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जाने के बाद भी एनडीटीवी पर छाए हुए हैं दिबांग

दिबांगएनडीटीवी इंडिया के पूर्व मैनेजिंग एडिटर अब एनडीटीवी से अलग हो चुके हैं। 30 दिसंबर को एनडीटीवी में उनका आखिरी दिन रहा और इसकी ख़बर एनडीटीवी मैनेजमेंट को एक महीने पहले से थी। लेकिन जाने के बाद भी वो एनडीटीवी इंडिया पर छाए हुए हैं। इस महीने, दो शनिवार गुजर चुके हैं। दोनों ही शनिवार मुक़ाबला दिखाया गया। और उस टॉक शो का संचालन दिबांग कर रहे थे। ख़बर यह भी है कि बीते सात साल में उन्होंने मुक़ाबला के जितने भी एपिसोड किए हैं, उनमें से कुछ चुनिंदा एपिसोड छांटे गए हैं। ये वो एपिसोड हैं जिनमें बहस का मुद्दा समय के साथ ठंडा नहीं पड़ा है। मसलन धर्म, संस्कृति, जेंडर और कॉमेडी जैसे मुद्दे। अब इन्हें बारी-बारी दिखाया जा रहा है।

बीते शनिवार जो मुक़ाबला दिखाया गया उसका सवाल था – क्या विज्ञान ने ईश्वर में आस्था को बेमानी बना डाला है? ईश्वर हमेशा से ही सभ्यता का केंद्र रहा है। उसे सब अलग-अलग नाम से पुकारते हैं लेकिन बहुत कम ही उसके अस्तित्व को खारिज करते हैं। इसलिए ईश्वर पर हुई बहस आप कभी भी दिखा सकते हैं। आज या फिर दो साल बाद भी। यही सोच कर उस एपिसोड को प्रसारित किया गया होगा। लेकिन क्या यह सही है कि किसी बड़े अधिकारी ने चैनल छोड़ दिया हो और उसकी घोषणा संपादकीय बैठक में की जा चुकी हो – उस शख़्स के द्वारा संचालित कार्यक्रमों को चैनल पर दिखाया जाता रहे? हैरानी की बात है कि उस संपादकीय बैठक में यह एलान भी किया गया था कि दिबांग के जाने के साथ ही मुक़ाबला बंद कर दिया जाएगा। अगर ऐसा था तो उसे बंद क्यों नहीं किया गया? और अगर बंद नहीं करना है तो फिर उसके संचालन का जिम्मा किसी और को क्यों नहीं दिया गया? क्या एनडीटीवी के पास लोगों की कमी हो गई है? या फिर एनडीटीवी के अधिकारियों को हमेशा नींद में रहने की आदत है?

यहां पर कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि कोई शख़्स किसी चैनल में रहते हुए जो भी कंटेंट तैयार करता है उसका कॉपीराउट चैनल के पास होता है। यह बात सही है लेकिन उस सूरत में यह साफ करना उस चैनल की जिम्मेदारी है कि कार्यक्रम किस वक़्त रिकॉर्ड किया गया था। अगर यह मुक़ाबला आज से छह महीने या साल भर पहले रिकॉर्ड हुआ था तो उसे बीते हफ़्ते प्रसारित करना दर्शकों के साथ एक धोखा है। और एनडीटीवी को यह क़बूल करना चाहिए उसने अपने ही दर्शकों को धोखा दिया है

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One Response to जाने के बाद भी एनडीटीवी पर छाए हुए हैं दिबांग

  1. Sanjay Grover Reply

    January 11, 2010 at 3:04 pm

    पता नहीं क्यों दिबांग की कहीं बात नहीं होती ? बिना लाउड और पक्षपाती हुए जिस तरह वे ‘मुकाबला’ का संचालन करते थे, बहुत अच्छा लगता था। शायद सेल्फ-प्रमोटिंग-मार्केटिंग और गुटबाज़ी-प्रांतबाज़ी जैसे गुर उनमें न रहे हों।

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