Subscribe by Email

‘ये तुम्हारे गले में किसकी आवाज है …….’*

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से प्रोफेसर अनिल चमड़िया को “क्रूर तरीके” से हटाए जाने के मुद्दे पर इन दिनों ढेरों ई-मेल पहुंच रहे हैं। ऐसी ही एक चिट्टी तीन दिन पहले हमारे पास पहुंची। लिखने वाले ने नाम-पता गोपनीय रखने की गुजारिश की है। उनकी मजबूरी को समझते हुए, हम इस अपील को मान रहे हैं और उनकी बातों को आपसे साझा कर रहे हैं। इसलिए कि इसमें दो ऐसे व्यक्तियों का जिक्र है जिनके बारे में हम और आप बहुत से लोग जानते हैं। उन दोनों व्यक्तियों में एक शख़्स हैं कृष्ण कुमार। बहुचर्चित शिक्षाविद कृष्ण कुमार इन दिनों एनसीईआरटी के कर्ता-धर्ता हैं। दस-बारह साल पहले उनकी एक पुस्तक आई थी “विचार का डर”। वह पुस्तक लाजवाब है। उससे कृष्ण कुमार की गहराई का पता चलता है। लेकिन ताज़ा प्रकरण से उनकी चतुराई का भी पता चल रहा है। वह भी उन दिग्गजों में से एक हैं जिन्होंने मिल कर अनिल चमड़िया को यूनिवर्सिटी से बाहर किया है। कृष्ण कुमार भी विभूति नारायण राय की इस साज़िश में बराबर के गुनहगार हैं। इसलिए जरूरत है कि अब बहस का दायरा बढ़ाया जाए। हर उस व्यक्ति से सवाल किया जाए जो विभूति नारायण राय का या तो समर्थन कर रहा है या फिर विरोध करने से बच रहा है। – मॉडरेटर

अनिल चमड़िया बनाम वी एन राय के पूरे किस्से में क्या सच है और क्या झूठ-यह तो धीरे-धीरे सामने आने ही लगा है। आशा है कि प्रगतिशील मानेजाने वाले और आम जन के अनेक क्रांतिकारी विचारक व रहनुमाओं की पोल इस प्रकरण में खुलकर सामने आ जाएंगीं। लेकिन जिनके बारे में चर्चा कभी नहीं हो पाएगी या हो पाती है – वह हैं राकेश मिश्रा जैसे व्यक्ति।

लेकिन सबसे पहले ‘राज, समाज और शिक्षा’ जैसी पुस्तक लिखने वाले कृष्ण कुमार के बारे में कुछ जान लेना जरुरी है। ये विद्वान ‘समाजशास्त्री और शिक्षाविद्’ अभी एनसीईआरटी के निदेशक हैं। इनके बारे में ज्यादा बात करने से बहुत लाभ नहीं है, लेकिन कुछ बातें किए बगैर परदे के पीछे की बहुत सी बातें बाहर नहीं आ पाएगीं। इसलिए इस पर जरूर बात की जानी चाहिए। उन्होंने जनसत्ता के अपने पाक्षिक कॉलम ‘दृश्यांतर’ में अनिल चमड़िया के लेखों का कई बार (कम से कम दो बार) तारीफ़ के साथ जिक्र भी किया है। कुल मिलाकर वह अनिल चमड़िया की प्रतिभा से वाकिफ हैं। अनिल चमड़िया को जब वी एन राय द्वारा अपने निकाले जाने की रणनीति के बारे में पता चला तो अनिल ने कृष्ण कुमार से बात भी की। कृष्ण कुमार ने चमड़िया को आश्वासन दिया कि वह वी एन राय के इस कदम का विरोध करेंगे और इसकी जांच के लिए एक समिति का गठन करवा देंगे। लेकिन जब बात एक्जीक्यूटिव कौंसिल में पहुंची तो उन्होंने वी एन राय का साथ दे दिया।
फिलहाल, कृष्ण कुमार के इस क्रांतिकारी “बदलाव” पर एक बड़ा लेख हो सकता है या लधु पुस्तिका भी। किताब भी लिखी जा सकती है। लेकिन ऐसा करना कृष्ण कुमार के महत्व को बढ़ाना होगा और मुझे उन पर वक्त, मेहनत और कागज जाया करने की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

