ग्लोबल टेलीविजन ने विभाजनकारी भूमिका आरंभ कर दी है। तेलंगाना के सवाल पर जिस तरह का कवरेज आया है वह चिंता की बात है। उससे तीन सवाल पैदा हुए हैं। पहला – क्या तेलंगाना आंदोलन पर जिम्मेदार टीवी कवरेज आया ? दूसरा – कांग्रेस और बीजेपी टेलीविजन के दबाव में आकर राजनीतिक फैसले क्यों लेते हैं? और तीसरा सवाल यह कि राजनीतिक फैसले, खासकर विभाजनकारी मसलों को प्रभावित करने में ग्बोबल मीडिया किस तरह की भूमिका निभाता है?
टीवी कवरेज ने विभाजनकारी तेलंगाना विवाद को वैध बनाया। तेलंगाना के आंदोलन में निहित अतार्किक समझ को वैध बनाया। यह भ्रम पैदा किया तुरंत फैसला करो। बगैर सोचे फैसला करो। केन्द्र सरकार ने अपनी राजनीतिक समझ को चैनलों के कवरेज के आधार वैध बनाया। सच यह है कि तेलंगाना राज्य बन नहीं सकता। यह मसला वर्चुअल मीडिया ने बनाया और इसके ही आधार पर कांग्रेस और भाजपा ने इसके पक्ष में फैसला लिया। ग्लोबल मीडिया आमतौर पर इस तरह के मसलों पर सारी दुनिया में विभाजनकारी भूमिका अदा करता रहा है। भारत में भी वह यही कर रहा है।
मीडिया कवरेज की गर्मी से प्रभावित दलों ने सोचा ही नहीं कि राजनीतिक फैसले मीडिया के द्वारा नहीं बल्कि राजनीतिक यथार्थ के आधार पर लिए जाते हैं। राजनीतिक यथार्थ मीडिया मे नहीं उसके बाहर सामाजिक जीवन में होता है। इस प्रसंग में चैनलों की राजनीतिक प्रस्तुतियां फेक रही हैं। उन्होंने तेलंगाना बनने के दुष्परिणामों को छिपाया।
उल्लेखनीय टीवी इमेज की जानलेवा क्षमता होती है। इमेज स्वयं की हत्या करती है। मॉडल की हत्या करती है। पहचान की भी हत्या करती है। चैनलों ने जो दिखाया है उसने तेलंगाना की हत्या कर दी है। तेलुगु अस्मिता की हत्या कर दी है। जो दिखाया जा रहा है उसके बारे में हमें मध्यस्थों के द्वारा जानकारियां मिलती रही हैं। अब सही और गलत क्या है, इसके बीच अंतर करना मुश्किल हो गया हैं।
तेलंगाना का संकेत सभी किस्म के संदर्भों की मौत की सूचना है। वादी और प्रतिवादी का टीवी प्रतिनिधित्व सभी किस्म के अनुकरण को निगल गया है। तेलंगाना की इमेज बुनियादी यथार्थ का प्रतिबिम्वन है। लेकिन टीवी में वह बुनियादी यथार्थ अपने को पलटता है। उसे मुखौटे प्रदान करता है। यह बुनियादी यथार्थ की अनुपस्थिति का मुखौटा है। उसका किसी भी किस्म के यथार्थ से कोई संबंध नहीं है। यह फेक का शुध्द अनुकरण है।
आज के युग की सबसे बड़ी चुनौती वस्तुगत यथार्थ नहीं है। बल्कि वस्तुगत भ्रम सबसे बड़ी चुनौती हैं। हम रहते हैं ‘रीयल टाइम’ में और गूंज हमेशा ‘बीते हुए समय’ की रहती है। आज हम वस्तुगत भ्रमों को स्वीकार करते है, वस्तुगत यथार्थ को नहीं। कॉमनसेंस की समझदारी को हम वास्तव समझ मानने लगे हैं। यह सबसे बड़ी कमजोरी है। तेलंगाना पर कामनसेंस के आधार पर फैसला लिया गया। यह फैसला राज्य बनाने के सभी वैध तरीकों को दरकिनार करके लिया गया। यह भारतीय राजनीति की सबसे घिनौनी अभिव्यक्ति है।
अब तक कांग्रेस और बीजेपी तेलंगाना के पक्ष में नहीं थे उनका मन अचानक चन्द्रशेखर राव के 11 दिन के आमरण अनशन ने बदल दिया। इन दोनों दलों ने अभी तक अपने नीतिगत बदलाव के कारण नहीं बताए हैं। खासकर कांग्रेस और बीजेपी का बदला हुआ रुख बुनियादी रुप से गलत है। ये दोनों दल अब जो कह रहे हैं उसे व्यवहार में मानते नहीं हैं। ये लोग वास्तव जिंदगी के प्रमाणों पर विश्वास नहीं करते। वे जिस यथार्थ की बात करते हैं। उसमें जीते नहीं हैं।
हमें याद रखना चाहिए कि आम लोगों की आशाएं सिर्फ यथार्थ में ही होती हैं। यथार्थ का चैरीटेबिल मंशाओं के तहत चित्रण संभव नहीं है। यथार्थ फैशन नहीं है। यह आम आदमी की जिन्दगी की जरूरत है। उसकी जिन्दगी की प्राणवायु है। जो लोग आम आदमी से उसका आंध्र यथार्थ छीनने में लगे हैं उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि आंध्र यथार्थ यदि अप्रासंगिक हो गया है। इसका अंत हो गया है तो यह बात विगत लोकसभा चुनाव के समय क्यों नहीं सोची गयी। आज चन्द्रशेखर राव के आमरण अनशन के चोर दरवाजे से तेलंगाना पाने का षडयंत्र किया जा रहा है। आम आदमी से आंध्र यथार्थ को छीनने की कोशिश क्यों की जा रही है? तेलंगाना की फेक टीवी इमेजों से आम आदमी के जीवन यथार्थ को घेर दिया गया है । यह असल में आंध्र यथार्थ के प्रति तिरस्कारभाव है।
आंध्र विभाजित न हो यह हाल में सम्पन्न लोकसभा-विधानसभा चुनाव का फैसला है उसे टीवी प्रसारणों और आमरण अनशन से बदला नहीं जा सकता। भारत का लोकतंत्र चैनलों और नपुंसक राजनीति का गुलाम नहीं है। लोकतंत्र को टीवी चैनलों के यहां बंधक नहीं रखा जा सकता,नेता चैनलों के बंधुआ हैं आंध्र की जनता नहीं। आंध्र की जनता का मौजूदा आक्रोश ग्लोबल चैनलों की गुलामगिरी के खिलाफ लोकतंत्र के हित में की गयी बगावत है।
( Prof. ) Dugdugi Prasad
December 15, 2009 at 3:00 am
Prof. Chaturvedi ji ka aalekh kewal shabdon ka mayajal hai. Kolkata men baithkar koi Telangana par likh rahen hain , kamal kar rahen hain . Ye bhi ho sakta hai ki Sri Chaturvedi ji ka koi rishta Hyderabad se ho , lekin Hyderabad Telangana nahin hai , Lekin Telangana ko Hyderabad chahiye.
Prof. Chaturvedi ji se guzarish hai ki ve Vishwavidyalayon ke Hindi vibhagon men bante ja rahe ‘ Telanganaon ‘ par kuchh likhen .
krishna kumar mishra
December 22, 2009 at 2:48 am
बिल्कुल दुरुस्त बात कही आप ने