“सबसे बड़ी शर्म” और “पर्दाफाश” जैसे जुमलों के साथ ज़ी न्यूज़ ने रेल बजट से ठीक पहले एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया। इसमें बताया गया कि चंद रुपये में “ट्रेन बिक जाती” है और महज “तीन हज़ार रुपये” में “प्लैटफॉर्म तक का सौदा” हो जाता है। यह भी खुलासा किया गया कि ट्रेन में सफ़र करते वक़्त आप जो खाना खाते हैं वो गंदे पानी से बना होता है और यह यात्रियों की सेहत के साथ बहुत बड़ा धोखा है।
रेल बजट से ठीक पहले इस स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिये ज़ी न्यूज़ ने सबसे आगे निकलने की कोशिश की। आज सुबह भी टुकड़ों-टुकड़ों में उस स्टिंग ऑपरेशन को दिखाया गया। दर्शकों को रेलवे के ख़ौफ़नाक सच से रू-ब-रू कराने की कोशिश की गई। और यह ताल भी ठोंकी गई कि ज़ी न्यूज़ के इस ऐतिहासिक खुलासे के बाद रेलवे के बाबुओं पर ममता का डंडा चल सकता है। हो सकता है कि टीआरपी दौड़ में शायद उसे कुछ फायदा भी मिले।
पैकेजिंग और शब्दों का चयन ऐसा था कि अगर स्क्रिन पर आ-जा रही लाल पट्टी पर अगर आपकी नज़र पड़ जाए तो आप कुछ देर के लिए रुक ही जाएंगे। उस ख़ौफ़नाक सच को जानने के लिए जो सबसे बड़ी शर्म है। लेकिन वो शब्द जो उम्मीद जगाते हैं, खुलासा उतना बड़ा नहीं होता। ब्रेकिंग न्यूज़ देख कर लगता है कि रेलवे का कोई बड़ा अधिकारी या फिर खुद मंत्री को सौदेबाजी करते हुए पकड़ा जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। इस स्टिंग ऑपरेशन में एक भी अधिकारी नज़र नहीं आया। चोरी-छिपे वेंडरों से की गई बातचीत के आधार पर ज़ी न्यूज़ ने खुलासा किया कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भीड़ भरी ट्रेनों को अपने प्लैटफॉर्म पर रुकवाने के लिए वेंडर कैसे स्टेशन मास्टर को रिश्वत देते हैं। ट्रेन और प्लैटफॉर्म का सौदा जैसे शब्दों का कुल मतलब इतना ही था कि तीन हज़ार रुपये प्रति माह की घूस। और यही देश की सबसे बड़ी शर्म भी थी।
ऐसे रिश्वत कांड देश के हर चौक-चौराहे पर होते हैं। जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन से इस देश की संसद तक – कोई चोरी छिपे तो कोई खुलेआम नोट लेता दिख जाएगा। फिर तो ज़ी न्यूज़ को चाहिए की हर रोज देश को शर्मसार करे। डेढ़ साल पहले की बात जब इसी देश की संसद में एक करोड़ रुपये रख दिए गए थे। उसमें दो ही फैसले हो सकते थे। या अगर बीजेपी सांसदों को रिश्वत नहीं दी गई थी तो उन सांसदों को देश की संसद को शर्मसार करने के लिए कठोर दंड देना चाहिए था। अगर उन्हें रिश्वत दी गई थी तो मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। तो फिर इस देश में एक वेंडर तीन हज़ार रुपये की रिश्वत दे तो फिर देश शर्मसार कैसे हो सकता है?
दरअसल, ज़ी न्यूज़ ने एक बेहद औसत ख़बर को बहुत बड़ी ख़बर के तौर पर पेश करने की कोशिश की। यह एक आम बात को सनसनीखेज बनाने की कोशिश है। जबकि वो ख़बर साफ-सुथरे तरीके से पेश की जा सकती थी। मामला जितना था उतना ही बताया जा सकता था। लेकिन इस “सनसनीखेज कोशिश” का मकसद रेलवे के भ्रष्टाचार से पर्दा उठाना नहीं है बल्कि एक अहम दिन पर दूसरे चैनलों से थोड़ी अधिक टीआरपी बटोरना है। अब चैनल के कर्ता-धर्ताओं से पूछा जाना चाहिए कि एक साधारण स्टोरी को सनसनीखेज बना कर उन्होंने क्या हासिल किया? क्या उनके सबूत किसी भी बड़े और भ्रष्ट अफ़सर को सज़ा दिलाने के लिए काफी हैं? अगर हां, तो इस सनसनीखेज खुलासे पर सिर्फ़ उन्हें ही नहीं पूरे पत्रकारिता जगत को नाज होना चाहिए। और अगर उसके सबूत सज़ा दिलाने में नाकाफी हैं (जो एक लिहाज से तय है) तो शर्म ज़ी न्यूज़ को करनी चाहिए। क्योंकि उसके इस खुलासे से कोई और नपे न नपे तीन वेंडर ज़रूर नपेंगे। उन वेंडरों की रोजी-रोटी ज़रूर छिनेगी या फिर उन्हें परेशान ज़रूर किया जाएगा।
यह वर्तमान दौर के टीवी पत्रकारिता की एक बड़ी हक़ीक़त है। बीते कुछ साल में हुए ज़्यादातर स्टिंग ऑपरेशन औसत श्रेणी के रहे हैं। किसी छुटभैये नेता या फिर कोई हवलदार और चपरासी की पोल खोली गई है। यह काम कोई क्षेत्रीय चैनल या फिर सिटी केबल जैसे संस्थान करें तो समझ में आती है। लेकिन जब राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल इस तरह की हरकत करते हैं तो उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर उनकी नज़र क्यों नहीं पड़ती? हाल के दिनों में दो आरटीआई एक्टिविस्ट मारे गए हैं। एक बिहार और एक महाराष्ट्र में। क्यों नहीं न्यूज़ चैनल इस पर मुहिम चलाते हैं? अभी मधु कोड़ा घोटाले की जांच कर रहे उज्ज्वल चौधरी का तबादला किया गया। क्यों नहीं न्यूज़ चैनल तबादले के ख़िलाफ़ मुहिम चला कर केंद्र में बैठे सफेदपोश घोटालेबाजों को बेनकाब करते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से ये न्यूज़ चैनल और उनके कर्ता-धर्ता डरते हैं? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि उस बड़े भ्रष्टाचार में उनकी भी भागीदारी है? सवाल बड़े हैं और इन सवालों पर चर्चा होनी चाहिए।
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