वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में विधि विधान का माखौल उड़ाया जा रहा है. इसकी वजह से कुलाध्यक्ष (राष्ट्रपति) जैसे पद की गरिमा और प्रतिष्ठा ख़तरे में है। इस पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। 13 जनवरी को विश्वविद्यालय की कथित नई कार्यकारिणी परिषद (एक्जक्यूटिव काउंसिल) की बैठक की गई और उसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय किए गए। इनमें से कई निर्णयों पर मानव संसाधन मंत्रालय के जरिये राष्ट्रपति महोदया (विश्वविद्यालय की कुलाध्यक्ष) की अंतिम मुहर लगनी है। लेकिन इस बैठक की पूरी प्रक्रिया और कार्यकारिणी परिषद की वस्तु स्थिति की तरफ ध्यान देना जरूरी है।
28 दिसंबर 2001 मानव संसाधन मंत्रालय के पत्रांक No. F 26 -21/2001 Desk(U) एवं तदानुसार 6 फरवरी 2002 की विश्वविद्यालय के कुलपति की अधिसूचना के अनुसार विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी परिषद के निम्म सदस्य होंगे।
(1) कुलपति
(2) प्रतिकुलपति
(3) कुलपति द्वारा मनोनीत दो वरिष्ठतम डीन
(4) दो विभागाध्यक्ष
(5) एक प्रोफेसर
(6) एक रीडर
(7) एक लेक्चरर
(8) कुलाध्यक्ष द्वारा मनोनीत विश्वविद्यालय के न्यायालय के दो सदस्य
(9) कुलाध्यक्ष द्वारा हिन्दी भाषा, साहित्य, संस्कृति, अनुवाद एवं निर्वचन के क्षेत्र से मनोनीत छह सदस्य
(10) कुलाध्यक्ष द्वारा सूचना एवं संचार तकनीकी के एक विशेषज्ञ।
इस तरह कार्यकारिणी परिषद के कुल सतरह सदस्य होंगे। यह स्पष्ट प्रावधान है कि सतरह सदस्यों की कार्यकारिणी परिषद की बैठक में छह सदस्यों की उपस्थिति होने पर ही कार्यकारिणी परिषद की बैठक का कोरम पूरा माना जाएगा। लेकिन आश्चर्य है कि सतरह सदस्यों की कार्यकारिणी का गठन किए बिना ही कुलपति ने कार्यकारिणी परिषद की बैठक कर ली। उनका जोर नियमानुसार कार्यकारिणी का गठन करने पर नहीं रहा है। वे चाहते है कि केवल छह लोगों के कोरम को पूरा करने की व्यवस्था हो जाए तो कार्यकारिणी की बैठक की जा सकती है और उसमें मनमाने तरीके से किए जाने वाले फैसले मान्य हो सकते हैं।
13 जनवरी 2010 की बैठक से पूर्व विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने कार्यकारिणी परिषद का गठन नहीं किया। उन्होंने कुलाध्यक्ष द्वारा मनोनीत सात सदस्यों में से छह सदस्यों को ही कार्यकारिणी मान लिया। कार्यकारिणी के ये सभी छह सदस्य विश्वविद्यालय के लिए नए हैं। कुलाध्यक्ष द्वारा मनोनीत एक सदस्य विष्णु नागर ने बैठक शुरू होने से पहले ही इस्तीफा कर दिया। वे इससे पहले की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य थे और विश्वविद्यालय के अंदरूनी मामलों की उन्हें जानकारी थी। वे कुलपति की कार्य संस्कृति से भी वाकिफ थे। इसीलिए उन्होंने आधी अधूरी कार्यकाकारिणी परिषद की बैठक से पूर्व ही अपना इस्तीफा सौंप दिया।
