हे मुनिवर नारद, आपने नारायण नारायण की रट लगा कर भवसागर पार कर ली। आपने ऐसा संदेश दिया कि जो नारायण नाम उचारेगा, उसे किसी भी तरह की मोह माया नहीं व्यापेगी। परंतु बावजूद इसके, आप नारायण की ही कृपा और उनकी ही महिमा से नारी के मोहपाश में बंध गये। इतने कि आप विवाह को उतावले हो गये। वह तो गनीमत कहिए कि नारायण ने यह सोचा कि अगर मुनि प्रवर विवाह के जाल में फंस गये तो उन जैसे के साथ साथ अन्य विवाहितों का क्या होगा? उस समय में पता नहीं, सब कुछ का आविष्कार हो गया था, मात्र एक दर्पण को छोड़कर। या हो सकता है कि मुनिवर आप थे त्यागी, मोह रहित, परम ज्ञानी, परम ध्यानी, नारायण भक्त सर्वश्रेष्ठ मुनि, तो संभवत: आपने सौंदर्य दिग्दर्शन के इस यंत्र की ओर ध्यान नही दिया होगा। परंतु इससे नुकसान यह हुआ कि आपने ध्यान नहीं दिया और आपके नारायण ने आपको वानर मुख दे दिया। न केवल दे दिया, बल्कि आचरण में भी वानर जनित चंचलता भर दी। परिणाम यह हुआ कि राजकुमारी के स्वयंवर में राजकुमारी जब उनकी ओर नहीं देख रही थीं तो वे स्वयं उनकी ओर हुलक हुलक कर चले जाते थे, उनकी ओर आस और प्यास भरी दृष्टि से देखने लगते थे कि हे सुंदरी, मेरा वरण करो। अन्य राजा महाराजा उनकी यह हालत देख देख कर हंसी से लोट पोट हुए जाते थे। स्वयं राजकुमारी मुस्कुरा मुस्कुरा कर वहां से निकल जाती थीं, उनकी सहेलियों और दासियों का भी वही हाल था।
हे मुनिवर, आपने नारायण को श्राप तो दे दिया कि जिस तरह से आप स्त्री पीड़ित हुए हैं, उसी तरह वे भी स्त्री के वियोग में तड़पेंगे। तुलसीदास ने उनकी तरफ से लिख भी दिया, हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी, तुम देखी सीता मृगनैनी। किसी ने यह भी कह दिया कि तुलसीदास ने इसे अपने लिए लिखा था, क्योंकि उनकी पत्नी ने जब उन्हें निकाल दिया अपमानित करके, तो वे इसी तरह स्त्री वियोग में तड़पे थे।
अब लोगों का क्या? वे तो ऐसे ही लिखते रहते हैं। किसी ने बहुत पहले इस पंक्ति की व्याख्या कुछ इस तरह से कर दी थी “सूरदास तब बिहुंसी जसोदा, लै उर कंठ लगायो” कि “सूरदास ने तब हंसते हुए जसोदा को अपने गले से लगा लिया।” वहां भी लोगों ने यही कह दिया कि सूरदास नेत्रहीन थे। उन्हें कौन अपनी बेटी देता? फक्कड़ कबीर को तो बीबी मिल गयी थी, मगर सूरदास को नहीं मिली, इसलिए वे अपने मन की बात इसी तरह से निकालते रहे, जिस तरह से कवि लोग निदर्शन तो मां बहनों का करते हैं, मगर उसकी देह में वे तमाम बड़े बड़े कुंभनुमा वर्णन होते हैं कि समझ में नहीं आता कि यह माता के दूध का वर्णन है या किसी रमणी के पयोधर का।
हे मुनिवर नारद, आपको तो नारायण ने उबार लिया, मगर खुद फिसल पड़े। अपने मन को लगाम देते रहे, देते रहे, मगर जब नहीं दे सके तो द्वापर में पहुंचकर साठ हज़ार के बीच अपने को बांट दिया। कहते हैं कि द्वापर के बाद कलियुग ही आता है। सो द्वापर की लगी भगी कलियुग में भी बनी रही। मगर कलियुग का कलिकाल बड़ा भद्दा और बदमाश है। वह शैतान सभी के मन में घुस गया है।
अब देखिए न मुनिवर, आपके नारायण जब साठ हज़ार के साथ महारास रचाते थे, वह भी राजा होकर, तब तो उन्हें कोई कुछ नहीं कहता था, अब उनके ही पदचिन्हों पर जब आज के हम नारायण लोग चलते हैं तो लोग लानत मलामत भेजने लगते हैं। संजयवाला दूर का दर्शन तब भी था, मगर देश तब इतना राजद्रोही नहीं हुआ था कि किसी के गले लगने या चुंबन लेने को बुरा मान लिया जाए। पुष्पक विमान तब भी थे, पर लोग इतने खराब नहीं हुए थे कि किसी के विमान पर चढ़ने का कारण बताओ नोटिस जारी कर दे। लोग कहते रहते हैं कि बुढ़ापा मन से आता है, तन से नहीं, तो क्या फर्क़ पड़ता है मुनिवर कि हम साठ के हैं या छियासी के या सोलह के? फिल्मवाले लिख गये हैं ना कि “दिल को देखो, चेहरा न देखो” दिल दरिया होना चाहिए। लोग बाग ऐसे ऐसे दिलदारों से जलते हैं और खुद उस दरिया में बहने, उसमें डूबने का मौका नहीं लगता है, तो मारे ईर्ष्या के भर जाते हैं और दिल के दरिया में डूबती उनकी नैया को डुबाने लगते हैं, जो इस नैया पर प्रेम के हिंडोले की तरह झूल रहे होते हैं।
