मैं सतीश शेट्टी हूं. मेरी हत्या हुए कुछ दिन बीत गए हैं. पुलिस जांच चल रही है, सीबीआई जांच की मांग भी उठ रही है. कुछ लोग पकड़े भी गए हैं, शायद जल्द ही मेरी हत्या की ‘नई थ्योरी’ भी सामने आ जाए. पर मैं अब इन सब पचड़ों से दूर जा चुका हूं.
ऊपर जा कर थोड़ा तनावमुक्त भी महसूस कर रहा हूं. लंबे समय से एक मुहिम लड़ रहा था. ज़मीन घोटालों, भ्रष्टाचार, नौकरशाही, सत्ता और दलालों के बीच के संबधों को उजागर करने के लिए आरटीआई एक्ट को औजार बना कर संघर्ष कर रहा था.
सोचता था कि एक अरब की जनता के लिए लड़ाई लड़ रहा हूं. मेरे इस जुझारूपन में एक अरब की जनता भी मेरे साथ है. चुप ही सही लेकिन साथ तो है. पहले तो पता नहीं चला. लेकिन अब महसूस हो रहा है कि मैं अकेला ही था. परिवार वाले मेरे जाने के बाद परेशान ज़रूर हैं, कुछ और लोग ज़रा हाथ पैर मार रहे हैं कि मेरे लिए आवाज़ उठा सकें लेकिन इन सबसे इतर एक ख़ामोशी सी पसरी है…किस भुलावे में जी रहा था मैं.
सोचता हूं कि मैं चाहता क्या हूं. मेरी हत्या से उद्वेलित लोगों की प्रतिक्रिया क्या मैं सड़कों पर देखना चाहता हूं. या फिर मेरी हत्या के एकदम बाद ही इस व्यवस्था में बदलाव आते देखना मेरी इच्छा है..ऐसा तो मैं अपने जीते जी नहीं कर पाया. फिर मेरे जाने के बाद कैसे संभव है.
अपनी हत्या के बाद जनांदोलन की उम्मीद भी किस से करूं. क्या उस जनता से जो वैसे ही पिसी जा रही है. जिसकी नियति अपने अस्तित्व को बचाना और रोज़ी रोटी को जुटाना बन गई है. वो जनता जो कमर तोड़ती महंगाई में और दम तोड़ती उम्मीदों में अपने लिए संघर्ष नहीं कर सकती वो मेरे लिए क्यों सड़कों पर उतरेगी. आख़िर किससे और क्यों इंसाफ़ की गुहार लगाएगी.. उनकी लड़ाई तो मैं ख़ुद ही लड़ रहा था ना.
क्या मैं इंसाफ़ के लिए उन लोगों को आवाज़ दूं जिन्हें आर्थिक कुलांचे भरते भारत की समृद्धि में अपना हिस्सा बटोरने का मौक़ा मिला है. जो किसी भी तरह बस अमीर हो जाना चाहते हैं. अगर मूल्य और सरोकार तबाह होते हैं, मेरे जैसे कुछ और लोग इस व्यवस्था की बलि चढ़ते हैं तो क्या फ़र्क़ पड़ता है. मेरे जैसे सामाजिक कार्यकर्ता के जाने से आर्थिक विकास की दर पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ना.
क्या उम्मीद करूं उस बुद्धिजीवी तबके से जो वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ, हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता, उदारीकरण बनाम समाजवाद की बहस में उलझा है. वो तबका जो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं में इतना दुबक कर बैठा है कि स्वतंत्र सोच को पनपने का कभी कोई मौक़ा ही नहीं देता..वो तबका जो अपनी विचारधारा की सत्ता कायम होने को ही अपना लक्ष्य मान बैठा है फिर भले ही सड़ रही व्यवस्था में कुछ भी बदलाव न आए. कम से कम उसकी विचारधारा की तो जीत होती है ना.
वैसे नेताओं से मुझे ज़्यादा उम्मीद नहीं है..दलित बस्तियों में जा कर हेडलाइन छपवाने, धर्म की राजनीति करने वाले, भव्य पार्कों के निर्माण में करोड़ो लुटा देने वाले राजनीतिक वर्ग के पास इतना समय नहीं है कि मुझ पर ध्यान दिया जाए…वो शायद मुझसे नाराज़ भी हैं,,मैं उन्हीं की बिरादरी के कुछ लोगों की सच्चाई सामने लाने का प्रयास जो कर रहा था..
लेकिन इस देश की मीडिया से मुझे ज़रूर उम्मीद है..शायद जल्द ही मेरे ऊपर सनसनी जैसा कोई कार्यक्रम बन जाए…..व्यथित कर देने वाले दृश्यों के साथ दर्शकों को बताया जाए कि मेरी हत्या कैसे की गई. और अगर यह नहीं भी हुआ तो 5-6 साल बाद मीडिया को ज़रूर याद आएगा कि मुझे इंसाफ़ नहीं मिला..फिर मेरे लिए भी जस्टिस फ़ॉर सतीश के नाम से मुहिम चलाई जाएगी..

सचिन गौड़
((सचिन गौड़। बेहद तेज और सुलझे हुए पत्रकार। इंजीनियरिंग की पढ़ाई। मगर दिल पत्रकारिता की तरफ खींच लाया। लंदन से मीडिया का कोर्स किया और बीबीसी की हिंदी सेवा से जुड़े। लंदन और दिल्ली दोनों जगहों पर अपनी सेवाएं दीं। बीते दो साल से डॉयचे वेले की हिंदी सेवा से जुड़े हुए हैं।))
Bhupendra
January 21, 2010 at 7:33 pm
I liked this style of writing. This writer has excellently expressed his anger for almost everything wrong going on in India, be it the tamed population, overjoyed media and powerfully corrupt politicians.
Keep posting the good work.
रंगनाथ सिंह
January 21, 2010 at 8:28 pm
मर्मस्पर्शी लेख।