विभूति नारायण राय। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति। एक सीनियर आईपीएस अफ़सर। सेकुलर साहित्यकार और जनवादी लेखक। लेकिन अब ये सारी छवियां टूटती नज़र आ रही हैं। बीते कुछ महीनों में उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय में जो कुछ भी घटित हुआ, उससे विभूति नारायण राय पर दलित विरोधी होने का आरोप लगा। एक ईमानदार प्रोफेसर को साज़िशन हटाने और एक दलित प्रोफेसर को मानसिक यंत्रण देने का आरोप लगा। साथ ही जातिवादी ज़हर फैलाने का आरोप भी लगा।
इन सभी आरोपों पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, मोहल्लालाइव के संपादक अविनाश और जनतंत्र की तरफ़ से समरेंद्र ने उनसे बात की। विभूति नारायण राय ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में तीनों को इंटरव्यू दिया। सभी सवालों का उन्होंने कभी शांत भाव से तो कभी गुस्से में जवाब दिया। बीच-बीच में वो यह भी जताते रहे कि वो किसी को जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते हैं। वो दलित विरोधी नहीं हैं। और यह साबित करने के लिए उन्हें किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं। मगर यह पूछने पर कि उनके कार्यकाल में जितनी भी अस्थाई नियुक्तियां हुईं हैं, क्या उनमें एक भी दलित है… वो कहते हैं कि उन्हें याद नहीं।
इसी बातचीत में उन्होंने बताया कि अनिल चमड़िया बेहद अनैतिक प्रोफेसर हैं। यह भी कि अनिल राय अंकित को चोर गुरू के तौर पर उनके दुश्मनों ने प्रचारित किया है। यह पूछने पर कि क्या अंकित अनैतिक नहीं? वह कहते हैं कि जांच के बाद ही तस्वीर साफ़ होगी। इसी इंटरव्यू में वो यह वादा भी करते हैं कि अगले कुछ दिनों में अंकित की जालसाजियों पर फैसला आ जाएगा। मगर कुछ पलों बाद यह भी दोहराते हैं कि फैसला जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही होगा और कमेटी अभी तक गठित नहीं हुई है।
विभूति नारायण राय का दावा है कि अनिल चमड़िया को हटाने में उनका कोई हाथ नहीं। मगर वह यह भी कबूल करते हैं कि उन्होंने ईसी के मेम्बरों से कहा था कि यूनिवर्सिटी से एक ग़लती (अनिल चमड़िया की नियुक्ति) हो गई है और वो इस ग़लती को दुरुस्त करना चाहते हैं। विभूति नारायण राय से यह बातचीत काफी लंबी है। करीब 36 मिनट लंबी। उसी के एक हिस्से को हम आज प्रकाशित कर रहे हैं। बाकी हिस्से अगले कुछ दिनों में आपके सामने रख दिए जाएंगे। ताकि आप सही ग़लत का फ़ैसला खुद कर सकें। – मॉडरेटर
समरेंद्र – प्रोफेसर अनिल चमड़िया वाले मामले में क्या हुआ था?
विभूति – अनिल चमड़िया का जो अप्वाइंट हुआ था। उस अप्वाइंटमेंट लेटर में लिखा हुआ था कि “दिस विल बी सब्जेक्ट टू अप्रूवल ऑफ ईसी (एक्जीक्यूटिव कौंसिल)”। ईसी की मंजूरी के बाद ही उनकी नियुक्ति प्रभावी होगी। उनके अप्वाइंटमेंट के बाद ईसी का गठन हुआ। 13 जनवरी को दिल्ली में बैठक हुई। वहां पर जितने लोगों का अप्वाइंटमेंट अनिल चमड़िया के साथ हुआ था। उन सभी लोगों का केस रखा गया। और ईसी ने अनिल चमड़िया को छोड़ कर बाकी सबका अप्रूवल कर दिया। इनका छोड़ दिया।
समरेंद्र - कितने लोग थे?
विभूति – 12 या 13 थे। मुझे इक्जैक्ट तो याद नहीं। लेकिन 12-13 लोग थे।
अविनाश – ईसी के रिजेक्ट करने का आधार क्या था?
विभूति – ईसी सारे रिकॉर्ड देखती है। सारे डॉक्यूमेंट देखती है। उसके बाद फैसला करती है।
समरेंद्र – तो क्या ईसी में आपने कुछ प्रस्ताव भी रखा था।
विभूति – नहीं मैंने कोई प्रस्ताव नहीं रखा। मैंने उनके सामने यह रखा कि ये केसेज हैं… अप्वाइंटमेंट के। इनको मेरिट के आधार पर तय करना है।
दिलीप – ईसी कब कंस्टीट्यूट हुई थी।
विभूति – ईसी… मुझे लगता कि हमारी 13 को मीटिंग हुई थी तो सात या फिर आठ (जनवरी) को ईसी का गठन हुआ था।
दिलीप – कितने लोग हैं ईसी में इस समय?
