जब रोम जल रहा है, नीरो मिट्टी का तेल डाल रहा है. जहां धुंआ उठ रहा है वहां हवा कर रहा है. बची हुई नमी को सूखा कर रहा है और जलाने पर पूरा-पूरा आमादा है. इतिहास की घटना का मुहावरा पंचटीला की पहाड़ियों पर उतर रहा है. गांधी के नाम पर बने विश्वविद्यालय में गांधी का रास्ता चुक रहा है, दम तोड़ रहा है.
कुछ ऐसी ही स्थिति है महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा की जहाँ पिछले आठ दिनों से छात्र आमरण अनशन पर हैं. जिसमे दो छात्र राहुल काम्बले, ओम प्रकाश वैरागी अस्पताल में भर्ती कराये जा चुके हैं और ओम प्रकाश वैरागी की हालत गम्भीर है. इस बीच लाखों रूपये खर्च करके किया जाने वाला आडम्बरपूर्ण कार्यक्रम दीक्षांत समारोह खत्म हो चुका है और कुलपति विभूति नरायण राय इस स्थिति को ऐसा ही छोड़ विश्वविद्यालय से बाहर चले गये हैं.
अनुवाद विद्यापीठ के प्रमुख प्रो. आत्म प्रकाश श्रीवास्तव द्वारा दलित छात्र राहुल काम्बले के उत्पीड़न व विभाग में प्रवेश न दिये जाने की वज़ह से शुरू हुए इस अनशन को वि.वि. प्रशासन स्थानीय अखबारों में झूठा आरोप बता कर ख़ारिज कर रहा है. जबकि वि.वि. में आत्म प्रकाश का ब्रहमणवादी रवैया पिछली कई घटनाओं के आधार पर उजागर हो चुका है. प्रशासन के उच्च अधिकारी इस मसले को सुलझाने के पक्ष में भी नहीं हैं क्योंकि वे इसे अपने प्रतिष्ठा का मसला मान रहे हैं जबकि दूसरी तरफ एक दलित छात्र का उत्पीड़न उन्हें स्वाभाविक सा प्रतीत हो रहा है. शायद इनकी नज़र में दलितों की कोई प्रतिष्ठा नहीं होती उच्च अधिकारियों में ज्यादातर अपने को प्रगतीशील के रूप में मानते हैं और देश दुनिया में उन्हें इसी लिहाज़ से जाना भी जाता है, चाहे वह प्रतिकुलपति नदीम हसनैन हों या फिर कुलपति विभूति नरायण राय. पर क्या यह एक तरह का सवर्णवाद नहीं है? जहां तीन माह से उत्पीड़ित होता रहे, कोई छात्र आमरण अनशन पर बैठे और आमरण अनशन के स्थगन के बिना उच्चाधिकारी किसी कार्यवाही पर राजी न हों. यह मसला वि.वि. के सवर्णवादी रुख को ही इंगित करता है जिसकी उम्मीद यहां के छात्र और बाहरी समाज बतौर कुलपति विभूति नरायण राय से नहीं करता.
वि.वि. के ही भाषा प्रौद्योगिकी नामक विभाग में दो ऐसी छात्राओं का प्रवेश लिया जाता है जो साक्षात्कार में सम्मलित नहीं थीं. जिनका नाम गुंजन शर्मा और अर्चना शर्मा है. यह प्रवेश किस आधार पर किया जाता है? बतौर प्रतिकुलपति यह प्रवेश विभाग प्रमुख की नीयत के आधार पर हुआ है उन्होंने चाहा और प्रवेश ले लिया गया. इस चाहने के पीछे का क्या कारण था? कि ये दोनों छात्रायें सवर्ण थी और प्रमुख महेन्द्र पाण्डेय भी सवर्ण और नीयत बन गयी.
दरअसल प्रतिकुलपति के द्वारा कहे हुए इसी वाक्य को राहुल काम्बले भी कह रहा है कि नीयत की व्याख्या करके देखा जाय कि उसके विभागाध्यक्ष आत्म प्रकाश की नीयत उसके लिये क्यों ख़राब है पर प्रशासन इस पर राजी नहीं है. तो इस बात को क्यों न माना जाय कि दलित छात्रों के लिये प्रशासन की नीयत भी खराब है? आखिर किसी प्रशासन या व्यक्ति की निष्पक्षता और प्रगतिशीलता को मापने के क्या पैमाने होंगे? प्रगतिशीलता की मुहर या उसके व्यवहार?
((वर्धा मेल))
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