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इतिहास के आईने में पेंटिंग्स की तरह ही नंगे हैं हुसैन

करीब ढाई हज़ार साल पहले यूनान के दार्शनिक सुकरात को जब ज़हर पीने की सज़ा दी गई तो उनके साथियों ने जेल से उन्हें भगाने की योजना तैयार कर ली थी। योजना के मुताबिक जेल में तैनात सुरक्षाकर्मियों को रिश्वत देकर सुकरात को भगा ले जाना था। लेकिन सुकरात ने भागने से इनकार कर दिया। जब उनके साथी क्रीटो ने इसकी वजह पूछी तो सुकरात ने कहा कि जन्म से लेकर बुढ़ापे तक उन्हें अपने वतन, वहां की मिट्टी और वहां के समाज से प्यार रहा। यहीं उनके शिष्य बने। यहां बहुत से लोगों ने उन्हें प्यार दिया। और आज जब उनके देश में उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया जा रहा है और वो मृत्यु के डर से भाग जाएं यह मुमकिन नहीं। ऐसा करना देश के साथ गद्दारी होगी। अपनी सोच और कर्मों के साथ धोखा होगा। वह वतन, समाज और अपने विचारों को धोखा देने से बेहतर मृत्यु को गले लगाना समझते हैं। यह सभी जानते हैं कि उसके बाद सुकरात ने विष का प्याला हंसते-हंसते पीया। सुकरात का बलिदान अपने विचारों के प्रति समर्पण का प्रतीक है। और यही वजह है कि आज सुकरात के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने वालों को कोई याद नहीं करता लेकिन उन्हें पूरी दुनिया याद रखे हुए है।

अब हम आज के दौर के एक चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन की चर्चा करते हैं। आज़ादी के बाद इस देश ने एम एफ हुसैन को बहुत कुछ दिया है। 1955 में उन्हें 40 साल की उम्र में पदमश्री सम्मान दिया गया। तब हुकूमत कांग्रेस की थी और जाहिर है तब की सरकार ने कला के क्षेत्र में उनके योगदान को पहचान लिया था। उसके बाद 1973 में उन्हें पदमभूषण सम्मान से नावाजा गया। 1986 में बतौर चित्रकार उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। 1991 में उन्हें पदमविभूषण सम्मान दिया गया। हुसैन को इस देश में जितना सम्मान मिला उतना सम्मान शायद ही किसी चित्रकार या फिर मूर्तिकार, शिल्पकार को मिला हो। भारत रत्न की मांग भी की जा चुकी है। और जब तक सम्मान पर सम्मान मिलते रहे हुसैन को कोई आपत्ति भी नहीं हुई। न ही उनके चाहने वालों को। इस लिहाज से देखें तो 1915 से लेकर 1991 तक जीवन के 76 साल हुसैन ने शान से बिताए। कहीं कोई विवाद नहीं। कोई विरोध नहीं। सामाजिक और कानूनी स्तर पर कोई बाधा नहीं। लेकिन फिर हालात तेजी से बदले।

80 के आखिरी और 90 के शुरुआती वर्षों में दो धाराएं सिर उठा रही थीं। हिंदुत्व के भीतर ब्राह्मणवादी व्यवस्था और सवर्णों के तानाशाही के ख़िलाफ़ पिछड़ी जातियां एकजुट हो रही थीं। तो मुसलमानों के विरुद्ध हिंदू कट्टरपंथी लामबंध हो रहे थे। एक तरफ़ हजारों साल पुरानी जातीय गुलामी की चूलें हिल रही थीं। दूसरी तरफ़ धार्मिक कट्टरता की जड़ें गहरी हो रही थीं। उस दौर की यही हक़ीक़त थी – उत्थान और पतन साथ-साथ।

जातीय संघर्ष पर चर्चा फिर कभी। अभी बात धार्मिक उन्माद की। उसी उन्माद में 1992 में हिंदू कट्टरपंथियों ने बाबरी मस्जिद ढाह दी। पूरे देश को दंगों की आग में झोंक दिया। उसके बाद 93 के बम धमाके और फिर हिंसा का दौर। थोड़े दिन माहौल सुधरा लेकिन 2002 में गुजरात दंगों को सभी ने देखा। धार्मिक उन्माद और खूनी दंगों की वजह से बीते दो दशकों को भुला पाना आसान नहीं।

