क्या इस बात पर देश को खुश होना चाहिए कि उड़ीसा में केंद्रपाड़ा जिले के एक मंदिर में दलितों को 900 साल बाद घुसने का मौका मिला? या फिर क्या दलितों को इस बात का जश्न मनाना चाहिए कि तमिलनाडु के नागापट्टनम जिले में एक मंदिर में 100 साल में पहली बार दलितों को अंदर पांव रखने का मौका मिला? देश के सैकड़ों मंदिरों में दलितों का प्रवेश अब भी वर्जित है। तो क्या 21वीं सदी में मंदिर प्रवेश दलित मुक्ति का एजेंडा साबित हो सकता है? जिस तरह केंद्रपाड़ा और नागापट्टनम में दलितों ने मंदिर में प्रवेश करने में कामयाबी हासिल की है, क्या वैसी ही कामयाबी के लिए देश भर के दलितों को और उनके विकास के लिए काम करने वालों को प्रयास करना चाहिए?
ये सवाल सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यहां हम देश के लगभग 16 प्रतिशत लोगों के बारे में यानी हर छह में से एक आदमी के बारे में बात कर रहे हैं। इस सवाल का महत्व इसलिए भी है क्योंकि ये बात नए समाज के निर्माण से सीधे जुड़ी है। दलितों के मंदिर प्रवेश को लेकर हिंदू समाज के एक हिस्से में हमेशा विरोध रहा है। जिन मंदिरों में दलितों को जाने की इजाजत है, वहां भी पूजा-पाठ और मंदिर के संचालन में दलितों की हिस्सेदारी नहीं है। देश के किसी भी प्रमुख मंदिर में दलित पुजारी नहीं हैं (कुछ मंदिरों में ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की गई पर वो असरदार साबित नहीं हुई) और न ही दलित किसी महत्वपूर्ण मंदिर का संचालन करते हैं। मंदिरों से जुड़ी अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी न हो तो किसी जाति समूह के मंदिर में घुसने का प्रतीकात्मक महत्व ही है। मंदिर इस देश में सिर्फ पूजापाठ की जगह नहीं हैं। खासकर बड़े मंदिरों और मठों से जुड़ी अर्थव्यवस्था भी चलती है। इस अर्थव्यवस्था पर उस इलाके के प्रभुत्वशाली लोगों और जाति समूहों का नियंत्रण होता है। क्या दलित इस स्थिति में पहुंच पा रहे हैं कि मंदिरों की अर्थव्यवस्था में उनकी हिस्सेदारी हो? अभी ये दूर की कौड़ी है।
ऐसे में 21वीं सदी में क्या दलितों को मंदिर में प्रवेश पाने के लिए जूझना चाहिए। मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए संघर्ष की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है। डॉक्टर भीम राव आंबेडकर ने नासिक के कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश के लिए पांच साल लंबा आंदोलन चलाया था। कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन और ऐसे ही कई और मंदिर प्रवेश आंदोलन कामयाब रहे, लेकिन मंदिर प्रवेश को लेकर सवर्ण हिंदू समाज की उग्र प्रतिक्रिया ने दलित मानस में काफी कड़वाहट पैदा की। इसकी एक परिणति ये हुई कि 1954 में बाबा साहब आंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया। हालांकि बाबासाहब ने धर्मपरिवर्तन का ये फैसला अपने जीवन के आखिरी दिनों में किया, लेकिन वो लंबे समय से इस विचार को आगे बढ़ा रहे थे कि दलित ऐतिहासिक रूप से हिंदू समाज का हिस्सा नहीं हैं। इसी आधार पर वो दलितों के लिए अगर चुनाव क्षेत्र मांग रहे थे, जहां दलित उम्मीदवारों के चयन के लिए सिर्फ दलित ही मतदान करें। हालांकि मोहनदास करमचंद गांधी के अनशन की वजह से आंबेडकर पूणा समझौता करने को मजबूर हुए और उन्हें ये मांग छोड़नी पड़ी।
