बहुत कम लोग अपने गुनाह कबूल करते हैं। इसके लिए बहुत बड़े साहस की ज़रूरत है। IBN 7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष ऐसे ही साहसी लोगों में से एक हैं। उन्होंने यह माना है कि आंध्र प्रदेश के चैनल टीवी 5 ने राजशेखर रेड्डी से जुड़ी जो ग़लत ख़बर दी, वह टेलीविजन न्यूज़ के लिए एक शर्मनाक घटना है। लेकिन इस शर्म की जड़ें काफी गहरी हैं। क्षेत्रीय चैनल की उस करतूत के लिए राष्ट्रीय चैनल भी जिम्मेदार हैं। यही नहीं आशुतोष ने चैनलों के कंटेंट को सुधारने के लिए टीआरपी को तुरंत ख़त्म करने की बात कही है। हिंदुस्तान से साभार यह लेख हम आपसे साझा कर रहे हैं। आप पढ़ें और इस बहस को आगे बढ़ाएं। – मॉडरेटर
टीवी के बारे में किसी ने कहा है कि जब बच्चों के गली में निकलने पर पाबंदी होती है तब वो उसे दुनिया भर की सैर कराता है। मैकलुहान भी कहता है कि मीडिया हमारे शरीर का ही विस्तार है यानी टीवी हमारी मासूमियत को विस्तार भी देता है साथ ही भ्रष्ट भी करता है। फर्क इतना है कि इस्तेमाल सही हो रहा है या फिर गलत। अगर सही तो वो हमें कूपमंडूक बने रहने से बाहर निकालता है, हमारे ज्ञान और विवेक की सीमा को नया आयाम देता है और अगर गलत तो आंध्र प्रदेश के कुछ टीवी चैनल्स जैसा हाल होता है। जब पूर्व मुख्यमंत्री वाईएसआर की मौत को एक साजिश बता कर इस तरह से पेश किया गया कि लोग उत्तेजित होकर सड़क पर उतर आये और तोड़फोड़ करने लगे। इस खबर का कोई आधार नहीं था। बस एक वेबसाइट पर खबर दिखी और बिना सोचे-समझे खबर बना दिया गया।
ऐसा क्यों हुआ? टीआरपी की दौड़ में आगे निकलने की होड़ में ये हुआ या किया गया। जो हुआ वो गैर-जिम्मेदाराना था, नासमझी थी और बेवकूफी की पराकाष्ठा। लेकिन ये सवाल भी उठना चाहिये कि इन चैनल्स ने जो कुछ भी किया, उसकी प्रेरणा उन्हें कहां से मिली, राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स से। निश्चित रूप से इस आरोप में दम है। और मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं भी इस अपराध में बराबर का सहभागी हूं। पिछले पांच साल में न्यूज चैनल्स में भयानक भटकाव दिखा। किसी का नाम लेना सही नहीं होगा लेकिन इसकी शुरुआत तब हुई जब 2004 में एक साथ कई चैनल बाजार में आये और उस वक्त के नंबर वन चैनल को मात देने का काम शुरू हुआ। नंबर वन होने के लिये जरूरी हो गया कि आपके पास सबसे ज्यादा टीआरपी हो। और जल्द ही ये पता चल गया कि न्यूज चैनल में टीआरपी न्यूज से नहीं आती। टीआरपी के लिये जरूरी हैं दो चीजें – या तो न्यूज को इस तरह से पेश किया जाये कि वो लोगों को बांध कर रखे यानी सनसनीखेज या फिर खबरों की नयी दुनिया तलाशी जाये।
तब एक दिन अचानक न जाने कहां से आमिर खान का ‘जान’ नाम का कोई बच्चा खबर बन गया और एक – दो मिनट की खबर आधे घंटे में तब्दील हो गयी। ये न्यूज चैनलों में गिरावट की शुरुआत थी। इस खबर के थोड़े ही दिनों के बाद अचानक शाहिद कपूर और करीना कपूर के किस का कोई क्लिप मार्केट में आ गया और धीरे से टीवी स्क्रीन पर भी। बिना किसी शर्म के, बिना मुजैक किये करीब से खींचे गये चुंबन के दृश्य छोटे पर्दे पर चलने लगे। टीआरपी के डर से सहमे हुए लोगों में किसी को ये हिम्मत नहीं हुई कि कहे प्लीज इस क्लिप को मत चलाओ। ये भौंडा है, दिखाने लायक नहीं है, आम आदमी की संवेदनशीलता को तकलीफ देता है। जिन लोगों ने प्रोटेस्ट किया, उन्हें समझा दिया गया या फिर झिड़क दिया गया।
फिर तो सिलसिला ही चल पड़ा। कहीं यमराज से मिले जगराज चला तो कहीं चार बजे किसी के मरने की भविष्यवाणी पर लाइव हुआ। अभी तक गनीमत थी लेकिन जैसे ही एक मंदिर में लड़के की कहानी की वजह से चुनौती देने वाला चैनल नंबर वन बना। टीवी के इतिहास में सही मायनों मे टर्निग प्वाइंट आ गया। अब सारी सीमायें टूट गयीं। सारे बांध भरभरा कर गिर गये। पुर्नजन्म की कहानियां पीछे छूट गयीं। भूत-प्रेत और नाग-नागिन मेनस्ट्रीम हो गये। नागिन मौत का बदला लेने के लिये अपने प्रियतम के कातिल को खोजने लगी। सपेरा बीन बजाता तो किसी पेड़ पर बैठा आदमी नीचे उतरने से डरने लगा, कहीं नागिन उसमें अपने नाग का हत्यारा खोज कर उसे डस न ले। बिना ड्राइवर की गाड़ी खबर बन गयी तो स्वर्ग की सीढ़ी में पत्रकारिता खोजी जाने लगी। मामला और आगे बढ़ा तो एलियन धरती पर आने लगे और गाय को उठाकर ले जाने लगे। आरुषि का कातिल जानने की तड़प में पत्रकार शरलाक होम्स बन गया। हवा और बिजली के खंभों में कातिल का अक्स ढूंढ़ा जाने लगा। न्यूज रूम नारको टेस्ट की प्रयोगशाला में तब्दील हो गये। भविष्यवाणी करने वालों की डिमांड़ बढ़ गयी, जो जितना ज्यादा डरावना और विद्रूप वे उतना ही काबिल भविष्य का जानकार।