उसी दौर में कट्टरपंथी हर वो विवाद चुन-चुन कर उठा रहे थे जिनसे बंटवारा गहरा हो सके। हुसैन के विवादित चित्र भी तभी सामने आए। हंगामा शुरू हो गया। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन। हुसैन के घर पर हमला। दर्जनों मुकदमें। यह सब इन्हीं दो दशकों में हुआ।

इसी दौरान दुनिया में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में हुसैन का भाव आसमान चढ़ने लगा। विवाद से पहले उनकी पेंटिंग्स 50 हज़ार डॉलर के आसपास बिकती थीं। अब उन्हीं पेंटिंग्स की कीमत बढ़ने लगी। खुद हुसैन ने अपने चित्रों की नीलामी के लिए न्यूनतम राशि बढ़ा कर एक लाख डॉलर कर दी। विवाद जितना बढ़ा, हुसैन की कीमत भी उतनी ही बढ़ी। कुछ साल पहले 2005 में हुसैन की सबसे महंगी पेंटिंग – इम्पटी बॉउल एट द लास्ट सपर – करीब 20 लाख डॉलर में बिकी। यह ईसाई मिथक पर आधारित है। उनकी दूसरी महंगी पेंटिंग है – बैटल ऑफ ऑफ गंगा-यमुना। यह हिंदू धार्मिक ग्रंथ महाभारत पर आधारित है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदू और ईसाई धर्म के मिथकों को कैनवास पर उकेर कर हुसैन ने बहुत कुछ हासिल किया है। पैसा, नाम, शोहरत – उन्हें काफी कुछ मिला है।

लेकिन धार्मिकों मिथकों पर आधारित पांच चित्र और भारतमाता का एक चित्र यानी कुल छह चित्र ऐसे हैं जो विवाद में हैं। इनमें सरस्वती, दुर्गा, सीता, लक्ष्मी, गंगा, यमुना समेत भारतमात्रा नंगी दिखाई गईं हैं। न केवल नंगी बल्कि सीता को रावण की जांघ पर बिठाया गया है, बगल में हनुमान नंगे हैं। गणेश के सिर पर नंगी लक्ष्मी हैं। यह सब कलाकार की नज़र में सिम्बल हो सकते हैं, लेकिन एक आम आस्तिक हिंदू की नज़र में देवी-देवताओं का अपमान भी हो सकता है। ऐसे में इस पूरे विवाद के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए? क्या इस हालात के लिए हुसैन की भी कोई भूमिका बनती है या नहीं? ये कुछ सवाल हैं जिन पर चर्चा होनी ही चाहिए। चर्चा इस पर भी होनी चाहिए कि जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई हुसैन देते हैं, जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी ने हुसैन को बहुत कुछ दिया भी है – क्या वो उस हक़ को, उस आज़ादी को महफूज रखने के लिए उतने ही प्रतिबद्ध और जिम्मेदार दिखते हैं या नहीं?

इन कसौटियों पर जब हुसैन के कृत्यों को तोला जाता है तो वो अपनी विवादित पेंटिंग्स की तरह ही नंगे दिखाई देते हैं। एक मौकापरस्त, लालची और बेईमान कलाकार नज़र आते हैं। ऐसा कलाकार जो चर्चा में बने रहने के लिए हर हथकंडे अपनाना चाहता है। विवादित चित्रों को बार-बार गैलरियों में सजाता है। लेकिन वही हथकंडे जब भारी पड़ते हैं तो भागने लगता है।

हुसैन का यही चरित्र है। भूख, गरीबी और सामाजिक बुराइयों से ज़्यादा उन्हें सितारों की कामुकता आकर्षित करती है। इमरजेंसी के दौरान जब आज़ाद खयाल लोगों का दमन हो रहा था तब हुसैन निजी आज़ादी सुरक्षित रखने के लिए सरकारी भांट बन जाते हैं। इंदिरा गांधी की पेंटिंग्स बनाने लगते हैं। दुर्गा के तौर पर पेश करने लगते हैं। अपने धर्म को हल्की सी ठेस पहुंचने पर तुरंत सफाई देने वाले हुसैन दूसरे धर्मों में यकीन रखने वालों को ठेस पहुंचाने पर माफी मांगने में हेठी समझते हैं। एक इशारे पर हुसैन को दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश नागरिकता दे सकते थे, लेकिन वो एक इस्लामिक देश की तरफ़ से नागरिकता का प्रस्ताव मिलने पर खुद को धन्य समझते हैं। जीवन भर कांग्रेस सरकार से तलवे चाटने और तोहफे वसूलने के बाद जब हालात विपरीत होते हैं तो उसी कांग्रेस की सरकार को भोकुस और कायर बताने लगते हैं।

