बहुत सारे लोग मेरा नाम सलमान रुश्दी के साथ जोड़ देते हैं। देश विदेश सब जगह। लेकिन अगर दो ऐसे लोगों को एक साथ रख कर देखा जाता है, जिनमें काफी असमानता है तो आपत्ति स्वाभाविक है। आजकल मुझे धड़ल्ले से महिला रुश्दी कह दिया जाता है। मैं पूछती हूं, सलमान रुश्दी को पुरुष नसरीन क्यों नहीं कहते? एक फतवे को छोड़ दें, तो हमारे बीच कोई समानता नहीं है। रुश्दी पुरुष हैं। मैं स्त्री हूं। यह सबसे बड़ा अंतर है। पुरुष होने के कारण वे सुविधाएं भोग रहे हैं और स्त्री होने के चलते मैं असुविधाओं से घिरी हूं।
मैं एक-एक कर असमानताएं गिनाती हूं। फतवा जारी होने के बाद उन्होंने कट्टरपंथियों से माफी मांगी, तौबा करके खांटी मुसलमान बने रहने की कसम खाई। मैंने माफी नहीं मांगी। मुसलमान भी नहीं होना चाहती। मैं बचपन से नास्तिक हूं। चाहे जितने आँधी-तूफान आए, हमेशा सिर ऊंचा किए नास्तिक बनी रही। जिस ईरान ने रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया था वे उस देश में कभी नहीं रहे। मगर जिस देश में मुझे फांसी पर चढ़ाने के मकसद से बरसों उन्मादियों का जुलूस निकलता रहा, जहां असहिष्णु मुसलमान मेरी हत्या को उतारू थे, जहां की सरकार ने खुद मेरे खिलाफ अपील की थी; जिसके चलते मेरा हुलिया जारी किया गया और मुझे महीनों रात के अंधेरे में लुक-छिप कर रहना पड़ा था, जिस देश के कट्टरपंथी अपने हाथों मेरी गर्दन मरोड़ने पर तुले थे, उस देश में- ऐसे उग्र माहौल में भी- मैं सशरीर उपस्थित रही। सरकार और कट्टरपंथियों के तमाम अत्याचार मैंने अकेले सहे थे।
फतवे के चलते रुश्दी को उनके देश में किसी ने प्रताड़ित नहीं किया। उन्हें देशनिकाले की सजा नहीं दी गई। रुश्दी का देश है इंग्लैंड। वे वहीं रहे और वहीं हैं। उनके खिलाफ महज एक फतवा जारी हुआ। मेरे खिलाफ बांग्लादेश में तीन और भारत में पांच फतवे जारी हुए। सबमें मेरे सिर की कीमत घोषित की गई। रुश्दी को तो किसी देश से नहीं, पर मुझे मेरे लिखने की वजह से दो देशों से निकाल बाहर किया गया। उनकी एक किताब प्रतिबंधित है, मेरी पांच किताबें प्रतिबंधित हैं। लज्जा, मेरा बचपन, उत्ताल हवा, द्विखंडित, सारा अंधकार। धर्म की निंदा करने के बावजूद रुश्दी किसी धर्मनिरपेक्ष मानववादी संगठन या मानवाधिकार संगठन के साथ नहीं जुड़े हैं, मैं सक्रिय रूप से जुड़ी हूं।
वे व्यक्तिगत जीवन में अत्यंत सामंतवादी हैं, मैं उनके उलट हूं। रुश्दी एक के बाद एक लड़कियों को पकड़ते, उन्हें भोगते और फिर छोड़ देते हैं। बूढ़ी उमर में उनकी इस यौनेच्छा को कोई बुढ़भसपने के रूप में नहीं देखता। बल्कि उन्हें अधिक समर्थ, सुंदर, प्रेमी के रूप में सम्मान दिया जाता है और ज्यादातर पुरुषों के लिए वे ईर्ष्या का विषय बने हुए हैं। जबकि इस तरफ, पुरुष साथी के बिना जीवन काटते रहने के बावजूद मेरी यौनता को लेकर तरह-तरह के किस्से कहानियां लिखे जाते हैं। मुझे वेश्या और विकृत औरत कहने-बताने वालों की भी कमी नहीं है।
