फिरोजशाह कोटला मैदान में श्रीलंकाई बल्लेबाज़ों पर बॉल बिल्कुल बॉडीलाइन सीरीज के अंदाज में आ रही थी। बस डगलस जार्डीन कहीं नहीं दिख रहा था। थोड़ी देर बाद राज़ खुला। कोटला की पिच ने जार्डीन के खूंखार तेवर अपनाए हुए थे। पिच इतनी ऊबड़-खाबड़ थी कि गेंद कभी दस-दस फिट उछलती, कभी सुर्री होकर बल्लेबाज और विकेटकीपर धोनी को चकमा देकर निकल जाती। यही कारण था कि 400 रन बनाने वाले श्रीलंकाई खिलाड़ी तड़ातड़ आउट होते चले गए। 85 रन पर पांच विकेट हो चुके थे जब संदेह गहराता देख मैच रेफरी ने वनडे सीरीज का पांचवा और आखिरी मैच रद्द कर दिया।
इसी पिच पर 13 महीने बाद वर्ल्ड कप खेला जाना है। बात इतनी छोटी नहीं थी। ये अंतर्राष्ट्रीय मैच था। ये मैच विश्व क्रिकेट की सबसे ताकतवर और सबसे अमीर बॉडी यानी बीसीसीआई के झंडे तले हुआ था। और होस्ट कंट्री विश्व की नम्बर वन टेस्ट टीम है। ये हिंदुस्तान में ही हो सकता है। जिस कोटला मैदान में गावस्कर ने सर डॉन ब्रैडमैन के 29 शतक की बराबरी की थी वो आज अपनी कमेंट्री में ये कहे बिना नहीं रह पाए कि पिच का हाल ऐसा था मानो गंजी खोपड़ी पर किसी ने कृत्रिम रूप से जगह जगह बाल उगवा लिए हों। जिस पिच पर कुंबले ने परफेक्ट टेन लेकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था वहां मैच इसलिए नहीं खेला जा सका क्योंकि पिच ठीक से बनायी ही नहीं गयी थी।
मैच रद्द होने की खबर खेल मंत्री एम एस गिल के पास रिपोर्टर ने पहुंचायी। लेकिन वो भी क्या कर सकते थे। वो खेल मंत्री हैं। लेकिन क्रिकेट खेलों में शुमार नहीं। वो इंडस्ट्री है। और गिल साहब खेल मंत्री। क्रिकेट उनके मंत्रालय के दायरे से बाहर है। हिंदुस्तान में अनऑफिशयल क्रिकेट मंत्रालय है जिसे बीसीसीआई कहते हैं। भारतीय क्रिकेट का यही पीएमओ है। और अब तो विश्व क्रिकेट का ओबामा भी यही है। इससे कोई पंगा नहीं ले सकता। ये आपस में ही पंगा लेते रहते हैं। और फिर बन आती है देश की शान पर। जैसा कि फिरोजशाह कोटला मैदान में 27 दिसंबर को हुआ। जिसके गवाह बने स्टेडियम में बैठे हज़ारों दर्शक और वो करोड़ो क्रिकेट प्रेमी जिन्होंने टीवी पर इतिहास रचते देखा तो माथा पीट लिया।
हिंदुस्तान के लोगों का काम करने का ढंग बहुत निराला है। इस तरह के निराले काम देश में पहले भी होते आये हैं। यहां के लोग भी निराले हैं। माना गिल साहब क्रिकेट का प्रबंधन नहीं करते तो कॉमनवेल्थ गेम्स के प्रबंधन में जो छेद दिख रहे हैं वो ठीकरा किसके सर फोड़ें। मात्र नौ महीने बचे हैं गेम्स को। लेकिन कभी कभी तो बच्चे के कन्सीव होने पर ही प्रश्न खड़े हो जाते हैं। डिलीवरी होते होते पता नहीं माताश्री को कितने दर्द झेलने पड़ेंगे। गेम्स के बारे में सोचते ही उनकी पेशानी पर बल पड़ जाते हैं। अब तो वो भी बेसब्र हो रही हैं। बच्चे का दर्द मां ही महसूस कर सकती है। एक बिचारी मां और गेम्स के बाप इतने सारे। कई साल कलमाडी थे। आजकल सुना गिल हैं। कानाफूसी चल रही कि राहुल भी हो सकते हैं। और ऊपर से गेम्स का असली बाप माइक फेनल। जो अब बच्चा गिरवा भी नहीं सकता। सोचता होगा प्रीकॉशन लिया होता तो ये नौबत न आती। लेकिन अब देर हो चुकी है। इसलिए भइया माइक अब अंजाम झेलने के लिये तैयार हो जाओ। जो बोवोगे वही तो काटोगे ना।
आज भारत कुमार यानी मनोज कुमार के भारत की कहानी बदल चुकी है। भारत गाता था – है प्रीत जहां की रीत सदा। अब क्या गायेगा – है ग्रीड जहां की रीत सदा। 2000 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के आरोपो में लिप्त झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को जब लगा कि कानून के हाथ उनकी गर्दन तक पहुंचने वाले हैं तो मुख्यमंत्री जी रांची के अपोलो अस्पताल में एडमिट हो गए। पता नहीं भ्रष्टाचारी नेताओं को अस्पताल से इतना प्रेम क्यों है। और अगर इतना प्रेम है तो देश में चिकित्सा व्यवस्था इतनी चौपट क्यों है। छोटे शहरों में अच्छे सरकारी अस्पतालों की कमी क्यों है। और अस्पताल हैं तो दवाइयों की कमी क्यों रहती है। और अगर दवाई है तो डॉक्टर गायब। इसलिए ऐसे मंत्री भी सरकारी अस्पताल नहीं जाते। प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हो जाते हैं। अस्पताल प्रबंधन को भी यकीन है कम से कम एक मरीज तो मिला जो बिल का पूरा भुगतान करेगा। यही नहीं बल्कि अपनी तरफ से दो-चार टेस्ट ज्यादा करवायेगा। डाक्टरों को अस्पताल में ज्यादा से ज्यादा रखने की मोटी फीस देगा। ग्रीड इतनी कि पब्लिक से किये वायदे भूल जाते हैं।
