
आज हिंदुस्तान देख कर कोई भी चौंक जाएगा। पहली ख़बर ठंड से जुड़ी हुई थी। मदन जैड़ा की रिपोर्ट जो मौसम वैज्ञानिकों के हवाले से तैयार की गई है। अगर मौसम वैज्ञानिकों की माने तो सर्दी देर से आई है और देर से जाएगी। यह ख़बर आप कल भी छाप सकते थे और कल भी छाप सकते हैं। चाहें तो अगर अगले साल जिस दिन भी कोहरा घना हो उस दिन उठा कर छाप दें। चार कॉलम की इस ख़बर के बगल में ज्योति बसु के निधन की ख़बर छपी है। दो कॉलम में। शायद हिंदुस्तान के संपादकों ने यह एक भद्दा मजाक किया है। वरना ज्योति बसु के निधन को पहली ख़बर बनाने की जगह मौसम वैज्ञानिकों के अनुमान पर आधारित एक ख़बर को पहली ख़बर बनाने का कोई तुक समझ नहीं आया।
यही हाल देश के नंबर वन अख़बार दैनिक जागरण का है। जागरण ने ज्योति बसु के निधन को पहली हेडलाइन के तौर पर पेश तो किया है। लेकिन दो कॉलम की ख़बर के बगल में एक हंसती खेलती तस्वीर लगा दी है। राजधानी एक्सप्रेस के नए लुक से जुड़ी तस्वीर। और नीचे चार कॉलम में अमर कथा है।
हालांकि दोनों अख़बारों ने भीतर के पन्नों पर भी ज्योति बसु से जुड़ी कुछ और ख़बरें छापी हैं। हिंदुस्तान ने तो एक संपादकीय भी लिखा है। लेकिन ख़बर को लेकर उनका रवैया निराशापूर्ण ही है। इस मामले में आज नई दुनिया का पहला पन्ना उनसे काफी बेहतर रहा। एक ऐतिहासिक घटना को उसी मान-सम्मान के साथ पेश किया गया है।
अंग्रेजी अख़बारों में तो सभी ने इस ख़बर को काफी तवज्जो दी है। द हिंदू के पहले पेज पर ज्योति बसु के अलावा कोई और ख़बर नहीं। इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पेज का दो तिहाई हिस्सा इस ख़बर को समर्पित किया है। हिंदुस्तान टाइम्स ने भी पांच कॉलम में ये ख़बर छापी है। शव यात्रा की तस्वीरों के साथ। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले आधे पन्ने पर यही एक ख़बर है। हेडिंग है। लास्ट सलाम टू ए लिजेंड।
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अविनाश
January 18, 2010 at 2:48 pm
आपने सही नब्ज़ पे हाथ रखा है। हिंदी अखबार अपनी तड़ी में हैं। उठाने-गिराने की मानसिकता उनकी नसों में बहने लगी है। और सबसे बड़ी बात कि उनकी आत्मा मर चुकी है। दुकान बन चुके अख़बारों का विश्लेषण करके आप किसे समझाना चाहते हैं?
aarkay
January 18, 2010 at 3:14 pm
कम से कम इतना तो लिहाज़ किया कि मुख पृष्ठ पर स्थान दिया . पता नहीं मीडिया अपनी प्राथमिकतायें किस प्रकार निर्धारित करता है.
अरविंद शेष
January 18, 2010 at 8:09 pm
समरेंद्र भाई, इससे जरा आगे बढ़िए। देखिए कि हिंदुस्तान ने अगर इस खबर को पहले पन्ने पर देने की मेहरबानी की भी है तो उसका शीर्षक क्या है- “बुझ गई वामपंथ की ज्योति।”
अब इस पर हंसिए या कुछ और करिए, यह अनायास नहीं है। ममता “दीदी” (उनको दीदी कहते हुए हंसी आती है)का बयान भी इसी सुर में है कि “वामपंथ का पहला और आखिरी अध्याय खत्म हो गया।”
और कुछ हिंदी अखबारों में भी इसी सुर को पकड़ा गया है- “बुझ गई ज्योति…।”
क्या यह ज्योति बसु के निधन के बाद किसी अखबार के लिए यह सबसे क्रियेटिव हेडिंग लगा…?
