Subscribe by Email

आखिर कौन है "मुन्नी मोबाइल"?

मुन्नी मोबाइल की सबसे बड़ी खासियत उसकी भाषा और शिल्प है, जो इसकी विषय वस्तु को पाठकों के सामने लाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस उपन्यास के केंद्र में दो पात्र हैं – आनंद भारती जो पत्रकार हैं और मुन्नी मोबाइल। पाठक भारती की नज़र से मुन्नी मोबाइल नाम की इस महिला की ज़‍िंदगी से रूबरू होता है, जिसका सफर एक सीधी-सादी नौकरानी के रूप में शुरू होकर वेश्यावृत्ति करवाने वाली महिला के रूप में अंत हुआ। इस यात्रा के दौरान लेखक बदलते मूल्यों, शहरी परिवेश, आधुनिक उपनिवेशवाद, आर्थिक मंदी, व्यवस्था की खामियों, मध्यमवर्ग के आदर्शवादी युवाओं की कुंठाओं को उजागर करता है।

उपन्यास के लेखक पेशे से पत्रकार हैं और कई शहरों में लंबे समय तक काम करते रहे हैं। इस उपन्यास में इन अनुभवों का उन्होंने भरपूर इस्तेमाल किया है। कहीं-कहीं उपन्यास में कथा सरपट भागती प्रतीत होती है। भारती की अपनी निजी समस्याएं, निजी अनुभव और उनसे जुड़े पात्र कथा को सपाट होने से बचाये रखते हैं। पर कई प्रसंग ऐसे हैं – भारती का तलाक, उनका कॉलेज जीवन में प्रेम आदि – जिनमें भारती आत्मुग्धता से ग्रस्त नजर आते हैं। सामाजिक सरोकारों वाले संवेदनशील पत्रकार के रूप में भारती के व्यक्तित्व से यह मेल नहीं खाता।
भारती और मुन्नी मोबाइल के अलावा दूसरे पात्रों के बारे में पाठक ठीक तरह से जान पाएं, इससे पहले ही कथा फिर से मुन्नी मोबाइल अथवा भारती की ओर मुड़ जाती है। ऐसा भी लगता है कि लेखक बहुत कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा कह देना चाहता है और एक चतुर गद्यकार की तरह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि 156 पृष्ठों के इस उपन्यास में ही उसके पाठकों को एक के बाद एक अलग-अलग कलेवर के प्रकरण पढ़ने को मिलते रहें ताकि उन्हें ऊब न हो। सो इसमें सुधा पांडे की कलकत्ता यात्रा, भारती का लंदन प्रवास, गुजरात के दंगों के दौरान भारती के पत्रकारिता से जुड़े अनुभवों का वर्णन भी है।

गुजरात के दंगों का वर्णन लोमहर्षक है, हालांकि कहीं-कहीं ऐसा भी लगता है कि सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता के चलते वर्णन कुछ ज़्यादा लंबा हो गया, जिससे पाठक ऊब भी सकते हैं क्योंकि इन दंगों पर पिछले कुछ बरसों में काफी विस्तृत रिपोर्टिंग हो चुकी है।
अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग बोलचाल की भाषा में भी काफी होने लगा है और ये उपन्यास भी इनसे अछूता नहीं है। इनका प्रयोग करते समय कुछ जगह ग़लतियां भी हुईं मसलन बुक सेल्फ के स्थान पर बुक शेल्फ होना चाहिए था। इसी प्रकार एक जगह लेखक ने लिखा है माइनस जीरो टेंपरेचर इसकी जगह जीरो से कम टेंपरेचर अथवा शून्य से कम तापमान का इस्तेमाल शायद ज़्यादा उपयुक्त हो सकता था।

उपन्यास के आरंभ में सौरभ ने स्पष्ट लिखा है कि इस उपन्यास के नायकों-खलनायकों को वह काल्पनिक कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। यह अपने आप में संकेत है कि यह उपन्यास यथार्थ के कितना करीब है। (एजेंसी)

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>