शरद पवार ने एक-एक कर अपने मंत्रालय से ताल्लुक रखनेवाली चीजों के बारे में जनता को बता दिया कि भैया अंटी अभी और ढ़ीली करनी पड़ेगी-दाम बढ़ने वाले हैं। मीडिया तलवार लेकर दौड़ा। फिर पवार साहब ने कह दिया कि वे अकेले थोड़े ही जिम्मेदार हैं, इसमें तो पीएम की मर्जी भी शामिल है। उधर कांग्रेस ‘शातिर’ तरीके से मौन है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री चाहते हैं कि आईपीएल विवाद को लेकर पवार और बीसीसीआई से बात करें ताकि ललित मोदी को दंडित किया जा सके। खबर है कि सरकार को ऐसा लगता है कि ललित मोदी, बीजेपी का एजेंडा चला रहे हैं और देश की विदेश नीति को आईपीएल की भेंट चढ़ा रहे हैं। इसका एक मतलब ये भी हो सकता है कि मोदी, पवार के इशारे पर ही तो ऐसा नहीं कर रहे ?
लेकिन खेल ये नहीं है। दरअसल, ये तमाम हथकंडे और ये तमाम कलावाजियां पवार को शंट करने के लिए की जा रही है – जिसे शरद पवार भली भांत जानते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जीत के तुरंत बाद कांग्रेस ने ये तय कर लिया था कि अब शरद पवार को निगल जाना है। कांग्रेस ने अपने द्वितीय पंक्ति (या दोयम दर्जे?) के नेताओं से ये खुलेआम बयान दिलवाया कि एनसीपी का कांग्रेस में विलय हो जाना चाहिए, जबकि कांग्रेस के आला नेता इस पर मासूमियत से चुप्पी साधे रहे। कांग्रेस को अपने निष्कंटक राह का सबसे बड़ा रोड़ा अब शरद पवार लगते हैं। ये वही पवार हैं जिन्होंने कांग्रेस अध्यक्षा को सबसे पहले विदेशी मूल का करार देकर पार्टी से नाता तोड़ा था। कमोवेश पवार अपनी शर्तों पर अभी भी कायम हैं, क्योंकि देश का मौजूदा प्रधानमंत्री ‘शुद्ध भारतीय मूल’ का है। ऐसे में कांग्रेस के लिए पवार को निपटाना जरूरी है।
उधर पवार जब बुढ़ापे और खराब सेहत की ओर बढ़े तो बेटी को सामने ला दिया। इससे उनकी पार्टी में असंतोष के लावे सुलगने लगे। उनके भतीजे और दूसरे नेता उनसे नाराज हैं। कांग्रेस इन सब बातों का फायदा उठाना चाहती है। कुल मिलाकर तलवारें खिंच चुकी है, बस हमें देखना ये है कि वो कौन सी सहूलियतों भरी घड़ी आती है कि इस पटकथा का आखिरी अध्याय लिखा जाए।
पवार जानते हैं कि देश का विपक्ष आभाहीन है। वो जनता के रिएक्शन को रिफ्लेक्ट नहीं कर रहा। महंगाई चरम पर है। कांग्रेस को विकल्पहीनता का लाभ मिला हुआ है जिसे नेहरु-परिवार व्यक्तिगत लोकप्रियता के नाम से बेच रहा है। हालात ऐसे रहे तो 2014 के लोकसभा चुनाव में भी फिर से कांग्रेस आ जाएगी। लेकिन, उम्र के आखिरी पड़ाव पर पवार ऐसा क्यों चाहेंगे?
लालू-मुलायम और मायावती, उत्तरभारत में कांग्रेस के साथ नहीं आ रहे, न ही कांग्रेस उन्हे अपने साथ ले रही है। बीजेपी अपने या अपने सहयोगियों के बल पर भी बहुत मजबूत नहीं है। ऐसे में पवार एक गैर-कांग्रेसी धुरी के नेता बनना चाहते हैं जिसे कम से कम बीजेपी बाहर से सपोर्ट कर दे।
पवार 1986 में वीपी सिंह वाला फार्मूला अपनाना चाहते हैं, हलांकि दोनों के हालात में बहुत फर्क है। लेकिन, अगर एक गैर-कांग्रेसी मोर्चा उन्हें अपने नेता मान लेता है तो उन्हें – 6 महीने के लिए ही सही- पीएम बनने से क्यों गुरेज होगा!

सुशांत झा
कृष्ण कुमार मिश्र
February 17, 2010 at 3:12 am
सुशान्त जी राजिनीति की इतनी बेहतरीन व्याख्या, यकीनन आप एक दिन नेता बनेंगे।