उसके बाद 55 साल बीत गए हैं। दलित आंदोलन ने इस बीच लंबा सफर तय किया है। आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की वजह से दलितों के बीच आज एक अच्छा खासा मध्यवर्ग है। शिक्षा संस्थानों में दलितों की उपस्थिति बेहतर हुई है। समाज के कई क्षेत्रों में दलित अब प्रभावशाली नजर आते हैं। ऐसे में क्या दलितों को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि कोई मंदिर उनके साथ अछूत की तरह व्यवहार करता है? दरअसल देखा जाए तो दलित चिंताओं में ये पहलू आज काफी पीछे चला जाना चाहिए। ये दलितों के हित में है कि वो मंदिर प्रवेश जैसे प्रतीकात्मक महत्व के आंदोलनों से खुद को दूर रखें।
दलित हिंदू समाज का हिस्सा बनें इसमें इस समय दलितों का कोई हित नहीं सधता। बल्कि ये हिंदू समाज के हित में है कि दलित उनके वृहत्तर समाज का हिस्सा बने रहें। दलित चार वर्णों की व्यवस्था से बाहर के समुदाय हैं। लेकिन दलित अस्पृश्य होकर भी हिंदू धर्म के ढांचे के अंदर एक दबे-कुचले समूह के रूप में मौजदू रहें, ये प्रभावशाली जाति समूहों के हित में हैं। इसलिए आप देखेंगे कि दलितों के साथ सहभोजन से लेकर उनके मंदिर प्रवेश जैसे आंदोलनों के केंद्र में ज्यादातर सनातन धर्मी संगठन ही हैं। इन संगठनों का नेतृत्व अनिवार्य रूप से सवर्ण जाति समूहों के हाथ में है। दलितों के स्वाभिमान की लड़ाई को मंदिर प्रवेश की लड़ाई का रूप देकर आखिर उसी मंदिर व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है, जिसके संचालन में दलित दूर-दूर तक कहीं नहीं हैं। मंदिर प्रवेश आंदोलन कहीं भी मंदिरों के संचालन में हिस्सेदारी की मांग तक आगे नहीं बढ़ पाता। गांधी जी जब दलितोद्धार कार्यक्रम चला रहे थे या जब तिरुपति जैसे देश के सबसे समृद्ध मंदिर के पुजारी दलित गोविंदम कार्यक्रम के तहत मूर्तियों को लेकर दलित बस्तियों में जाते हैं तो इनके पीछे का विचार यही है कि दलितों को हिंदू धर्म के दायरे में समेटकर रखा जाए। लेकिन इसमें दलितों का क्या हित है, ये सोचना जरूरी है। आंबेडकर ने आखिरकार इस विचार को खारिज कर दिया। लेकिन दलितों का एक बड़ा तबका तब भी और अब भी मंदिरों में ही मुक्ति का मार्ग तलाश रहा है। इसलिए दलितों के मंदिर प्रवेश को लेकर आयोजनों और आंदोलनों की गुंजाइश बनी हुई है।
लेकिन नए समय में मंदिर प्रवेश दलितों के लिए मुक्ति का मार्ग नहीं हो सकता। मंदिर में जाने की सुविधा उन्हें अधिकार के तौर पर नहीं मिल रही, बल्कि हिंदू समाज के लिए ये एक रणनीतिक फैसला है। इसलिए मंदिर में दलित पुजारी नहीं होंगे और न ही वो मंदिर की जायदाद में हिस्सेदार बनेंगे। और फिर वर्तमान समय में दलितों की मुक्ति के नए मंदिर अस्तित्व में आ चुके हैं। ये मंदिर शिक्षा और विज्ञान के केंद्र हैं। शहर भी दलितों के लिए मुक्ति का मार्ग साबित हो रहे हैं।
इस सच से इनकार कैसे किया जा सकता कि अब शहरों के मंदिर में घुसने से पहले किसी से जाति नहीं पूछी जाती। शहरों में जातीय पहचान से जुड़े कई भेदभाव खत्म हो चुके हैं। बसों से लेकर ट्राम, मेट्रो और रेल में साथ बैठना अब सबकी मजबूरी है। रेस्टोरेंट्स में खाना खाने का अधिकार आपकी जेब में मौजूद पैसों और क्रेडिट/डेबिट कार्ड से तय होता है ना कि जाति से। शहरी लोकजीवन में जाति खत्म तो नहीं हुई है, लेकिन उसका महत्व निर्णायक रूप से कम हुआ है। ऐसे में गांवों के दलितों के लिए बेहतर है कि वो मंदिर में घुसने के अधिकार के आंदोलन में अपनी ऊर्जा खर्च करने की जगह शहरों की ओर भागें। और नॉलेज इकॉनमी में जगह बनानी है तो शिक्षा को लेकर अपने और परिवार में पागलपन पैदा करें। 21वीं सदी के दलितों को मंदिरों में नहीं, स्कूलों, कॉलेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों में मुक्ति मिलेगी। (यह लेख अमर उजाला में छपा है)
संजय ग्रोवर
December 18, 2009 at 9:14 pm
EK DAM SATEEK LEKH .
MANDIR-Pravesh to Gulami ki Bhul-Bhulaiya meN vapis ghus kar, bhatakne ka rasta hai.