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	<title>Comments on: राठौर आदरणीय क्यों? मीडिया के भाषाई संस्कार पर सवाल</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: Lalit Bansal</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1326</link>
		<dc:creator>Lalit Bansal</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 06:45:07 +0000</pubDate>
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		<description>sabse pehle hamara system hi kharab hai, wo police wali ko fansi di jaani chahiye jo isme doshi hai, chautala, bhajanlal ko black list kar dena chahiye</description>
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		<title>By: रंगनाथ सिंह</title>
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		<dc:creator>रंगनाथ सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Dec 2009 07:44:22 +0000</pubDate>
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		<description>अभी जरूरत थी कि राठौर और उस सिस्टम के खिलाफ लिखा जाए जो ऐसे गुनाहगारों के लिए कवच का काम करता है। मीडिया की भाषा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने के लिए आप लोगों ने गलत वक्त चुना है। कुल मिला कर यहां पर अजीत अंजुम का पक्ष ही वजनी लग रहा है। मौके की नजाकत को ध्यान रखे बिना कोई बहस छेड़ देना सिनिसिज्म का लक्षण है। दिलीप जी तो सदैव सिस्टम के खिलाफ धारदार लेख लिखते रहे हैं। फिलवक्त वो न्यायपालिका या पुलिसिया उत्पीड़न या फिर अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण पर लिखते तो उनका लेख ज्यादा समीचीन होता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अभी जरूरत थी कि राठौर और उस सिस्टम के खिलाफ लिखा जाए जो ऐसे गुनाहगारों के लिए कवच का काम करता है। मीडिया की भाषा का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने के लिए आप लोगों ने गलत वक्त चुना है। कुल मिला कर यहां पर अजीत अंजुम का पक्ष ही वजनी लग रहा है। मौके की नजाकत को ध्यान रखे बिना कोई बहस छेड़ देना सिनिसिज्म का लक्षण है। दिलीप जी तो सदैव सिस्टम के खिलाफ धारदार लेख लिखते रहे हैं। फिलवक्त वो न्यायपालिका या पुलिसिया उत्पीड़न या फिर अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण पर लिखते तो उनका लेख ज्यादा समीचीन होता।</p>
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		<title>By: अजय रघुवंशी</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1324</link>
		<dc:creator>अजय रघुवंशी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Dec 2009 07:40:48 +0000</pubDate>
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		<description>अजीत जी की बात बिलकुल ठीक है। आप लोग मीडिया को बेवजह कोसना बंद कीजिए। अगर मीडिया न होता तो राठौड़ जैसे बड़े रसूख वाले शख्स पर खुलेआम उंगली उठाने और उसे कोसने का साहस कितने लोग कर पाते? और आपकी ये वेबसाइट भी तो मीडिया का ही अंग है। रहा सवाल भाषाई संस्कारों का, तो ये तो जाते-जाते जाएगा। ठीक है कि एक आम चोर को जिस तरह संबोधित करते हैं, वैसे शायद राठौड़ को नहीं किया गया। लेकिन क्या सिर्फ इसी वजह से मीडिया की सकारात्मक भूमिका को पूरी तरह खारिज कर देंगे? संजय कुमार सिंह की टिप्पणी तो ज़रूर एक पिछड़े सोच वाली दलील पेश करती है, लेकिन उसे पूरे मीडिया का दिमाग तो नहीं मान सकते। किसी बड़े अफसर, नेता या किसी भी बड़ी शख्सियत के दोषी साबित होने के बाद अचानक उसे तू-तड़ाक से संबोधित करना ही क्या सबसे ज़रूरी है?
