भारतवर्ष के सबसे बड़े चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन अब खाड़ी देश क़तर के नागरिक होंगें. उन्हें क़तर की नागरिकता की पेशकश की गई है. चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है लिहाज़ा अब हुसैन शायद आने वाले दिनों में ओवरसीज़ इंडियन सिटीज़न के रूप में अपना नामांकन चाहें तो करा लें वरना वो अब तो शायद क़तर के नागरिक होंगे ही.
2010 की शुरूआत में कला संस्कृति की भारतीय परंपरा के लिए ये एक सदमे वाली स्थिति है. द हिंदू अख़बार में हुसैन के भेजे एक संदेश से हुसैन के प्रशंसक और कला प्रेमी और संस्कृतिकर्मी स्तब्ध हैं कि भारत देश ने अपने एक सपूत को इस तरह गंवा दिया. ये एक अजीब संयोग है कि जब देश क्रिकेट के महान सितारे सचिन तेंदुलकर के वनडे में 200 रन का अभूतपूर्व जश्न मना रहा था तो उधर देश से बाहर अघोषित किस्म के निर्वसन में रह रहा देश का सबसे बड़ा पेंटर देश लौटने की एक विकराल छटपटाहट से जूझता हुआ एक दूसरे देश का नागरिक बनने का अनचाहा गौरव हासिल कर रहा था.
95 साल के हुसैन के पास विकल्प नहीं थे. देश की विभिन्न अदालतों में बताया जाता है उनके ख़िलाफ़ इतने मुक़दमें हैं कि वो देश लौटने की जुर्रत नहीं कर सकते थे. हिंदू कट्टरपंथियों और उनके नाना किस्म के सूरमाओं ने हुसैन के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के मामले दायर किए हुए हैं. हुसैन लड़ते रहते लड़ते रहते और शायद हार जाते. आखिर एक कलाकार इस सनक भरी और जुनूनी लड़ाई का हिस्सा बनने नहीं आया है.
द हिंदू अख़बार को भेजे अपने संदेश में हुसैन ने एक चित्राकृति के साथ एक लाइन भेजी है कि वो अब क़तर के नागरिक हैं. इस वाक्य की करुणा और इसमें छिपी पीड़ा, अफ़सोस, उदासी और दर्द को कोई कठमुल्लापन कभी नहीं समझ पाएगा. एक अरब से ज़्यादा की आबादी वाला और खजुराहो और दक्षिण भारत की मंदिर कला परंपराओं वाले सांस्कृतिक देश भारत की सरकार भी हुसैन के मामले पर ख़ामोश है.
कुछ कोशिशें अलबत्ता छिटपुट हुई लेकिन हुसैन को बाहर रखना लगता है ज़्यादा मुफ़ीद है. कोई किसी को नाराज़ नहीं करना चाहता. मानो हुसैन अगर देवी देवीताओं के चित्र न बनाते, तो भारत के नागरिकों, धर्म के ठेकेदारों को कभी अश्लीलता न दिखती. कभी संस्कृति का अनादर न दिखता. खजुराहो और अजंता एलौरा हैं तो क्या हुआ. हुसैन नहीं चाहिए. गोकि हुसैन की राष्ट्रीयता, देशभक्ति और प्रेम पर संदेह है. हुसैन एक महत्वपूर्ण पेंटर से विवादास्पद पेंटर बना दिए गए.
हुसैन के चाहने वालों का कहना है कि ये भीषण स्तब्धकारी घटना है कि इस देश को आज़ाद हुए और संप्रभु गणतंत्र बने उतने साल नहीं हुए जितनी हुसैन की उम्र है लेकिन उन्हें एक अघोषित देशनिकाला किस्म का झेलना पड़ रहा है. जश्न और मस्ती और अमीरी और बहुसंख्यकवाद की खुमारी में डूबे समाज के लिए क्या यह एक ग्लानि का दिन नही कि वह अपने एक महानायक के तिरस्कार का भागी है. अपार वंदनाओं और कीर्ति पताकाओं और यश प्रार्थनाओं के इस दौर में देखने वाली बात है कि कितने लोग हुसैन की नागरिकता में इस बदलाव के लिए अफ़सोस और हैरानी ज़ाहिर कर पाते हैं. 20 वीं सदी के महान भारतीय पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन क्या अब 20 वीं सदी के महान पेंटर हैं…भारतीय मूल के.
हुसैन को नागरिकता से नवाज़कर क़तर सम्मानित हुआ है और हुसैन के चाहने वाले कुछ ख़ुश कुछ उदास और कुछ राहत में हैं. हुसैन अब सुनते हैं कि भारतीय सभ्यता और अरबी सभ्यता पर अपने चिरपरिचित तूफ़ानी अंदाज़ में एक बड़ी कला योजना पर काम कर रहे हैं. एक कलाकार आखिर एक समस्त मनुष्य जिजीविषा का प्रतीक और एक सकल वेदना का वाहक है या महज़ एक देश का ये भूगोल का. 21वीं सदी के इन वक़्तों की कला दुनिया के नज़ारों में मक़बूल फ़िदा हुसैन से बड़ी मिसाल नहीं होगी.