पहले त्रेता, द्वापर युग में अपने हिंदू धर्म में कई कई विवाह मान्य थे। कलियुग ने वह सब भी कबाड़ कर दिया। नियम बना दिया कि एक ही विवाह मान्य रहेगा। दूसरा करना हो तो पहली से विधिवत तलाक लो। हे मुनिवर, अब आप ही बताएं, निस्संदेह आपका मोह एक बार में ही भंग हो गया, परंतु सभी तो आपकी तरह मोह माया से निस्पृह नहीं हैं न। आप तो साधु थे, मगर हम तो गृहस्थ हैं। तो दोनों में फर्क़ तो होना चाहिए कि नहीं? एक आम और एक खास में फर्क होना चाहिए कि नहीं। आम आदमी के जीवन में क्या झंझट है? उठो, जाओ, कमाओ, बीवी बच्चे के साथ खा पी लो, सो जाओ। मगर व्यवस्था से बंधे लोगों के पास इतने बखेड़े होते हैं कि सांस तक लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती। ऐसे में चढ़ी सांस को जब तनिक उतारने का मौका लगता है तो सारे संजय अपने अपने दूर के दर्शन और सारे के सारे गणेश जाने किस वेदव्यास की प्रेरणा से अपनी अपनी कलम थामकर सामने आ जाते हैं। क्या हम इतने नकारा हो गये हैं कि किसी 14 साल की कमसिन को उसकी आनेवाली जवानी का रहस्य भी न बताएं या इतने लुंजपुंज कि कोई हमें अपने अधरों के प्रसाद देने आएं तो प्रसाद लेने से मना कर दें? आपको मालूम तो है न मुनिवर कि प्रसाद लेने से मना करना भक्ति भाव का कितना बड़ा अपमान है?
बताइए भला, कैसे देश बचेगा और कैसे इसकी तरक्की होगी? एक तो जनता की सेवा का महाव्रत उठाओ और उस पर से भी उन्हीं की तरफ से भला बुरा भी सुनो। हे मुनिवर, कह दीजिए इस देश की सभी मूढ मतिमंद जनता से कि वे हमारे झमेले में नहीं फंसे। हम पुराने सेवी हैं। सेवा करते करते उम्र के पचासी छियासी वसंत देख चुके हैं। हमें हर तरह का अनुभव है। उम्र के हर रंग का, हर स्वाद का पता हमें है। हम इस देश के हैं और यह देश संविधान के धर्मनिरपेक्ष देश की घोषणा के बावजूद हिंदू देश है और जिसके लिए हमें सिखाया जाता है कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं।” हम हिंदू धर्म का दिल से सम्मान करते हैं और इसकी परंपरा के पालन के प्रति पूरे तन, मन, धन से तत्पर और प्रस्तुत हैं।
आजकल देश में वैसे भी ब्राह्मण विरोधी बयार बह रही है। एक ब्राह्मण तो अपनी प्रभा की आष को जोश में भरते भरते, और कलम घिसाई करते करते स्वर्ग ही सिधार गया। ब्राह्मण विरोधी यह बयार वैसे पुरानी ही है। मुनिवर, आपको भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। विश्वामित्र को भी मेनका के रूप का तेज सहना पड़ा। और भी पता नहीं किस-किस को सहना पड़ेगा। परंतु विश्वास कीजिए मुनिवर कि हम सब ऐसे नहीं हैं कि अपने से कहीं चले जाएं। अरे, अगर कोई आ जाए तो क्या हम इतने अंधे, लाचार और नपुंसक हैं कि उस ओर देखें भी नहीं।
पुरुषत्व का उम्र से कोई वास्ता नहीं होता मुनिवर अपने यहां, बल्कि कहीं भी नहीं। अपने यहां तो कहा भी गया है कि मर्द साठे पर पाठा होता है और यह भी कि मर्द और घोड़े कभी बूढे नहीं होते। औरतें हो जाती हैं, इसलिए एक दो बच्चे होते न होते घर गिरस्थी, बाल बच्चे में रम जाती हैं। हम क्या करें मुनिवर? हम तो समाजसेवी भी हैं, सेवाव्रती भी हैं, इसलिए घर की बूढी हो गयी औरतों को हम उनके मन के राज काज के लिए छोड़ देते हैं। हम और भी सेवाव्रतधारी हैं, इसलिए हमें भी इन युवतियों को अपने गहन अनुभव का ज्ञान देना होता है। और ज्ञानदान न तो कहीं से ग़लत है और न कहीं से अवैध। इस ज्ञानदान का कहीं कोई फल-प्रतिफल सामने आ जाए तो हमारा क्या दोष? रास्ते चलते धूल-धक्कड़ तो आते ही हैं तो क्या धूल को हम माथे से लगा लें? समझाइए मुनिवर, इस देश की पागल, बेवकूफ जनता को!
काजल कुमार
December 28, 2009 at 6:19 pm
नारायण नारायण
shambhu bhadra
December 29, 2009 at 1:17 am
vibha jee
narayan narayan ke roop mein jabardast vyangya ke kiye kotishah dhanyavad.
lekin hum hain ki bade besharm hain.
aap likhte rahain, apko narayan milte rahenge.
apko yah yad dilana jaroori hai ki harek narayan jati-dharm se uper uth chuka hota hai.
Rahul Kumar Singh
January 7, 2010 at 6:55 pm
Vibha jee
your thinking is perfect according to the message you post.