दिलीप जी से एक सवाल है -
आप क्या चाहते हैं, चोरों को भी आप कहकर संबोधित किया जाए या चोरों की तरह ही राठौड़ का नाम भी तू-तड़ाक वाले अंदाज़ में लिया जाए? टिप्पणियों को पढ़कर ऐसा लगा कि लोग इस मसले पर कनफ्यूज़ हो रहे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अजीत जी की बात बिलकुल ठीक है। आप लोग मीडिया को बेवजह कोसना बंद कीजिए। अगर मीडिया न होता तो राठौड़ जैसे बड़े रसूख वाले शख्स पर खुलेआम उंगली उठाने और उसे कोसने का साहस कितने लोग कर पाते? और आपकी ये वेबसाइट भी तो मीडिया का ही अंग है। रहा सवाल भाषाई संस्कारों का, तो ये तो जाते-जाते जाएगा। ठीक है कि एक आम चोर को जिस तरह संबोधित करते हैं, वैसे शायद राठौड़ को नहीं किया गया। लेकिन क्या सिर्फ इसी वजह से मीडिया की सकारात्मक भूमिका को पूरी तरह खारिज कर देंगे? संजय कुमार सिंह की टिप्पणी तो ज़रूर एक पिछड़े सोच वाली दलील पेश करती है, लेकिन उसे पूरे मीडिया का दिमाग तो नहीं मान सकते। किसी बड़े अफसर, नेता या किसी भी बड़ी शख्सियत के दोषी साबित होने के बाद अचानक उसे तू-तड़ाक से संबोधित करना ही क्या सबसे ज़रूरी है?<br />
दिलीप जी से एक सवाल है -<br />
आप क्या चाहते हैं, चोरों को भी आप कहकर संबोधित किया जाए या चोरों की तरह ही राठौड़ का नाम भी तू-तड़ाक वाले अंदाज़ में लिया जाए? टिप्पणियों को पढ़कर ऐसा लगा कि लोग इस मसले पर कनफ्यूज़ हो रहे हैं।</p>
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		<title>By: ajit anjum</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1323</link>
		<dc:creator>ajit anjum</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Dec 2009 17:17:18 +0000</pubDate>
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		<description>अनिकेत तिवारी जी , पहले तो आप दिमाग से निकाल दें कि मैं संपादकत्व के बोझ से निकल नहीं पा रहा हूं या फिर मीडिया के प्रवक्ता के तौर पर बोल रहा हूं . यही आप जैसे लोगों का पूर्वग्रह है . अगर मीडिया को दिन रात पानी पी पीकर कोसने वाले और खामियां गिनाने वाले लोग पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं , अपनी निजी राय ( जो कभी - कभी भड़ास और कुंठाओं में तब्दील हो जाती है ) को पूरे देश , समाज और दर्शकों की राय मान लेते हैं , तो फिर मैं तो इस मीडिया का हिस्सा हूं . मैं अपनी बात कह रहा हूं तो आप कैसे मेरी बात को प्रवक्ता के तौर पर मान रहे हैं . इस देश की जनता और दर्शक के कितने स्वयंभू प्रवक्ता अपनी बात कह रहे हैं , हमने कहा तो क्यों एतराज . मैं खुद को कभी संपादक मानता ही नहीं हूं , एक पत्रकार हूं , जो वक्ती तौर पर हो सकता है  संपादक की भूमिका में हो , ये आप मान रहे हैं . रही बात लालू और नीतीश लिखने वाली मीडिया लाल , मुरली या नरेन्द्र क्यों नहीं लिखता . ये बड़ा अबूझ सा सवाल है . क्या लाल कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि किसी बात हो रही है ?क्या नरेन्द्र कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि मोदी की बात हो रही है?
आपकी अपनी फिलॉसफी हो सकती है कि अभिजात्य को लेकर हमारे दिलो दिमाग में बैठी ग्रंथियों की है , उसका कोई जवाब नहीं है . इंदिरा को इंदिरा कहा गया . आपको इतना तो पता ही होगा . फिरोज गांधी को फिरोज कहा गया . मोती लाल नेहरू को मोती लाल कहा गया . जेपी या जयप्रकाश कहा गया , बीजू पटनायक को बीजू कहा गया . ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं भाई साहब . सरनेम या नाम का इस्तेमाल ये भी तय करता है कि दुनिया समझ पाए कि बात किसकी हो रही है . आपने एक जजमेंट दे दिया कि मीडिया में लिखने बोलने वाले लोग भी इन्ही अभिजात्य संस्कारों से आते हैं , इसलिए वहां भी झलक मिलती है . ये आपकी राय हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर सही नहीं . मुलायम , विलास राव , शिवराज , वसुंधरा , राजनाथ , वेंकैया , सोनिया,  सुषमा ...किस  किसके नाम गिनाऊं . ये वो लोग हैं जिनके सरनेम के बगैर मीडिया इन्हें संबोधित करता है औऱ दुनिया समझ लेती है . लेकिन अगर कोई कई लोगों के नाम ऐसे हैं कि सरनेम छोड़ दें तो अधूरा हो जाएगा . जैसे सीताराम ( बगैर यचूरी के ) प्रकाश ( बगैर करात के ) हरकिशन ( बगैर सुरजीत के ) ज्योति ( बगैर )बाल ( बगैर ठाकरे के ) ...