पुरुष यौन जीवन का उपभोग कर सकता है। अगर औरत ऐसा करती या करने के अधिकार की बात करती लिखती है तो वह ‘वेश्या’ है। जबसे लिखना शुरू किया है, लोगों की निंदा सुनती आ रही हूं। स्त्री की यौन स्वाधीनता का सवाल उठा कर जैसे मैंने समाज का बारह बजा दिया। रुश्दी और मेरे बीच एक और विचित्र समानता या असमानता यह है कि जो रुश्दी को अच्छा लेखक मानते हैं उनमें से ज्यादातर लोगों ने उनका लिखा नहीं पढ़ा है। और जो लोग मुझे खराब लेखक मानते हैं, उनमें से भी ज्यादातर ने मेरा लिखा नहीं पढ़ा है।
रुश्दी के साथ 1993 से मेरा नाम जोड़ा जा रहा है। ईरान से फतवा जारी होने के बाद रुश्दी एक विख्यात नाम हो गया था। जबकि मेरे सिर की कीमत घोषित होने के बाद बांग्लादेश और भारत की सीमा के कुछ लोगों ने मेरा नाम जाना। जिस वक्त मैं बांग्लादेश में नजरबंद अवस्था में थी, उस वक्त मेरे पक्ष में खुला पत्र लिख कर आंदोलन चलाने वाले यूरोपीय लेखकों में रुश्दी भी थे। लेकिन निर्वासन के दौरान जर्मनी की एक पत्रिका में छपे मेरे बयान को पढ़ कर वे आग बबूला हो उठे। उस पत्रिका में मैंने हताशा प्रकट करते हुए कहा था कि अगर फतवे के डर से रुश्दी ने माफी मांगी है तो यह उनकी कायरता है।
फिलहाल रुश्दी न्यूयार्क शहर में रहते हैं। मैं भी वहीं रहती हूं। लेकिन हम दोनों की मुलाकात की कोई संभावना नहीं है। वे अमेरिकी कवियों-लेखकों के एक बड़े संगठन- पेन क्लब- के अध्यक्ष हैं। दो साल पहले पेन क्लब की ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर काफी बड़ा आयोजन हुआ था। उसमें एशिया-अफ्रीका के बहुत सारे लेखक जुटे थे, सारे प्राय: अपरिचित।
सलमान रुश्दी जानते हैं कि मैं भारत से निर्वासित होकर यहां आई हूं। मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जो आघात हुआ है, उसके पीछे घृणा और अविश्वास है। बांग्लादेश में मेरी सारी किताबें सामाजिक भाव से नहीं, सरकारी तौर पर प्रतिबंधित हैं। केवल बांग्लादेश से नहीं, पश्चिम बंगाल से भी मुझे निर्वासित किया जा चुका है। इतना ही नहीं, देश से बाहर निकालने से पहले साढ़े सात महीने तक मुझे कोलकाता और दिल्ली में नजरबंदी की हालत में रखा गया। मगर मेरे इतिहास को छल, बल, कौशल से अस्वीकार करते हुए सलमान रुश्दी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उत्सव मना रहे हैं!
