित पुनर्वास ) बिल, 2009 को कैबिनेट की मंजूरी मिल गयी। और इसी के साथ इस बिल को सदन तक पहुंचाने और पेश करने की कवायद भी पूरी हो गयी। यदि ये बिल पास हुया और कानून बन गया तो केन्द्र सरकार को उस राज्य में केन्द्रीय बल भेजने की पूरी छूट होगी जहां साम्प्रदायिक दंगों में जान या माल का नुकसान हुया हो। बिल में प्रावधान है कि केन्द्र सरकार बिना राज्य सरकार से पूछे इस कार्यवाई को एकतरफा अंजाम दे सकती है। यानी संविधान की धारा 355 और 356 के अलावा केन्द्र सरकार के हाथ में राज्य सरकार को बर्खास्त करने का एक और हथकंडा होगा।

राज्य सरकारों को इसकी भनक है। शायद यही वजह है कि इस बिल पर पिछले 4 सालों में माथा-पच्ची चलती रही और संसद की स्थायी समिति ने 2005 वाले ओरिजिनल बिल में 59 संशोधन किये जिस पर कैबिनेट ने अपनी मोहर लगा दी। लेकिन नये बिल में भी वो सब कुछ है जिससे की राज्य सरकारें केन्द्र की मंशा को संदेह की नज़रों से देखें। क्योंकि ये बिल संविधान में दिये गये फेडरल सट्रक्चर की ही नींव पर हमला करता है। पुराने बिल में केन्द्र सरकार को साम्प्रदायिक हिंसा में किसी के मारे जाने पर ही उस राज्य में केन्द्रीय बल भेजने का अधिकार था। नये बिल के मुताबिक अब जान-माल किसी का भी नुकसान होने पर केन्द्रीय बल धड़धड़ाते हुए राज्यों में घुसकर इलाके में अपना तंबू गाड़ सकते हैं।

संविधान की धारा 355 और धारा 356 के गलत इस्तेमाल से राज्य में विपक्षी दलों की सरकारें आतंकित रही हैं। पिछले 62 सालों में धारा 356 की आड़ में केन्द्र ने राज्यों की चुनी हुई सरकारों को मनमाने तरीके से बर्खास्त किया है। ये नुस्खा नेहरू ने आजमाया और उसके बाद से लगभग सभी प्रधानमंत्रियों ने इसको बड़ी शिद्दत से फॉलो किया। चाहे इंदिरा गांधी हों या मोरारजी देसाई या फिर राजीव गांधी। संविधानिक व्यवस्था बिगड़ने की आड़ लेकर केन्द्रीय सरकारों ने मनमाने ढंग से चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया। आंकड़े डराते हैं। अब तक 100 से ज्यादा चुनी हुई सरकारें केन्द्र के एक फरमान पर बर्खास्त की जा चुकी हैं।

जिस कांग्रेस पार्टी पर राज्य सरकारों को बर्खास्त करने की मनमानी करने का सबसे ज्यादा आरोप लगा वही पार्टी ऐसे बिल पेश करने पर आमादा है जो फेडरेल स्ट्रक्चर को और कमजो़र करेगा। यही नहीं केन्द्र सरकार राज्य के किसी भी इलाके को डिस्टर्ब्ड एरिया घोषित कर सकती है अगर उसे लगा कि राज्य सरकार ने उसके दिशानिर्देशों पर अमल नहीं किया है। बिल में एक यूनिफाइड कमांड बनाने का भी प्रस्ताव है। पुराने बिल के मुताबिक इस यूनीफाइड कमांड में केन्द्र और राज्य दोनों की नुमाइंदगी थी लेकिन नये बिल में राज्यों की नुमाइंदगी खत्म कर दी गयी है। इससे राज्य सरकारों का संशय बढ़ेगा या घटेगा इस पर कयास लगाना कतई मुश्किल नहीं।

राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले धारा 355 के तहत राज्य सरकार को आगाह करना लाज़मी होता है। लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा बिल के तहत राज्य सरकारों को ऐसी कोई रियायत नहीं मिलेगी। लाजमी है कि जिस राज्य में साम्प्रदायिक हिंसा इस कदर भड़की हो कि केन्द्रीय बल भेजने की नौबत आ जाये वहां कानून व्यवस्था चौपट हो चुकी होगी। यानी धारा 356 के लिये माकूल माहौल बन चुका होगा। क्योंकि इसकी क्या गारंटी की पैरा मिलेट्री वहां व्यवस्था बहाल कर वापस लौट आयेगी और राज्य सरकार वापिस अपने कामकाज पर लौट जायेगी। जैसे कि कुछ हुई ही न हो। केन्द्र की नीयत पर प्रश्नचिन्ह तब भी बना रहेगा। यानी राज्य सरकार इस डर में ही काम करेगी कि पता नहीं कब दिल्ली उसे सत्ता से बेदखल कर दे।