अब इसका क्या कहेंगे . मैं संजय का लेख भी पढ़ चुका हूं लेकिन उसे आप अपने संदर्भ के साथ देख रहे हैं . आपने व्यंग्य का साथ कहा है कि बहस में पुराने दोस्त होने का भी असर है . पता नहीं आप कहना क्या चाह रहे हैं . लेकिन इतना तो मुझे समझ में आ रहा है कि आप उसी पूर्वग्रही श्रेणी के हैं , जिन्हें वही नजर आता है , जो देखना चाहते हैं . बात कहां दूर तक जाती है , कहां से उसे पकड़ना है , इस पर आप विचार करें लेकिन थोड़ा खुलेपन के साथ .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अनिकेत तिवारी जी , पहले तो आप दिमाग से निकाल दें कि मैं संपादकत्व के बोझ से निकल नहीं पा रहा हूं या फिर मीडिया के प्रवक्ता के तौर पर बोल रहा हूं . यही आप जैसे लोगों का पूर्वग्रह है . अगर मीडिया को दिन रात पानी पी पीकर कोसने वाले और खामियां गिनाने वाले लोग पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं , अपनी निजी राय ( जो कभी &#8211; कभी भड़ास और कुंठाओं में तब्दील हो जाती है ) को पूरे देश , समाज और दर्शकों की राय मान लेते हैं , तो फिर मैं तो इस मीडिया का हिस्सा हूं . मैं अपनी बात कह रहा हूं तो आप कैसे मेरी बात को प्रवक्ता के तौर पर मान रहे हैं . इस देश की जनता और दर्शक के कितने स्वयंभू प्रवक्ता अपनी बात कह रहे हैं , हमने कहा तो क्यों एतराज . मैं खुद को कभी संपादक मानता ही नहीं हूं , एक पत्रकार हूं , जो वक्ती तौर पर हो सकता है  संपादक की भूमिका में हो , ये आप मान रहे हैं . रही बात लालू और नीतीश लिखने वाली मीडिया लाल , मुरली या नरेन्द्र क्यों नहीं लिखता . ये बड़ा अबूझ सा सवाल है . क्या लाल कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि किसी बात हो रही है ?क्या नरेन्द्र कहने से पूरा देश समझ जाएगा कि मोदी की बात हो रही है?<br />
आपकी अपनी फिलॉसफी हो सकती है कि अभिजात्य को लेकर हमारे दिलो दिमाग में बैठी ग्रंथियों की है , उसका कोई जवाब नहीं है . इंदिरा को इंदिरा कहा गया . आपको इतना तो पता ही होगा . फिरोज गांधी को फिरोज कहा गया . मोती लाल नेहरू को मोती लाल कहा गया . जेपी या जयप्रकाश कहा गया , बीजू पटनायक को बीजू कहा गया . ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं भाई साहब . सरनेम या नाम का इस्तेमाल ये भी तय करता है कि दुनिया समझ पाए कि बात किसकी हो रही है . आपने एक जजमेंट दे दिया कि मीडिया में लिखने बोलने वाले लोग भी इन्ही अभिजात्य संस्कारों से आते हैं , इसलिए वहां भी झलक मिलती है . ये आपकी राय हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर सही नहीं . मुलायम , विलास राव , शिवराज , वसुंधरा , राजनाथ , वेंकैया , सोनिया,  सुषमा &#8230;किस  किसके नाम गिनाऊं . ये वो लोग हैं जिनके सरनेम के बगैर मीडिया इन्हें संबोधित करता है औऱ दुनिया समझ लेती है . लेकिन अगर कोई कई लोगों के नाम ऐसे हैं कि सरनेम छोड़ दें तो अधूरा हो जाएगा . जैसे सीताराम ( बगैर यचूरी के ) प्रकाश ( बगैर करात के ) हरकिशन ( बगैर सुरजीत के ) ज्योति ( बगैर )बाल ( बगैर ठाकरे के ) &#8230;अब इसका क्या कहेंगे . मैं संजय का लेख भी पढ़ चुका हूं लेकिन उसे आप अपने संदर्भ के साथ देख रहे हैं . आपने व्यंग्य का साथ कहा है कि बहस में पुराने दोस्त होने का भी असर है . पता नहीं आप कहना क्या चाह रहे हैं . लेकिन इतना तो मुझे समझ में आ रहा है कि आप उसी पूर्वग्रही श्रेणी के हैं , जिन्हें वही नजर आता है , जो देखना चाहते हैं . बात कहां दूर तक जाती है , कहां से उसे पकड़ना है , इस पर आप विचार करें लेकिन थोड़ा खुलेपन के साथ .</p>
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	<item>
		<title>By: अनिकेत तिवारी</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1322</link>
		<dc:creator>अनिकेत तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Dec 2009 15:04:25 +0000</pubDate>