वे जो चाहते हैं, करते हैं। उनके सुरक्षाकर्मियों में से एक ने उनके खिलाफ किताब लिखी है। उन्होंने प्रकाशकों से बात करके उसे न छपने देने का बंदोबस्त कर लिया है। हां, वे अभिव्यक्ति की आजादी का उत्सव मना रहे हैं। वे साठ पार कर चुके हैं, लेकिन लड़कियों की तरफ ललचाई नजर से देखते हैं तो उन्हें कोई बुरा नहीं कहता। लड़कियां उन पर आरोप लगा चुकी हैं कि रुश्दी उन्हें यौन-वस्तु के अलावा और कुछ नहीं समझते, तब भी उनके प्रति लोगों में घृणा नहीं उपजती। इस प्रचंड पुरुषवादी लेखक का खूब नाम है, यश है, उन्हें खूब ख्याति मिल चुकी है, लेकिन हकीकत यह है कि एक फतवे को छोड़ कर उनके साथ मेरा कोई मेल नहीं है।
पिछले करीब दो साल से एक और व्यक्ति के साथ मेरा नाम जोड़ा जाने लगा है। वे हैं मकबूल फिदा हुसेन। वे बड़े चित्रकार हैं। भारत में उनके चित्र सबसे अधिक कीमत पर बिकते हैं। बहुत सारे लोग उन्हें भारत के नंबर एक चित्रकार के रूप में देखते हैं। उन्होंने सरस्वती की नंगी तस्वीर बना कर हिंदू धार्मिक मन पर आघात किया था। हिंदुओं ने उनके चित्र नष्ट कर दिए, उन्हें धमकी दी, वे देश छोड़ने को बाध्य हुए। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शत- प्रतिशत विश्वास करती हूं। मेरा मानना है कि मकबूल फिदा हुसेन जो चाहते हैं उन्हें वही रचने की आजादी मिलनी चाहिए। इस वजह से उनके ऊपर अत्याचार करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है।
मगर हुसेन जैसे एक बड़े चित्रकार के साथ मेरे जैसे एक छोटे व्यक्ति का नाम जोड़ा जाता है तो मैं बेचैनी महसूस करती हूं। इसलिए कि छोटी होने के बावजूद मैं अपने आदर्शों को बहुत मूल्यवान मानती हूं। मेरे आदर्शों की तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं की जा सकती। चाहे वह इस दुनिया का कितना भी मशहूर आदमी क्यों न हो, उसके प्रति मेरे मन में कोई पक्षपात नहीं पैदा होता। उसके साथ मेरा नाम लिया जाता है तो मैं पुलकित नहीं होती।
हुसेन के सरस्वती की नंगी तस्वीर बनाने को लेकर भारत में विवाद शुरू हुआ तो मैं स्वाभाविक रूप से चित्रकार की स्वाधीनता के पक्ष में थी। मुसलमानों में नास्तिकों की तादाद बहुत कम है। मैंने मकबूल फिदा हुसेन के चित्रों को हर जगह से खोज कर देखने की कोशिश की कि हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म, खासकर अपने धर्म इस्लाम को लेकर उन्होंने कोई व्यंग्य किया है या नहीं! लेकिन देखा कि बिल्कुल नहीं किया है। बल्कि वे कैनवास पर अरबी में शब्दश: अल्लाह लिखते हैं। मैंने यह भी स्पष्ट रूप से देखा कि उनमें इस्लाम के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। इस्लाम के अलावा दूसरे किसी धर्म में वे विश्वास नहीं करते!
हिंदुत्व के प्रति अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया है! क्या वे मोहम्मद को नंगा चित्रित कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते। मुझे किसी भी धर्म के देवी-देवता या पैगंबर वगैरह को नंगा चित्रित करने में कोई हिचक नहीं है। दुनिया के हर धर्म के प्रति मेरे मन में समान रूप से अविश्वास है। मैं किसी धर्म को ऊपर रख कर दूसरे के प्रति घृणा प्रदर्शित करने, किसी के प्रति लगाव या विश्वास दिखाने की कोशिश नहीं करती।
