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कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस

देश के महान गेंदबाज अनिल कुंबले और सियासत के माहिर खिलाड़ी लाल कृष्ण आडवाणी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन अपने-अपने क्षेत्र में ये दोनों लीडरशिप को लेकर दिलचस्प केस स्टडी बन सकते हैं।

भारत जब टेस्ट क्रिकेट में दुनिया की नम्बर वन टीम बना, तो पूर्व कप्तान कुंबले ने अपने कॉलम एक अहम बात कही…”20 महीने पहले गैरी कर्स्टन के कोच बनने के बाद पूरी टीम ने नम्बर वन बनने का सपना देखा था। मैं कप्तान के तौर पर इस हसरत का हिस्सा रहा। लेकिन नंबर वन बनने में हर किसी का योगदान रहा। इसकी एक बड़ी वजह रही कि हर किसी के मन में ये साफ था कि हमें पहुंचना कहां है। ये पहले से ही तय था कि मेरा उत्तराधिकारी कौन होगा जिससे कि ये मिशन इसी मजबूती के साथ आगे बढ़ सके” अनिल कुंबले टेस्ट कप्तानी में अपने उत्तराधिकारी महेंद्र सिंह धोनी की ओर इशारा कर रहे थे…अगर कुंबले-धोनी दौर इस बात की मिसाल है कि कैसे अगली पीढ़ी को बेटन थमाया जाना चाहिए तो अटल-आडवाणी दौर इस बात की गवाह रही कि उत्तराधिकार तय करने में लापरवाही और दिशाहीनता कैसे एक पार्टी, एक विचारधारा और एक सोच को हाशिए पर ले जाती है।

बीजेपी में लौहपुरुष माने जाने वाले आडवाणी ने सुषमा स्वराज और नितिन गडकरी को जिम्मा सौंपने के बाद एक अखबार से इंटरव्यू में कहा- “मैंने पहले ही पद छोड़ने का फैसला किया था लेकिन आरएसएस ने मुझे रोक लिया। जब उन्होंने इस प्रक्रिया की देखरेख करने का जिम्मा मुझे सौंपा तो मैंने अध्यक्ष पद के लिए नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेता पद के लिए सुषमा का नाम सुझाया। मोदी गुजरात से बाहर आने को तैयार नहीं दिखे और इसके बाद हमने गडकरी को लेकर सहमति बनाई।” आडवाणी के इस बयान से दो बातें सामने आती है। पहली बात, संगठन में यह साफ नहीं था कि नेता कब अपने उत्तराधिकारी को कमान सौंपेगा। दूसरी बात यह कि उत्तराधिकारी को लेकर तस्वीर बहुत धुंधली थी। ऐसे में आज पार्टी का जो हाल है वो हर किसी के सामने है।

किसी भी टीम, संगठन या फिर देश की तरक्की तभी होती है जब सोच, नीतियों और नीतियों पर अमल के तरीके में निरंतरता हो। ये तभी संभव है जब नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर तस्वीर साफ हो। एलन बॉर्डर, मार्क टेलर, स्टीव वॉ और अब रिकी पोटिंग…ये वो दौर था जब ऑस्ट्रेलिया विश्व क्रिकेट का सुपर-पावर रहा और हर कप्तान के कार्यकाल के दौरान ये तय था कि अगला कप्तान कौन होगा। पोटिंग को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में आए दो साल हुए थे, तभी क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने उन्हें बुलाकर ये कहा था कि “तुम अगले लीडर हो। नशे की लत से बचो और इसमें हम पूरा साथ देंगे।“ माइकल क्लार्क ने करियर की शुरुआत ही की थी और उन्हें अगले लीडर के तौर पर ट्रेनिंग दी जाने लगी। दक्षिण अफ्रीका ने भी जब शॉन पोलक को कप्तानी से हटाने का फैसला किया तभी कैलिस समेत कई सीनियर क्रिकेटरों के रहते नौजवान ग्रीम स्मिथ को ये जिम्मेदारी दे दी। ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका विश्व क्रिकेट में कहां है ये जगजाहिर है।

अब इसकी तुलना भारत से करते हैं। टैलेंट की बात करें तो भारत कई साल से कंगारू और प्रोटियाज से आगे हैं। लेकिन कप्तान की कुर्सी की बात करें तो किसी दौर में ये गावस्कर-कपिल के बीच म्युजिकल चेयर रहा तो कभी सचिन-अजहर के बीच। भारतीय क्रिकेट में लीडरशिप को लेकर सोच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्वर्गीय राज सिंह डुंगरपुर अचानक अजहर से पूछते हैं कि – मियां कप्तान बनोगे और फौरन अपना फैसला सुना देते हैं। लीडरशिप और दृष्टि को लेकर सोच सौरव गांगुली के जमाने से साफ़ हुई और द्रविड़-कुंबले-धोनी के बीच जब बेटन निरंतरता से आगे बढ़ा तो भारत टेस्ट में नम्बर वन टीम बना।