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		<description>इस शानदार बहस के लिए जनतंत्र, दिलीप मंडल और अजीत अंजुम को बधाई। सबसे दिलचस्प है दिलीप मंडल और अजीत अंजुम की बहस। दोनों की मुख्य स्थापनाएं अपनी-अपनी जगह ठीक हैं। लेकिन बहस में लगता है “पुराने दोस्त” होने का भी असर है। या फिर अजीत अपने संपादकत्व के बोझ से बाहर नहीं आ पा रहे। वरना दिलीप ने तो लिख ही दिया है कि उन्हें चैनलों के तेवर से कोई शिकायत नहीं है। वो तो इसी बहाने भाषाई संस्कारों का शाश्वत मुद्दा उठाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि दिलीप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। उनकी बात कितनी वाजिब है और भाषाई संस्कारों का पूर्वाग्रह कितना गहरा होता है वो इस लेख पर आयी संजय कुमार सिंह की टिप्पणी से साफ है। अगर अजीत इस टिप्पणी को पढ़ें और फिर अपनी संपादक और मीडिया के प्रवक्ता वाली भूमिका को थोड़ी देर के लिए छोड़कर सोचें, तो बात पूरी तरह साफ हो जाएगी। हां, इसे यूं भी कह सकते हैं कि बात सिर्फ मीडिया के नहीं, हमारे पूरे समाज के संस्कारों की है। ये संस्कार सिर्फ अपराध की खबरों में ही नहीं, वैसे भी दिखाई देता है। जैसे, हम लालू प्रसाद यादव के लिए सिर्फ “लालू” नीतीश कुमार के लिए सिर्फ नीतीश बड़ी आसानी से लिखते-बोलते हैं। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के लिए सिर्फ मुरली या नारायण दत्त तिवारी के लिए सिर्फ नारायण या लाल कृष्ण आडवाणी के लिए सिर्फ लाल या लालकृष्ण यहां तक कि नरेंद्र मोदी के लिए नरेंद्र नहीं लिखते – इनके नाम छोटे में लिखने हों तो टाइटल लिखने की पुरानी स्थापित परंपरा का ही पालन किया जाता है – मसलन जोशी, तिवारी, आडवाणी या मोदी वगैरह...हां अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का पहला शब्द एक अपवाद की तरह ज़रूर इस्तेमाल किया जाता है। यहां बात सिर्फ सवर्ण या अवर्ण की नहीं है, बात दरअसल “आभिजात्य” को लेकर हमारे दिलो-दिमाग में गहरे बैठी ग्रंथियों की है। मीडिया में लिखने-बोलने वाले लोग भी इन्हीं संस्कारों से आते हैं, इसलिए वहां भी इसकी झलक मिलती है। ये कोई सायास प्रक्रिया नहीं है...सब-कांशस माइंड में बैठा संस्कार है।
शानदार लेख के लिए दिलीप मंडल को बधाई।
अजीत अंजुम ने मीडिया की रुचिका मुहिम के बचाव में जो कहा वो भी मोटे तौर पर सही है।
लेकिन बात इससे कहीं दूर तक जाती है।
उस बात को पकड़िए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस शानदार बहस के लिए जनतंत्र, दिलीप मंडल और अजीत अंजुम को बधाई। सबसे दिलचस्प है दिलीप मंडल और अजीत अंजुम की बहस। दोनों की मुख्य स्थापनाएं अपनी-अपनी जगह ठीक हैं। लेकिन बहस में लगता है “पुराने दोस्त” होने का भी असर है। या फिर अजीत अपने संपादकत्व के बोझ से बाहर नहीं आ पा रहे। वरना दिलीप ने तो लिख ही दिया है कि उन्हें चैनलों के तेवर से कोई शिकायत नहीं है। वो तो इसी बहाने भाषाई संस्कारों का शाश्वत मुद्दा उठाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि दिलीप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। उनकी बात कितनी वाजिब है और भाषाई संस्कारों का पूर्वाग्रह कितना गहरा होता है वो इस लेख पर आयी संजय कुमार सिंह की टिप्पणी से साफ है। अगर अजीत इस टिप्पणी को पढ़ें और फिर अपनी संपादक और मीडिया के प्रवक्ता वाली भूमिका को थोड़ी देर के लिए छोड़कर सोचें, तो बात पूरी तरह साफ हो जाएगी। हां, इसे यूं भी कह सकते हैं कि बात सिर्फ मीडिया के नहीं, हमारे पूरे समाज के संस्कारों की है। ये संस्कार सिर्फ अपराध की खबरों में ही नहीं, वैसे भी दिखाई देता है। जैसे, हम लालू प्रसाद यादव के लिए सिर्फ “लालू” नीतीश कुमार के लिए सिर्फ नीतीश बड़ी आसानी से लिखते-बोलते हैं। लेकिन मुरली मनोहर जोशी के लिए सिर्फ मुरली या नारायण दत्त तिवारी के लिए सिर्फ नारायण या लाल कृष्ण आडवाणी के लिए सिर्फ लाल या लालकृष्ण यहां तक कि नरेंद्र मोदी के लिए नरेंद्र नहीं लिखते – इनके नाम छोटे में लिखने हों तो टाइटल लिखने की पुरानी स्थापित परंपरा का ही पालन किया जाता है – मसलन जोशी, तिवारी, आडवाणी या मोदी वगैरह&#8230;हां अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का पहला शब्द एक अपवाद की तरह ज़रूर इस्तेमाल किया जाता है। यहां बात सिर्फ सवर्ण या अवर्ण की नहीं है, बात दरअसल “आभिजात्य” को लेकर हमारे दिलो-दिमाग में गहरे बैठी ग्रंथियों की है। मीडिया में लिखने-बोलने वाले लोग भी इन्हीं संस्कारों से आते हैं, इसलिए वहां भी इसकी झलक मिलती है। ये कोई सायास प्रक्रिया नहीं है&#8230;सब-कांशस माइंड में बैठा संस्कार है।<br />
शानदार लेख के लिए दिलीप मंडल को बधाई।<br />
अजीत अंजुम ने मीडिया की रुचिका मुहिम के बचाव में जो कहा वो भी मोटे तौर पर सही है।<br />
लेकिन बात इससे कहीं दूर तक जाती है।<br />
