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ये महाभारत अनंत है… आप अपना रोल चुनिए

चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ अब ध्यान नहीं खींचती। लेकिन शुक्रवार को तिरुनेलवेल्ली शहर से जो ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ विजुअल्स चले उसने दिल दहला दिया। ख़ून में सना एक वर्दीदार पुलिसकर्मी सड़क पर पड़ा था। वो तड़प रहा था। बार-बार उठने की कोशिश कर रहा था। हाथ के इशारे से आने-जाने वालों से मदद की गुहार कर रहा था। मगर कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया। उसी सड़क से दो- दो मंत्रियों की कारों का काफिला गुजरा। भीड़ ने तमाशा देखा। मगर उस पुलिसकर्मी की मदद को कोई हाथ आगे नहीं बढ़ा। उस पुलिसवाले को बदमाशों ने बम मार कर लहू-लुहान कर दिया था। उसके शरीर के अंग में गहरे घाव हो चुके थे। एक बार तो हिम्मत करके उसने बैठने की कोशिश की मगर हिम्मत जवाब दे गयी। वो फिर सड़क पर गिरा मानो बिजली का तार टूट के गिरा हो। उस विजुअल को देखकर शरीर में करंट दौड़ गयी। उसकी लाचारी पर आंसू भर आए। जनता की नपुंसकता पर गुस्सा आया। करीब आधे घंटे बाद जब वो अपनी आखिरी सांसे ले रहा था तब किसी ने उसके पास जाकर उसे उठाया और गाड़ी में लेकर अस्पताल पहुंचाया। क्या पता वो उस पुलिसकर्मी को नहीं उसकी लाश को अस्पताल ले जा रहे थे? क्योंकि सब-इंस्पेक्टर आर वेत्रीवल अस्पताल ज़िंदा नहीं पहुंचे।

सब-इंस्पेक्टर आर वेत्रीवल स्पेशल टास्क फोर्स की उस टीम में शामिल थे, जिसने ख़ूंखार तस्कर वीरप्पन को मार गिराया था। किसे पता था ऐसे जांबाज पुलिसकर्मी की जान ऐसे सस्ते में जाएगी? अगर वो दोनों मंत्री पनीरसिल्वन और मोहीद्दीन मानवीय संवेदनाओं के प्रति तनिक भी सेन्सेटिव होते तो वेत्रीवेल की जान बच सकती थी। दूसरे दिन विधानसभा में जब प्रतिपक्ष ने हंगामा किया तो मंत्रियों के बयान ने भौंचक्क कर दिया। उन्होंने कहा कि उस पुलिसकर्मी को देखकर उन्होंने एंबुलेंस को फोन किया। लेकिन ये सब होते-होते काफी देर हो चुकी थी। जरूरत थी उसे तुरंत कार में डाल कर पास के अस्पताल में उपचार कराने की। अगर मंत्री जी के साथ ऐसी कोई सड़क दुर्घटना हुई होती या उनपर बदमाशों नें हमला किया होता तो क्या उनके साथी एंबुलेंस का इंतज़ार करते? लेकिन विधानसभा में मंत्रियों ने उस जांबाज पुलिसकर्मी की मौत से पल्ला झाड़ लिया।

चूंकि ये विजुअल टीवी चैनलों पर थे इसलिए उस पुलिसकर्मी के प्रति दर्शकों की सहानभूति सहज थी। और मंत्रियों पर गुस्सा भी जायज है। लेकिन ऐसा आए दिन होता है जब किसी सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति वहीं सड़क पर तड़पता रहता है और गाड़ियों की रफ़्तार नहीं थमती। कोई गाड़ी से उतर कर उस घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए आगे नहीं आता। तमाशबीनों की भीड़ जुट जाती है। और घायल वहीं पड़ा अपनी किस्मत को कोसता दम तोड़ देता है। जो उन मंत्रियों ने किया वो जनता की उसी संवेदनहीनता का आईना है। उसी जनता ने उन्हें चुन कर विधानसभा भेजा और मंत्री बनवाया। इसलिए उनसे ऐसी संवेदनशीलता की अपेक्षा करना भी बेमानी है। आत्मा को झकझोर कर पूछने का वक़्त है कि वेत्रीवल की हत्या क्या उन बदमाशों ने की? क्या हम और आप भी इस गुनाह में भागीदार नहीं।

