सतीश शेट्टी, तुमने हिम्मत कैसे की. कैसे राज़ खोल दिया ग़ैरक़ानूनी ज़मीन पर बने बंगलों का. कैसे बता दिया दुनिया को कि किसानों को बहका कर उनकी ज़मीनें हड़पी जा रही हैं. सतीश, यह हिम्मत करके तुमने बड़ी ग़लती कर दी.
सूचना के अधिकार का क़ानून मिला तो क्या. क्या तुम सबकी पोल खोलते फिरोगे. क्या सबको बताते चलोगे कि सफ़ेद खादी के नीचे वहशी और नापाक इनसान छिपा है. क्या ग़रीबों को बता दोगे कि उनके साथ कौन धोखा कर रहा है. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था सतीश.
अरे, तुमने सत्येंद्र दुबे से क्यों नहीं सीखा. वह भी तो पहले ऐसी ग़लती कर चुका था. एक विशाल घोटाले की ख़बर सीधे प्रधानमंत्री को दे दी थी. आईआईटी में पढ़ा तो क्या, आईईएस में सेलेक्ट हुआ तो क्या, विशालकाय परियोजना का प्रोजेक्ट डायरेक्टर हुआ तो क्या.
उसे हिम्मत नहीं करनी चाहिए थी. अन्याय को उजागर तो नहीं करना चाहिए था. देखा नहीं, क्या हाल हुआ उसका. देश की सबसे बड़ी सड़क के घोटाले को बेनक़ाब करने की हिम्मत की थी. गया शहर में सड़क पर ही छह गोलियां उतार दी गईं उसके बदन में. सात साल हो गए, हत्या के आरोप में पकड़ा गया रिक्शावाला फ़रार है और सफ़ेदपोश असली हत्यारे पहुंच से बाहर.
सतीश, तुमने ग़लती कर दी. फ़र्ज़ी राशन कांड का भंडा फोड़ दिया. अरे, कितने ही दलालों का राशन इससे चलता है. तुमने उस पर नकेल लगा दिया. तुमने उन ज़मीनों की सच्चाई सामने ला दी, जो कभी थी ही नहीं और जिनके नाम पर करोड़ों की डील हो गई. अरे, तुमने ऐसा क्यों किया.
सतीश, तुमने तलवार खाने का मौक़ा ही क्यों आने दिया. क्या कभी मंजूनाथ का चेहरा नज़र नहीं आया. क्या कभी नहीं देखा कि पेट्रोल पंप में धांधली करने वाले किस तरह इंडियन ऑयल के उस जांबाज़ अफ़सर पर हमला करते हैं. क्या तुमने गोलियों से बिंधे 27 साल के मंजूनाथ के बारे में कभी नहीं सोचा. वह भी तो तुम्हारी तरह ही ग़लती कर बैठा था सतीश.
क्या तुमने हम मुर्दों को नहीं देखा था सतीश. क्या देखा नहीं था कि तुम जैसों के लिए हमारे सिस्टम और हमारी मीडिया में कोई जगह नहीं. क्या देखा नहीं था कि बिकाऊ मुद्दों के आगे हम कैसे घुटने टेक देते हैं. या यह सब देख कर भी तुम हिम्मत कर बैठे. सतीश, कहीं तुम यह तो नहीं सोच बैठे थे कि तुम्हारी लड़ाई में हम तुम्हारा साथ देंगे.

अनवर जमाल अशरफ़
हम मुर्दों की बस्ती में वैसे भी तुम जैसे ज़िंदा इंसानों की जगह नहीं है सतीश. हमें माफ़ कर दो.
((वरिष्ठ पत्रकार अनवर जे अशरफ़ इन दिनों डॉयचे वेले से जुड़े हैं और जर्मनी के बॉन शहर में रहते हैं))
shiv joshi
January 16, 2010 at 7:32 pm
anwar ne jantantra mein apne lekh ke zariye ek bahut alag dhang se is maamle ki bhayanakta aur ek nirlajj chuppi ke mahol ko saamne rakha aur rooh ke darwaze par ek zaruri dastak di.
krishna kumar mishra
January 16, 2010 at 9:12 pm
सरकार के कानून जिन्हे बनाया जाता है आम आदमी की सहूलियत के लिए, वही कानून ढ़ाल की तरह इस्तेमाल कर लेते है ये मूल्य-हीन भ्रष्टाचारी लोग, इनके साथा शासन को राजशाही की तरह सलूक करना चाहिए, ताकि कोई कानून की कमजोरी इनकी ढ़ाल न बन सके। मौत के बदले मौत।
krishna kumar mishra
January 16, 2010 at 9:28 pm
बेबाक बात, आप के द्वारा इस बेहद ज्वलंत, व जरूरी मसले पर भाव-विभोर कर देने वाली रपट को मेरा सलाम, लेकिन क्या सरकारे भावुक होंगी?………..माफ़ करिये अरे वो तो संवेदनहीन संस्था है।
alok nandan
January 18, 2010 at 3:20 pm
कसुर उन हाथों की जिनमें तलवार थे, सतीश तुमने अपना काम किया बेखौफ….जंग जारी रहेगा यह वादा है