घटना यह है। सऊदी अरब की पत्रकार नादीन अल-बेदैर का एक लेख मिस्र के दैनिक ‘अल मसरी अल यूम’ के 11 दिसंबर 2010 के अंक में एक लेख छपा। लेख का शीर्षक था – ‘मैं और मेरे चार शौहर’। लेख की शुरुआत यहां से होती है – ‘मुझे चार, पांच या नौं या मै जितने भी चाहूं उतने शौहर चुनने की इजाजत दें। मैं तरह-तरह के साइज और शेप वाले शौहर चुनूंगी। एक काला, एक सुनहरे बालों वाला, एक लंबा और हो सकता है एक नाटा। उनका चुनाव जुदा-जुदा किस्मों, धर्मों, नस्लों और देशों से होगा। मैं वादा करती हूं कि उनके बीच पर्याप्त सौहार्द रहेगा।’
नादीन को यह तर्क मंजूर नहीं है कि औरतों के लिए एक से अधिक मर्दों को झेलना मुमकिन नहीं है। वे कहती हैं कि यह मुमकिन है, यह तो साबित हो ही चुका है उन औरतों द्वारा जो अपने शौहर से चोरी-छिपे गैर मर्द से प्यार करती हैं या उन औरतों के द्वारा जिनका प्यार पैसे से खरीदा जा सकता है। नादीन का सवाल है : ‘एक औरत से बोर हो जाने के बाद दूसरी, और दूसरी से बोर हो जाने के बाद तीसरी और उससे भी बोर होने के बाद चौथी औरत से शादी करने का हक सिर्फ मर्दों को ही क्यों है? यह हक औरतों को भी होना चाहिए। आखिर औरत भी तो अपने एकमात्र शौहर से बोर हो जा सकती है। या हो सकता है, सुहागरात से ही उसका दांपत्य जीवन ठीक न चल रहा हो।’ आखिर ऐसी औरतों को भी सुख-चैन से जीने का अधिकार है।
वास्तव में नादीन का यह लेख बहुगामी होने की उनकी ख्वाहिश का इश्तहार नहीं है। वे तो मुसलमान पुरुषों के चार शादियां करने के अधिकार को चुनौती देना चाहती हैं। इसीलिए उनके लेख का अंत इन पंक्तियों से होता है कि या तो मर्द-औरत दोनों को बहुगामी होने का अधिकार मिले या विवाह संस्था को नए सिरे से गढ़ा जाए। जाहिर है, यह मुस्लिम नारीवाद का एक क्रांतिकारी चेहरा है। चूंकि सऊदी अरब की इस साहसी पत्रकार ने स्त्री-पुरुष समानता की ख्वाहिश को बेहद नाटकीय ढंग से पेश किया है, इसलिए उनके लेख पर मुस्लिम जगत में हाहाकार मचा हुआ है। नादीन की कटु से कटु आलोचना की जा रही है और उन्हें फाहशा, चरित्रहीन, मर्दखोर आदि बताया जा रहा है। व्यंग्य की शैली बहुत ही प्रभावशाली होती है, लेकिन इसे अपनाने के अपने खतरे भी हैं। मैं तो सऊदी पत्रकार नादीन अल-बेदैर को बधाई ही दूंगा कि उन्होंने अपनी बात इतनी तल्खी से रखी है। इसके लिए जहां उन पर अपशब्दों की बौछार हो रही है, वहीं शुक्र यह है कि बहुत-से पुरुष उनके प्रतिपादन के मर्म तक पहुंच सके हैं, इसलिए उन्होंने लेखिका का पक्ष लिया है।
उदाहरण के लिए, काहिरा में एक मस्जिद के प्रबंधक शेख अम्र जाकी ने लिखा, ‘लोगों को अब जाग जाना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि औरतों के साथ मर्दों का सलूक क्या रहता है। उन्हें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आज के जमाने में बहुगामिता को मंजूर नहीं किया जा सकता। इसकी कोई जरूरत नहीं है। इसके अलावा, कोई भी मर्द एक से ज्यादा औरतों से सच्चा प्यार नहीं कर सकता न कोई औरत ही एक से ज्यादा मर्दों से सच्चा प्यार कर सकती है।’ एलान पत्रिका की आयशा गवाद ने लिखा, ‘मैं औरतों या मर्दों की बहुगामिता की तरदारी नहीं कर रही हूं। मैं मिज अल-बेदैर की ओर से भी कुछ कहना नहीं चाहती। लेकिन मुझे लगता है कि वे भी औरत या मर्द की बहुगामिता की वकालत नहीं कर रही हैं। वे तो उस गैरबराबरी को रेखांकित करना चाहती थीं जो बहुत-से बहुगामी विवाहों में मौजूद होती है। ‘