खबर देना नहीं डराना काबिलियत का पैमाना बना तो विकास नहीं विनाश न्यूज रूम में महत्वपूर्ण हो गया। ऐसे में 2012 में धरती खत्म हो जायेगी टीआरपी का सबसे कारगर हथियार साबित होने लगा। इस दौर में टीवी ने जो अच्छा काम किया वे सब पानी में मिल गया। दहेज हत्या, भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान, घूसखोरी और भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिये किये गये स्टिंग ऑपरेशन, टीवी ने आम आदमी को आवाज बुलंद करने का एक सशक्त प्लेटफार्म दिया, जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्ट, नीतीश कटारा जैसे केस में इंसाफ दिलाने में टीवी ने जबर्दस्त भूमिका निभाई। हाल में रुचिका का मामला इसकी एक बानगी है, सांप्रदायिकता का भरपूर विरोध। इत्यादि, इत्यादि। लेकिन इसे याद करने वाला कोई नहीं मिला क्योंकि गलतियां इतनी ज्यादा थीं कि अच्छाई गौण हो गयी। लोगों का गुस्सा आसमान पर चढ़ने लगा। सरकारों ने भवें तानीं और टीआरपी की रेस में शामिल कुछ लोगों को शर्म भी आयी। समझ में आया ये सही नहीं है। फिर अंदरूनी सुधार की कोशिश शुरू हुई। बदलाव भी आने लगा। आज यह कह सकते हैं कि हालात काफी बेहतर हैं। खबरों को फिर से स्पेस मिलने लगा है, लेकिन अभी भी दिल्ली काफी दूर है।
मुझे पूरा यकीन है कि दिल्ली हम पहुंचेंगे लेकिन इसके लिये कुछ और कदम भी उठाने होंगे। एक- रेटिंग सिस्टम यानी टीआरपी को फौरन बंद करना होगा। दो- न्यूज चैनल्स को मनोरंजन चैनलों की बरक्स न तौला जाये। तीन- हर न्यूज चैनल्स के कंटेंट की हर तीन या छह महीने पर स्वतंत्र एडीटर्स की संस्था आडिट करे। चार- चैनल्स को नो प्रोफिट नो लॉस की तर्ज पर चलाया जाये। पांच- न्यूज चैनल्स से जुड़ी शिकायत को सुनने और उसके निराकरण के लिए एक गैर सरकारी संस्था बने जो फैसला सुनाये और हर चैनल उसे मानने के लिये बाध्य हो। और जब ऐसा होगा तो हम गर्व से कह सकेंगे कि टीवी हमारी मानसिक गिरावट का नहीं बल्कि मानसिक विस्तार का प्रतीक है और तब हमें पिकासो की गुएर्निका में सिर्फ विध्वंस का चित्र नहीं दिखेगा और कोई टीवी को एब्सर्ड थियेटर भी नहीं कहेगा।
VASHISHTH SHUKLA
January 11, 2010 at 5:21 pm
आशु जी ने जो कहा वोह शत प्रतिशत सही है . क्यूंकि में खुद एक पत्रकार हु मगर जब कोई आम आदमी टीवी चैनल पर न्यूज़ देखते वक़्त ठहाके मार के हँसता है और कहता है ” की अब तुम्हारे लिए कोई काम नहीं बचा की ऐसी फालतू की स्टोरीज़ को खबर बनाके बेच रहे हो ? ” तब काफी दुख होता है की यह अंको की आपाधापी में सही पत्रकारत्व खो गया है. आम आदमी को पता नहीं होता की एक खबर के पीछे कितनी मेहनत होती है मगर वोह खबर TRP PULLER ना होने से इतनी तवज्जो नहीं मिलती और इसके सामने आपकी सारी मेहनत या तो राखी सावंत लूट जाती है या फिर बाबा…..
vishnu
January 15, 2010 at 10:39 am
बहुत बहुत शुक्रिया कि आप ने कम से कस ये सच बोलने कि हिम्मत तो कि। सच बोलने कि लिए बहुत सहास और एक अच्छी नियत की जरुरत होती है, जो साफ झलकती है। मैं एक बात और कहना चाहुंगा कि अब मुझे लगता है कि गम्मभीर पत्रकारिता की शुरुआत हो चुकी है, मुझे पुरा विश्वास है कि एक दिन न्यूज चैनल सच में न्यूज चैनल्स होंगे। और इस पेशे में आने वाले लोगों को अब घुट घुट कर मरना नहीं पडेगा कि….हाय हमारा चैनल क्या दिखा रहा है.. हम (ट्रेनिंग) यही बात करते रहते हैं आपस में। कम मे कस कब इस घुटन से छुटकारा मिलेगा। समय जरुर लगेगा… लेकिन आगाज हो चुका है। आप जैसे कई वरिष्ट पत्रकार..राजदीप, राहुल देव,बर्खा ने इस पर चिंता जताई है…जब जागो तभी सबेरा।