अपराधियों को लेकर भी मीडिया का चरित्र दोहरा है। अगर किसी साधारण शख़्स के ख़िलाफ़ अपराध साबित नहीं हुआ हो तो भी पत्रकार उसके लिए सख़्त भाषा का इस्तेमाल करते हैं। एक तरीके से अपराधी घोषित कर देते हैं। लेकिन अगर वही शख़्स ताक़तवर हो तो पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की भाषा बदल जाती है। चाहे उस शख़्स का जुर्म साबित ही क्यों न हो गया हो। चाहे अदालत ने उसे गुनहगार ठहरा कर सज़ा ही क्यों न सुना दी हो।
ताज़ा मामला हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर से जुड़ा है। राठौर ने 19 साल पहले एक 14 साल की नाबालिग लड़की रुचिका गेहरोत्रा से छेड़खानी की थी। और मामला दर्ज होने के बाद इस वहशी दरिंदे ने रुचिका और उसके घरवालों को मानसिक यंत्रणा दी। अपने पुलिसिया ताक़त के जोर पर उनकी ज़िंदगी नर्क बना दी। आखिर में रुचिका ने 17 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली। राठौर के कुकर्मों की वजह से एक परिवार बर्बाद हो गया जबकि राठौर की तरक्की होती चली गई। सत्ता और नेताओं से गठजोड़ का फायदा उठा कर वह हरियाणा का डीजीपी बना और 2002 में सेवानिवृत हुआ।
उस मामले में 19 साल तक कानूनी लड़ाई चली और अब राठौर का गुनाह साबित हो गया है। वह अपराधी है। उसने एक नाबालिग का यौनशोषण किया है। एक बच्ची को मौत के मुंह में ढकेला है। एक परिवार को बर्बाद किया है। लेकिन हमारी अदालत ने उसे छह महीने की सज़ा दी है और अख़बारों में उसके लिए सम्मानपूर्वक भाषा का इस्तेमाल हो रहा है। उन्हें, उनके … और हैं… जैसे संबोधन का इस्तेमाल हो रहा है।
इसमें किसी एक अख़बार का नाम लेना सही नहीं होगा। दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, नई दुनिया समेत ज़्यादातर अख़बारों का रवैया एक सा है। सिर्फ़ दैनिक भास्कर ने ही इस घिनौने अपराध और अपराधी के लिए सही भाषा का इस्तेमाल किया है। टेलीविजन चैनलों में टाइम्स नाउ ने आक्रामक स्टैंड लिया। अर्णव ने अपने कार्यक्रम में पुलिस से लेकर न्यायिक व्यवस्था की कड़े शब्दों में खिंचाई की। उसके लिए अर्णव और टाइम्स नाउ की तारीफ़ होनी चाहिए।
रुचिका छेड़खानी और आत्महत्या के मामले में आया फ़ैसला हमारी पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाता है। न्यायिक तंत्र जिसमें न्यायपालिका से लेकर जांच एजेंसियां और पुलिस शामिल हैं। इस फैसले से साबित होता है कि हमारा न्यायिक तंत्र किस कदर सड़ चुका है। इस वारदात और इसमें 19 साल बाद आए फै़सले का विश्लेषण जिस कठोर तरीके से होना चाहिए, वो हुआ नहीं है। लगता है कि मीडिया ने न्यायिक व्यवस्था कि समीक्षा का एक मौका आसानी से गंवा दिया है।
एक नज़र अख़बारों के कवरेज पर