उस बात को पकड़िए।</p>
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		<title>By: संजय कुमार सिंह</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1321</link>
		<dc:creator>संजय कुमार सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 19:38:25 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी अखबारों और चैनलों की भी भाषा को लेकर वैसे ही कम रोना नहीं है। उसपर आप चोर के बारे में लिखवाना चाहते हैं कि - चोर जी से चूक हो गई इसलिए बेचारे पकड़े गए वरना चोरी का उनका अनुभव तो ऐसा था कि रहने वाले भले बिहार के थे पर पंजाब में चोरी करते थे तो अंग्रेजी बोलते थे और चेन्नई में किसी की जेब काट रहे हों तो पंजाबी बोलते थे ताकि पकड़े न जाएं और कोई सबूत न छूटे।

चोर श्री फलाने महाराज एक बार गुजरात में चोरी करके मौके पर वाशिंगटन पोस्ट का इंटरनेट से निकाला प्रिंट आउट छोड़ आए तो वहां कि पुलिस ऐसे चकराई कि जांच के लिए एक टीम वाशिंगटन पोस्ट के दफ्तर में और दूसरी जेके पेपर मिल में पहुंच गई। चोर जी ने खुद कोई पढ़ाई नहीं की और पढ़ी लिखी ढिमकाना कुमारी से विवाह कर लिया। श्रीमती कुमारी ने अपने पति की रोज-रोज की गैर कानूनी कार्रवाइयों से खुश होकर उनकी पैरवी खुद ही करने का फैसला किया और वकील बन गई।

श्री फलाने महाराज को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के मौके पर उनकी पत्नी और वकील श्रीमती ढिमकाना कुमारी ने कहा है कि वे नालायक और निकम्मी पुलिस की पोल खोल कर रहेंगी और अपने योग्य व काबिल चोर पति के हक में सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगी।

दूसरी ओर, आप चाहतें हैं कि रिटायर आईपीएस अधिकारी पर छेड़छाड़ और बदसलूकी का आरोप साबित हो गया है या अदालत ने उन्हें सजा दे दी है तो उनके बारे में खबर इस तरह छपे - पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगा। राठौर ने कहा कि उसे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उसकी लड़ाई जारी रहेगी और वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकता है।

बताइए कौन चोर सुप्रीम कोर्ट गया है जिसे अखबारों ने सम्मान दिया है। किस चोर ने न्यायपालिका पर भरोसा जताया है, छेड़खानी के कितने अभियुक्त आईपीएस हैं, कितने अभियुक्तों की पत्नी वकील हैं। मेरे ख्याल में इस टक्कर के अपराधी चार्ल्स शोभराज और नटरवाल ही हैं। और इनके लिए मीडिया ने सम्मान सूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ अभियुक्त हैं पर वे पूर्व डीजीपी भी हैं और जिस समाज ने करीब 30 साल के उनके कैरियर के दौरान उन्हें सम्मान दिया है वो एक दिन में खत्म नहीं हो जाएगा। आपने जितने उदाहरण दिए हैं उससे भी यह लगता है कि जो हुआ वह सामान्य है। वरना आपको इतने उदाहरण नहीं मिलते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी अखबारों और चैनलों की भी भाषा को लेकर वैसे ही कम रोना नहीं है। उसपर आप चोर के बारे में लिखवाना चाहते हैं कि &#8211; चोर जी से चूक हो गई इसलिए बेचारे पकड़े गए वरना चोरी का उनका अनुभव तो ऐसा था कि रहने वाले भले बिहार के थे पर पंजाब में चोरी करते थे तो अंग्रेजी बोलते थे और चेन्नई में किसी की जेब काट रहे हों तो पंजाबी बोलते थे ताकि पकड़े न जाएं और कोई सबूत न छूटे।</p>
<p>चोर श्री फलाने महाराज एक बार गुजरात में चोरी करके मौके पर वाशिंगटन पोस्ट का इंटरनेट से निकाला प्रिंट आउट छोड़ आए तो वहां कि पुलिस ऐसे चकराई कि जांच के लिए एक टीम वाशिंगटन पोस्ट के दफ्तर में और दूसरी जेके पेपर मिल में पहुंच गई। चोर जी ने खुद कोई पढ़ाई नहीं की और पढ़ी लिखी ढिमकाना कुमारी से विवाह कर लिया। श्रीमती कुमारी ने अपने पति की रोज-रोज की गैर कानूनी कार्रवाइयों से खुश होकर उनकी पैरवी खुद ही करने का फैसला किया और वकील बन गई।</p>
<p>श्री फलाने महाराज को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के मौके पर उनकी पत्नी और वकील श्रीमती ढिमकाना कुमारी ने कहा है कि वे नालायक और निकम्मी पुलिस की पोल खोल कर रहेंगी और अपने योग्य व काबिल चोर पति के हक में सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगी।</p>