टीम इंडिया की तरह बीजेपी ने अपना स्वर्णिम दौर तभी देखा जब अटल-आडवाणी को लेकर पार्टी के विचार साफ थे। अटल को पूरे देश में पार्टी के सर्वमान्य चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया गया तो आडवाणी पार्टी के अंदर कार्यकर्ताओं के मुखिया थे। अटल-आडवाणी की वजह से बीजेपी का नेतृत्व मजबूत था तो दूसरी पांत में काफी ताकतवर नज़र आती थी। प्रमोद महाजन, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू हर किसी की भूमिका तय थी। इन दोनों पंक्तियों के बीच कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिंह भंडारी, जना कृष्णमूर्ति जैसे लोग थे, जो अनुभवी तो थे, लेकिन जिनके कार्यक्षेत्र तय कर दिए गए थे…ये मार्डन मैनेजमेंट की भाषा में मेनटोर के रोल में चले गए। सत्ता खोने और वाजपेयी के जाते ही जैसे ही चेन ऑफ कमांड बिगड़ा पूरा संगठन ताश की पत्तों की तरह गिरता चला गया।

क्रिकेट जैसे खेल में टीम के सोचने के तरीके से मैदान के बाहर समाज की मानसिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक ओर ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम है जिसमें लीडरशिप, चेन ऑफ कमांड और वीजन हर चीज तय है। कुछ-कुछ अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलियाई समाज जैसा जहां देश से लेकर पार्टी स्तर पर साफ होता है कि बेटन किसे सौंपा जाना है। इन देशों में शिखर पर बैठे किरदार भले ही बदल जाते हैं, लेकिन विदेश, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा जैसे मामलों में निरंतरता होती है.. दूसरी ओर पाकिस्तान है जहां लोकतंत्र पनप ही नहीं पाया और राष्ट्र के हर पूर्व मुखिया को या तो फांसी पर चढ़ना पड़ता है, जेल में दिन गुजारने होते हैं और या फिर देश छोड़कर भागना पड़ता है। पाकिस्तानी समाज की तरह पाकिस्तानी क्रिकेट को भी इमरान खान जैसा कद्दावर लीडर ही एक सूत्र में पिरोए रख सकता है…जिस यूनिस खान ने पाकिस्तान को टी-20 वर्ल्ड कप चैपियन बनाया और जिस यूनिस खान में ऐसा दम है जो पाकिस्तानी क्रिकेट को अगले दौर में ले जा सकता है उसका क्या बुरा हाल हुआ, इसे हर किसी ने देखा।

लीडरशिप और व्यवस्था की इन दोनों धुरियों के बीच भारत है जहां पश्चिमी देशों जैसी सोच और नीतियों में निरंतरता तो अभी नहीं आई है , लेकिन जहां पाकिस्तान जैसी अराजकता भी नहीं…भारत दुनिया का विरला ऐसा देश है जो लाख असमानताओं के बावजूद आज फलता-फूलता लोकतंत्र है.। भय और भूख से संघर्ष करता हुआ ये देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसपर हमें गर्व होना चाहिए, लेकिन अब जरूरी है कि हम सभ्यता की सीढी में दूसरा कदम रखे। भारत सुपरपावर बन पाएगा या नहीं, इस दिशा में ये निर्णायक कदम होगा।

विश्व में समाजशास्त्रियों का एक स्कूल समाज के विकास को मापने का तीन पैमाना मानता है। पहला, किसी समाज में उत्तराधिकार का फैसला कैसे होता है। दूसरा, समाज के शिखर पर बैठा नेता कब यह तय करता है कि बेटन थामने का वक्त आ गया है। तीसरा, समाज का जोर व्यवस्था पर है या व्यक्तिविशेष पर। प्राचीन भारत में अशोक साम्राज्य की कोई सानी नहीं, लेकिन ये अशोक के निधन के बाद ही खत्म हो गया क्योंकि पूरा राज्य एक व्यक्तिविशेष के करिश्मे पर आधारित था। मुगलों ने बाबर के बाद से एक व्यवस्था का विकास किया और यही वजह रही कि औरंगजेब के जाने के बाद भी मुगलिया राज को टूटने में 150 से अधिक साल लगे।