यहां हुसैन से पूछना चाहिए कि वो खुद क्या हैं? क्या वो खुद कायर नहीं हैं? जीवन भर वतन से सभी सम्मान हासिल करना और मुश्किल परिस्थितियों में वतन छोड़ कर दूसरे देशों की गोद में जाकर बैठ जाना – क्या कायरता की निशानी नहीं है? फिर एक कायर को यह वतन सम्मान क्यों दे? हुसैन बीते चार साल से अपने उम्र की दुहाई दे रहे हैं। कह रहे हैं कि इस उम्र में जगह-जगह घूम कर मुक़दमा लड़ना मुमकिन नहीं। लेकिन एक जगह तो मुक़दमा लड़ा ही जा सकता है। अगर उन्होंने किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाया है तो फिर अदालत के सामने खुद को बेकसूर साबित करने से बचना क्यों चाहते हैं?

दरअसल, हुसैन को अंदाजा है कि जब अदालत में उनके चित्रों का मूल्यांकन होगा तो शायद वो भावनाएं भड़काने के आरोपों से बच नहीं सकें। जिस कानून की आड़ में उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी का तुल्फ़ उठाया है, अब उसी कानून का डर उन्हें सता रहा है। वो चाहते थे कि उन पर लगे सारे मुक़दमे रद्द कर दिए जाएं और सरकार अपने खर्च पर उन्हें सुरक्षा मुहैया कराए और उनकी हिफाजत का भरोसा दे – तभी वो वतन लौटेंगे। कोई भी सरकार सुरक्षा का वादा तो कर सकती है। लेकिन किसी को कानून की देवी के सिर पर नहीं बिठा सकती। किसी भी शख़्स के लिए किसी भी सरकार की तरफ़ से इस तरह का वादा करना मुमकिन नहीं था। और सरकार की इसी मजबूरी की आड़ में हुसैन ने भारत को फासीवादी ठहराने का मौका ढूंढ लिया। वतन के सम्मान को गैर मुल्क में गिरवी रख दिया। जीवन भर ऐशोआराम भोगने वाले हुसैन उम्र की आखिरी दहलीज पर भी वैभव का मोह त्याग नहीं सके और देश की अस्मिता का सौदा कर गए।

मकबूल फिदा हुसैन के पक्ष में दलील देने वाले अक्सर कहते हैं कि विवादित चित्रों से सिर्फ़ चंद कट्टरपंथी हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है। यह दावा भी हुसैन के दावे जैसा ही है। जो कहते हैं कि हिंदुस्तान की 90 फीसदी जनता उन्हें प्यार करती है। कायदे से हुसैन और उनके समर्थकों को एक सर्वे कराना चाहिए ताकि तस्वीर साफ हो सके। क्योंकि वो जो कहते हैं अगर उसमें ज़रा भी दम होता तो सरकार 90 फीसदी जनता को नाराज़ करने का जोखिम नहीं उठा सकती थी।

आखिर में, अभिव्यक्ति की आज़ादी एक लुभावना जुमला है। हुसैन जैसे बहुत से लोग इसे मुनाफ़ा कमाने के लिए एक जुमले का इस्तेमाल करते हैं। जबकि बहुत से लोग पूरी आस्था के साथ इस आज़ादी को हासिल करने के लिए क़ीमत चुकाते हैं। क़ीमत चुकाने वालों के बारे में जानना है तो दिल्ली, कतर, लंदन और न्यूयॉर्क से थोड़ा दूर हटो… भारत के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों की तरफ़ रुख करिए। पता चलेगा कि अभिव्यक्ति कितनी आज़ाद है।

जिस देश में पत्रकार सीमा आज़ाद और उनके पति को सरकार के विरुद्ध लिखने पर माओवादी बना कर जेल में ठूंस दिया जाता हो, जहां धर्म की निंदा से जुड़ा एक लेख छापने पर स्टेट्समैन के संपादक और प्रकाशक को कैद कर लिया जाता हो… जहां एक कार्टून छापने पर हिंदी संपादक को गिरफ़्तार कर लिया जाता हो… जिस देश में सूचना मांगने पर लोग क़त्ल कर दिए जाते हों। ऐसे देश में हुसैन ने सच में अभिव्यक्ति की आज़ादी का सुख भोगा है। अगर कोई यह कहता है कि उन्होंने क़ीमत अदा की है तो वो झूठ बोल रहा है क्योंकि जब क़ीमत चुकाने की बारी आई तो वो पीठ दिखा गए।