इसलिए इस समय जिस आदमी पर नजर रखे जाने की सबसे ज्यादा जरुरत है, वे हैं बनारस से दिल्ली के रास्ते वर्धा पंहुचे राकेश मिश्र। वो कथाकार हैं। कभी-कभी अच्छी कहानियां भी लिखते हैं। राकेश मिश्र वर्धा उस समय पहुंचे जब अशोक वाजपेयी वहां के वी सी थे। बताया जाता है कि उन्होंने अशोक वाजपेयी के सबसे विश्वसनीय आदमी अपूर्वानंद के सहारे वर्धा के अहिंसा कोर्स में छलांग लगाई। जब अशोक वाजपेयी का कार्यकाल खत्म हो गया तो पी गोपीनाथन नए वी सी बनकर आए। भगवाधारी और अकादमिक माहौल को बिगाड़ने के चलते दिल्ली में उनके खिलाफ लगातार प्रदर्शन चला जिसके एक-आध शुरुआती प्रदर्शन में राकेश जी शामिल थे, लेकिन कुछ ही दिनों में सबकुछ बदल गया। वो गोपीनाथन के खासमखास हो गए।

इस बीच वे वर्धा से लेकर दिल्ली तक लोगों को बताते रहे कि किस तरह अशोक वाजपेयी एंड कंपनी ने विश्विविद्यालय का बेरा गर्क कर दिया था और गोपीनाथन उसे कितनी मुश्किल से रास्ते पर लाने में लगे हैं। परिणाम काफी सुखद और चमत्कारिक निकलाः राकेश मिश्रा महात्मा गांधी हिंदी विश्विविद्यालय में अहिंसा के प्राध्यापक नियुक्त हुए। आज वही राकेश मिश्रा वी सी विभूति नारायण राय के मीडिया और साहित्येत्तर सलाहकार हैं। लोगों का कहना है कि वी एन राय के बदले राकेश मिश्र ने ही वर्धा से बाहर के लेखक-बुद्धिजीवियों को अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ लामबंद करने की ‘सुपारी’ लिया है।

जिस अनिल चमड़िया के ऊपर वी एन राय ने आरोप लगाया है कि वह छात्रों के साथ बैठकर शराब पीते हैं, उनके बारे ये बातें तो तथ्यहीन है ही। लेकिन यह बात वी एन राय जैसे अलकोह्लिक व्यक्ति के मुंह से शोभा नहीं देता है, जो सुबह में अपनी दिनचर्या चाय से शुरु करते हैं या शराब से यह खुद उन्हें पता नहीं है। हां, राकेश मिश्र भी शराब के इतने ही शौकिन हैं, वी एन राय के सबदरवारियों में राकेश मिश्र सिर्फ पद और प्रतिष्ठा कारण नहीं जुड़े हैं बल्कि उसमें प्याले का होना भी शामिल है।

वर्षों पहले इंदिरा गांधी के आपातकाल के आततायी के बारे में मशहूर पत्रकार जनार्दन ठाकुर ने एक किताब लिखी थीः ऑल द प्राईममिनिस्टर मेन, शायद हिन्दी में इसका अनुवाद हमारे मशहूर लेखक उदय प्रकाश ने सब दरबारी के नाम से किया है। राकेश जी वी एन के सब दरबारियों में से एक हैं।

* यह शीर्षक हंस के यशस्वी संपादक राजेन्द्र यादव के एक संपादकीय से लिया गया है।

((यह ई-मेल एक वरिष्ठ पत्रकार ने भेजा है, जो वर्धा से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं))

Share This Post

One Response to ‘ये तुम्हारे गले में किसकी आवाज है …….’*

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    February 2, 2010 at 11:09 pm

    वर्धा विश्वविद्यालय से जितनी भी खबरें छन कर आई हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि यह विश्वविद्यालय अकादमिक भ्रष्टाचार का बिगअड्डा बन चुका है। वहाँ पर हुई नियुक्तियों, एडमिशन, विभिन्न मदों में किए गए खर्चों की जांच होनी चाहिए। किसी एक के निकाले या रखे जाने को तूल देने से कोई ज्यादा हासिल नहीं है। सर्वप्रथम वीसी को तत्काल अपदस्थ करके एक जाँच कमेटी बैठाई जाय। जो लोग विरोध पत्र लिख रहे हैं वो यूजीसी के चेयरमैन और मानवसंसाधन विकास मंत्री को पत्र लिखें कि इस विश्वविद्यालय की गतिविधियाँ संिदग्ध हैं। अकादमिक भ्रष्टाचार पर ध्यानाकर्षण का यह अच्छा मौका है । यह दो व्यक्तियों के बीच का टकराव नहीं है। मामला व्यापक है और इस पर उसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रतिक्रिया होनी चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>