हुसेन भी उन्हीं धार्मिक लोगों की तरह हैं जो अपने धर्म में तो विश्वास रखते हैं, पर दूसरे लोगों के उनके धर्मों में विश्वास की निंदा करते हैं। फिदा हुसेन के साथ मेरा नाम लिया जाता है। कहां वे विशाल वृक्ष और कहां मैं एक तुच्छ तिनका! दोनों में क्या मेल। कहां मैं नास्तिक और वे आस्तिक न सही, अपने ईश्वर के प्रति तो आस्तिक हैं।
फिदा हुसेन के साथ मेरी एक ही समानता है। धर्मांध लोगों के आक्रामक हो उठने के बाद लगभग एक साथ हम दोनों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। इसके अलावा बाकी सब असमानता है। पहली असमानता तो यही है कि उन्होंने स्वेच्छा से देश छोड़ा है, मैंने स्वेच्छा से नहीं छोड़ा है। फिर मुझे अपने कोलकाता के घर से ही नहीं, समूचे भारत से बाहर कर दिया गया है। किसी कट्टरपंथी ने नहीं, बल्कि खुद सरकार ने मुझे बाहर किया। हुसेन को तो रहने के लिए विदेश में अपना घर है, मेरा नहीं है।
हुसेन की देश वापसी के लिए सरकार पूरी कोशिश कर रही है, मुझे तो न भारत सरकार लौटने दे रही है न बांग्लादेश सरकार। भारत से निकाले जाने के बाद मैंने जितनी बार भी वहां लौटने की कोशिश की, मुझे दृढ़तापूर्वक विदा कर दिया गया। हुसेन तो एक धर्म को लेकर व्यंग्य करते हैं, मैं नारी अधिकारों की बात करते हुए दुनिया के सभी धर्मों में वर्णित स्त्री विरोधी श्लोकों की आलोचना करती हूं। नारी विरोधी संस्कृति और कानून समाप्त होने चाहिए। जब धर्म की आलोचना करती हूं तो सारे धर्मों की करती हूं, ऐसा नहीं कि अपने आत्मीय और परिजनों के धर्म इस्लाम को अलग रख कर करती हूं।
रुश्दी और फिदा हुसेन की तरह मुझे नाम, यश, ख्याति प्राप्त नहीं है। उनके साथ मेरा नाम नहीं लिया जाना चाहिए। जिस तरह लंबे समय तक मैंने धर्मांध और ताकतवर सरकार के अत्याचार सहन किए हैं, वैसा इनमें से किसी ने नहीं सहा है। जिस तरह बेघर अवस्था में, अनिश्चय और अभाव में, अकेली, खुद को बचाने के लिए विदेश में रह कर दिन पर दिन संघर्ष करना पड़ रहा है- अगर कोई साथ है तो वह मेरा आदर्श और विश्वास, जिसके बल पर संघर्ष करती जा रही हूं- वह सब नजरअंदाज करने की चीज नहीं है। रुश्दी या हुसेन को ऐसी असहनीय स्थिति में कभी दिन नहीं गुजारने पड़े।
उन दोनों की रचनाओं के प्रति असीम श्रद्धा रखते हुए मैं कह रही हूं कि इन दोनों पुरुषों के साथ कोष्ठक में मेरा नाम रखना उचित नहीं है। धर्ममुक्त, विषमतामुक्त, समान अधिकारयुक्त समाज की रचना के लिए मैं जो संघर्ष कर रही हूं, वह अगर किसी को नहीं दिखाई देता तो वह चाहे जितना बड़ा शिल्पी क्यों न हो, मेरे आदर्श के करीब आने की उसमें कोई योग्यता नहीं है।
((जनसत्ता से साभार))
एक भारतीय
February 28, 2010 at 12:10 pm
लाजवाब लेख है. हिम्मत है जो मकबूल फिदा हुसैन और अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थक तसलीमा के सवालों का जवाब दें। बताएं कि क्यों नहीं उन्होंने इस्लाम के अराध्य देवों की नंगी तस्वीरें बनाई हैं? क्यों हिंदू देविओं और भारत माता की नंगी तस्वीरें ही बनाते हैं?
मिहिरभोज
February 28, 2010 at 12:31 pm
बहु खूब.. ये छापने केलिए साधुवाद…..
