वर्तमान में जिसके पास भी ताक़त होती है वह दूसरों के हक़ का अतिक्रमण करना चाहता है। कुछ तो जीते-जागते इंसानों को अपनी जागीर समझने लगते हैं। इन दिनों महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में एक निरंकुश सत्ता का क्रूर चेहरा सामने आ रहा है। दलितों के उत्पीड़न और प्रोफेसर अनिल चमड़िया को यूनिवर्सिटी से बेदखल करने के बाद अब वहां एक छात्र को महज इसलिए कैंपस से बाहर कर दिया गया क्योंकि उसने कुलपति विभूति नारायण राय और उनके गिरोह की दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का साहस किया था। इस छात्र का नाम है अनिल। और उसे जिस बहाने से निशाना बनाया गया है वो बहाना भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के क्रूर चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी है। - मॉडरेटर
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में अधिकारियों की बेशर्मी से जुड़ी एक और ख़बर आ रही है। वहां पर पीएचडी छात्र अनिल को छह महीने के लिए रेस्टिकेट कर दिया गया है। अनिल ने बीते कुछ समय में छात्र हितों से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए थे। यही नहीं उन्होंने यूनिवर्सिटी से प्रोफेसर अनिल चमड़िया को ग़लत तरीक़े से हटाए जाने का विरोध भी किया था। यह विरोध एक छात्र होने के नाते किया गया था। लेकिन इसकी वजह से वो यूनिवर्सिटी के कुलपति विभूति नारायण राय, जनसंचार के हेड अनिल राय अंकित की आंखों में खटक रहे थे। और अब उन्हें बेहद शातिराना और क्रूर अंदाज में शिकार बनाया गया है।
अनिल को हटाने के लिए तीन महीने पुराने वाकये का सहारा लिया गया है। बीते साल नंवबर में मीडिया विभाग में तृतीय छमाही का एक सेमिनार हुआ और इसे आयोजित किया था विभाग के अध्यापक अख़्तर आलम ने। यह एक अविभागीय सेमिनार था जिसमे कोई भी छात्र छात्रों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले पेपर के निरीक्षण के लिए बैठ सकता था। विश्वविद्यालय में यह स्वस्थ परम्परा लंबे समय से चली आ रही थी। इसी परंपरा के तहत पीएचडी छात्र अनिल उस सेमिनार में हिस्सा लेने पहुंचे। वो हॉल में दाखिल होने लगे तो अख़्तर आलम ने उन्हें घुसने से मना किया और कहा कि इसके लिए विभागाध्यक्ष (अनिल राय अंकित) से पूछ कर आओ। जवाब में अनिल ने कहा कि पत्रकारिता विभाग की स्वस्थ और पुरानी परम्परा के मुताबिक उन्हें सेमिनार में बतौर एक स्रोता मौजूद रहने के लिए किसी इजाजत की जरूरत नहीं है। अनिल की बात का समर्थन सेमिनार में प्रस्तुति दे रहे छात्रों ने भी किया। इसके बाद अख़्तर आलम ने उन्हें बैठने की इजाजत दी मगर चुप रहने की हिदायत के साथ।
इसी बीच सेमिनार में पेपर प्रस्तुत कर रहे दिलीप नाम के छात्र के तथ्यात्मक गलती कर दी। अनिल ने उसे ठीक करने को कहा। इस पर अख़्तर आलम ने कहा आप बैठ सकते हैं कुछ बोल नहीं सकते। जबकि पहले ऐसा होता था कि उपस्थित छात्र सवाल करते थे और बहस होती थी। अनिल को अख़्तर आलम की यह बात अच्छी नहीं लगी और वो हॉल से बाहर चले गए। सेमिनार के बाद इस मुद्दे पर अनिल और अख़्तर आलम के बीच घंटों बात हुई। मामला रफा-दफा हो गया।
लेकिन कुछ दिन बाद अख़्तर आलम ने इस मामले की लिखित शिकायत की। जिसके आधार पर कुलानुशासक द्वारा अनिल को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। एक जांच समिति बना दी गई। और अब अनिल को छह महीने के लिए कैंपस से बाहर दिया गया है।
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