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अनिल का जवाब – “जो बहुत सम्मानित है, वह संदिग्ध है”

अख़्तर आलम की शिकायत पर अनिल को जब कारण बताओ नोटिस भेजा गया तो वो चौंक गए। उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि जो मुद्दा बातचीत के बाद ख़त्म घोषित कर दिया गया था उसी को आधार बना कर उन पर इस तरीके से हमला किया जाएगा। खैर उन्होंने प्रशासन को जवाब दिया। इस जवाब में एक अहसास भी है। अहसास कि जब इंसाफ़ क़ातिलों को ही करना है तो बेकसूरों को क़त्ल होने से कौन बचा सकता है! खैर आप भी अब अनिल का जवाब पढ़िए और फैसला कीजिए। - मॉडरेटर

प्रति, दिनांक 26. 11. 2009
प्रो मनोज कुमार
कुलानुशासक
म गां अं हिं वि वि, वर्धा (महाराष्‍ट्र)

महोदय,

आपका पत्र (पत्रांक:/जा क्र 87/09, दिनांक 25.11.2009) मिला। पत्र में हालांकि यह स्पष्‍ट तौर पर उल्लिखित नहीं है कि यह पत्र वास्तव में है क्या? क्या यह ‘कारण बताओ अधिसूचना’ है या सामान्य पत्र? बहरहाल, सामान्य तौर पर विश्‍वविद्यालय में तथा खासतौर से विभाग में हमेशा से अकादमिक गुणवत्ता आधारित माहौल निर्मित करने के लिए संपूर्णता में अपने आप को हर तरह से जिम्मेदार मानते हुए मैं इस पत्र का जवाब लिख रहा हूं, अन्यथा जिस मामले के बारे में आपने मुझे “स्पष्‍टीकरण” देने को कहा है, मैं उसे ‘वास्तविक मुद्दा’ नहीं मानता हूं। इसके पहले एक बात यह कि मेरा नाम ‘अनिल मिश्रा’ नहीं है। औपचारिक तौर पर ’अनिल कुमार मिश्र’ लिखा जाता है, लेकिन भविष्‍य के पत्रों में अगर आप मुझे सिर्फ अनिल संबोधित करेंगे, तो मेहरबानी होगी। मैं सिलसिलेवार तरीके से अपनी बातों को निम्न बिंदुओं से स्पष्‍ट करने की कोशिश करूंगा।

आपने अपने पत्र में लिखा है, “माननीय कुलपति महोदय के द्वारा मेरे संज्ञान में लाया गया है कि 16 नवंबर 2009 को एमए तृतीय छमाही के वर्ग सेमिनार में आपके प्रवेश को लेकर जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अख्तर आलम के द्वारा आपत्ति करने और विभागाध्यक्ष से अनुमति प्राप्त कर बैठने को लेकर वर्ग में वाद-विवाद किया। बैठने की अनुमति देने के बावजूद आपने व्यवधान उत्पन्न किया। जबकि वर्ग सेमिनार परीक्षा का एक हिस्सा है।” (शब्दों पर जोर मेरा।)

(1) सबसे पहली बात, आपने बिल्कुल गलत लिखा है कि माननीय कुलपति महोदय द्वारा आपके संज्ञान में यह बात लायी गयी। आपको याद होगा (और मुझे यकीन है कि आपको जरूर याद होगा) कि उसी दिन इस पूरे प्रकरण के बाद मैंने खुद आपके कार्यालय में आकर इस प्रकरण की तफसील से जानकारी दी थी। मैंने आपसे स्पष्‍ट कहा था कि अगर आप चाहें तो मैं लिखित दे सकता हूं लेकिन आपके इस आश्‍वासन पर मैंने लिखित नहीं दिया कि आप सारे मामले को मौखिक तौर पर संज्ञान में ले रहे हैं। साथ ही इस प्रकरण को विभाग में स्थापित और अब रोज-ब-रोज प्रचलित (और असहनीय भी) होती जा रही फर्जी और निरंकुश कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए मैंने विभाग के और भी कुछ बेहद बुनियादी और गंभीर अकादमिक मुद्दों की ओर आपका ध्यान दिलाया था।