संजय ग्रोवर
February 28, 2010 at 4:46 pm
बहुत ज़रुरी लेख को आप नेट पर लाए, धन्यवाद। क्या संघी, क्या कम्युनिस्ट, क्या प्रगतिशील, क्या परंपरावादी, क्या हिंदू क्या मुस्लिम, सभी तरह के समर्थकों-विरोधियों को आंखें और दिमाग़ खोलकर इस लेख को पढ़ लेना चाहिए। कि कैसा होता है एक सही मायने में स्वतंत्र लेखक, क्या होता है संघर्ष, क्या होती है अभिव्यक्ति की छटपटाहट और क्या होता है तसलीमा होने का मतलब। ऐ बहादुर तसलीमा, हम तो तुम्हे सलाम करने लायक भी नहीं। हांलांकि हम इस लायक तो नहीं पर हो सके तो माफ़ कर देना हमे क्यों कि हम नहीं जानते कि हम सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं।
अर्कजेश
February 28, 2010 at 9:54 pm
ऐ बहादुर तसलीमा, हम तो तुम्हे सलाम करने लायक भी नहीं। फिर भी आपको सलाम करते हैं, अपनी नाकाबिलियत के बावजूद ।
जो आपने लिखा है उस पर हमें यकीन है । और इस लेख से और साफ हुआ तसलीमा होने का मतलब ।
शेखर मल्लिक
February 28, 2010 at 10:44 pm
मुझे यकीन है कि एक ना एक दिन हम सबको तस्लीमा आपा के प्रति असहिष्णुता का एहसास और शर्मिंदगी जरूर होगी. पुरुषप्रधान दुनिया में तस्लीमा जी का संघर्ष सचमुच कोई बयान करने वाली चीज नहीं बल्कि महसूस करनी की बात है. मुझे स्वयं एक लेखक और पुरुष होने के बावजूद वाकई अंदर से शर्म सी महसूस होती है जब भी तस्लीमा दीदी की बातें पढ़ता या सुनता हूँ. तस्लीमा आपा आप लड़ते रहो, सिर्फ उस अंतिम औरत के विश्वाश और हिम्मत के वास्ते.
aradhana
March 1, 2010 at 1:29 am
आपका आभार जो आपने यह लेख यहाँ प्रकाशित किया. तस्लीमा की बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ. जनसाधारण की भावनाओं से सिर्फ़ अपने फ़ायदे और नाम के लिये खिलवाड़ करने वाले रुश्दी और हुसैन जैसे लोगों से तस्लीमा की तुलना नहीं की जानी चाहिये. क्योंकि वे जो कुछ कहती हैं, वह उनके जीवन का सच है. और बिना किसी डर के वे पूरी ईमानदारी से अपने विचारों और सिद्धान्तों की लड़ाई लड़ रही हैं.
anjule
March 1, 2010 at 8:31 am
(क्या वे मोहम्मद को नंगा चित्रित कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते)…अपने वासुलों के लिए कभी हर ना मानने का जज्बा तसलीमा को रुश्दी और फिदा हुसेन से बड़ा बनती है.अपने जज्बातों के लिए वे डर बदर की ठोकरे भलें खा रही हों मगर एसे लोग ही हमारी उम्मीदों के दिए जला रखा है.फ़िदा कितने मतलब परस्त हैं ये बात २ रोज पहले ही साबित हो गया है.तसलीमा की बुक माने भी पढ़ी है मुझे तो कहीं नहीं लगा की इन चीजो को लेकर फतवा भी जरी किया जा सकता है बल्किं बहुत सारे बुक्स में इससे बहुत ज्यादे उल्टा सीधा लिखा है.मगर उन्हें देखने पड़ने वाला कोई नहीं कोई उनपे फतवा नहीं जरी करता..तस्लीम सलाम आपको.आपके जज्बे को …माफ़ी मत मांगना कभी …हमारी उम्मीदें हैं आपसे ..इन उम्मीदों को मत तोडना कभी…सलाम तसलीमा..सलाम…
प्राइमरी का मास्टर
March 1, 2010 at 3:28 pm
सच है तसलीमा और सलमान रश्दी की कोई तुलना नहीं हो सकती !
S K Sudhanshu
March 1, 2010 at 6:53 pm
भारत द्वारा तसलीमा को शरण न देना,
भारत के धर्मनिरपेक्षता पर काला धब्बा है।
फिदा हुसेन ने लक्ष्मी और सरस्वती यहां तक की भारत माता को नंगा चित्रित किया है!
क्या वे मोहम्मद को नंगा चित्रित कर सकते हैं?
कभी नहीं कर सकते।
फिर भी अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता के नाम पर, हम उन्हे सर आँखो पर बैठाने को तैयार है।
लेकिन वहीं तसलीमा की अभिव्यक्ती की स्वतंत्रता कहां गयी?
इसका जवाब हमारे भारत को देना होगा!
S K Sudhanshu
March 1, 2010 at 6:58 pm
तसलीमा…जय हो…….