विभूति – ईसी में इस समय …. देखिए हमारी ईसी का फॉर्मेशन ऐसा होता है कि विजिटर के सात नॉमिनी होते हैं। तो विजिटर ने सात लोगों को नोमिनेट किया था। उसमें एक विष्णु नागर जी ने पहले ही दिन.. जैसे ही सात या आठ तारीख को मैंने उनको फोन करके कहा कि आप हमारी ईसी के मेंबर हो गए हैं, उन्होंने कहा कि उनके लिए यह संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि पिछली बार भी वो ईसी में हमारे थे और उनका कहना था कि वो ईसी में हमारे बहुत व्यस्त और थका देने वाला वो था.. तो वो इस बार नहीं रह पाएंगे। तो इस तरह से छह लोग बचे।
दिलीप – इस समय आपकी ईसी में सब मिला कर कितने लोग हैं।
विभूति – आठ लोग हैं।
दिलीप – ये पूरी ईसी है?
विभूति – नहीं। ये पूरी ईसी नहीं है। इसमें सात अध्यापक भी होने चाहिए। अध्यापक पिछले डेढ़ दो साल से नहीं हो पा रहे हैं हमारी ईसी में। उसकी वजह है कि उनकी सीनियोरिटी को लेकर विवाद चल रहा। जब तक वो हल नहीं हो जाता, वो ईसी में नहीं आ सकते। ये लगता है कि सवा साल तो मुझी को हो गया और ये मेरे आने के पहले से यानी लगभग दो साल से बिना अध्यापकों के… केवल विस्टर के नोमिनी की ईसी चल रही है।
दिलीप – ये जो एजेंडा में जब ये क्लॉज आया होगा तो क्या आपने उनको (ईसी मेंबर्स को) कोई उनको इसके बारे में कोई बैकग्राउंडर दिया था?
विभूति – बैकग्राउंडर दो होते हैं। एक तो विज्ञापन की कॉपी होती है। दूसरा यूजीसी की गाइडलाइन्स होती हैं। ये दोनों बैकग्राउंडर उनके पास होते हैं।
समरेंद्र – ये वैकेंसी कब की थी। 1998, 2000 या फिर 2009 की?
विभूति – यह मुझे याद नहीं। ये वैकेंसी .. जिसमें अनिल चमड़िया हुए थे?
समरेंद्र – हां
विभूति – ये मुझे ध्यान नहीं। ये देखना पड़ेगा अपने रिकॉर्ड्स में।
समरेंद्र – अच्छा!
विभूति – 98 की हो ही नहीं सकती क्योंकि 2001 के बाद हमारे यहां पठन-पाठन हुआ था। तो उसके बाद ही की होगी।
समरेंद्र – अच्छा तो उसके बाद की ही होगी।
दिलीप – जब आपने एडवरटाइज किया था और अनिल चमड़िया ने अप्लाई किया था तो आपको यह क्यों लगा कि ये क्राइटेरिया फुलफिल करते हैं?विभूति – नहीं। उस समय हमारे दफ़्तर से ग़लती हुई थी। यूजीसी की दो गाइडलाइन्स थीं। एक गाइडलाइन्स पहले की थी, जिसमें …. असल में ऐसा है कि यूजीसी में एक एक्सलेंस का क्लॉज है। एक्सलेंस के क्लॉज में आप किसी को प्रोफेसर बना सकते हैं। अगर उसने उस क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण कंट्रीब्यूशन किया हो तो। लेकिन उसके बाद 2002 में यूजीसी ने नई गाइडलाइन्स जारी की थी… 2000 या 2001 में ..