<p>दूसरी ओर, आप चाहतें हैं कि रिटायर आईपीएस अधिकारी पर छेड़छाड़ और बदसलूकी का आरोप साबित हो गया है या अदालत ने उन्हें सजा दे दी है तो उनके बारे में खबर इस तरह छपे &#8211; पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील दायर करेगा। राठौर ने कहा कि उसे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उसकी लड़ाई जारी रहेगी और वह सुप्रीम कोर्ट भी जा सकता है।</p>
<p>बताइए कौन चोर सुप्रीम कोर्ट गया है जिसे अखबारों ने सम्मान दिया है। किस चोर ने न्यायपालिका पर भरोसा जताया है, छेड़खानी के कितने अभियुक्त आईपीएस हैं, कितने अभियुक्तों की पत्नी वकील हैं। मेरे ख्याल में इस टक्कर के अपराधी चार्ल्स शोभराज और नटरवाल ही हैं। और इनके लिए मीडिया ने सम्मान सूचक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौड़ अभियुक्त हैं पर वे पूर्व डीजीपी भी हैं और जिस समाज ने करीब 30 साल के उनके कैरियर के दौरान उन्हें सम्मान दिया है वो एक दिन में खत्म नहीं हो जाएगा। आपने जितने उदाहरण दिए हैं उससे भी यह लगता है कि जो हुआ वह सामान्य है। वरना आपको इतने उदाहरण नहीं मिलते।</p>
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	<item>
		<title>By: dilip mandal</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1320</link>
		<dc:creator>dilip mandal</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 16:30:20 +0000</pubDate>
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		<description>भाषा हमेशा सत्ता संरचना का हिस्सा होती है। इसका असर मीडिया पर भी दिखता है, हमारी बातचीत में भी और हमारी गालियों तक में(ज्यादातर गालियां महिलाओं और उनके अंगों को लक्षित कर यूं ही नहीं दी जाती)। मैंने एक बार किसी जगह एक उदाहरण देते हुए कहा था कि पत्नी बाजार से सब्जी लेकर आई और पति ने खाना पकाया तो पूरा सभागृह ठठाकर हंस पड़ा। दफ्तर में किसी खास चपरासी को जी और किसी को नाम से क्यों बुलाया जाता है, जैसी गुत्थियां भारतीय समाज की विशिष्टताओं को रेखांकित करती हैं। कोड़ा और सुखराम के लिए हम एक भाषा का इस्तेमाल नहीं कर पाते। मायावती और अटल बिहारी वाजपेयी भाषा की तराजू पर बराबर नहीं तुलते।

कल्पना कीजिए कि देश की राजधानी का नाम दरभंगा होता तो भी क्या बिहारी उच्चारण के लिए लोगों को गालियां सुननी पड़ती?

भाषा में जटिलताओं की बहुलता है। पंजाब के अखबारों में मैंने ऐसे प्रयोग देखे हैं कि लुटेरे अच्छी हिंदी बोल रहे थे। बिहारी और पूरबिया लोगों को नापने का ये भाषाई शिष्टाचार अद्भुत है। इस बारे में बातचीत शुरू करने के लिए मेरी तैयारी शायद नाकाफी हैं। ये कदाचित बड़े शोध का विषय है जिसे फास्टफूड अंदाज में निबटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। राठौर मामला सिर्फ एक ट्रिगर था, इस चर्चा के लिए। बात न यहां शुरू हुई है और न उसे यहां खत्म होना चाहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाषा हमेशा सत्ता संरचना का हिस्सा होती है। इसका असर मीडिया पर भी दिखता है, हमारी बातचीत में भी और हमारी गालियों तक में(ज्यादातर गालियां महिलाओं और उनके अंगों को लक्षित कर यूं ही नहीं दी जाती)। मैंने एक बार किसी जगह एक उदाहरण देते हुए कहा था कि पत्नी बाजार से सब्जी लेकर आई और पति ने खाना पकाया तो पूरा सभागृह ठठाकर हंस पड़ा। दफ्तर में किसी खास चपरासी को जी और किसी को नाम से क्यों बुलाया जाता है, जैसी गुत्थियां भारतीय समाज की विशिष्टताओं को रेखांकित करती हैं। कोड़ा और सुखराम के लिए हम एक भाषा का इस्तेमाल नहीं कर पाते। मायावती और अटल बिहारी वाजपेयी भाषा की तराजू पर बराबर नहीं तुलते।</p>
<p>कल्पना कीजिए कि देश की राजधानी का नाम दरभंगा होता तो भी क्या बिहारी उच्चारण के लिए लोगों को गालियां सुननी पड़ती?</p>
<p>भाषा में जटिलताओं की बहुलता है। पंजाब के अखबारों में मैंने ऐसे प्रयोग देखे हैं कि लुटेरे अच्छी हिंदी बोल रहे थे। बिहारी और पूरबिया लोगों को नापने का ये भाषाई शिष्टाचार अद्भुत है। इस बारे में बातचीत शुरू करने के लिए मेरी तैयारी शायद नाकाफी हैं। ये कदाचित बड़े शोध का विषय है जिसे फास्टफूड अंदाज में निबटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। राठौर मामला सिर्फ एक ट्रिगर था, इस चर्चा के लिए। बात न यहां शुरू हुई है और न उसे यहां खत्म होना चाहिए।</p>
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		<title>By: Vibha rani</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1319</link>
