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मीडिया की मुहिम के बाद अब राठौर की खाल नहीं बचेगी

इस मामले (रुचिका के साथ हुई छेड़खानी और उसके बात पुलिसिया जुल्मों के जरिए उसे आत्महत्या के मुंह में ढकेलने और इस संगीन मामले में अदालत के बेतुके फैसले) को मीडिया ने पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता के साथ उठाया है। आज तीसरे दिन भी अखबारों और न्यूज चैनलों पर रूचिका से साथ हुई नाइंसाफी का मामला छाया है। कोर्ट के फैसले के बाद हंसते हुए पूर्व डीजीपी राठौर की बेशर्मी और कानून को अपने ठेंगे पर रखने की उनकी हिमाकत को मीडिया ने खूब उछाला है। कई न्यूज चैनलों ने राठौर को मिली मामूली सज़ा के ख़िलाफ़ लगातार मुहिम चला रखी है। अब क्या चाहते हैं ? मीडिया इससे ज़्यादा क्या कर सकता है ? सच तो ये है कि आज से करीब 19 साल पहले जब ये मामला हुआ था, तब टीवी तो था नहीं, अखबार भी इतने नहीं थे या कहें कि राष्ट्रीय फलक पर फैले हुए नहीं थे. मैं कह नहीं सकता उस समय मीडिया ने इस मामले को कितना उठाया था, लेकिन आज तो मैं कह सकता हूं कि मीडिया की भूमिका यकीनन सराहनीय है।

अगर मीडिया ने इस मामले को नहीं उठाया होता तो पूरे देश को पता भी नहीं चलता कि रूचिका की एक दोस्त कैसे विदेश में रहते हुए भी मुकदमा लड़ती रही । रुचिका की दोस्त के मां- बाप कैसे राठौर को सज़ा दिलाने के लिए इतने सालों तक कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाते रहे। रूचिका के मामले में कैसे कानून को ठेंगे पर रखा गया और एक आईजी ( तब राठौर आईजी था ) ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए रुचिका की जीना हराम इसलिए कर दिया क्योंकि वो उसके इशारों पर नाचने को तैयार नहीं थी। उस मासूम लड़की ने राठौर की करतूतों के ख़िलाफ़ लड़ने का फैसला किया था। कैसे सरकारी तंत्र ने पूरे मामले में लीपापोती की और रुचिका को खुदकुशी करनी पड़ी। ये सब मीडिया के जरिए ही तो पता चला।

मीडिया का काम है कि किसी भी मामले को उठाना और सिस्टम को झकझोरना। मुझे लगता है कि मीडिया ने ये काम बखूबी किया है। इसके बाद का काम सरकार और सिस्टम का है। कोर्ट का है। लेकिन इतना जरूर हुआ कि इस मामले के तूल पकड़ने के बाद अब अगर राठौर ऊपरी अदालत में अपील करता है तो उसे इतनी आसानी से सज़ा से न तो छूट मिल पाएगी, न ही वो अपनी चमड़ी बचा पाएगा।

अजीत अंजुम

अजीत अंजुम

आप ऐसे किसी भी मामले को उठाकर देख लीजिए। चाहे प्रियदर्शिनी मट्टू केस हो या नीतीश कटारा केस या फिर बीएमडब्लू केस, मीडिया की भूमिका इतनी असरदार रही कि उसका असर मुकदमे पर पड़ा है। मीडिया ने अगर इन मामलों में जिम्मेदारी नहीं निभाई होती, समझ सकते हैं क्या होता। नीलम कटारा के साथ तो पल पल खड़ा था मीडिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसे मामलों में अगर मीडिया का दबाव न हो, तो उसे आसानी से दबा दिया जा सकता है। इसके सैकड़ों उदाहरण हैं। आज जितने चैनल और अखबार हैं, अगर ये 1990 में भी होते तो राठौर शायद पहले ही नप  गया होता। नही नपा होता तो कम से कम इतनी आसानी से बच नहीं पाता।

(( वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम न्यूज़ 24 के मैनेजिंग एडिटर हैं।))

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One Response to मीडिया की मुहिम के बाद अब राठौर की खाल नहीं बचेगी

  1. Lalit Bansal Reply

    December 28, 2009 at 12:19 pm

    sabse pehle to m ye kahuga ki in police, politician, terrorist me koi khas difference nhi hai, chahe koi bhi govt. ho sab k sab apne paise kamane me lge rhte hai, ye sab log chor hai, aur hum choro se insaaf ki umeed kyo karte hai,

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