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इस ‘सिस्टम’ में बार बार मरेगी रुचिका

टीवी चैनलों पर चंडीगढ़ की विशेष अदालत के बाहर एसपीएस राठौर को हंसते, खिलखिलाते देखा तो लगा सरकार ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी को किसी बड़े सम्मान से नवाज़ा हो। ये चेहरा उस शख़्स का चेहरा नहीं था जिसको अदालत ने 14 साल की लड़की रुचिका गिरहोत्रा के साथ छेड़खानी करने के आरोप में दोषी पाया हो। अदालत के फैसले में राठौर को अपनी जीत नज़र आई। जिस अदालत ने दोषी पाते हुए 6 महीने की क़ैद की सज़ा सुनायी उसी अदालत से तुरत फुरत ज़मानत भी मिल गयी। पूर्व डीजीपी सीना फूला कर अपने घर के लिए निकला। मानो वो मीडिया और देश को चिढ़ा रहा हो कि देखो कानून मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

विशेष अदालत के फैसले के दो दिन बाद चंडीगढ़ से ही टीवी चैनलों पर एक और ब्रेकिंग न्यूज फ्लैश होती है। ये तस्वीर रुचिका के बूढ़े पिता की है। ‘उन्नीस साल बाद भी हमें इंसाफ नहीं मिला है। हमारे साथ अत्याचार हुआ है।’ ये कहते हुए गिरहोत्रा साहब कैमरा के सामने अपने इमोशन रोक नहीं पाये और फफक फफक कर रो पड़े। इतने सालों में गिरहोत्रा परिवार मीडिया के सामने नहीं आया। राठौर के आतंक से ये सभी अपने पॉश कॉलोनी का मकान छोड़ कर गुमनाम जिंदगी बसर कर रहे थे। अपने घर से इन्होंने अपनी बेटी की तस्वीर तक हटा दी थी। ताकि उनकी पहचान कहीं भी ज़ाहिर न हो। उन्हें इस बात का डर हमेशा बना रहता कि राठौर उन्हें और प्रताड़ित करेगा। फैसला आने के तुरंत बाद गिरहोत्रा परिवार के पास एक अनजान फोन आता है। दूसरी तरफ से आवाज आती है – क्या बिगाड़ लिया तुमने।

राठौर को अपनी नाजायज ताक़त का अंदाजा अच्छी तरह था। इसीलिए जब रुचिका और उसकी सहेली के परिवार ने पुलिस में उसके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करायी तो राठौर ने उसके भाई आशु के खिलाफ लगभग एक दर्जन चोरी के फर्जी मामले दर्ज करवाकर उसे जेल भिजवाया। रुचिका के स्कूल प्रशासन पर प्रेशर डाल कर उसे स्कूल से निकलवाया। रुचिका और उसके परिवार के लिए ज़िंदगी नर्क बना दी। इसका असर रुचिका पर इतना पड़ा कि 17 साल की उम्र में उस अबोध लड़की ने आत्महत्या कर ली।

राठौर की घिनौनी सोच को तब और बल मिला जब सत्ताधारी पार्टियों ने भी उसके कारनामे को नज़रअंदाज किया। जबकि तत्कालीन डीजीपी आर आर सिंह ने आंतरिक जांच में उसे दोषी पाया था। लेकिन चौटाला सरकार उसपर कुंडली मार कर बैठ गयी। फिर कांग्रेस की भजन लाल सरकार ने मामले को दबा दिया। और उल्टे रूचिका के भाई पर झूठे मुकद्दमों की झड़ी लगा दी। जाहिर है ये सब राठौर के ही दिमाग की उपज थी। ताकि रुचिका का परिवार अपना केस वापस ले ले। रुचिका की मौत के बाद भजन लाल सरकार ने राठौर के ख़िलाफ़ सारे आरोप एक सिरे से गिरा दिए। आशु फर्जी आरोपों से बरी हो गया फिर भी बंसी लाल सरकार सोयी रही। चौटाला जब वापस सत्ता में आए तो राठौर को ही उन्होंने राज्य के पुलिस महकमें की बागडोर सौंपी।

