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श्श्श्श् आलोक जी जनता देख रही है

मीडिया संस्थानों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं। विज्ञापनों का स्तर कैसा हो यह फैसला अख़बार या मीडिया संस्थान का होता है। बड़े अख़बारों में विज्ञापन लेते वक़्त एक खास ख्याल रखा जाता है कि उस विज्ञापन से मीडिया संस्थान के अपने ब्रांड पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। इस लिहाज से देखा जाए तो विज्ञापनों के स्तर से आप अख़बार की नीति, स्थिति और स्तर का अंदाजा लगा सकते हैं।

हम आपके सामने दो विज्ञापन रख रहे हैं जो एक राष्ट्रीय डेली में पहली जनवरी को यानी नए साल के पहले दिन छापे गए। इन विज्ञापनों को देख कर आप बताएं कि क्या इन्हें किसी भी अख़बार में छापा जाना चाहिए या नहीं?

अब जाते जाते हम यह भी साफ कर देते हैं कि ये राष्ट्रीय अख़बार कौन है। यह अख़बार है नई दुनिया और ये दोनों विज्ञापन इस साल के पहले दिन यानी पहली जनवरी को दिल्ली संस्करण में छापे गए हैं। और इन दोनों लिंगवर्धक विज्ञापनों के नीचे ख़बर है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सबको नववर्ष की शुभकामनाएं दी हैं।

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4 Responses to श्श्श्श् आलोक जी जनता देख रही है

  1. चन्दर Reply

    January 5, 2010 at 5:03 pm

    बेचारे एक अखबार यानी नई (नयी) दुनिया को दोष देना ठीक नहीं, और कई अखबार भी लगभग इसी श्रेणी में खड़े हैं। ऐसे भ्रामक और अश्लील लगने वाले विज्ञापनों की बाढ़ आयी हुई है। सरकार की आंखें तो बन्द रहती ही हैं, चौथे स्तम्भ की आंखों के साथसाथ अक्ल पर भी पर्दा पड़ा हुआ है।

  2. विनीत कुमार Reply

    January 5, 2010 at 7:30 pm

    इससे बढ़िया तो एमसीडी के पेशाबघर हैं। इन जानकारियों के लिए पैसे भी नही खर्च करने पड़ते।.

  3. Rajendra asthana Reply

    January 5, 2010 at 8:07 pm

    Ye vigyapan nai duniya me har din prakashit hote hain. Vaise, nai duniya koi akela nahi hai. Tamam akhbar aisa karte hain. massage parlour ke ashleel advt to times of india me bhi bhare hote hain.

  4. SUNILPARBHAKAR Reply

    January 8, 2010 at 6:57 am

    yae kya ho reha hai

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