		<dc:creator>Vibha rani</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 12:21:32 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=4108#comment-1319</guid>
		<description>बहुत अच्छे, धान से चावल निकल जाने के बाद भी भूसे को पीटते रहने की हमारी आदत ज़िन्दाबाद! कभी मौका लगे तो http://chhammakchhallokahis.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html भी पढ लें. आदर देना तो हमारे खून में है. सुना नहीं है- एक संत जा रहे थे, एक मुसाफिर आ रहा था. यही तो है खास और आम का फर्क़. और दिलीप जी के आशय पर जाएं, ना कि विषयांतर हों.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छे, धान से चावल निकल जाने के बाद भी भूसे को पीटते रहने की हमारी आदत ज़िन्दाबाद! कभी मौका लगे तो <a href="http://chhammakchhallokahis.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html" rel="nofollow">http://chhammakchhallokahis.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html</a> भी पढ लें. आदर देना तो हमारे खून में है. सुना नहीं है- एक संत जा रहे थे, एक मुसाफिर आ रहा था. यही तो है खास और आम का फर्क़. और दिलीप जी के आशय पर जाएं, ना कि विषयांतर हों.</p>
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		<title>By: ajit anjum</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1318</link>
		<dc:creator>ajit anjum</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 11:21:08 +0000</pubDate>
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		<description>तो दिलीप जी आपके कहने का मतलब ये हुआ कि चूंकि मीडिया ने राठौर के लिए उसने की उन्होंने का इस्तेमाल किया है , इसलिए सब किया धरा बेकार है . उन्होंने की जगह उसने कह देते तो सब ठीक हो जाता . वैसे आपकी जानकारी के लिए उसने भी कहा जा रहा है . लेकिन क्या मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका उसने और उन्होंने जैसे शब्दों के बीच तय होनी है ?  अगर आपके पास फुर्सत हो तो आज शाम से न्यूज चैनल देखना शुरू कीजिए . देर से ही सही . आपके सवालों का जवाब मिल जाएगा . हमारे चैनल पर भी और सीएनएन आईबीएन से लेकर आईबीएन -7 और बाकी चैनलों पर भी . मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप किस तीखापन की उम्मीद मीडिया से कर रहे हैं . मिर्ची लेकर राठौर को दिखाने से तीखापन तो नहीं आने वाला है . आप लोग जिस तरह की भाषा इस्तेमाल करने के लिए मीडिया की आलोचना करते रहे हैं , वही भाषा इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं . चलिए आप अपनी बात कहते रहिए , हम तो यही कहेंगे कम से कम रूचिका के मामले में मीडिया ने अपना काम जरूर किया और बेहतर ढंग से किया . आगे भी करेगा , इसी उम्मीद के साथ कि रूचिका को इंसाफ मिले और राठौर के सख्त से सख्त सजा .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>तो दिलीप जी आपके कहने का मतलब ये हुआ कि चूंकि मीडिया ने राठौर के लिए उसने की उन्होंने का इस्तेमाल किया है , इसलिए सब किया धरा बेकार है . उन्होंने की जगह उसने कह देते तो सब ठीक हो जाता . वैसे आपकी जानकारी के लिए उसने भी कहा जा रहा है . लेकिन क्या मीडिया की जिम्मेदारी और भूमिका उसने और उन्होंने जैसे शब्दों के बीच तय होनी है ?  अगर आपके पास फुर्सत हो तो आज शाम से न्यूज चैनल देखना शुरू कीजिए . देर से ही सही . आपके सवालों का जवाब मिल जाएगा . हमारे चैनल पर भी और सीएनएन आईबीएन से लेकर आईबीएन -7 और बाकी चैनलों पर भी . मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप किस तीखापन की उम्मीद मीडिया से कर रहे हैं . मिर्ची लेकर राठौर को दिखाने से तीखापन तो नहीं आने वाला है . आप लोग जिस तरह की भाषा इस्तेमाल करने के लिए मीडिया की आलोचना करते रहे हैं , वही भाषा इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं . चलिए आप अपनी बात कहते रहिए , हम तो यही कहेंगे कम से कम रूचिका के मामले में मीडिया ने अपना काम जरूर किया और बेहतर ढंग से किया . आगे भी करेगा , इसी उम्मीद के साथ कि रूचिका को इंसाफ मिले और राठौर के सख्त से सख्त सजा .</p>
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		<title>By: dilip mandal</title>
