ये तीन थे। मगर इडियट्स नहीं थे। न ही किसी 70 एमएम की फिल्म के हीरो थे, जिनकी अदाकारी पर आप ताली बजाएं। ये तीनों देश के सर्वाधिक मेधावी छात्रों में से एक थे। अभी दो हफ़्ते पहले की बात है। इनमें से एक के. सुशील ने छात्रावास परिसर में आत्महत्या की कोशिश की। कृष्णमोहन ने इसी महीने 48 घंटों तक खुद को कमरे में बंद रखा। वहीं ज्ञानेंद्र के पास अपनी विधवा मां के सवालों के उत्तर में सिर्फ़ आंसू थे। देश के बड़े प्रौद्योगिकी संस्थानों में से एक भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान इलाहाबाद के इन होनहार छात्रों की इस हालत की वजह सिर्फ एक थी। इन दलित छात्रों ने संस्थान के निदेशक द्वारा संस्थान के ही एक विद्वान प्राध्यापक की मनमाने ढंग से असमय सेवा समाप्ति के आदेश को लेकर ई-मेल किए थे। इसका खामियाजा इन्हें विश्ववद्यालय से निलंबन के साथ बंधक बनकर चुकाना पड़ा।
ज्ञानेंद्र सूचना प्रौद्योगिकी से सम्बंधित एक बेहद महत्वपूर्ण विषय पर शोध कर रहे हैं। सुशील और कृष्णमोहन संस्थान से ही एम-टेक कर रहे हैं। इस पूरे मामले पर जब हमने कांग्रेस के एक बड़े नेता के करीबी और अपनी संपत्ति से सम्बंधित सूचना न देने के आरोप में सूचनाधिकार कानून के तहत दण्डित निदेशक एम.डी तिवारी से बात कि तो उन्होंने झेंपते हुए पहले तो सुशील द्वारा आत्महत्या की कोशिशों की जानकारी की बात स्वीकार कर ली लेकिन बेहद शर्मनाक तरीके से निलंबन पर पैंतरा बदलते हुए कहा कि हमने इन छात्रों को प्राध्यापक यू.एस. तिवारी समबन्धित ई.मेल भेजने की वजह से नहीं हटाया था। निलंबन की वजहें और थीं। बहुत पूछे जाने पर भी उन्होंने उन वजहों का खुलासा नहीं किया। यहां ये बात काबिलेगौर है कि ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय से प्रकाशित अभियांत्रिकी की कई किताबों के लेखक यू.एस. तिवारी की मनमाने ढंग से सेवा समाप्ति सिर्फ इसलिए की गयी थी क्योंकि उन्होंने संस्थान में निदेशक द्वारा की जा रही मनमानी पर अपनी आपत्ति जताई थी।
ज्ञानेंद्र, के. सुशील और कृष्णमोहन को इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि अपने गुरु के लिए आवाज़ उठाने की कीमत उन्हें यूं चुकानी पड़ेगी। पिछले साल, 22 दिसंबर को ट्रिपल आई टी के प्रोफेसर यू एस तिवारी की सेवा समाप्ति से सम्बंधित सूचना जैसे ही संस्थान के पूर्व छात्रों की मिली। इन पूर्व छात्रों ने प्रोफेसर तिवारी के समर्थन में संयुक्त बयान जारी कर उसे ई .मेल के जरिये चारों और फैला दिया। ऐसा ही जब संस्थान के वर्तमान छात्रों को मिला तो पूरे संस्थान के छात्र अपने प्रिय प्रोफेसर के समर्थन में एकजुट होने लगे। यही बात निदेशक एम डी तिवारी को बुरी लगी। मगर सवाल ये था कि इस चिंगारी को आग में तब्दील होने से कैसे रोका जाए? फिर क्या था निदेशक द्वारा मनमाने ढंग से एक जांच कमेटी बना दी गयी। चार सदस्यीय इस कमेटी में एक कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी की पुत्री भी थी।