(2) आपके पत्र की भाषा से झलक रहा है (और जहां तक मैं समझ पा रहा हूं) कि आपने डॉ अख्‍तर आलम से उस क्षण हुई मेरी बातचीत के बारे में मुझ पर दो आरोप लगाते हुए स्पष्‍टीकरण की उम्मीद की है। पहला, मैंने “वाद-विवाद” किया और दूसरा, बैठने के पश्‍चात “व्यवधान” उत्पन्न किया। श्रीमान, मैं इन दोनों शब्दों के ठीक-ठीक मायने नहीं समझ पा रहा हूं कि आपका इनसे आशय क्या है? बेहतर होगा कि आप मुझे डॉ अख्‍तर आलम द्वारा मेरे खिलाफ दिये गये शिकायत पत्र की प्रति उपलब्ध कराएं ताकि मैं उनके आरोपों के स्पष्‍ट अर्थ समझ सकूं।

(3) उस दिन की बातचीत को, जिसके पहले अंश को आपने “वाद-विवाद” कहा है, मैं एक ‘बहस’ कह सकता हूं जैसा कि कोई भी गंभीर और अकादमिक रुझान का विद्यार्थी किसी भी शिक्षक से करेगा। इतना ही नहीं, उस दिन चूंकि डॉ अख्‍तर आलम का पूरा व्यवहार मेरे लिए खुद भी बेहद अपमानजनक था, इसलिए उसी दिन अर्थात दिनांक 16 नवंबर को इस “बहस” के बाद, मैंने विभागाध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ‘अंकित’ से इस बारे में अपनी आपत्तियां दर्ज करायी थीं। उनसे भी मैंने कहा कि अगर आप कहें तो मैं लिखित दे सकता हूं लेकिन उन्होंने मुझे आश्‍वस्त किया था कि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है, वे डॉ अख्‍तर आलम से बातचीत करेंगे।

(4) इस पूरे मामले पर मेरा सिर्फ यह कहना है कि तृतीय छमाही के विद्यार्थियों के सेमिनार में मैंने जब बैठना चाहा, तो डॉ अख्‍तर आलम ने मुझे यह कहते हुए कक्षा से बाहर जाने के लिए कहा कि, “आप बैठ नहीं सकते!” मेरे ‘क्यों?’ पूछने पर उनका जवाब था कि ‘आप विभागाध्यक्ष से पूछ कर आइए।’ इस पर मैंने कहा, “किस कक्षा में कौन बैठेगा, यह विभागाध्यक्ष कैसे तय करेंगे? जबकि हमारे विश्‍वविद्यालय में अंतरानुशासनिक ढंग की शिक्षा की अवधारणा है। इसीलिए तो विश्‍वविद्यालय के अब तक के अकादमिक इतिहास में इच्छुक विद्यार्थी किसी भी सेमिनार में बैठते रहे हैं और जरूरत पड़ने पर सवाल पूछते रहे हैं।” वहां उपस्थित विद्यार्थियों से इस बात की प्रतिपुष्‍टि करने पर डॉ अख्‍तर आलम ने इस बेतुकी हिदायत के साथ बैठने को कहा कि “आप डिस्टर्ब नहीं करेंगे।” मैंने तत्काल कोई प्रतिवाद नहीं किया। एक विद्यार्थी ने अपने सेमिनार में जब कुछ तथ्यात्मक भूल की, तो मैं उसे ठीक करने के लिए उठा। डॉ अख्‍तर आलम ईर्ष्या से भर कर बोले, “आप डिस्टर्ब मत करिए!” मैंने तब प्रतिवाद करते हुए कहा कि “आप अजीब तरह से शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। महोदय, मैं डिस्टर्ब नहीं कर रहा हूं बल्कि एक तथ्यात्मक भूल को महज ठीक कर रहा हूं।” इसके बाद मैंने खुद ही कक्षा में और आगे बैठना उचित नहीं समझा और उठ कर कक्षा से बाहर आ गया।

