
यह ख़बर प्रभात ख़बर में छपी है। इसे वहीं से साभार जनतंत्र पर छापा जा रहा है। इस रिपोर्ट से झारखंड पुलिस की बेशर्मी जाहिर होती है। यह भी कि अगर पुलिस के आला अधिकारियों ने प्रभात ख़बर की टीम में भरोसा जताते हुए उसे माओवादियों के पास भेजा था और बीडीओ प्रशांत कुमार को लाने की जिम्मेदारी सौंपी थी तो एक एसपी इतनी हिम्मत कैसे कर सकता है कि वो उस टीम को बीच जंगल में घेर ले। आप इस पूरी रिपोर्ट को पढ़िए और सोचिए कि जहां पुलिस और प्रशासन का रवैया इतना बेहूदा हो वहां पर नक्सली समस्या से कैसे निपटा जा सकता है? – मॉडरेटर
माओवादियों ने शुक्रवार शाम लगभग छह बजे गुड़ाबांधा के पास जंगल में बीडीओ प्रशांत कुमार लायक को प्रभात खबर की टीम को सही सलामत सौंप दिया. अपना वादा भी नक्सलियों ने निभाया. जब तक प्रभात खबर की टीम जंगल में थी, सरकार ने भी अपना वादा निभाते हुए कोई ऐसा काम नहीं किया, जिससे स्थिति बिगड़ती. शुक्रवार को जब प्रभात खबर के पास माओवादियों ने संदेश भेजा कि बीडीओ प्रशांत को वे रिहा कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ प्रभात खबर की टीम के समक्ष. प्रभात खबर के पास धर्मसंकट था. प्रभात खबर ने पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए झारखंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया. उन्हें बताया कि माओवादियों की ओर से ऐसा संकेत आया है. अगर सरकार कहेगी, तो प्रभात खबर की टीम जान जोखिम में डाल कर यह दायित्व निभाने को तैयार हैं. सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने सहमति दी. फिर शुरू हुआ अभियान. काम जोखिम भरा था. प्रभात खबर की टीम को माओवादियों द्वारा संदेश दिया गया कि किस जगह पर पहले जाना है.
जहां जाना था, वहां जाते ही कहीं और जाने का संदेश मिलता. कई बार जगह बदली गयी. मुसाबनी से डुमरिया होते हुए गुड़ा के रास्ते में सुरक्षाकर्मियों की भरमार थी. इसके बावजूद प्रभात खबर की टीम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती गयी. टीम के सामने चुनौतियां थीं. एक ओर माओवादी थे, तो दूसरी ओर पुलिसकर्मी. जरा सी चूक से जान जा सकती थी. टीम बढ़ती जा रही थी और उस पर माओवादियों की ओर से नजर भी रखी जा रही थी. निर्धारित जगह पर जब टीम कुछ देर रुकती, तो उसे कुछ देर बाद संदेश मिलता. फिर दूसरी जगह की ओर टीम रवाना होती.
कितने लोग हैं, कौन-कौन हैं, सवाल किये जाते. एक जगह पर एक कम उम्र का बालक मिला. वह एक जंगल की ओर ले गया. लगभग पौने छह बज रहे थे. वहीं टीम को खड़ा कर दिया गया. वहां करीब 15 मिनट तक इंतजार करने के बाद जंगल की ओर से हलचल हुई. फिर पांच माओवादी बीडीओ प्रशांत को लेकर बाहर निकले.प्रभात खबर की टीम ने परिचय दिया. अत्याधुनिक हथियार से लैस माओवादियों में दो लड़कियां भी थीं. सभी ड्रेस में थे. चेहरे ढक रखे थे. उन लोगों ने बीडीओ प्रशांत को प्रभात खबर की टीम को सौंप दिया. कहा कि बीडीओ को आप लोगों को सौंपने का आदेश है. माओवादियों ने तसवीरें भी खिंचवाई. बहुत बातचीत नहीं की. सभी माओवादी कम उम्र के थे. बीडीओ खुश थे. उस समय चेहरे पर तनाव भी नहीं था. बीडीओ ने माओवादियों के सामने ही कहा कि उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया. पैर में चप्पल भी थे.
