उपेंद्र राय। स्टार न्यूज़ के तेज तर्रार रिपोर्टर। सीनियर एडिटर। और अब सहारा इंडिया परिवार के न्यूज़ डायरेक्टर। इतनी कम उम्र में किसी भी शख़्स को इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली। यह किसी भी शख़्स के लिए फक्र की बात होगी। उपेंद्र राय की इस कामयाबी पर आप या तो नाज़ कर सकते हैं या फिर रश्क। लेकिन आप उनकी इस कामयाबी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। यह कामयाबी जितनी बड़ी है उससे कहीं अधिक बड़ी है सहारा मीडिया को उस मंजिल पर पहुंचाने की चुनौती जहां से यह सार्थक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी पहचान बना सके। इस बेहद कठिन चुनौती को उपेंद्र राय और उनके साथी कैसे पूरा करेंगे इस बारे में जनतंत्र की तरफ से समरेंद्र ने उनसे बात की। यह बातचीत हम आपसे साझा कर रहे हैं। – मॉडरेटर
समरेंद्र – सबसे पहले तो बधाई। सहारा ने आपको इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। इसे आप किस तरह देखते हैं?
उपेंद्र राय – यह मेरी ज़िंदगी का एक खास पल है। उम्र के किसी भी पड़ाव पर जब मैं पीछे मुड़ कर देखूंगा तो इस पल के बारे में सोच कर गर्व महसूस करूंगा। मेरे करियर की शुरुआत सहारा से ही हुई थी। 1997 में मैंने एक स्ट्रींगर के तौर पर सहारा में काम शुरू किया। तब मुझे 1500 रुपये मिलते थे। 1997 से 31 मई 2000 तक मैं स्ट्रींगर रहा। एक जून 2000 से मेरी स्थायी नियुक्ति हुई और पहला वेतन 3300 रुपये का मिला। जून से 30 नवंबर तक मैंने सहारा वेलफेयर फाउंडेशन में काम किया। प्रोजेक्ट था जनसंख्या एक रचनात्मक आंदोलन। इस प्रोजेक्ट से खुद सहारा श्री जुड़े थे। वो जनसंख्या विस्फोट के ख़िलाफ़ मुहिम चलाना चाहते थे। उस प्रोजेक्ट का मैं कोऑर्डिनेटर नियुक्त हुआ। उसके बाद सितंबर 2000 में गोविंद दीक्षित सहारा अख़बार के संपादक बने। उसी साल उन्होंने प्रबंधन से अनुमति लेकर मुझे मुंबई ब्यूरो का इंचार्ज बना दिया।
यह सब कहने का सिर्फ़ यही मकसद है कि मीडिया में काम करने की मेरी इच्छा समय के साथ पूरी होती चली गई। मुझे जीवन में बहुत अच्छे लोगों का साथ मिला। उम्मीद है कि साथियों के सहयोग से हम यह बड़ी जिम्मेदारी भी शानदार तरीके से पूरी करेंगे। हमें मालूम है कि इसके लिए काफी मेहनत करनी होगी। हम सब मेहनत के लिए तैयार हैं।
समरेंद्र - सहारा चेयरमैन सुब्रत रॉय ने यह जिम्मेदारी सौंपते वक़्त क्या आप लोगों को कोई दिशानिर्देश भी दिया है?
उपेंद्र राय – उन्होंने बस इतना ही कहा कि जब मैं अख़बार को खुद देखता था तो शुरुआती कुछ साल तक अख़बार की जो धार रही, लोकप्रियता और पहुंच रही… कालांतर में वो धार कुंद हो गई। लोकप्रियता घट गई। उन्होंने कहा कि हो सकता है कि लोकप्रियता कम होने की एक वजह कंपटिशन हो, लेकिन इससे अख़बार की धार कुंद नहीं होनी चाहिए थी। आक्रामक तेवर, हिम्मत और ईमानदारी के साथ सच्चाई का दामन थामे रखने की लगन कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुहिम को आगे बढ़ाना है। वो पुरानी पहचान वापस हासिल करनी है।
समरेंद्र – एक बात देखी गई है कि सहारा में गुटबाजी बहुत है। आपसे पहले दो बार सत्ता परिवर्तन हुआ… वो लोग बहुत दिन तक नहीं टिके। आपको लगता है कि आप वहां टिक सकेंगे और कुछ अच्छा कर सकेंगे?