Manoj
March 1, 2010 at 10:18 pm
हुसैन सही है या सलमान गलत, ये कभी न खत्म होने वाली बहस है, पर सवाल ये है कि खुद को उनसे अलग साबित करने के लिए तस्लीमा ने जिस भाषा का प्रयोग किया उसे किसी भी लिहाज में सही नहीं ठहराया जा सकता। क्या खुद को बेहतर व अलग साबित करने के लिए इस जानीमानी लेखिका को लफ्ज कम पड गए, जो उन्हें इस भाषा का प्रयोग करना पडा।
Pingback: Mohalla Live » Blog Archive » साहसी तसलीमा, फैशनेबल समझ और हुसैन की रे
Askho Chaturvedi
March 2, 2010 at 11:59 am
She is bloody publicity seeker and nothing i can’t imagine such a filthy writer can earn so much of name just because of continous publicity stunt.
Dipak 'Mashal'
March 4, 2010 at 4:17 pm
mind your language mr. fake name
विवेक कुमार
March 4, 2010 at 4:40 pm
अरे भाई आप तो धमकाने लगे हैं। धमकी मत दीजिए। यह वर्चुअल स्पेस है। यहां पर आप किसी को पकड़ नहीं पाएंगे। हो सकता है कि आप तसलीमा के भक्त हों, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि आप उनके लिए दूसरों को डराने धमकाने लगिएगा।
shahnaz ansari
March 2, 2010 at 5:13 pm
sach hai kise kee tulna kise sai nhi ho sakte tasleema is a great…
P.C.Godiyal
March 4, 2010 at 5:38 pm
यह भी नोट किया जाये कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी जो अपने धर्म की पता नहीं क्या-क्या महानताए गिनाते रहते है यहाँ इस लेख की टिपण्णी में एक भी नहीं फटका ! एक-आधा कायर कोई फटकेगा भी तो बेनामी होकर !
सुरेश
March 4, 2010 at 6:05 pm
तथाकथित बुद्धिजीवी कौन? संघी या वामपंथी? धर्म की महानताएं कैसी? कुछ तो साफ लिखा करो।
ab inconvinienti
March 4, 2010 at 8:50 pm
स्वच्छ बिरादरी कहाँ गई?
P.C.Godiyal
March 5, 2010 at 10:45 am
@ सुरेश,
बंधू , आपकी जिज्ञासा को जरूर शांत करता, अगर आपने इतनी हिम्मत दिखाई होती कि अपना ओरिजिनल ID यहाँ दिया होता ! मैं नकली ID को जबाब देने से बचता हूँ क्योंकि देखा गया है कि
आजकल जहांगीर और औरंगजेब की नाजायज संताने इस तरह के ID देकर लोगो को भ्रमित करते है और अपने को तुर्रमखां समझते है !
नत्थू गोदियाल
March 5, 2010 at 11:44 am
@गोदियाल मामा, उन्होंने पढ लिया, विश्वास न हो तो नीचे दिये लिंक पर 25वें कमेंटस में पढ लो
^^आत्महत्या करने में हिन्दू युवा अव्वल क्यों^^
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/under-shadow-of-death.html
Rakesh Kaushik
March 5, 2010 at 2:33 pm
इन्सान और इंसानियत को झकझोर देने वाले साहसिक आलेख के लिए आभार और धन्यवाद्
ghughutibasuti
March 5, 2010 at 4:53 pm
तसलीमा जी का लेख पढ़वाने के लिए आभार। अपने मूल्यों के लिए संसार का सामना करना बहुत बड़ी बात है। तसलीमा जी इसी कारण सराहनीय हैं।
यह भी सच है कि रुश्दी और हुसैन को इतना कष्ट नहीं सहना पड़ा।
तसलीमा जी हुसैन जी से जो प्रश्न पूछती हैं ठीक वही मैं भी मन ही मन पूछती रही हूँ।
घुघूती बासूती
सुरेश
March 5, 2010 at 5:30 pm