समरेंद्र – 2000 में।
विभूति – चलो तो अच्छा है आपने देख रखा है .. तो फिर आप मुझसे क्या पूछ रहे हैं? (थोड़ा पॉज) उन गाइडलाइन्स में यह स्पष्ट था कि यूजीसी ने मास कॉम से ये क्लॉज हटा दिया था। बाकी दूसरी जगह है। जैसे अनिल चमड़िया साहित्य के प्रोफेसर हो सकते थे। किसी और हमारे सब्जेक्ट के हो सकते थे। लेकिन वो मास कॉम के नहीं हो सकते थे। दूर्भाग्य से हमारे दफ़्तर में जब स्क्रूटनी (फॉर्म की) हो रही थी तो वो रिकॉर्ड हमारे सामने नहीं आया था। उस चक्कर में हमने अनिल चमड़िया को बुला लिया और सलेक्शन कमेटी ने उनको सलेक्ट भी कर लिया।
दिलीप – इस ग़लती की जानकारी आप लोगों ने ईसी को दे दी थी। या फिर ईसी ने …
विभूति – नहीं। हमने दे दी थी। हम क्यों ईसी से छिपाएंगे। हमने उससे पहले हाईकोर्ट को यह जानकारी दे दी थी। शायद आपको यह तथ्य नहीं मालूम है कि नागपुर में हाई कोर्ट में अनिल चमड़िया के ख़िलाफ़ एक रिट है। एक सज्जन जो कि … आशुतोष मिश्रा नाम के एक सज्जन हैं। जो उसी इंटरव्यू में आए थे। जिनका सलेक्शन नहीं हुआ था। तो आशुतोष मिश्रा ने एक रिट कर रखी है हाई कोर्ट में। उन्होंने कहा है कि भाई साहब 2002 या फिर 2001 … अब आप कह रहे हैं कि 2000 तो यूजीसी की 2000 वाली गाइडलाइन्स का यूनिवर्सिटी ने उल्लंघन किया है। यह विश्वविद्यालय को अधिकार नहीं था। यह ईसी के बैठक से पहले की बात है। हफ़्ते-दस दिन पहले की बात। जब हमने अपना पक्ष रखा तो हमने स्वीकार कर लिया था कि हमसे ग़लती हो गई थी। और हम इस ग़लती को सुधार कर आपके पास आएंगे।
दिलीप – हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई की जानकारी ईसी को दी गई थी।
विभूति – हां। ये ईसी के मेंबर्स को भी पता होगी।
दिलीप – उनको पता था कि आपलोग एक पोजीशन ले चुके हैं।
विभूति – हां। … नहीं… ये तो मुझे ध्यान नहीं आ रहा कि शायद यह पक्ष उठा था या नहीं उठा था। लेकिन जो यूजीसी के नॉर्म्स थे और जो एड्वरटिजमेंट था वो सब ईसी के सामने रखा गया था। उन्होंने सारे .. दस बारह जितने अप्वाइंटमेट हुए थे… सबका एक-एक करके देखा।
समरेंद्र – कोर्ट का जिक्र किया गया था?
विभूति – मुझे नहीं लगता कि कोर्ट का जिक्र किया था। हो सकता है कि बातचीत में आया भी हो तो मुझे ध्यान नहीं।
समरेंद्र – मृणाल पांडे का कहना है कि बैठक में कहा गया था कि ग़लती हो गई है उसे हमें सुधारनी है।
विभूति – हां.. यह तो हमने कहा ही था कि हमसे ग़लती हो गई है और उसे सुधारना है।
अविनाश – किसी भी कानूनी पचड़े से बचने के लिए हमने उनको अप्रूव नहीं किया।
विभूति – चलो अच्छा है। मृणाल जी कह रही हैं तो ठीक ही होगा। मृणाल जी कहना ठीक ही होगा। (पॉज) क्योंकि हमने ऑलरेडी नागपुर में हाई कोर्ट में – यह स्वीकार कर रखा है कि हमसे ग़लती हुई है। अगले 10-05 दिन में हाई कोर्ट का फ़ैसला आ जाएगा। हमसे ग़लती हुई है तो हम उसे छिपाए क्यों?
समरेंद्र – आपके कार्यकाल के दौरान कुल कितनी नियुक्तियां हुई हैं?
विभूति – अब तो यह ध्यान नहीं… देखना पड़ेगा।
दिलीप – फैक्लटी पोजिशन..
