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Special from Berlin: ज़िंदगी के इस उत्सव में आप शामिल हों

बर्लिन शहर के केंद्र में ऐतिहासिक ब्रैंडनबुर्ग गेट से कुछ दूर ही स्थित है शानदार पोट्सडामर प्लाट्ज़. शहर के मुख्य चौराहों में से एक. इसी के आस पास बसा है बर्लिनाले का फ़िल्म गांव. भव्य बर्लिनाले प्लास्ट, बेबीलोन, एड्रिया, सिने स्टार, कोलोसियम, सिनेमैक्स सहित कई अन्य सिनेमाघर. सिनेमैक्स मल्टीप्लैक्स में तो 19 सिनेमा स्क्रीन हैं. यहीं पर अलग अलग देशों की फ़िल्में दिखाई जा रही हैं.

भीड़ से भरे इस इलाक़े में सड़क के दोनों ओर अच्छी ख़ासी बर्फ़ जमी है. कई दिनों से पारा शून्य से नीचे ही लुढ़का हुआ है. बर्फ़ की मोटी परत मिट्टी के साथ घुल कर काली हो गई है. तेज़ क़दमों से चलते हुए लोगों को कई बार फिसलते देखा. लेकिन जल्द ही वे संभल कर आगे बढ़ गए. रूकने का समय ही किसके पास है. एक हलचल, कौतुहूल है, ऐसा माहौल है मानो ठहरना नियमों के ख़िलाफ़ हो.

बर्लिनाले प्लास्ट के मेन गेट से लेकर सड़क तक रेड कारपेट (लाल कालीन) बिछा है जहां हर रात सितारे ज़मीं पर उतरते हैं. कारपेट के दोनों ओर बैरिकेडिंग की गई है ताकि प्रशंसक अपने सपनीले नायकों को बस दूर से देख सकें. इसलिए लोग दोपहर से इस कोशिश में लग जाते हैं कि सबसे आगे खड़े होने की जगह मिल सके. कुछ मिनटों के लिए इतने घंटों तक खड़े होकर इंतज़ार उन्हें मंज़ूर है. शायद इसी को दीवानगी कहते हैं. वैसे देर से आने वाले या पीछे खड़े होने वाले प्रशंसकों के लिए एक विशालकाय स्क्रीन लगाई गई है ताकि पास से नहीं तो दूर से ही सितारों की नज़दीकी का एहसास हो सके.

बर्लिनाले की कवरेज के लिए 80 से ज़्यादा देशों के 4,000 पत्रकार वहां पहुंचे हैं. बर्लिनाले प्लास्ट के सामने ही हयात होटल हैं जहां प्रेस सेंटर बनाया गया है. यहां पर स्टाफ़ किसी भी सवाल का जवाब बेहद तत्परता से देते हैं और मदद के लिए हर वक़्त तैयार रहते हैं लेकिन आईटी सेंटर में बैठने में मुश्किलें पेश आती हैं. कंप्यूटर डेस्क के बीच बैठने की जगह इतनी छोटी है कि एक बार बैठने के बाद निकलना असंभव सा जान पड़ता है. यहां आने वाला हर पत्रकार दिन में एक बार तो आईटी सेंटर के प्लानर को कोस ही लेता है.

मीडियाकर्मियों का पूरा दिन आपाधापी में बीतता है. होटल से बर्लिनाले प्लास्ट, सिनेमैक्स और फिर वो होटल जहां फ़िल्म के निर्देशक या कलाकार रूके हैं. कभी प्रेस कांफ़्रेंस तो कभी इंटरव्यू की ज़द्दोजहद. समय मिलते ही सैंडविच और चाय कॉफ़ी जैसे तैसे गले से नीचे उतारने की कोशिश और उसी दौरान आगे की प्लानिंग. रात होते होते मीडिया का हुजूम रेड कारपेट के इर्द गिर्द जुटना शुरू हो जाता है. लाल कॉलर वाला काला चोगा और सफ़ेद मफ़लर पहने कर्मचारी सुरक्षा का ज़िम्मा संभालते हैं. बर्लिन में पारा और नीचे गिर जाता है. हवा और ठंडी हो जाती है. बर्फ़बारी भी शुरू हो जाती है. लेकिन कोई अपने स्थान से नहीं हटता बल्कि वहां डटे रहने का जज़्बा और मज़बूत हो जाता है.

फ़िल्म के प्रीमियर से कुछ देर पहले एक एक कर काले रंग की कारें आकर रूकती जाती हैं और उसमें से नामी गिरामी कलाकार उतरते हैं. अपने सितारों की ख़ुशबू प्रशंसकों में जोश, ऊर्जा और उत्साह भर देती है और वो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हैं. ज़ुबां पर नाम कभी शाह रुख़ का होता है, तो कभी लियोनार्डो डिकैप्रियो का. चेहरे बदलते जाते हैं लेकिन दीवानगी बरक़रार रहती है.

कुछ की आंखों में आंसू आ जाते हैं, कोई रो रोकर अपने चहेते कलाकारों से अपने पास आने की गुहार लगाता है. कुछ की मुराद पूरी होती है लेकिन बहुतों की हसरत अधूरी रह जाती है. वे यूं ही भारी मन से सांत्वना दे कर लौट जाते हैं कि दूर से देखने का अनुभव इतना बुरा तो नहीं. तो क्या हुआ अगर पास से एक झलक या ऑटोग्राफ़ नहीं मिला.

सचिन गौड़

सचिन गौड़

और हर रात ये सिलसिला जारी रहता है. यहां जीवन एक उत्सव सा जान पड़ता है. स्वप्न सरीखा. जहां धूमधाम है, ख़ुशी है, ऊर्जा है. एक ऐसी जगह जहां भेदभाव और मतभेद मिट गए हैं. अलग अलग देशों के नागरिक -7, -10 डिग्री तापमान में भी एक ही लक्ष्य के लिए डटे हैं, दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, एकजुट हैं. फिर चाहे वो प्रशंसक हों जिनका लक्ष्य अपने पसंदीदा सितारों की एक झलक पाना है या फिर वो हज़ारों मीडियाकर्मी जो बर्लिनाले की हर गतिविधि को अपने कैमरे या क़लम में क़ैद कर लेना चाहते हैं.

((सचिन गौड़। बेहद तेज और सुलझे हुए पत्रकार। इंजीनियरिंग की पढ़ाई। मगर दिल पत्रकारिता की तरफ खींच लाया। लंदन से मीडिया का कोर्स किया और बीबीसी की हिंदी सेवा से जुड़े। लंदन और दिल्ली दोनों जगहों पर अपनी सेवाएं दीं। बीते दो साल से डॉयचे वेले की हिंदी सेवा से जुड़े हुए हैं।))

सचिन गौड़ के कैमरे से बर्लिनाले फिल्म फेस्टिवल की कुछ तस्वीरें।

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