दैनिक जागरण

नई दुनिया

दैनिक भास्कर
ajit anjum
December 22, 2009 at 9:59 pm
समरेन्द्र
ये कहना गलत है कि मीडिया ने राठौर को बख्श दिया . हो सकता है किसी अखबार की हेडिंग उतनी तल्ख न हो , लेकिन टीवी चैनलों ने दो दिन से राठौर के खिलाफ मुहिम चला रखी है .कुछ अखबारों ने भी बहुत सख्त लाइन ली है . कल रात टाइम्स नाऊ से लेकर कुछ हिन्दी चैनलों ने राठौर को मिली मामूली सजा के खिलाफ मोर्चा खोला . आज सुबह से तो करीब करीब सभी चैनल बहुत आक्रामक हैं . हमने तो कल से आजतक कम से कम पांच घंटे इसी मुद्दे पर बुलेटिन बनाया और अपनी मर्यादा में रहकर जितनी निंदा कर सकते थे , उतनी की . 19 साल के बाद छह महीने की सजा को महज धोखा है . मीडिया ने इस मामले में जिम्मेदारी निभाई है . इक्के दुक्के उदाहरण देकर आप पूरी मीडिया के तेवर को नजरअंदाज मत करिए . मैंने कम से 15 अखबार भी देखे हैं और चैनल तो दिन -रात देखता ही हूं . चैनलों के तेवर की तो तारीफ होनी चाहिए दोस्त , लेकिन आपने शायद चैनल देखे नहीं . रंजना कुमारी , नीलम कटारा , इंदिरा जयसिंह , कामिनी जयसवाल , गिरिजा व्यास , मधु किश्वर से लेकर कई नामचीन महिलाएं न्यूज चैनल्स पर गेस्ट के रूप में मौजूद रही हैं . मेरे चैनल पर ही इनमें से पांच महिलाओं का पैनल था . कल भी हमने काफी दिखाया . सजा को नाकाफी बताते हुए राठौर को और कड़ी सजा देने को लेकर मुहिम चलाई .
ajit anjum
December 23, 2009 at 4:27 pm
इस मामले को मीडिया पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ उठाया है . आज तीसरे दिन भी अखबारों और न्यूज चैनल्स पर ये रूचिका से साथ हुई नाइंसाफी का मामला छाया है . कोर्ट के फैसले के बाद हंसते हुए पूर्व डीजीपी राठौर की बेशर्मी और कानून को अपने ठेंगे पर रखने की उनकी हिमाकत को मीडिया ने खूब उछाला है .कई न्यूज चैनल्स ने इस राठौर को मिली मामूली सजा के खिलाफ लगातार मुहिम चला रखी है . अब क्या चाहते हैं ? मीडिया इससे ज्यादा क्या कर सकता है ? सच तो ये है कि आज से करीब 19 साल पहले जब ये मामला हुआ था , तब टीवी तो था नही , अखबार भी इतने नहीं थे , या कहें राष्ट्रीय फलक पर फैले हुए नहीं थे . मैं कह नहीं सकता उस समय मीडिया ने इस मामले को कितना उठाया था , लेकिन आज तो मैं कह सकता हूं कि मीडिया की भूमिका यकींनन सराहनीय है .
अगर मीडिया ने इस मामले को नहीं उठाया होता तो पूरे देश को पता भी नहीं चलता कि रूचिका की एक दोस्त कैसे विदेश में रहते हुए भी मुकदमा लड़ती रही . रुचिका की दोस्त के मां- बाप कैसे पूरे राठौर को सजा दिलाने के लिए इतने सालों तक कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते रहे . रूचिका के मामले में कैसे कानून को ठेंगे पर रखा गया और एक आईजी ( तब राठौर आईजी था ) ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए रूचिका की जीना हराम सिर्फ इसलिए कर दिया क्योंकि वो उनके इशारों पर नाचने को तैयार नहीं थी . उस मासूम लड़की ने राठौर की करतूतों के खिलाफ लड़ने का फैसला किया था . कैसे सरकारी तंत्र ने पूरे मामले में लीपापोती की और रूचिका को खुदकुशी करनी पड़ी . ये सब मीडिया के जरिए ही तो पता चला .
मीडिया का काम है कि किसी भी मामले को उठाना और सिस्टम को झकझोरना . मुझे लगता है कि मीडिया ने ये काम बखूबी किया है . इसके बाद का काम सरकार और सिस्टम का है . कोर्ट का है . लेकिन इतना जरूर हुआ कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद अब अगर राठौर ऊपरी अदालत में अपील करता है तो उसे इतनी आसानी से सजा से न तो छूट मिल पाएगी , न ही वो अपनी चमड़ी बचा पाएगा . आप ऐसे किसी भी मामले को उठाकर देख लीजिए . चाहे प्रियदर्शिनी मट्टू केस हो या नीतीश कटारा केस या फिर बीएमडब्लू केस , मीडिया की भूमिका इतनी असरदार रही कि उसका असर मुकदमे पर पड़ा है . मीडिया ने अगर इन मामलों में जिम्मेदारी नहीं निभाई होती , समझ सकते हैं क्या होता . नीलम कटारा के साथ तो पल पल खड़ा था मीडिया . इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसे मामलों में अगर मीडिया का दबाव न हो , तो उसे आसानी से दबा दिया जा सकता है . इसके सैकड़ों उदाहरण हैं . आज जितने चैनल और अखबार हैं , अगर ये 1990 में भी होते तो राठौर शायद पहले ही नप गए होते . नही नपे होते तो कम से कम इतनी आसानी से बच नहीं गए होते .
वीरेंद्र यादव
December 23, 2009 at 7:54 pm
अजित अंजुम जी का कहना सही है। टीवी चैनलों ने इस मुद्दे पर जोरदार मुहिम चलाई है। अखबारों ने भी राठौर का पक्ष नहीं लिया। लेकिन जहां तक मैं समझ पाया हूं, लेखक का गुस्सा अखबारों के कंटेंट से ज्यादा उनकी भाषा को लेकर है। जब हम आम तौर पर किसी अपराधी को ‘आप’ कहकर संबोधित नहीं करते, तो राठौर को ऐसा क्यों कहते हैं? उसके ओहदे की वजह से ही। टीवी चैनलों पर भी कई बार एंकर और संवाददाता भले ही अनजाने में इसी तरह बात करते दिखे…उनकी बात कड़ी थी, लेकिन भाषा में सम्मान झलकता था। ऐसा कोई जानबूझकर नहीं, बल्कि शायद सब-कांशस माइंड में बैठे संस्कारों के कारण होता है। बहरहाल, मुझे लगता है कि कुल मिलाकर ऐसे मसलों पर मीडिया की मुहिम की तारीफ ही की जानी चाहिए।