((शिवप्रसाद जोशी। पत्रकारिता में 15 साल लंबा सफ़र। राजनीति शास्त्र से एमए और भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। देश के चुनिंदा टीवी चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों जर्मन रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी सेवा में दूसरी पारी खेल रहे हैं।))
कलाप्रेमी
February 28, 2010 at 3:18 am
हुसैन ने साबित कर दिया है कि वो कभी दिल से भारतीय थे ही नहीं…और ना ही भारतीय संस्कृति की उन्हें धेले भर की भी कोई समझ रही है…वरना वो सामासिक संस्कृति और लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली वाले भारत को छोड़कर धर्मांधता से भरे मुल्क की राजशाही का न्योता स्वीकार नहीं कर लेते। बेहद बौने साबित हो गए हैं हुसैन। भारत में अपने समर्थकों को उन्होंने कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा…तसलीमा नसरीन को देखिए…वो अपने मुल्क से निकाले जाने के बाद भारत में शरण चाहती हैं…जबकि कट्टरपंथी उन्हें यहां भी निशाना बनाते हैं, लेकिन वो यूरोप-अमेरिका की आरामगाह छोड़कर भारत की ज़मीन में अपनी जड़ें बसाना चाहती हैं…क्योंकि उनके संघर्ष में कहीं ना कहीं प्रतिबद्धता है, सच्चाई है, ईमानदारी है…और ये एक हमारे हुसैन साहब हैं…भारत का खुला आसमान छोड़कर कतर के नवाबी दरबार की शान बढ़ाने पहुंच गए…वहां चारण बनकर रहेंगे…क़तर में धर्म-निरपेक्ष बनकर दिखाएं, तो जानें… हुसैन के इस फैसले पर फालतू का बचकाना स्यापा बंद कीजिए…ऐसे कमज़ोर, खोखले और बेईमान लोगों को खोकर भारत का कोई नुकसान नहीं हुआ…
भारतीय नागरिक
March 2, 2010 at 3:27 pm
बहुत महान हैं आप. आपको नमन. एक काम और करिये कि कतर जाकर हिन्दुओं के लिये सार्वजनिक स्थानों पर पूजापाठ की अनुमति दिलवा दीजिये. अरब देशों में, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी धर्मनिरपेक्षता लागू नहीं है, एक बार मुद्दा उठाइये और सुरेश चिपलूनकर जी के ब्लाग sureshchiplunkar.blogspot.com पर जाकर आज के मुद्दे के बारे में कुछ धारदार टिप्पणी कीजिये.
P.C.Godiyal
March 2, 2010 at 3:33 pm
नाम ही उसका M.F.है !!!!!!!!!!!!!!!!!!
बीरेंद्र
March 2, 2010 at 3:44 pm
ओह, यह लेखक की तस्वीर है. दाढ़ी की वजह से लगा कि हुसैन जी की जवानी की तस्वीर है.
एक भारतीय
March 2, 2010 at 3:46 pm
लगता है कि सारे बजरंगियों ने लेखक पर हमला बोल दिया है। ये तो सही बात नहीं। समर्थन या विरोध में तर्क लिखो अब दाढ़ी और मूंछ के पीछे क्यों पड़ गए हो।
कुश
March 2, 2010 at 4:08 pm
हुसैन था, तब भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था और नहीं है तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता..
रही उसकी कला की बात. तो मैंने उससे अच्छे और भी कई कलाकार देखे है.. लेखक से आग्रह है कि खजुराहो और एलोरा के अलावा मीनाक्षी टेम्पल.. रामेश्वरम मंदिर.. दिलवाडा जैन मंदिर.. रणकपुर मंदिर.. पावा पुरी.. या अक्षर धाम के किसी भी मंदिर में की गयी कला देख ले.. भारत में सिर्फ खजुराहो ही नहीं है..
भारतीय साहब..
अगर दाढ़ी मूंछ कहने वाले गलत है तो बजरंगी कहने वाले भी गलत है..
समर्थन या विरोध में तर्क लिखो
आप ही का कथन है.. पर आपके तर्क गायब है..
एक भारतीय
March 2, 2010 at 4:11 pm
कुश साहब, वो टिप्पणी को एक टिप्पणी के जवाब में थी। आपने देखना नहीं। रिप्लाई में लिखा हुआ है। आप तो नाहक परेशान हो गए।
vivek
March 9, 2010 at 6:40 pm
Husain ke jane se desh ke kala jagat ki gandgi hi dur hui hai. Husain jaiso ko desh se nikal hi dena chahiye