सबसे पहले बात पहले पैमने की। यह सच है कि देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई है, लेकिन यह भी सच है कि हम लोकतांत्रिक तरीके से फैसला करने से कतराते हैं। आखिर क्यों कांग्रेस हो या बीजेपी – देश की बड़ी पार्टियों में लोकतांत्रिक तरीके से आंतरिक चुनाव कराने की आदर्श परंपरा नहीं विकसित हो सकी? बीजेपी में लीडरशिप के बारे में हम चर्चा तक चुके हैं और कांग्रेस में भी ये एक परिवार तक सीमित है। 1991 में जब इस परिवार ने खुद को अलग किया तो पार्टी का बुरा हाल हम सबने देखा। आखिर क्यों आरजेडी, आरएलडी, समाजवादी पार्टी समेत अधिकतर दल अगला नेता खुद के ही खानदान में खोज लेते हैं। आखिर क्यों टीम इंडिया की कामयाबी के अनुभवों के बावजूद अबतक ये तय नहीं है कि धोनी के बाद अगला कप्तान कौन होगा?

दूसरे पैमाने की बात करें तो अब भी अधिकतर मामलों में शिखर पर लोग रोते-पिटते जाते हैं। खुशी-खुशी अलविदा नहीं कहते। राजनीति में अब भी आडवाणी, करुणानिधि और सीताराम केसरी जैसे लोग अधिक हैं और ज्योति बसु जैसे कम। क्रिकेट में कपिल और अजहर अधिक है और गावस्कर और श्रीनाथ कम। संस्थानों में नारायण मूर्ति जैसे उदाहरण भी गिने-चुने ही हैं।

अभिषेक दूबे

अभिषेक दूबे

जहां तक तीसरे पैमाने का सवाल है व्यवस्था पर जोर के तमाम उदाहरण हैं, लेकिन अभी लंबी दूरी तय करनी है।

भारत को अगर अगले और निर्णायक दौर में मजबूती से कदम रखना है… कांग्रेस, बीजेपी और लेफ्ट को भारतीय लोकतंत्र के तीन दमदार विकल्प बने रहना है… और भारतीय कंपनियों को दुनिया भर में डंका पीटना है, तो क्रिकेट में ही नहीं हर मैदान पर कुंबले मॉडल चाहिए।

((अभिषेक दूबे IBN 7 में स्पोर्ट्स एडिटर हैं))

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4 Responses to कुंबले-धोनी मॉडल से सबक लें बीजेपी और कांग्रेस

  1. वीरेंद्र यादव Reply

    December 23, 2009 at 7:45 pm

    बढ़िया विश्लेषण है। लेकिन बीजेपी को तो इसी तरह नष्ट होना है। कृष्ण की ताकत के बल पर उन्मत्त हो गए उनके वंशजों का भी यही हाल हुआ था। दूसरों को लड़ाकर राज करने की सैद्धांतिक राजनीति करने वालों का ये हश्र नहीं होगा, तो क्या होगा? जो समाज में समरसता के विरोधी हैं, नफरत को मूल्य और जीवन की ताकत मानकर चलते हैं, वो आपस में मेलजोल से कैसे रह पाएंगे? नफरत और साजिश का संस्कार मन को कलुषित करेगा, तो उसका असर तो हर तरफ दिखेगा ही।

  2. सुधीर सक्सेना Reply

    December 23, 2009 at 9:13 pm

    क्या बेकार की बात कर रहे हैं वीरेंद्र यादव। अभिषेक दूबे का विश्लेषण तो निष्पक्ष है। लेकिन आपकी टिप्पणी नहीं। लगता है आप किसी लाल झंडे वाली पार्टी के कामरेड हैं। तभी तो आपको सिर्फ बीजेपी का दोष नज़र आता है।

  3. सुशांत झा Reply

    December 23, 2009 at 10:51 pm

    बढ़िया विश्लेषण…राजनीति, क्रिकेट और कॉरपोरेट का बढ़िया तुलनात्मक अध्ययन…।

  4. विवेक Reply

    December 23, 2009 at 11:01 pm

    मैं आपकी बात से सहमत हूं। जहां कहीं भी नेतृत्व का संकट होगा वहां पर अराजकता होगी। अराजकता का नतीजा कभी अच्छा नहीं होता। बीजेपी में यही हो रहा है और पूरे देश का हाल यही है। अगर बीजेपी की बात करें तो झारखंड का ताज़ा नतीजा उसी का गवाह है। देखिए कितनी बुरी तरह पार्टी हार गई है। सब विरोधियों से नहीं बल्कि एक दूसरे से लड़ रहे थे। यशवंत सिन्हा मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। अब सारे सपन धरे रह गए। अभिषेक आपने बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। इसके लिए आपको साधुवाद। क्रिकेट और सियासत की तुलना तो लाजवाब है। मन खुश हो गया। आमतौर पर ऐसा तुलनात्मक अध्ययन पढ़ने को नहीं मिलता।

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