उपेंद्र राय – अच्छा करना अपने निजी गुण-दोषों पर भी निर्भर करता है। इस पर कि आप किसी चुनौती को किस तरह लेते हैं। अगर आप किसी भी संस्था में सफल होना चाहते हैं तो सबसे पहले वहां का माइंडसेट समझना होगा। कर्मचारियों से बेहतर ताल-मेल बिठाना होगा। अगर आप गौर करें तो दुनिया में सबसे ज़्यादा कठिनाई तब आती है जब कोई अमेरिकी कंपनी चीन या फिर जापान की किसी कंपनी को टेकओवर करती है। जहां सांस्कृतिक टकराव काफी ज़्यादा होता है। एक दिन उन कंपनियों में भी सामंजस्य बनता है। बेहतर नतीजे सामने आते हैं।
समरेंद्र – सुब्रत रॉय ने कहा है कि वो सहारा को एक धारदार ब्रांड बनाना चाहते हैं। इसके लिए आपने कोई रणनीति तैयार की है।
उपेंद्र राय – रणनीति के बारे में बस इतना ही कहना चाहूंगा कि अगर आपमें ऐसी क्षमता है कि आप दूसरों को प्रेरित कर सकें, तो परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है। पहली क्रांति व्यक्ति में होती है और फिर समाज में। संजीव श्रीवास्तव जी और मैं, अपने स्तर पर कुछ ऐसा करेंगे जिससे साथियों को प्रेरणा मिले। मैं कई साल से इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग कर रहा हूं। मैंने तय किया है कि अगले कुछ महीनों में दस बड़ी रिपोर्ट पेश करूंगा। मुझे लगता है कि अगर हम लोग मेहनत करेंगे और साथियों को मेहनत के लिए प्रेरित करेंगे तो नतीजे अच्छे मिलेंगे। मैं न्यूज़ डायरेक्टर बनने के बाद भी अगर रिपोर्ट फाइल करूंगा तो इससे रिपोर्टर काफी मोटिवेट होंगे। फिर हमारे चैनल पर अच्छी और बड़ी ख़बरें प्रसारित होंगी।
समरेंद्र – आमतौर पर जब कहीं बड़ा बदलाव होता है तो धीरे धीरे पूरी टीम बदल जाती है। क्या आप लोग भी अलग से अपनी टीम तैयार करेंगे? वहां मौजूद लोगों को हटाएंगे?
उपेंद्र राय – सहारा के पास अच्छी टीम है। हमें लगता है कि वहां मौजूद लोगों से ही हम बेहतर नतीजे हासिल कर सकेंगे। हमारा ऐसा इरादा कतई नहीं है कि हम लाव लश्कर लेकर चलें। अगर कुछ लोगों की नियुक्ति करनी पड़ी तो वो की जाएगी लेकिन कोई बड़ा भर्ती अभियान नहीं होने जा रहा। देखिए एक पुरानी कहावत है कि कॉमन थिंग्स आर नॉट कॉमन। अच्छे नतीजों के लिए कोई रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है। टीम में विश्वास भर दीजिए, प्रदर्शन सुधर जाएगा। और टीम हमारे पास है।
समरेंद्र – सहारा के बाद बात स्टार न्यूज़ की। आपने स्टार न्यूज़ में लंबा वक़्त बिताया। वहां आपका अनुभव कैसा रहा?
उपेंद्र राय – स्टार न्यूज़ एक बेहतरीन कंपनी है। वहां मेरिट को पूरा सम्मान दिया जाता है। मुझे भी काफी सम्मान मिला। मैं अक्टूबर 2005 में दोबारा स्टार न्यूज़ गया और मुझे साल भर के प्रदर्शन के बाद 2006 में स्टार एचीवर अवार्ड मिला। उसके साथ मुझे प्रमोशन दिया गया। मैं स्पेशल करस्पॉन्डेंट से प्रमोट कर एसोसिएट एडिटर बना दिया गया। अभी मैं वहां पर सीनियर एडिटर के पद पर काम कर रहा था। मैंने मुंबई में नौ साल बिताए और जून 2009 में दिल्ली आया। स्टार न्यूज़ का दौर मेरे जीवन का स्वर्णिम काल है। मेरे संपादक उदय शंकर ने मुझे जो छूट दी, शायद ही कोई संपादक किसी रिपोर्टर को उतनी छूट देगा। शाजी जमां जी ने भी मुझे काम करने का पूरा मौका दिया। इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं।
समरेंद्र - स्टार न्जूज़ में आपने दो ऐसे लोगों के साथ काम किया जो एक दूसरे के विरोधी माने जाते रहे हैं। संजय पुगलिया और उदय शंकर। उन दोनों के साथ आपके संबंध बेहतर रहे। ऐसा कैसे हुआ?