हिन्दी में इस प्रसंग को उठाया है जेएनयू की शोध छात्र शीबा असलम फ़ाहमी ने। शीबा ‘हंस’ पत्रिका में हर महीने ‘जेंडर जिहाद’ नाम से एक अत्यंत लोकप्रिय कॉलम लिखती हैं। फरवरी अंक में इस प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने फ़रीद बुक डीपो, जामा मस्जिद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी रह की पुस्तक ‘अहकामे इस्लाम की नज़र में तालीफ़’ से एक लंबा उद्धरण दिया है, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि मुस्लिम मर्दों को चार शादी करने का हक क्यों है या क्यों होना चाहिए, इसकी तरफदारी में कैसे-कैसे बेहूदा तर्क दिए जा सकते हैं।
मौलाना का तर्क यह है : ‘तफसील इस इजमाल की ये है कि ऐसा आदमी जब किसी एक औरत को निकाह में लाएगा तो कम अज कम ये औरत उसके लिए तीन माह तक काफी है। क्योंकि हमल की शनाख्त कम अज कम तीन माह तक मुकर्रर है। पर अगर उस मीयाद में उस औरत को हमल ठहर जाए तो ऐसे हैजान व जोशे शहवत वाला आदमी अगर उस औरत से सुहबत करेगा तो जनीन पर बुरा असर पड़ेगा और हमल गिर जाने का अंदेशा है। लिहाजा उस औरत को आराम देवे और उस औरत की सुहबत तर्क करके दूसरी औरत निकाह में लाएगा। अगर दूसरी औरत को भी तीन माह तक करारे हमल हो जाए तो उससे भी सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। … ये 6 माह हुए। अब तीसरी औरत से निकाह करेगा। अगर तीसरी औरत को भी हमल हो गया तो अब उससे भी उसको सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। ये 9 माह हुए। अब पहली औरत का वजए-हमल हो जाएगा मगर वह गालिबन तीन माह तक काबिले-सुहबत नहीं हो सकती। लिहाजा उसको चौथी निगाह में लानी होगी। अब चौथी औरत के हमल की शनाख्त भी तीन माह तक मुकर्रर है। यह एक साल हुआ और इस अस्ना में पहली औरत जिसको वजए-हमल से तीन माह गुजर चुके हैं तअल्लुकात जनान व शोई के लिए तैयार हो जाएगी। इस तरह वजए-हमल के बाद हर एक औरत नौबत-बनौबत उसके लिए मुहैया होगी।’
है न कमाल का गणित ! इस गणित को चुनौती देने के लिए सऊदी अरब की नादीन अल-बेदैर और भारत की शीबा असलम फ़ाहमी को मेरा सलाम।
((राजकिशोर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))
नादीन का एक इंटरव्यू (यू-ट्यूब से उधार)
संजय ग्रोवर
February 17, 2010 at 1:13 pm
फ़िलहाल मोटे तौर पर एक फ़र्क दिखाई पड़ता है। नादीन अपने वक्तव्य में साफ़ कह रहीं हैं कि उन्हें यह बदलाव अभी चाहिए, इसी जन्म में। उधर शीबा अपने कालम में लगातार, इस बदलाव को एक रणनीति के तहत धीरे-धीरे लाने की बात करती हैं। मुझे नादीन की एप्रोच बेहतर लगती है। आखि़र कितनी पीढ़ियों को रणनीतियों पर वारा जा सकता है !? बहरहाल मंज़िल दोनों की एक ही है इसलिए दोनों को, और इनसे भी पहले तसलीमा को सलाम।
संजय ग्रोवर
February 17, 2010 at 2:33 pm
यहां यह रेखांकित करना बहुत ही ज़रुरी है कि यह तुलना इस अर्थ में असंगत है कि नादीन इस ख़बर की नायिका हैं और शीबा इसकी सूचनाकत्र्ता। ठीक वैसे ही जैसे राजकिशोर।