महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय बार-बार ये कह रहे हैं कि मैंने तो अनिल चमड़िया को रखा था, ईसी यानी एक्जिक्यूटिव कौंसिल ने हटा दिया तो मैं क्या कर सकता हूं। जिस ईसी ने अनिल चमड़िया की नियुक्ति निरस्त करने का फैसला किया, उसकी एक सदस्य थीं पत्रकार मृणाल पांडे। मृणाल पांडे कुछ समय पहले तक दैनिक हिंदुस्तान की संपादक थीं।
यहां एक बात गौर करने की है कि न्यायपालिका में ये परंपरा है कि अगर किसी जज का किसी केस में हितों का टकराव यानी कॉन्फ्लिक्ट ऑफ होता है, तो जज ऐसे मामलों से खुद को अलग कर लेता है। हाल के दिनों में ऐसे कई मामले हुए हैं, जब जजों ने खुद ही मामलों की सुनवाई से अलग होने का फैसला किया।
लेकिन यहां इस बात की चर्चा क्यों? ये चर्चा इसलिए कि अनिल चमड़िया के मामले में ईसी में फैसला करने की कुर्सी पर बैठीं मृणाल पांडे के लिए यहां कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की मामला था। इस टकराव की पृष्ठभूमि 2006 की है। इस वर्ष देश के सबसे बड़े बिजनेस चैनल सीएनबीसी टीवी-18 के स्टूडियो में एक कार्यक्रम रेकॉर्ड हुआ था, जिसके एंकर थे करण थापर। इस कार्यक्रम में प्रो. योगेंद्र यादव, हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की उपाध्यक्ष शोभना भरतीया (मृणाल पांडे उस समय जहां नौकरी करती थीं, उस अखबार की मालकिन), पायोनियर के प्रधान संपादक चंदन मित्रा और चेन्नई से हिंदू अखबार के प्रधान संपादक एन राम शामिल हुए।
इस कार्यक्रम की शुरुआत में करण थापर ने एक सर्वे का जिक्र किया जिसमें बताया गयाथा कि मीडिया में देश के सामाजिक चरित्र का प्रतिनिधित्व नहीं है। इस रिकॉर्डिंग का एक अंश यहां पेश है (साभार- डॉ श्योराज सिंह बेचैन, एस एस गौतम: 2009, पेज 118)
योगेंद्र यादव: हां, यह बहुत ही बारीक समस्या है और यह भी सही है कि हमने औपचारिक रूप से संस्थानों से संपर्क नहीं किया और रूटीन सर्वे नहीं किया। लेकिन यह भी सही है कि हमने सिर्फ सरनेम को देखकर निर्णय नहीं लिया है। यह आपके संगठन दैनिक हिंदुस्तान की सूची है। जिसमें एक ही जाति के 10 लोग ऊपर से नीचे भरे हैं, और यह पहला संस्थान है, जहां दस के दस न सिर्फ सवर्ण हैं, बल्कि ब्राह्मण हैं। अब आप बताइए कि क्या यह सही नहीं है?
शोभना भरतीया: यह कहना तत्काल उचित नहीं होगा कि यह सही है या गलत। क्योंकि सबसे पहली बात तो ये कि जब हम लोगों को नियुक्त करते हैं तो उनकी जाति नहीं देखते हैं कि वह व्यक्ति ब्राह्मण है, कायस्थ है या दलित है। और हमने इसे कभी बढ़ावा नहीं दिया। लेकिन मैं यकीनी तौर पर इस सर्वे के बारे में जांच करूंगी कि ये सही है या नहीं।
कहना न होगा कि इस जांच के दायरे में उस संस्थान यानी दैनिक हिंदुस्तान की प्रधान संपादक भी होगी, जो मृणाल पांडे थीं। इसके बाद मृणाल पांडे ने इसकी सफाई देते हुए दैनिक हिंदुस्तान के संपादकीय पन्ने पर एक लेख लिखा- जात न पूछो मीडिया की, पूछ लीजिए ज्ञान। इस लेख में पूरा पैराग्राफ मीडिया की सामाजिक संरचना के बारे में किए गए सर्वेक्षण के बारे में है।
अब जिस सर्वेक्षण से ये बात शुरू हुई थी, जिसकी वजह से मृणाल पांडे के अखबार की मालकिन को जांच कराने की बात सार्वजनिक तौर पर करनी पड़ी, वो सर्वेक्षण आखिर किसने किया था।
- ये सर्वेक्षण योगेंद्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार ने किया था, जिससे पता चला कि दिल्ली के 37 मीडिया संस्थानों के 315 प्रमुख पदों पर आसीन लोगों में 71 फीसदी पदों पर “सवर्ण हिंदू पुरुष” काबिज हैं, 4 फीसदी पदों पर ओबीसी हैं और दलित तथा आदिवासी इस पूरी लिस्ट से गायब हैं।
क्या अब वर्धा विवि से अनिल चमड़िया की विदाई का नए ढंग से पाठ किया जा सकता है। ऐसा खतरनाक अनिल चमड़िया को, जो पत्रकारिता और समाज के अनकहे पक्ष को सामने लाता है, सत्य के संधान में उन पथों पर चलता है, जिससे होकर लोग नहीं गुजरते, उसे कैसे किसी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में टिकने, काम करने और शोध कराने दिया जा सकता है? उसे हटाने के लिए कुलपति से लेकर मृणाल पांडे से लेकर गंगा प्रसाद विमल तक का एकजुट हो जाना ही तो स्वाभाविक है। इसलिए एक्जीक्यूटिव कौंसिल में ये फैसला आम राय से हुआ। किसी ने विरोध नहीं किया, किसी ने नहीं कहा कि एक बार अनिल चमड़िया से उसका पक्ष जान तो लेते हैं या किसी ने ऐसा सुझाव भी नहीं दिया कि वीसी जो कह रहे हैं, उसकी जांच करा ली जाए।
क्या ये पूछने की जरूरत है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की ईसी कितने दलित, ओबीसी या मुसलमान सदस्य थे? कहने को कहा जा सकता है कि उनकी नियुक्ति तो राष्ट्रपति के द्वारा होती है। लेकिन ऐसे फैसले दरअसल कार्यपालिका के होते हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है।
((वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल इन दिनों आईआईएमसी से जुड़े हुए हैं))
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