उपेंद्र राय – इसकी सिर्फ़ एक वजह है। अगर आप संपादक या बॉस की कही बात को पूरी तरह से लागू करने की क्षमता रखते हैं। साथ ही ज़रूरत पड़ने पर अपनी गारंटी पर उनके आदेश में करेक्शन करके उन्हें कन्विंस कर लेते हैं तो आपका कद बॉस की नज़र में बढ़ता है। मैंने वही किया। जहां मुझे लगा कि बॉस के आदेश में सुधार की जरूरत है और इससे उनका आदेश अधिक मजबूती से लागू होगा तो मैंने इसकी जानकारी उन्हें दी। फिर आगे बढ़ा। इससे संस्थान और संपादक दोनों के निर्णयों में एक और सुंदरता आई। इसका मुझे भी लाभ मिला। मेरे दोनों संपादकों ने मेरे अंदर ये देखा कि उपेंद्र के काम करने के तरीके में एक मॉडेस्टी है और वो कुछ भी करेगा उससे उनका सिर नीचा नहीं होगा। और मैंने भी जो ख़बरें दीं, उनका एक-एक सबूत और दस्तावेज मेरे पास है।
समरेंद्र – संजय पुगलिया और उदय शंकर के व्यक्तित्व में… काम करने के तरीके में क्या बातें हैं जो अच्छी लगती हैं।
उपेंद्र राय – सबसे पहले मैंने संजय जी के साथ काम किया है तो उनके बारे में बताऊंगा। संजय पुगलिया जी एक ऐसे संपादक हैं जो अपने टीम के एक-एक बंदे से दोस्ताना संबंध रखते हैं। अच्छे कर्मचारी को हर व्यक्ति साथ रखना चाहता है। लेकिन संजय जी कम करने वाले को भी यह अहसास नहीं होने देते हैं कि वो उसके काम से खुश नहीं हैं। उनकी टीम में अगर कोई कहीं कमजोर पड़ता है तो वो मोटिवेट करके उसके काम को निखार देते हैं। ऐसी क्वालिटी बहुत कम संपादकों में होती है। अपने साथ काम करने वालों को वो बहुत ज़्यादा सम्मान देते हैं।
अब बात उदय शंकर जी की। उदय जी की साफ और सीधी लाइन है। व्यक्तिगत रिश्ते ऑफिस से बाहर और काम से कोई समझौता नहीं। अगर आप उनके आलोचक हैं और आपको काम आता है तो उदय शंकर आपको ऑफिस में बहुत मान-सम्मान के साथ रखेंगे और आपका मान-सम्मान बढ़ाएंगे भी, लेकिन हो सकता है कि दफ़्तर से बाहर आप उनसे मिल न पाएं। बात न कर पाएं। वो हर हाल में मेरिट को प्रमोट करने वाले हैं।
समरेंद्र – बीते तेरह साल में आपने काफी लंबी दूरी तय की। इस सफर में… संघर्ष में क्या कोई ऐसा पल आया जिसे आप भुलाना चाहते हों।
उपेंद्र राय – एक दौर था जब मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा। 2002 में मुझे विपरीत परिस्थितियों में सहारा से हटना पड़ा। मुझे मौका नहीं दिया गया अपनी बात कहने का। मैं सहारा चेयरमैन से मिल कर अपना पक्ष रखना चाहता था। लेकिन मुझे मौका ही नहीं मिला। तब मुझे काफी पीड़ा हुई। जो काम मैंने नहीं किया मुझे उसकी सज़ा मिली थी। उसके बाद मैं कुछ मौकों पर सहारा श्री से मिला, लेकिन इस बारे में बात नहीं हो सकी। इस पर बात करने का मौका मुझे 2007 में मिला और मैंने उन्हें पूरी बात बताई। मैं सहारा श्री का हमेशा आभारी रहूंगा कि लंबा वक़्त बीतने के बावजूद उन्हें सब बातें याद थीं। उन्होंने मेरा दर्द समझा और महसूस किया। तब मैं भावुक हो गया और मेरी आंखें भर आईं थीं।