मामला इससे आगे का है। विचारधारा के स्तर पर जो जिसको सूट करता है या खलता है, वह वहां खेल कर ही जाता है। बुझ गई वामपंथ की ज्योति- को इसी निगाह से देखना होगा।
फिर वामपंथ किसे नहीं सुहाता है? जिनके लिए यह असुविधाजनक होगा, उनके लिए ज्योति बसु हों या मार्क्स- बराबर के खतरे होंगे…
गौर कीजिए इंडियन एक्सप्रेस की रचनात्मकता पर। उसके पहले पन्ने का तुक्का है- क्या वे (ज्योति बसु) सीपीएम के वाजपेयी थे? नहीं वे ज्यादा आडवाणी थे।
क्या इसका कुछ मतलब निकलता है?
पिछले एक-दो सालों में जिस तरह वामपंथी नेताओं की तुलना नरेंद्र मोदी, वाजपेयी या आडवाणी से करने की लहर चली है, क्या उसके पीछे कोई खास मकसद हो सकता है?
क्या यह बाकी दूसरी धाराओं के अलावा खुद को ज्यादा वामपंथी समूह मानने वालों के लिए इतराने का दौर है? इस दौर पर चिंता कीजिए…।
खैर, आपने एक संतोष तो दिया ही। महान पत्रकार प्रभाष जोशी की मौत पर आपने बहुत अच्छा कवरेज जनतंत्र पर किया था। ज्योति बसु पर अखबारों के रवैये के जरिए ही सही…!!!
vikram
January 18, 2010 at 10:00 pm
Guys grow up… come out of the lonely world you are living… News has changed a lot and its only you who are crying for Basu… Newspapers are more concerned about the news people want to read.
सलीम
January 19, 2010 at 12:53 pm
ठीक कह रहे हैं विक्रम। तभी अख़बारों में अफवाह, सेक्स और फिल्मी जगत की “रंगीन” ख़बरें छाई रहती हैं। शायद यही आप पढ़ना चाहते हैं।
vikram
January 19, 2010 at 9:39 pm
Yes… stop being a fake buddhijivi… let people be happy with what they like and dislike… newspapers and tv show what people like to read and see. Dont throw media into the era of journalism when sansad mein abhootporv hanagama used to be page one lead… media has grown up, you too grop
सलीम
January 19, 2010 at 11:26 pm
बात सही है विक्रम। आप सही कह रहे हैं। हमें कोई हक़ नहीं यह तय करने का कि लोगों को क्या पसंद है और क्या नहीं। लेकिन फिर आपको किसने यह हक दिया कि आप पीआर एजेंट की तरह किसी के ग़लत कामों की वकालत करें। क्या हिंदुस्तान और उसके जैसे अख़बारों ने आपको अपना पी आर एजेंट नियुक्त किया है? आपको किसने कह दिया कि ज्योति बसु के निधन की ख़बर लोगों को पसंद नहीं? क्या आपने कोई सर्वे किया था? या फिर आप अंतरयामी … भगवान की तरह एक घोषणा कर रहे हैं? क्या कर रहे हैं आप?
चन्दर
January 19, 2010 at 11:08 am
इसमें कहने वाली बात क्या है? उनका अखबार, उनका समाचार प्रस्तुति का ढंग, उनकी मानसिकता वगैरह…आप और हम कौन? ४०-५० प्रतिशत व्यर्थ सामग्री छापकर ये कागज बरबाद करके ही खुश हैं…
aam admi
January 19, 2010 at 2:45 pm
समरेन्द्र जी,
ज्योति बसु के निधन पर मुख्यधारा के अखबारों द्वारा अपनाये गए रवैये के बरख्स ज्योति बसु की राजनितिक शैली और योगदान पर जनतंत्र में क्या दिखा ? क्या जनतंत्र का रवैया ठीक वही नहीं जो मुख्यधारा के अखबारों का रहा ? एक वामपंथी नेता और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर ज्योति बसु की चाहे जितनी भी विफलताएं रही हों, उनका योगदान कुछ कम नहीं. खासकर उस स्थिति में, जब लोकतंत्र के नाम पर ‘लोक’ को ही हाशिये पर रखने का कारोबार लगातार चल रहा हो.
जिस निष्पक्षता और वस्तुनिष्टता की अपेक्षा हमे मुख्यधारा की मीडिया से है, उसके लिए यह बेहद जरुरी है कि पहले हम अपने अप्रोच में वस्तुनिष्ट हों. अरविन्द शेष की भांति मुझे भी हैरानी है कि एक ‘ जनतांत्रिक’ अप्रोच हमे ज्योति बसु पर दो-चार लाइन लिखने से भी रोकता है!!!!
खैर, आपने तो थोड़ी गुजाइश छोड़ी भी. मोहल्ला में तो Blackout ही हो गया.