विभूति – अब यह ध्यान नहीं। 12-13 तो हुई ही होंगी।
समरेंद्र – बस 12-13 के आस-पास
विभूति – अभी तक तो एक ही विज्ञापन निकला था मेरे सामने। जिसका इंटरव्यू हुआ था। दूसरा विज्ञापन अब निकला हुआ है। 10-12 लोगों का और। जिस पर अगले एक-दो महीने में इंटरव्यू होंगे।
(कमरे की घंटी बजती है।)
समरेंद्र – लगभग 12 के आसपास… आपके मुताबिक नियुक्तियां हुई हैं।
विभूति – यस .. ज़रा एक मिनट शाहिद (कमरे में बैठे हुए शाहिद से उन्होंने गुजारिश की दरवाजा खोलने के लिए। बैरा चाय लेकर कमरे में दाखिल होता है। बातचीत जारी रहती है।) इक्जैक्ट संख्या तो मुझे देखनी पड़ेगी।
समरेंद्र – नियुक्तियों के लिए क्या कोई अप्रूवल लेना पड़ता है। ईसी से या फिर फाइनेंस कमेटी से या फिर यूजीसी से।
विभूति – नहीं… अप्रूवल नहीं लेना पड़ता।
समरेंद्र – यूजीसी से भी नहीं लेना पड़ता।
विभूति – यूजीसी के गाइडलाइन्स उनकी वेबसाइट पर हैं। अगर आपको चाहिए तो आप उनकी वेबसाइट पर उनको देख सकते हैं।
(अब बातचीत थोड़ी देर कर लिए रुकती है। चाय बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है)
दिलीप – इसी से जुड़ा हुआ मामला है। क्या आपने ईसी को इस बात की जानकारी दी थी कि डॉ अनिल राय अंकित को लेकर विवाद चल रहा है।
विभूति – नहीं.. नहीं। देखिए। ये ईसी से जुड़ा मसला नहीं है। जो अनिल राय अंकित के ऊपर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने प्लैगरिज्म (plagiarism – दूसरे के विचार और भाषा को उठा कर अपने नाम पर चेप देना) किया है। दूसरों की किताबों से चुरा कर लिखा है। उसकी जांच हो रही है। जांच की रिपोर्ट आएगी, वो ईसी के सामने रखी जाएगी। क्योंकि अनिल राय अंकित वो सारी जो योग्यताएं थीं उनको पूरी करते थे। वो जो यूजीसी की गाइडलाइन्स थीं उसमें अंकित के मामले में कोई दिक्कत नहीं हुई। यह तो दूसरा आरोप है कि उन्होंने प्लैगरिज्म किया है। दूसरों के किताबों से उठा कर अपने नाम पर छाप दिया है। यह जांच का विषय है। जांच कमेटी बना दी गई है।
दिलीप – अंकित अभी सस्पेंड है या काम कर रहे हैं?
विभूति – क्यों भई? जब तक कोई दोषी नहीं पाया जाएगा उसे सस्पेंड क्यों किया जाए।
दिलीप – सस्पेंड तो करना ही चाहिए था।
विभूति – काहे को सस्पेंड?
समरेंद्र – जांच कमेटी में कौन कौन है?
विभूति – वो मैं अभी नहीं बता सकता। क्योंकि कमेटी के मेंबरों के रिटेन कंसेन्ट अभी आए नहीं थे। हमने उनको ऑलरेडी भेज रखा है। जब मैं चला था तो उन्होंने कहा था कि उन्होंने स्पीड पोस्ट से भेज दिया है। मुझे वहां से चले सात दिन हो गए हैं। अब मैं जाकर के देख कर बताता हूं।
दिलीप – ये जो ईसी फैसले होते हैं। किसी को रखने और निकालने के फैसले। इसमें क्या ईसी का फैसला अंतिम होता है या फिर इसके ऊपर कोई और भी अथॉरिटी है। जो उसके फैसले को बदल सकती है।
विभूति – ईसी के ऊपर तो कोई नहीं है। ईसी ही है। अब चमड़िया जी कोर्ट में जाना चाहते हैं तो जाए।
दिलीप – विजिटर की कोई भूमिका होती है क्या?
विभूति – विजिटर की भूमिका …. विजिटर को हमने भेज दिया है। अब विजिटर के यहां से कोई ऑब्जेक्शन आए तो देखा जाएगा।
दिलीप – अप्रूवल आ गया क्या?
विभूति – नहीं। विजिटर के अप्रूवल की कोई ज़रूरत नहीं होती है। विजिटर को हम सूचनार्थ ईसी की सारी प्रोसिडिंग के फैसले हम भेजते हैं।
अविनाश – अब दलितों की अनदेखी वाला सवाल करते हैं हम लोग। टाइम बहुत कम है न। ((…. जारी))
SHAMBHU
February 9, 2010 at 10:01 am
सरकारी नौकरी की ठसक में ऐसे ही हो जाते हैं देश के ब्यूरोक्रेट्स और अधिकारी… शैक्षिक क्षेत्रों में अच्छे लोगों के आने की उम्मीद होती है… लेकिन यहां तो सब गुण अफसर साही वाला है साहेब के…
Krishna
February 13, 2010 at 11:27 pm
मैं विभूति जी को जानता हूं, वे एक बेहतर लेखक होने के साथ ही सरल व्यक्तित्व के मालिक भी, इस लिए ये सारे आरोप बेबुनियाद है जो आप के प्रतष्ठित चिठ्ठे (ब्लाग) के माध्यम से लगाये जा रहे है
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