मैं जनसत्ता रोज नहीं मंगाता। सिर्फ़ संडे के संडे जनसत्ता पढ़ता हूं। लेकिन प्रभाष जोशी के निधन के बाद जनसत्ता बेरंग, बेरस नज़र आ रहा था। दो पुस्तक समीक्षाएं पहले से ही छपती रही हैं और कागद कारे की जगह पर तीसरी पुस्तक समीक्षा को जबरन घुसेड़ना बहुत बेतुका लगता था। कई बार तो मन यही करता था कि संडे को भी जनसत्ता मंगाना बंद कर दूं। आखिरी कुछ हफ़्तों में तो संपादकीय पृष्ठ किसी साहित्यिक गोष्ठी का विज्ञापन लगने लगा। एक पेज पर तीन-तीन पुस्तक समीक्षाएं और उसके बाद अशोक वाजपेयी धारावाहिक की वो कड़ी जो कभी कभार नहीं बल्कि हर रविवार आती है। दूसरे पन्ने पर कुछ लेख पढ़ने लायक जरूर होते हैं लेकिन उनमें प्रभाष जोशी वाली बात नहीं।
लेकिन आज का जनसत्ता कुछ अलग रहा। शायद इसलिए कि आज तसलीमा नसरीन का कॉलम शुरू हुआ और खुद संपादक ओम थानवी ने एक यादगार पीस लिखा है। सर्दियों के इस मौसम में कोपेनहेगन में बिछी बर्फ की चादर और उसके बहाने जलवायु सम्मेलन की मंत्रणा। अच्छा लगा पढ़ कर। और इससे भी अधिक अच्छा लगा ज्योति बसु पर तसलीमा नसरीन को पढ़ कर। ज्योति बसु के व्यक्तित्व से जुड़े एक अलग पहलू को जानने और समझने का मौका मिला। वो लिखती हैं कि “ज्योति बसु अस्वस्थ हैं। वे किसी भी दिन हमारे बीच से जा सकते हैं। यह सब सुन कर भीतर अजीब सी हूक उठती है। भयानक खालीपन पैदा हो जाता है। उन्होंने लंबी उम्र पायी फिर भी इच्छा होती है कि वे और दिन रहें…”
आप जिन्हें चाहते हैं उनके जाने के अहसास से ही मन में खालीपन घर कर जाता है। क्योंकि आप जानते हैं कि वक़्त भी उनकी कमी को पूरा नहीं कर सकता। हम जब भी अकेले होते हैं वो हमें याद आते हैं। सोते वक़्त हमारे सपनों में जाग जाते हैं। और हर बार अपनी कमी का अहसास करा जाते हैं। इसलिए तस्लीमा नसरीन ज्योति बाबू की और लंबी उम्र के लिए दुआ मांग रही हैं। उनके इस स्तंभ को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा और उनके साथ मेरे हाथ भी ज्योति बाबू की लंबी उम्र की दुआ में उठ गए।
खालीपन क्या होता है यह जनसत्ता के पाठक जानते हैं। हर सप्ताह रविवार को हम इस खालीपन को बेहद करीब महसूस करते हैं। हर सप्ताह लगता है कि प्रभाष जोशी कुछ और दिन ज़िंदा होते। उन्हें बहुत काम करने थे। उन्हें बहुत कुछ लिखना था। हम सब जानते हैं कि इस खालीपन को भरना नामुमकिन है। लेकिन प्रभाष जोशी के कागद कारे का विकल्प एक पुस्तक समीक्षा नहीं हो सकती। बेहतर तो यही होता कि उस जगह को खुले मंच के तौर पर छोड़ दिया जाता। जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ भी नया मिलता उसे छापा जाता। सरकार को आईना दिखाया जाता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। क्यों? यह जनसत्ता वाले जाने। मगर एक पाठक की हैसियत से इतना तो कह ही सकता हूं कि कागद कारे की जगह पुस्तक समीक्षा छापना मेरे जैसे पाठकों के साथ एक घोर अन्याय है।
रंगनाथ सिंह
January 10, 2010 at 10:10 pm
आपने तो मुंह की बात छीन ली ! तस्लीमा का स्तम्भ वहीं प्लेस किया जाता तो भी ठीक था। हद तो यह है कि अशोक जी कभी-कभार चौड़ा होता जा रहा है। शुरू में तो लगा था कि यह अस्थाई व्यवस्था है लेकिन अब लगता है कि हम गलत थे.