प्रशांत को लेकर प्रभात खबर की टीम पैदल ही रवाना हो गयी. उधर माओवादी भी घने जंगल में चले गये. जहां गाड़ी खड़ी की गयी थी, वहां पहुंचने के बाद बीडीओ प्रशांत को गाड़ी पर बैटाया गया. टीम उन्हें लेकर जंगल से बाहर जा रही थी. जंगल में कितनी दूरी तय की, यह उस समय बताना मुश्किल था. रात हो चुकी थी. अंधेरा था. टीम डुमरिया होते हुए घाटशिला की ओर जानेवाले रास्ते पर थी.
गुड़ा के पास अचानक सैकड़ों की संख्या में सुरक्षा बलों ने गाड़ी को घेर लिया. हथियार निकाल लिया. टीम अचंभित थी. खुद एसपी नवीन सिंह भी वहां थे. उन्होंने कड़क आवाज में पूछा-कहां है बीडीओ. इसके पहले कि टीम कुछ समझ पाती, बीडीओ को एसपी ने बाहर खींच लिया. जो बीडीओ प्रभात खबर की टीम के साथ गाड़ी में अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे थे, वही बीडीओ एसपी की कार्रवाई के बाद रोने लगे. प्रभात खबर की टीम ने उन्हें समझाया. एसपी ने साफ-साफ कहा कि बीडीओ को वे अपनी कस्टडी में लेते हैं.
प्रभात खबर ने इसका विरोध किया और कहा कि बीडीओ को या तो उनके परिवार को सौंपा जायेगा या फिर घाटशिला में राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष. ऐसा इसलिए, क्योंकि यह प्रभात खबर के विश्वास के साथ जुड़ा मामला है. एसपी नहीं माने. जब प्रभात खबर की टीम ने मुख्यमंत्री शिबू सोरेन या डीजीपी से बात करने की इच्छा जतायी, तो उन्हें मोबाइल का प्रयोग नहीं करने दिया गया. प्रभात खबर की टीम अड़ी रही. अंतत: प्रभात खबर ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए बीडीओ प्रशांत को एसपी नवीन सिंह को सौंप दिया. इसकी तसवीर भी ली गयी.
गुड़ा के पास जो स्थिति बन गयी थी, अगर कुछ देर पहले ही पुलिस वैसी कार्रवाई कर देती, तो बीडीओ और पत्रकारों की जान भी जा सकती थी.बाद में प्रभात खबर की टीम बगैर बीडीओ के घाटशिला आयी. वहां आइजी समेत अनेक अधिकारी थे. सबों को जानकारी दे दी गयी कि प्रभात खबर ने अपने दायित्व का निर्वाह कर दिया है. फिर घाटशिला में बीडीओ के घर भी टीम गयी. परिजनों से मुलाकात की. बाद में बीडीओ को लेकर खुद एसपी डीबी आये. वहां बाकी मीडिया के सामने अपनी बातें रखीं. जब बीडीओ घर गये और बेटी से मिले, तो वह दृश्य भाव विह्लल करनेवाला था.राज्य के लिए बीडीओ की रिहाई खुशी की बात है. प्रभात खबर ने सरकार को विश्वास में लेकर इसमें पहल की, लेकिन यह बात समझ से परे है कि आखिर प्रभात खबर की टीम से बीडीओ को क्यों ले लिया गया?
अपनी संक्षिप्त बातचीत में माओवादियों ने इतना संकेत जरूर दे दिया कि उन्होंने अपना वादा निभाया है और अब सरकार अपना वादा निभाये. इसमें कोई दो राय नहीं कि मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने रांची से जो मैसेज जारी किया था, उस पर माओवादियों ने भरोसा किया और युवा बीडीओ को रिहा किया. अब बीडीओ रिहा हो चुके हैं. घर में हैं. प्रभात खबर का यह प्रयास तभी सार्थक माना जायेगा,जब आनेवाले दिनों में नक्सलवाद का कोई स्थायी समाधान निकल पायेगा.
sanjay
February 21, 2010 at 6:47 pm
badhiya laga.