पोट्टी श्रीरामुलु की जान व्यर्थ नहीं गयी। भूख हड़ताल के 58वें दिन जब उनकी मौत हुई तो नेहरू सरकार जागी और उसने अलग आंध्र प्रदेश बनाने की मांग तुरंत मान ली। तेलुगु भाषियों के लिए अपने नेता को खो देने का गम था मगर अपना अलग घर यानी अलग आंध्र प्रदेश पाने की खुशी भी। आज लगभग 55 साल बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम के ‘स्ट्रोक ऑफ द मिडनाइट आवर’ एलान ने आंध्र् प्रदेश के बंटवारे की चिंगारी को हवा दे दी है। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति नेता चंद्रशेखर राव भले ही तेलंगाना आंदोलन के जरिए अपनी खोयी राजनीतिक पहचान वापस पाना चाहते हों लेकिन अलग तेलंगाना की मांग उतनी ही पुरानी है जितना की आंध्र प्रदेश राज्य का अस्तित्व। आंध्र प्रदेश बनते समय हैदराबाद स्टेट (आज का तेलंगाना) नए राज्य में शामिल कर लिया गया था। मगर महज एक दशक के भीतर ही अलग तेलंगाना की मांग ने जोर पकड़ ली। 1969 में अलग तेलंगाना राज्य का आंदोलन चरम पर था। लेकिन आंदोलन की अगुवाई करते हुए प्रजा राज्यम पार्टी के चेन्नारेड्डी ने पल्टी मारी और इंदिरा गांधी से डील कर ली। आंदोलन स्थगित हुआ। चन्ना रेड्ड़ी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। समस्या टल गई। खत्म नहीं हुई।
अलग तेलंगाना का आंदोलन भाषाई अस्मिता का आंदोलन नहीं है। सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड या छत्तीसगढ़ भी भाषाई आधार पर अलग नहीं हुए। ये राज्य अपनी अलग पहचान चाहते थे। ये वो राज्य थे जहां लोग खुद को कटा-कटा सा महसूस करते थे। दिल्ली के सौतेले बर्ताव से परेशान थे। खेती और खनिज का अकूत भंडार होते हुए भी लुटी-पिटी जिंदगी बसर करते थे जहां इनके विकास की पैरवी करने वाला कोई नहीं था। जहां मूलभूत सुविधाओं की घोर कमी थी। जहां आजादी के 50 साल के बाद रेल लाइन नहीं पहुंची थी। अलग राज्य बनने से पहले भी झारखंड खनिज संपदा की खान था। मगर राज्य की पॉलिटिक्स उत्तरी बिहार की जातिगत राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती रही। न बिहार सुधरा न झारखंड के आदिवासियों का कोई भला हुआ। उल्टा, आदिवासियों का शोषण हुआ। उनकी ज़मीन से खनिज निकाल कर लोग करोड़पति बन गये। उनके आत्म-सम्मान को पैरों तले रौंदा गया। उपेक्षा के इसी इमोशन की छवि अलग गोरखालैंड, बुंदेलखंड, विदर्भ, हरित प्रदेश और बोडोलैंड की मांगों में भी देखी जा सकती है।
तब से अब तक कई नए राज्य बन चुके हैं। और कई राज्यों के भीतर ही नए राज्य की मांग भी ज़ोर पकड़ रही है। अब राहुल गांधी को लग रहा बुंदेलखंड पिछड़ा हुआ है। बुंदेलखंड को केन्द्र से हजारों करोड़ का वित्तीय पैकेज दिलवा दिया। ये बुंदेलखंड नेहरू, इंदिरा, राजीव के जमाने में भी तो था। उनकी नज़र-ए-इनायत क्यों नहीं हुई? और फिर बुंदेलखंड से सटे पूर्वांचल का क्या? जिसने देश को कई प्रधानमंत्री तो दिए, मगर वो देश के अति पिछड़े इलाके में शुमार है। विदर्भ का क्या? दिल्ली से बढ़ती दूरी पाटने की जिम्मेदारी क्या बुंदेलखंड पर आकर ख़त्म हो जाती है। तो फिर दूसरे इलाकों के साथ ये सौतेला व्यवहार क्यों? तेलंगाना में भी खनिज सम्पदा अथाह है लेकिन उसकी पहचान नक्सलियों से होती है। क्योंकि इतने सालों में केन्द्र न तो नक्सली समस्या ख़त्म कर पाया, न ही इलाके के विकास को जायज तरजीह दी। विकास का आलम ये है कि जिस तेलंगाना इलाके से 14 सांसद चुन के आते हैं वहां अब तक कोई इंडस्ट्री नहीं।