कुलपति ने जान बुझकर विश्वविद्यालय के साथ काम करने वाले सदस्यों को शामिल कर कार्यकारिणी परिषद का गठन करने की कोशिश भी नहीं की। कुलपति ने ये बैठक भी वर्धा से बाहर दिल्ली में रखी। बैठक में कुलपति ने उपस्थित सदस्यों को जैसा बताया, सदस्यों ने उनकी बातें सुनकर अपनी मुहर लगा दी। इस बैठक के बाद उसके मिनटस जारी किए गए होते तो संभवत लोगों को ये भी पता लग सकता था कि उक्त बैठक में क्या-क्या फैसले किए गए। लेकिन मिनटस को जान बुझकर विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर भी नहीं डाला गया।
दरअसल, कुलपति के प्रभाव में आकर कार्यकारिणी परिषद ने जिस तरह से फैसले किए हैं, उन मामलों की गहराई में जाने की जरूरत महसूस की जाती है। वे किसी न किसी स्तर पर विवादस्पद है। यदि उन फैसलों पर कुलाध्यक्ष महोदया की मुहर लगनी है तो उस पर मुहर लगने से उनके पद और गरिमा को चोट पहुंच सकती है। लिहाजा जरूरी है कि विश्वविद्यालय की आधी अधूरी कार्यकारिणी परिषद के फैसलों पर अमल से पहले कार्यकारिणी परिषद का पूर्णरूप से गठन किया जाना चाहिए। उसमें विश्वविद्यालय से जिन सदस्यों को मनोनीत किया जाना है उनका मनोनयन किया जाना चाहिए। यह लोकतांत्रिक भावना भी है।
इस संबंध में पूछताछ की जानी चाहिए और यदि कार्यकारिणी परिषद के फैसलों पर अपनी मुहर या अनुशंसा से पहले उस फैसले से जुड़े संबंधित पक्षों के बारे में पूछताछ व गहन जांच कर लेनी चाहिए।
((वर्धा मेल))
aam admi
January 28, 2010 at 4:26 pm
सामंती चरित्र और प्रतिक्रियावादी मानसिकता में पगा आदमी अपने हितों को साधने के लिए सबसे पहले प्रगतिशीलता का ही लबादा ओढ़ता है. विभिन्न स्रोतों से वर्धा से आ रही ख़बरों से यह साबित होता है कि महात्मा गाँधी के नाम पर बने विश्वविद्यालय को सामंती चरित्र और प्रतिक्रियावादी मानसिकता में पगे लेकिन प्रगतिशीलता का लबादा ओढ़े एक कुलपति ने अपनी निजी मिल्कियत मान लिया है. इतिहास गवाह है कि जब भी किसी व्यवस्था/ निकाय / संस्थान का नेतृत्व किसी ‘रंगे सियार’ के हांथो में आया है, उसका बंटाधार ही हुआ है.
सुशांत झा
January 28, 2010 at 8:27 pm
बहुत बढ़िया, कृष्ण कुमार जी, जारी रहिए।
Ramesh Parashar
January 30, 2010 at 9:42 pm
अनिल चमड़िया का ये कहना कि वे दलित हैं, 100 फीसदी झूठ है। श्री चमड़िया पत्रकारिता में मौका पाने के लिए स्वयं को दलित कहते हैं। इनका तथाकथित दलित प्रेम भी एक स्वांग है क्योंकि अनिल जी और इनके परिवार को दलितों से कोई लेनादेना नहीं है। अनिल चमड़िया न जाति से और न कर्म से दलित हैं। बल्कि वे जाति से मारवाड़ी बनिया और बड़े व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनकी शिक्षा सासाराम में ही हुई है। अत: हर व्यक्ति इनके बारे में अच्छी तरह जानता है। इनका विवाह सासाराम शहर के बड़े वैश्य परिवार गिरीश चन्द्र जायसवाल की बेटी से हुआ है। जिनका शहर में दर्जनों मकान, मार्केट और व्यापार है। अन्य भाइयों और बहन की शादियां भी बड़े मारवाड़ी व्यापारी परिवार में हुई है। इनके परिवार के किसी भी दूर के रिश्तेदार का भी वैवाहिक सम्बंध किसी दलित परिवार से नहीं है। अनिल चमड़िया और उनके परिवार का एक संक्षिप्त परिचय-