लेकिन पब्लिक इतनी पगली है रे कि इट हेट टियर्स। मधु कोड़ा की पत्नी गीता के आंसू इस पब्लिक से नहीं देखे गए। इसलिए जब पति जेल में था तो उसने रोती, बिलखती पत्नी को चुनाव जिता दिया। कभी लगता है वूमन पावर का रास्ता भ्रष्ट मंत्रियों के रास्ते होकर निकलता है। संसद में खामख्वा महिला आरक्षण बिल पर हाय-तौबा मची रहती है। महिलाओं को विधायिका में आरक्षण देने के लिए जरूरी है हमारा सिस्टम ज्यादा से ज्यादा भ्रष्ट पुरूष मंत्री बनाए। ताकि उनके जेल जाते ही उनकी पत्नी, मां, सास, बेटी सब खुद-ब-खुद पब्लिक के सपोर्ट से ज्यादा से ज्यादा संख्या में संसद और विधानसभा पहुंचें।
लेकिन अगर ज्यादा महिलायें संसद और विधानसभा पहुंची तो क्या गारंटी कि महिलाओं की देश में ज्यादा सुनी जायेगी। क्या गारंटी की ऐसा होने पर जेसिका और प्रियदर्शनी मट्टू के परिवार वालों को सालों साल कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। छेड़खानी के मामले में एक नाबिलिग लड़की की किसी रसूखदार आदमी के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट 10 साल तक धूल नहीं खायेगी। ये हमारे महान देश में ही मुमकिन है कि रसूखदार लोग कानून को यहां वहां गलत जगह छूकर उससे छेड़खानी करते हैं और उनका बाल भी बांका नहीं होता। ऐसा हैवानों को नेताओं की सरपरस्ती मिलती है और दिन दूनी रात चौगुनी तरकक्की। उसे अदालत भी छोटी-मोटी सज़ा सुना कर बेल दे देती है मानो ये कह रही हो… सॉरी ग़लती हो गयी, आप खुद को बाइज्जत बरी समझें।
हिंदुस्तान करवट ले रहा। अब तो हिंदुस्तान ने चंद्रमा पर पानी भी ढूंढ़ लिया। न्यूक्लियर देशों की छोटी सी जमात में खड़ा है। जी 8 के आठ ताकतवर देशों के समूह में बतौर मेहमान जगह बना ली है और अब संयुक्त राष्ट्र के पी 5 में घुसने के लिए फड़फड़ा रहा। भारत एशिया में मेडिकल टूरिज्म का केन्द्र बन गया है। सॉफ्टवेयर के साथ साथ आउटसोर्सिंग का भी हब बन चुका है। जिनोम कोड का एक्सपेरिमेंट भी सफलता पूर्वक कर लिया।
साल ट्वेंटी-टेन में बस जिनोम कोड पर ही भरोसा है। ये खोलेगा राज़ कि आखिर हिंदुस्तान ऐसा है तो क्यूं है। वो करेगा हिंदुस्तान की डीएनए मैपिंग। वो क्या खूसूसियत है हिंदुस्तान के जिनोम कोड में जो 86 साल के बीमार ( ऑन रिकॉर्ड उन्होंने मेडीकल ग्राउंड पर इस्तीफा दिया) इंसान में भी रंगीली आस जगाती है। इतनी कि वो पद की गरिमा से भी कॉम्प्रोमाइज करता पाया जाता है। ऐसा क्या है जिनोम कोड में जो 83 साल के शख्स में भी सत्ता की अलख जलाये रखती है। जिनोम कोडिंग के बहाने कम से कम ये समझ में आयेगा कि जो सरकार ग्लोबल आतंकवाद को स्पॉन्सर करने वाले पाकिस्तान से बात कर सकती है वो छत्तीसगढ़ के जंगलों मे आदिवासियों को क्यों ‘हंट’ करना चाहती है। क्यों 25 साल बाद भी भोपाल गैस पीड़ित मोमबत्ती की लौ थामे इंसाफ का रास्ता तलाश रहे। पता चले कि क्यों सालों साल उम्मीद सिस्टम से अंतत: हार जाती है। पता चले कि क्रिकेट के अलावा दूसरे देसी खेलों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों होता है। पता चले कि कोई काम टाइम से क्यों पूरा नहीं होता। क्यों दंगे में मरने वालों के परिवारों के दर्द पर मरहम लगाने की बजाय लाशों पर राजनीति होती है।

प्रभात शुंगलू
((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))
Recent Comments