नेहरू ने पैंडोरा का जो बक्सा खोला वो आने वाली सरकारों से समेटते नहीं बन रहा। डर सिर्फ़ एक है। जो 1950 के दशक में भाषाई अस्मिता के नाम पर राज्यों का बंटवारा शुरू हुआ वो अब जातिगत ऐंगल न ले ले। क्योंकि विकास की खदबदाहट समाज के हर वर्ग-समुदाय में व्याप्त है। दरअसल आज भी विकास की रफ्तार बहुत धीमी है। विकास फाइलों में तो जरूर हैं मगर गांवो और छोटे शहरों से गायब है। ऐसे में बेहतर प्रशासन या इलाकाई अस्मिता के नाम पर ही सही अलग राज्यों के लिए झंडे बुलंद होते रहेंगे। बीच बीच में अलग कूर्ग और सौराष्ट्र का भी बुखार जोर मारता है। सरकार के सामने कैच 22 जैसी स्थित है।
ऐसी ही स्थित से नेहरू को भी रू-ब-रू होना पड़ा। अलग आंध्र प्रदेश बनाने के अलावा राज्य पुनर्गठन आयोग ने मुंबई को महाराष्ट्र से अलग रखने के प्रस्ताव दिया। इस पर कांग्रेसी भड़क उठे। मराठी अस्मिता की लड़ाई सड़कों पर लड़ी गयी। मुंबई की जनता ने नारा दिया – लाठी गोली खाएंगे, फिर भी बम्बई लाएंगे। प्रधानमंत्री नेहरू जब मुंबई पहुंचे तो उन्हें काले झंडे दिखाए गए। एक लाख बच्चो ने हस्ताक्षऱ कैम्पेन चलाया। जिसमें नेहरू के लिये मराठी में ये मैसेज था – ‘चाचा नेहरू, बम्बई देया’ । ( चाचा नेहरू बम्बई दो)। मुंबई के हुतात्मा चौक की खूनी होली में इस आंदोलन का पटाक्षेप हुआ, जिसमें 105 लोग पुलिस की गोलियों का शिकार हुए। 1960 में जब महाराष्ट्र अस्तित्व में आया तो बम्बई यानी मुंबई उसकी राजधानी बनी।
चंद्रशेखर राव के जज्बे और केन्द्र सरकार के बयान ने अलग राज्य के नए-पुराने आंदलनों को और बल दिया है। अब उत्तर प्रदेश को बुंदेलखंड, पूर्वांचल और हरितप्रदेश में विभाजित करने का प्रस्ताव खुद मुख्यमंत्री मायावती ने पेश कर दिया है। सांसद जसवंत सिंह भी पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड को लेकर उम्मीद से भरे हुए दिखे। भारत के नक्शे में अभी और तब्दीली बाकी है। सवाल बड़े और छोटे राज्य का नहीं। तेलंगाना बना तो वो दर्जन भर राज्यों से बड़ा होगा।
सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका में छोटे बड़े 50 राज्य हैं। सवाल है कि क्या आज़ादी के 62 साल बाद भी विकास के नाम पर लोगों की अपेक्षाओं, उनकी जायज भावनाओं और महत्वकांक्षाओं का दमन किया जा सकता है। लोगों को वो विकास क्यों न मिले जिसके वो हकदार हैं? क्योंकि राजनीतिक दलों के चुनावी एजेंडे में भी पृथक राज्य का मुद्दा शामिल रहा। उस एजेंडे पर उन्होंने चुनाव जीते भी। मगर फिर अपने वायदे से ऐसे पीछे हटे मानो कभी किया ही न हो। कब तक जनता को वायदों का झुनझुना पकड़ा कर उनसे मुंह फेरा जायेगा? ये कैसी संवादहीनता है? इंटरनेट के ज़रिये तो पूरे विश्व से जुड़ गए, बस अपनों से ही संवाद टूट गया। (यह लेख आज हरिभूमि में छपा है)
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN-7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
krishna kumar mishra
December 17, 2009 at 9:52 pm
जनाब अब और लूट बढ़ेगी, हां इतना जरूर है जो अभी तक जूठन पाते थे अलग टुकड़ों में उनकी अहमियत बढ़ जायेगी और मलाई खाने लगेगे, चलिए कुछ लोगों का ही सही अरबपतियॊ की तादाद तो बढ़ेगी।, विकास नही है इसके लिए व्यवस्था जिम्मेदार, लोग तो वही रहेंगे लकीरे खींच देने से क्या होगा