जांच कमेटी की मनमानी के बारे में बताते हुए संस्थान का ही छात्र और निलंबित छात्रों का एक मित्र बिलख पड़ता है। वो बताता है “के .सुशील ने तो कुछ किया ही नहीं था, उसे बार-बार डराया धमकाया जा रहा था। जब उसने इस ई.मेल प्रकरण में किसी अन्य छात्र का नाम लेने से इनकार कर दिया तो उससे जबरन कागज़ पर साइन लेकर निलंबित कर दिया गया। वहीं ज्ञानेंद्र और कृष्णमोहन से तो पहले इस गलती को स्वीकार कर भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का शपथपत्र लिया गया। फिर उन्हें भी निलंबन का कागज़ थमा दिया गया। संस्थान के ज्यादातर छात्रों का कहना था कि निदेशक द्वारा जानबूझ कर दलित छात्रों के खिलाफ कार्यवाही की गयी हैं। गौरतलब है कि यू एस तिवारी के निर्देशन में जितने भी छात्र अधयन्न कर रहे थे जिनमे से ये तीन ही दलित थे।
निलम्बन आदेश में इन छात्रों को इलाहाबाद से बाहर न जाने के आदेश दिया गया। साथ ही इन छात्रों की स्कालरशिप रोक दी गई। ज्ञानेंद्र के मित्र बताते हैं कि उनकी मां महज 1500 रुपये पेंशन पाती हैं। आंध्र प्रदेश के रहने वाले सुशील और केरल के कृष्णमोहन के घर की भी आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं। ऐसे में ये छात्र क्या करें.. कहां जाएं? ये पूरी खबर जब हमने छापी तो उसके 48 घंटों बाद आश्चर्यजनक ढंग से निलंबन वापस ले लिया गया।
((लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। आवेश से आप awesh29@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))
पद्म सिंह
March 9, 2010 at 2:58 pm
आवेश जी आपका लेख वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है … किन्तु आपने घटना को दलित से जोड़ कर कहीं न कहीं दलितों के प्रति सहानुभूति जुटाने की मंशा रखी है… दलितों के साथ ये घटनाएं नयी नहीं हैं.. सदा होती आई हैं और इस तरह की घटनाएं निन्दनीय भी हैं. किन्तु तस्वीर का एक रुख और भी दिखाना चाहता हूँ आपको … मै एक सरकारी विभाग में कार्य करता हूँ … मेरे अधिकारी तथाकथित दलित (??) समाज से हैं .. लगभग डेढ़ वर्ष पहले जब अधिकारी महोदय स्थानांतरित हो कर आये तभी से उनहोंने सवर्ण विरोधी मोर्चा खोल रखा है …किसी सवर्ण का कोई भी कार्य करते ही नहीं और अगर किया भी तो बहुत अनुनय विनय करवा कर ही … कई बार तो खुले रूप से उनके द्वारा हरिजन एक्ट में फर्जी फंसा देने की धमकियाँ भी दी गयीं हैं उनके द्वारा … उनके एक रिश्तेदार बसपा के सांसद हैं जिनके कारण विभाग भी उनकी अक्षमता के कारण जब भी उन्हें हटाना चाहता है हटा नहीं पाता और वे मनमाने ढंग से और निहायन अनियमित तरीके से टेंडर और अन्य विभागीय प्रक्रियाएं निपटाते हैं..तकनीकी ज्ञान इतना कम है कि किसी मीटिंग में अपने किसी अन्य कनिष्ठ इंजीनियर को अधिवक्ता के रूप में ले जाते हैं … अगर किसी ने जरा भी आवाज़ उठाई तो उसे हर तरह से इतना पंगु बना दिया जाता है कि किसी लायक नहीं रह जाता … और निरंतर उनका मनमाना राज चल रहा है… ये उदाहरण मै आपको इस लिए दे रहा हूँ क्यों कि जो तस्वीर आप पेश करना चाहते हैं वो तस्वीर का एक रुख है और आंशिक है …तस्वीर वो नहीं है जो आप दिखाना चाहते हैं … ये हर युग में होता आया है और इसे दलित बनाम सवर्ण न देखें बल्कि जंगल राज की तरह देखें तो ज्यादा उचित होगा जहां शक्तिशाली ही श्रेष्ट है … मुझे उन छात्रों के प्रति संवेदना है और होनी चाहिए … परन्तु इस लिए नहीं कि वो जाति से दलित हैं .. बल्कि इस लिए कि वो जंगल राज के शिकार हैं जो निरंतर अपने पाँव पसार रहा है ….