सहारा से हटने के बाद और स्टार न्यूज़ में नौकरी मिलने के दौरान कई महीने मैं खाली रहा। उस दौरान मुझे रिश्तों को समझने का मौका मिला। दोस्तों की पहचान हुई। यह पता चला कि किस पर विश्वास करना चाहिए और किस पर नहीं।
समरेंद्र – आज से दस साल बाद आप अपने को कहां देखते हैं।
उपेंद्र राय – मैं वर्तमान में जीने वाला हूं। भविष्य के बारे में नहीं सोचता। जीने का यह अंदाज़ भी मैंने सहारा श्री से सीखा है। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि कंपनी के सामने इतनी सारी चुनौतियां हैं तो क्या कंपनी के फ्यूचर को लेकर वो परेशान होते हैं? उन्होंने उत्तर दिया था कि मैं वर्तमान में जीता हूं। इसलिए तुम मुझे कभी चिंतित नहीं देखोगे। साल के 365 दिन, मेरी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आता। यह बात मैंने उनसे ही सीखी है कि वर्तमान में जीना सबसे सुखदायी है। वैसे भी भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है यह कोई नहीं जानता।
Pranesh Srivastava
January 8, 2010 at 11:30 am
My Best wishes with Mr Upender Roy sir.
Saurabh Chatterjee
January 8, 2010 at 1:37 pm
उपेन्द्र भाई को शब्दों में व्यक्त कर पाना कठिन है वे बेहद मधुरभाषी ,सहज, सदह्रदय एवं दृणनिश्चय के स्वामी है मैंने उन्हें सन २००० से अबतक देखा है वे सदा एक से है,स्वाभमानी है पर अभिमान का लेश मात्र नहीं है ,वे बेहद संस्कारी है, सबका दिल जीत लेते है, उनके आत्मविश्वास तथा उनके व्यक्तित्व से सदा प्रेरणा मिलती है!
हम सदा से उनके शुभचिंतक रहे है और सदा कामना करते है उनके उपलब्धियों और सफलता के नए आयामों के प्राप्ति की !
उपेन्द्र भाई की बात को पाठको तक पहुचाने के लिए आप का धन्यवाद,साधुवाद !
शशि सिंह
January 8, 2010 at 3:01 pm
उपेंद्र भाई, शुभकामनाएं!
अभिषेक
January 8, 2010 at 3:07 pm
कोई जमीन से इतनी ऊंचाई तक पहुंचा है कुछ बात तो जरूर होगी। मेरी तरफ से भी बधाई।
Ek dost
January 8, 2010 at 6:57 pm
उपेंद्र जी की इस कामयाबी पर उनके तमाम दोस्तों को अपार खुशी और गर्व का अनुभव हो रहा है। लेकिन साथ ही कुछ ऐसे “मारीच” भी सक्रिय हो गए हैं, जो भइया-भइया का राग आलाप कर अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में हैं। स्टार न्यूज़ के कुछ ऐसे ही “मारीच” इस चक्कर में हैं कि उपेंद्र जी की दरियादिली का फायदा उठाकर उनसे चिट्ठी हासिल कर लें और फिर उसे स्टार में दिखाकर अपनी हैसियत बढ़वा लें। विनोद कापड़ी के इंडिया टीवी जाने के बाद भी कुछ लोगों ने ऐसा ही किया था और रातो-रात फायदा उठाने में कामयाब हो गए थे। ऐसे ही लोग अब फिर से सक्रिय हो गए हैं। उपेंद्र जी और स्टार न्यूज़ मैनेजमेंट, दोनों को इनसे सावधान रहना चाहिए।
मुकुंद पांडे
January 9, 2010 at 12:38 am
उपेंद्र का सफर बहुत ही शानदार रहा है. बहुत कम लोग ही गांव-देहात और कस्बों से निकल कर इतनी ऊंचाई पर पहुंचते हैं. उनकी सफलता उन तमाम लोगों के लिए एक उदाहरण है जो नीचे से ऊपर उठना चाहते हैं. उन्हें ढेरों शुभकामाएं और बधाइयां…