क्या जादू किया था राठौर ने चौटाला, बंसी लाल और भजन लाल पर। इनके बारे में ऐसा कौन सा राज़ राठौर जानता था कि उसे दंडित करने की बजाय उसे सिर पर बिठाया गया। कोई अदालत भले ही इन नेताओं को रुचिका की मौत का दोषी न माने पर रुचिका की मौत का जिम्मेदार जितना राठौर था उतने ही ये नेता भी। जिन्होंने राठौर को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राठौर जैसे रसूखदार लोग कानून को कांख में दबाये मूंछ पर ताव देकर घूमते रहे। जहां राजनीतिक संरक्षण मजबूत होता है वहां व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है और सब मिलकर सिस्टम को पंगु बना देते हैं।

इसी सिस्टम में कानून में इतने छेद हैं कि हत्या के बावजूद आरोपियों को बरी कर दिया जाता है। ये कहते हुए कि प्रॉसिक्यूशन (अभियोजन पक्ष) उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाया। राजधानी दिल्ली में जेसिका लाल हत्याकांड और प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में ऐसा ही देखने को मिला। इन दोनों मामलों में निचली अदालतों के फैसले से समाज का हर तबका भौचक्क रह गया। हाई कोर्ट में अपील के बाद आरोपियों को सज़ा मिली। रुचिका मामले में भी सीबीआई चाहती तो आरोपी के ख़िलाफ़ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुक़दमा ठोंक सकती थी पर उसके हाथ भी बंधे दिखे। राठौर इस मामले में दोषी पाया गया होता तो 10 साल तक की सज़ा हो सकती थी। मामला महज़ छेड़छाड़ का बना। जिसकी सजा़ ज़्यादा से ज़्यादा 2 साल क़ैद है।

न्यायिक प्रक्रिया की ऐसी ही दूसरी खामियों का फायदा भी राठौर को मिला। नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में 10 साल की कैद है। मगर लॉ कमीशन के सुझावों के बावजूद नाबालिग के साथ मॉलेस्टेशन जैसे मामलों में अलग से कोई विशेष कानून अभी तक नहीं बना है। लॉ कमीशन ने यहां तक कहा है कि बलात्कार की परिभाषा को विस्तार दिया जाए और गैर-कानूनी यौन सम्बन्ध को भी रेप जैसा ही अपराध मानते हुए कानून बने, जिसमे दोषी को 10 साल की सज़ा हो। ऐसा कानून होता तो राठौर इतने सस्ते में नहीं छूटते।

प्रभात शुंगलू

प्रभात शुंगलू

जब राजनीतिक संरक्षण का संसार इस कदर फल-फूल रहा हो और समाज के रसूखदार लोग न्यायिक प्रक्रिया का बेख़ौफ़ शोषण कर रहे हों ऐसे सिस्टम से इंसाफ़ की उम्मीद बेमानी होगी। लेकिन जनता तय कर ले तो समाज के इन ठेकेदारों को अपने वजूद का एहसास करा सकती है। क्या पता हाई कोर्ट इस मामले में समाज की भावनाओं की कद्र करते हुए सुवो मोटो केस री-ओपेन करने के आदेश दे दे। फिर नए सिरे से सुनवाई होगी। जो ऐसा हुआ तो फिर जलाएंगे इंडिया गेट पर मोमबत्ती। रुचिका की याद में, इंसाफ़ की आस में भी और सही मायनों में सेलीब्रेट करेंगे जनतंत्र के 60 साल।

((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))

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4 Responses to इस ‘सिस्टम’ में बार बार मरेगी रुचिका

  1. सुशांत झा Reply

    December 25, 2009 at 4:08 pm

    कायदे से इस देश में एक प्रोटोकॉल बनाकर बड़े अधिकारियों, नेताओं, ठेकेदारो और एक खास आय से ऊपर के लोगों को बलात्कार करने की छूट दे देनी चाहिए।

  2. रंगनाथ सिंह Reply

    December 25, 2009 at 8:55 pm

    इस मुददे पर मीडिया ने जिस तरह स्टैण्ड लिया है उससे थोडी राहत है। नहीं तो लोगों को यह भी नहीं पता चलता कि ऐसा जघन्य अपराधी था राठौर….

  3. media ka madhav Reply

    December 28, 2009 at 10:59 am

    aur aise patrakaron ka kya karen jo media kee takat se police aur adalat tak khareed lete hain?

  4. media ka madhav Reply

    December 28, 2009 at 11:01 am

    media sirf bahri logo ke liye stand leta hai apne saathee ka sawal ho to papi pet kee chinta ka hawala aa jata hai

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