अनिल चमड़िया, पिता स्व. राम गोपाल चमड़िया, निवासी -हरे कृष्ण कॉलोनी, कंपनी सराय, थाना- सासाराम, जिला-रोहतास, बिहार, अपने पांच भाई और एक बहन में सबसे बड़े हैं। इनके अन्य भाइयों का नाम सुनील चमड़िया पेशे से चार्टर्ड एकाउटेंट, आलोक चमड़िया और अमित चमड़िया पेशे से पत्रकार और अशोक चमड़िया पारिवारिक गल्ले के व्यवसाय में हैं। बहन प्रीती चमड़िया का विवाह हो गया है। इनके परिवार का लगभग 30-35 वर्षों से गल्ला के थोक दलाली का व्यवसाय है, जिसे पूर्व में इनके पिता और अब भाई संचालित करते हैं। ये लोग मूलत: मध्य प्रदेश के सागर शहर के निवासी हैं। जो बाद में व्यवसाय हेतु सासाराम आ गए थे। इनका परिवार सासाराम शहर के बड़े व्यवसायी मारवाड़ी परिवारों में शुमार होता है। अनिल चमड़िया के चचेरे चाचा श्री मनोहर लाल जी अपने ननिहाल के धन पर सागर से सासाराम आए। यहां आकर इन्होने अपनी सरनेम चमड़िया की जगह पोद्दार लिखना शुरू कर दिया, क्योंकि इनके ननिहाल का उपनाम पोद्दार था। मनोहर लाल जी चूंकि अपने ननिहाल के घर पर आए तो इन्होंने अपना उपनाम पोद्दार रख लिया। परन्तु अनिल चमड़िया के पिता ने अपना मूल मारवाड़ी उपनाम चमड़िया बरकरार रखा। जो आज तक चला आ रहा है। श्री अनिल चमड़िया के दादा का नाम महावीर प्रसाद चमड़िया था, जो म.प्र. के सागर शहर में व्यवसाय करते थे। बाद में सासाराम आने से पहले इनके पिता और चाचा ने वहां की संपति बेच दी। आज श्री चमड़िया के परिवार के पास शहर और उसके आसपास करोड़ों का व्यवसाय पत्रकारिता के धौंस पर बखूबी चलता है। इनके और इनके भाइयों के पत्रकारिता की धौंस हमेशा इन लोगों के व्यवसायिक हितों के काम आई है।
चमड़िया के सरनेम वाले श्री सीताराम चमड़िया कांग्रेस के जमाने में बिहार सरकार के मन्त्री हुआ करते थे। जो मारवाड़ी बनिया थे। अनिल जी शायद देश के पहले स्वघोषित दलित हैं, जिन्होंने दलित जुमले का इस्तेमाल अपने पत्रकारिता के करियर को चमकाने में किया है। लेकिन श्री चमड़िया पहले शख्स होंगे, जो गैर दलित होते हुए दलित के नाम पर सहानुभूति लेते हैं। मैं पत्रकारिता जगत से जुड़ा हुआ इनके तहसील का ही निवासी हूं। इसलिए इनसे जुड़ी हुई सारी जानकारी आप लोगों के सामने रख रहा हूं। इनके दलित होने और दलित प्रेम का खुलासा करना अभी बड़ा मौजूं था क्योंकि मैं भी बेसब्री से इस वक्त का इन्तजार कर रहा था। आशा है आपको यह तहकीकात अच्छी लगेगी।
रमेश पराशर
ranjan
February 1, 2010 at 1:08 pm
parashar pandit, (agar tumhara kul-gotra “nirdosh” hai to)
tumhari yah tahkikaat beshak achchi lagi.
shayad tumne darbhangia panditon ke chauraath ke doolha bazar ka me kisi vyakti ki khaandaani panjika banane ya uska itihaas sanjo ke rakhne ka dhandha karte ho.
isi tarah tumhein vn rai ke kul-gotra ka bhi byora dena chahiye. wahaan se tumhein jitna mila hoga, us se bhi achchi keemat milegi. suna hai, wahaan keemat ke roop “bhinn-bhinn” “sewaayein” pradaan ki jati hain. agr zameer bachaa hua ho “sewaa” lene se pahle “sewaa” pradaata ke kul-gotra ki parakh zaroor kar lena, kyonki kaheen wah tumhaara hissa na nikle ya kaheen us se tumhara kul-gotra na bhang ho jaye.
anil chamadiya ke dalit paksh ko itna hi samajh sakne ki tumhaari aukaat hai.