ये भीड़ उसी संस्कृति का भार ढोए हुए है जिस संस्कृति में द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म पितामह मौन बैठे रहे। वो तो परिवार के मुखिया थे। उनकी बात टालने की जुर्रत न पांडवों में थी न कौरवों में। लेकिन फिर भी उनकी आंखों के सामने दुश्शासन द्रोपदी का चीर हरण करता रहा। द्रौपदी अपनी लाज बचाने की गुहार लगाती रही मगर वीर अर्जुन, सत्यवादी युधिष्ठर और पर्वत का जिगर रखने वाले भीम टस से मस नहीं दिखे। आज भी महाभारत जैसी महागाथा। जनमानस में ज़िंदा है। साथ ही ज़िंदा है उसका हर वो पात्र जो मौके रहते बहुत कुछ कर गया और बहुत मौके गंवा गया। अब समाज ही द्रौपदी है उसे लूटने, खसोटने, उसकी लाज को तार-तार करने वालों की कमी नहीं।

तब एक दुश्शासन था। आज कई है। अलग अलग भेस में। वो कभी राठौर बन कर 14 साल की लड़की की इज्जत पर हाथ डालते हैं और पितामह जैसे लोग उनकी बलाएं लेते हैं, उनको सरपरस्ती देते हैं और उनके किए पर पर्दा डालते हैं। जिस नेता के होम मिनिस्टर रहते देश की व्यावसियिक राजधानी पर आतंकवादी तीन दिन तांडव करते हैं और सैकड़ो बेकसूरों को मौत के घाट उतार देते हैं उसे फिर होम मिनिस्टर की गद्दी मिल जाती है। कोई मुख्यमंत्री बनता है तो भैसों का चारा गटकार जाता है और दूसरा जनता के पैसे को विदेशी बैंकों में अपने नाम पर ट्रांसफर करा लेता है। कोई मुख्यमंत्री बनकर जनता को मज़हब के नाम पर डराता है। तो कोई औद्योगिक घरानों के साथ मिलकर विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन हड़पने की ब्लूप्रिंट तैयार कर जनता की आंखों में धूल झोंकता है। ये उसी महाभारत के भीष्म पितामह का देश है जहां किसान भूमि में खून-पसीने का हल जोतकर देश को अन्न देता है और उसके अपने घर में फाका होता है। हताश और मजबूर होकर वो अपनी जान भी दे देता है।

प्रभात शुंगलू

प्रभात शुंगलू

धर्म ग्रंथ बताते हैं कि महाभारत से कलियुग का आगाज़ हुआ। कलियुग में बेवजह और सस्ते में जान देने के लिए कमर कसनी होगी। कलियुग में जान सबसे सुलभ होगी। और इसे हत्या का दर्जा भी नहीं दिया जाएगा। क्योंकि मुर्दों की बस्ती में कोई किसी की चीख पुकार नहीं सुन सकता। उस महाभारत में 18 दिन ख़ून की होली खेली गयी। और बुराई का अंत हुआ। लेकिन ये महाभारत तो अनंत है। वेत्रीवेल और रुचिका गिरहोत्रा की मौत हमें यही बता रही है।

((वरिष्ठ पत्रकार प्रभात शुंगलू IBN 7 में एडिटर (स्पेशल असाइनमेंट) हैं))

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2 Responses to ये महाभारत अनंत है… आप अपना रोल चुनिए

  1. जवाहर चौधरी Reply

    January 12, 2010 at 10:17 pm

    पतन की परिभाषा बदलनी होगी ।

  2. shashi bhusha Reply

    January 13, 2010 at 12:27 am

    bhai jee,
    *** shoot karane vale patrakar vaha *** rahe the. Us tadap rahe police wale ko wo bhi aspatal bhej sakate the. Lekin *** sab bechate hain. TV wale footej bechate kamate hain. Yadi we matnri amanaviye the to *** channel vale bhi **** hain.

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