(5) महोदय, मेरा सवाल आपसे हमारे विद्यापीठ के अधिष्ठाता होने के नाते यह है कि अगर विभाग से संबंधित यह कोई बहुत जरूरी (Urgent) मुद्दा था, तो इसे डॉ अख्‍तर आलम द्वारा प्राथमिक तौर पर विभागाध्यक्ष और अधिष्ठाता के यहां पेश क्यों नहीं किया? इस पूरे प्रकरण में सीधे कुलपति महोदय को शामिल क्यों किया गया? क्या विश्‍वविद्यालय में कुलपति के अलावा अन्य कोई अकादमिक बॉडी इस मामले को सुनने तक में सक्षम नहीं थी? फिर जबकि मैंने आपको स्वयं सारे मामले की विस्तृत जानकारी दी थी, खुद विभागाध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ‘अंकित’ को जब मामले की सारी जानकारी थी तो बावजूद इसके कुलपति महोदय को इस बारे में ठीक ठीक जानकारी क्यों नहीं दी गयी? क्या ऐसा हुआ कि जानकारी दिये जाने के बाद भी उस पर गंभीरतापूर्वक कोई पक्ष क्यों नहीं लिया गया?

(6) भविष्‍य के पत्राचार तथा किसी किस्म की प्रस्तावित कार्रवाई को सरल बनाने के लिए एक बात का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है। इस बातचीत के दो दिन बाद डॉ अख्‍तर आलम से उनकी कक्ष में मेरी तक़रीबन एक घंटे चर्चा हुई, जिसमें हमने व्यक्‍तिगत तौर पर विभाग से संबंधित कई मुद्दों पर खुली चर्चा की। इस पूरी बातचीत के दौरान उन्होंने स्पष्‍ट किया कि उन्हें पिछली किन्हीं बातों से किसी तरह की परेशानी नहीं है। बल्कि विभाग की स्थितियों पर उनकी कुछ तकलीफें बेहद जैनुइन थीं, जिनके बारे में चर्चा शायद कभी न हो। इससे स्पष्‍ट होता है कि अगर यह कोई वास्तविक मुद्‍दा होता, तो डॉ अख्‍तर आलम कहीं न कहीं जरूर इस बारे में कोई इशारा करते। जबकि सारी बातचीत बिल्कुल मैत्रीपूर्ण तरीके से हुई थी। इसी विश्‍वास के कारण मैंने शुरू में कहा है कि विभाग का यह कोई “वास्तविक मुद्‍दा” नहीं है।

(7) मैं साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि विश्‍वविद्यालय के प्रमुख पदाधिकारी अकादमिक प्रारूपों पर अगर इस तरह का नजरिया रखते हैं, तो यह विश्‍वविद्यालय के विजन और अकादमिक भविष्य के निर्माण की बची-खुची उम्मीद के साथ एक क्रूर खिलवाड़ है। आपने अपने पत्र में कहा है कि “वर्ग सेमिनार परीक्षा का एक हिस्सा है।” मैं समझ सकता हूं कि यहां आपका आशय शायद कक्षा से ही है। यह कोई नयी बात नहीं है। हम सभी यह जानते हैं। यहां आप पिछले ढाई तीन सालों से हैं, आप इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि यहां विद्यार्थी किसी भी सेमिनार में जाते हैं, सवाल पूछते हैं। सब कुछ से अवगत होते हुए भी निराधार तरीकों और वजहों से आपने मुझसे जिस तरह से स्पष्‍टीकरण मांगा है, यह सत्ता का मनमाना (दुर) उपयोग है, जो सख्‍त आपत्तिजनक है।

पत्र के अंत में, मैं अपने आपको हिंदी के चर्चित कवि देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता उद्धृत करने से नहीं रोक पा रहा हूं:

हमारे समाज में आदमी को अपमानित करने की
कई हजार तकनीकें विकसित कर ली गयी हैं
समाज में इतने सारे लोग इतने सारे तरीकों से
अपमानित किये जा रहे हैं कि लगता है
जो बहुत सम्मानित है, वह संदिग्ध है।

विभाग से संबंधित कुछ गंभीर तथा बेहद जरूरी अकादमिक मुद्‍दों के बारे में आपसे सार्वजनिक बातचीत करने और इस पत्र के जवाब में,

अनिल
पीएचडी, जनसंचार विभाग

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