		<link>http://jantantra.com/2009/12/24/dilip-mandal-on-media-language/comment-page-1/#comment-1317</link>
		<dc:creator>dilip mandal</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 24 Dec 2009 09:32:45 +0000</pubDate>
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		<description>मैंने जो टिप्पणी लिखी है उसमें भी साफ कहा गया है कि “राठौर को लेकर मीडिया में कोई सहानुभूति नहीं है।“ इसलिए  अगर कोई विवाद है तो उसका प्रस्थान बिंदु ये नहीं हो सकता कि मीडिया ने इस कांड का कवरेज कैसे किया है। कवरेज अच्छा है,जोरदार है, इसपर विवाद कहां है? रुचिका कांड में मीडिया की आक्रामकता प्रशंसनीय है। वैसे इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि मीडिया को इस कांड के लिए सक्रिय होते समय वर्गीय, सामाजिक और ऐसे जटिल प्रश्नों से नहीं जूझना पड़ा। ऐसे में सच और सही के पक्ष में खड़ा होने में असुविधा कम होती है। बहरहाल ये एक और ही बहस है।

सवाल तो यही है कि राठौर के खिलाफ आक्रामक होते हुए भी मीडिया की भाषा में वो तीखापन क्यों नहीं है जो ऐसे ही दूसरे मामलों में होता है और वैसे मामलों में भी, जिनमें एफआईआर या चार्जशीट तक दाखिल न हो। वो कौन सी बाधा है जो हमें राठौर को “उसे” या “उसने” या “अपील दायर करेगा” आदि लिखने से रोकती है।

भाषा में अगर तू-तड़ाक नहीं होनी चाहिए तो ऐसा ही भाषाई संस्कार हम बाकी मामलों में क्यों नहीं बरत पाते? मिसाल के तौर पर चोरियां तो हर दिन होती है। किस चोर को हमने “उन्हें”, “उन्होंने” लिखा है? कितनी बार किसी छेड़खानी करने वाले या बलात्कार के मामले में पकड़े गए या सजा पाए शख्स के लिए हम वैसी आदर वाली भाषा लिखते हैं, जैसी भाषा राठौर के लिए लिखी गई?

क्या ये ऐसी बात है जिसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या ये बिल्कुल स्वाभाविक है?

ये सवाल किसी एक राठौर मामले के कवरेज से बड़ा है और स्थायी किस्म का भी है। संचार माध्यमों की भाषा के ऐसे सवाल तब भी होंगे, जब रुचिका-राठौर प्रकरण की सनसनी नहीं होगी। इस सवाल और ऐसे ही सवालों से मीडिया को अमूमन हर दिन टकराना होता है। सचेत और संवेदनशील हैं तो इस टकराव को महसूस करेंगे/कर पाएंगे, वरना तो सब कुशल मंगल है, मौसम सुहाना है और चराचर जगत में शांति है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैंने जो टिप्पणी लिखी है उसमें भी साफ कहा गया है कि “राठौर को लेकर मीडिया में कोई सहानुभूति नहीं है।“ इसलिए  अगर कोई विवाद है तो उसका प्रस्थान बिंदु ये नहीं हो सकता कि मीडिया ने इस कांड का कवरेज कैसे किया है। कवरेज अच्छा है,जोरदार है, इसपर विवाद कहां है? रुचिका कांड में मीडिया की आक्रामकता प्रशंसनीय है। वैसे इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि मीडिया को इस कांड के लिए सक्रिय होते समय वर्गीय, सामाजिक और ऐसे जटिल प्रश्नों से नहीं जूझना पड़ा। ऐसे में सच और सही के पक्ष में खड़ा होने में असुविधा कम होती है। बहरहाल ये एक और ही बहस है।</p>
<p>सवाल तो यही है कि राठौर के खिलाफ आक्रामक होते हुए भी मीडिया की भाषा में वो तीखापन क्यों नहीं है जो ऐसे ही दूसरे मामलों में होता है और वैसे मामलों में भी, जिनमें एफआईआर या चार्जशीट तक दाखिल न हो। वो कौन सी बाधा है जो हमें राठौर को “उसे” या “उसने” या “अपील दायर करेगा” आदि लिखने से रोकती है।</p>
<p>भाषा में अगर तू-तड़ाक नहीं होनी चाहिए तो ऐसा ही भाषाई संस्कार हम बाकी मामलों में क्यों नहीं बरत पाते? मिसाल के तौर पर चोरियां तो हर दिन होती है। किस चोर को हमने “उन्हें”, “उन्होंने” लिखा है? कितनी बार किसी छेड़खानी करने वाले या बलात्कार के मामले में पकड़े गए या सजा पाए शख्स के लिए हम वैसी आदर वाली भाषा लिखते हैं, जैसी भाषा राठौर के लिए लिखी गई?</p>
<p>क्या ये ऐसी बात है जिसपर चर्चा नहीं होनी चाहिए? क्या ये बिल्कुल स्वाभाविक है?</p>
<p>ये सवाल किसी एक राठौर मामले के कवरेज से बड़ा है और स्थायी किस्म का भी है। संचार माध्यमों की भाषा के ऐसे सवाल तब भी होंगे, जब रुचिका-राठौर प्रकरण की सनसनी नहीं होगी। इस सवाल और ऐसे ही सवालों से मीडिया को अमूमन हर दिन टकराना होता है। सचेत और संवेदनशील हैं तो इस टकराव को महसूस करेंगे/कर पाएंगे, वरना तो सब कुशल मंगल है, मौसम सुहाना है और चराचर जगत में शांति है।</p>
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