बिल में इस बात को कोई जवाब नहीं कि उस स्थित में क्या होगा जब केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो। क्या होगा जब राज्य सरकार पर साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने की बजाय उसे और भड़काने का आरोप लगे। जैसा की 2002 में गुजरात में दिखा। क्या ऐसी स्थित में राज्य सरकार को ‘राजधर्म’ का वास्ता देकर केन्द्र वहां अर्धसैनिक बल भेजने से पीछे हटेगा। 2002 ही क्यों 1984 की मिसाल भी हमारे सामने है। और उससे पहले दिसंबर 1992 की। जब वक्त रहते सही कदम उठाने की जगह केन्द्र सरकार भी सोती दिखी और बलवाइयों ने मस्जिद ढहा दी। ऐसी स्थितयों से निबटने को लेकर बिल में कोई प्रावधान नज़र नहीं आता। यानी केन्द्र सरकार ने अपने बचने की जगह भी तलाश ली है।

आखिर मुद्दा क्या है? देश के किसी भी कोने में साम्प्रदायिकता के ज़हर को मारना? या चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने के नये नये बहाने ढूंढ़ना? क्या महज केन्द्रीय बल भेजने से ही साम्प्रदायिकता खत्म की जा सकती है? दिलों के बीच की खाई क्या केन्द्रीय बल पाट सकेंगे? क्योंकि साम्प्रदायिक दंगों में उपद्रवियों या पुलिस बल का शिकार अक्सर अखलियत के लोग ही होते हैं। जरूरत है कि राज्यों की पुलिस बल को और सेक्यूलर बनाने की, आईएएस और आईपीएस और विधायिका में मुस्लिमों की भागीदारी बढ़ाने की, दलितों की तरह पसमंदा मुसलमानों को नौकरियों में आरक्षण दिलाने की। ये सारी सिफारिशें जस्टिस सच्चर और जस्टिस रंगनाथ मिश्रा अपनी रिपोर्ट में कर चुके हैं। लेकिन केन्द्र सरकार ने इन सिफारिशों पर अमल करने से फिलहाल मुंह फेर रखा है।

लेकिन साम्प्रदायिक हिंसा बिल लाकर सरकार अखलियतों को रिझाने का शॉर्ट कट ढूंढ़ने की फिराक में हैं। तो क्या जनता मान ले कि इस बिल के कानून बनने के बाद देश के किसी भी राज्य में दंगे नहीं होंगे? क्या भय मुक्त समाज की परिकल्पना इस बिल के जरिये ही है। ये तो तय है कि इस बिल के जरिये हर पार्टी को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों से बदला लेने का मौका मिलेगा। क्योंकि जो आज केन्द्र की सत्ता में है वो कल विपक्ष में होगा। लेकिन सवाल आम आदमी का है। क्योंकि साम्प्रदायिक दंगों में वो ही बेबस, लाचार और सरकार की गलतियों का बोझ ढोता नजर आता है। इस बिल को पढ़कर लगता है कि निशाने पर फिर आम आदमी ही है। ((नवभारत टाइम्स से उधार))

((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN-7 के एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))

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One Response to तो क्या अब दंगे नहीं होंगे?

  1. सुशांत झा Reply

    December 10, 2009 at 12:50 pm

    इसे कहते हैं सियासत का शर्टकट…और कांग्रेसे तो इसमें सिद्धहस्त है। ये वैसा ही कुछ मामला है जैसे शहरीकरण की व्यापक योजना बनाने के वजाय धड़ाधड़ कच्ची कालनियों को नियमित कर दिया जाता है। अब सरकार भला आईपीएस में मुस्लिमों की भागीदारी तर्कसंगत स्तर तक क्यों लाने लगी-जबकि उसे पता है कि इस तरह के आरक्षण के लिए एक तो कोर्ट की इजाजत नहीं मिलेगी और अगर 50 फीसदी के अंदर आरक्षण दे भी दिया तो देशभर के पिछड़े- दलित नाराज हो जाएंगे। तो इसका एक ही सस्ता उपाय है कि कानून बना दो कि अकलियतों अगर दंगा हुआ तो ये कांग्रेस की सरकार बिना मोदी की इजाजत के ही सीआरपीएफ भेज देगी। मान लीजिए..कल को मोदी ही पीएम बन जाए तो क्या होगा? फिर तो वो सीआरपीएफ…राजपथ पर पैरेड करती हुई ही नजर आएगी। कुल मिलाकर ये बिल एक झुनझुना से कम नहीं जिसे सिर्फ सेक्यूलर सरकारे ही दिल्ली बजा पाएंगी-वो भी तब जब वे राजनीतिक रुप से अनूकूल हालत में हो। असली बात जो पुलिस सुधार की है उस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। आयोगों की रपटे धूल फांक रही है कि देश में पुलिस व्यवस्था में सुधार किया जाए-जिस पर कोई नेता नहीं सोचता। सब सोचता है कि जब मैं सीएम बनूंगा तो फिर पुलिस को डंडा से कैसे हांक पाऊंगा। वक्त आ गया है कि चुनाव आयोग की तरह हरेक राज्या में पुलिस नियामक आयोग हो इसमें सीएम, विपक्ष का नेता, हाईकोर्ट के जज और कुछ बुद्दिजीवियों को शामिल किया जाए। इसके आलावे भी बहुत सारे पुलिस सुधार करने की जरुरत है।

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