यहां तसलीमा के समर्थन और वाहवाही में जितने भी लोग उतरे हैं वो सभी के सभी हिंदू हैं। और दावे से कहा जा सकता है सकता है ज्यादातर स्वर्ण होंगे। इसे से आप सच और झूठ का अंदाजा और इन सभी वाहवाही करने वालों की सियासत समझ सकते हैं।
सुरेश चिपलूनकर
March 6, 2010 at 11:56 am
तसलीमा के एक लेख ने सभी “छातीकूट अभियानों” की हवा निकाल दी… अभी तक बेचारे, हुसैन और तसलीमा को एक पलड़े में रखकर तसलीमा को कोसते और हुसैन को महिमामण्डित करते रहते थे…। तसलीमा ने सिद्ध कर दिया कि वे महिला हैं इसीलिये अधिक पीड़ित हैं, जबकि रुश्दी और हुसैन पुरुष हैं इसलिये अपनी लम्पटता जारी रखे हुए हैं… चाहे माधुरी हों या तब्बू सब के साथ बुढ़ऊ इश्क फ़रमाने से बाज नहीं आये थे…। भगोड़ा बनकर पहुँचे भी कहाँ तो एक इस्लामी देश में… जहाँ अब हिम्मत हुई तो राजपरिवार की किसी कन्या का न्यूड चित्र बनाकर दिखायें…
@ सुरेश भाई – सुरेश नाम रख लेने भर से कोई हिन्दू तो नहीं हो जाता? तसलीमा के समर्थन में यदि सभी हिन्दू और सवर्ण उतरे हैं तो क्या विरोध करने वाले सभी लोग मुस्लिम और दलित हैं? क्या बात कर रहे हो यार…
चन्दर
March 5, 2010 at 6:15 pm
तसलीमा का कहना सही है। कुछ लोग पैदा ही औरों को परेशान करने के लिए ही होते हैं और ऐसे लोग जो इनके बचाव में आते हैं वे मूर्ख नहीं बदमाश होते हैं। हुसैन को वापस बुलाने की मांग सदन में उठी है…बुलाओ, अभी तमाम हिन्दू देवी-देवता बाकी हैं जो अपना अपमान होने का इन्तज़ार कर रहे हैं! देखें-http://cartoonpanna.blogspot.com/2010/03/blog-post_05.html
विवेक
March 6, 2010 at 2:29 am
तसलीमा ने बहुत साहस का काम किया है। यह लिख कर कि उनकी तुलना हुसैन और रुश्दी से नहीं की जाए उन्होंने अपने लिए एक और आफत मोल ली है। अंतरराष्ट्रीय कला और साहित्य जगत में उन दोनों की गहरी पैठ है। अब तसलीमा को उनके गुस्सा झेलना पड़ सकता है।
रेखा
March 6, 2010 at 5:45 pm
तस्लीमा को खारिज करना किसी के लिए मुमकिन नहीं। कोई स्त्रियों का विरोधी ही तस्लीमा को बेतुकी वजहों से खारिज करने की कोशिश कर सकता है।
abdul ansari
March 6, 2010 at 6:52 pm
कठमुल्लों की समझ में कभी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता आ ही नहीं सकती. आप सही लिखती हो तसलीमा. ये हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी कौम में यह कट्टरपंथी गहरे तक घुस गये हैं. अब काफिर कौन है, खुद अंदाजा लगाईये. मीठा-मीठा गप, कडुवा-कडुवा थू कहने वाले कभी सही बात न तो कह सकते हैं और न लिख सकते हैं. काश कि हमारी बिरादरी में चौथाई लोग खुले दिमाग के हो जायें.
करिश्मा कुमारी
March 8, 2010 at 5:43 pm
एक ओर साहब लोग हुसैन की तस्वीरों का अर्थ समझा रहे हैं. अपने-अपेन हिसाब से अर्थ समझा कर उन्हें बहुत बड़ा चित्रकार साबित कर रहे हैं. दूसरी ओर तसलीमा को कठघरे में खडा़ कर रहे हैं. यह कहने के बाद भी कि मेरी तुलना हुसैन और सलमान रुश्दी से नहीं की जाए, तुलना पर तुलना कर रहे हैं. इससे पता चलता है कि इस मर्दवादी समाज में स्त्रियों को अभी बहुत चुनौतियां झेलनी हैं. तसलीमा को बहुत बहुत साधुवाद
madhuri singh
August 30, 2011 at 4:27 pm
Bilkul sahi. Kya swatantrata ek dharm ke khilaf likhne ya chitrit karne mein hai