सच यही है कि किसी सरकार ने हुसैन ने देश निकाला नहीं दिया। ऐशोआराम में कोई खलल नहीं पड़े, इस इरादे से यह निर्वसन खुद मकबूल फिदा हुसैन ने चुना है। ऐसे मकबूल फिदा हुसैन और उनके नाम पर छाती कूटने वाले और उन्हें खुदा बनाने वाले धन्य हैं।

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14 Responses to इतिहास के आईने में पेंटिंग्स की तरह ही नंगे हैं हुसैन

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    March 3, 2010 at 4:58 pm

    हुसैन के खिलाफ मुकदमे का सच क्या है ? 26 फरवरी के जनसत्ता में पृष्ठ 7 पर छपी खबर में छपा है कि

    “केन्द्रिय गृहसचिव जीके पिल्लई ने कहाः एमएफ हुसेन के खिलाफ कोई मामला नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ सभी मामालों को निरस्त कर दिया है।”

    इस बयान की क्या सच्चाई है ? यदि यह सच है तो सभी वेबसाइटों और ब्लागों पर मुकदमों को लेकर इसके विपरीत बातें क्यों कही जा रही हैं ?

  2. Neeraj Bhushan Reply

    March 3, 2010 at 4:58 pm

    Can I do something for Husain? Can I embrace him? I think, I can.

    I welcome him to my home, promising safety, comfort and the right atmosphere to paint.

    May he feel it fit and proper to live at my house and also to make it his workplace.

  3. भारत अनजान Reply

    March 3, 2010 at 6:10 pm

    बचपन में भारत में हर किसी को सिखाया जाता है कि धार्मिक होना बुरा नहीं, कट्टर होना बुरा है. मुझे भी सिखाया गया था कि अपने धर्म को ज़रूर मानो, लेकिन दूसरों के धर्म का भी पूरा सम्मान करो क्योंकि जो महत्व तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म का है, वही दूसरों के लिए उनके धर्म का. बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि अधिकारों के साथ कर्तव्य जुड़ा है. मुझे भी सिखाया गया था कि अपने अधिकार ज़रूर मांगो लेकिन यह भी देखो कि तुम्हारा कर्तव्य क्या है. हो सकता है कि एमएफ़ हुसैन के अंदर का चित्रकार अभिव्यक्ति के उद्गार के लिए विचलित हो रहा हो तो उनकी कूची ने किसी नग्न मूर्ति को तराश दिया हो. लेकिन एक सम्मानित और तथाकथित ज़िम्मेदार व्यक्तित्व से यह अपेक्षा भी ज़रूर की जानी चाहिए कि वह अपनी मचलती भावनाओं को भरभरा कर फैला देने से पहले यह सोच लेता कि उसका कैनवस इस बार आंखों को ठंडक पहुंचाने वाली कोई शीतल पेंटिंग नहीं तैयार कर रहा, बल्कि उसकी प्रयोगशाला में नफ़रत का ऐसा सीसा तैयार हो रहा है, जो पता नहीं कितने ही लोगों के दिलों को गोद देगा.
    समरेंद्र ने एक बेहद नाज़ुक मुद्दे पर एकदम सीधी बात कही है, जिसकी हिम्मत, मैं नहीं समझता, आज के तथाकथित बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध भारतीय तबक़े में और कहीं होगी. हुसैन की तारीफ़ करने और उनके लिए आहें भरने वालों की कोई कमी नहीं, जो समझते हैं कि ऐसा करके वे उस श्रेणी में शामिल हो जाएंगे, जहां उन्हें “समझदार” समझा जाएगा. दरअसल यह उनकी कमअक़ली है. मैं उन लोगों को भी न्यूनतम समझ वाला समझता हूं, जो यह दलील देते हैं कि हुसैन ने अपने धर्म की नग्न अभिव्यक्ति क्यों नहीं की और डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के पक्ष में क्यों नहीं उठ खड़े हुए. मेरे एक साथी हैं, जो इसे निगेटिव ऊर्जा करते हैं. मैं उन्हें सही समझता हूं.
    हुसैन वाक़ई में मौक़ापरस्त महसूस होने लगे हैं. उनके बारे में मैंने कभी कोई राय तैयार नहीं की थी क्योंकि मैं ख़ुद को कला और पेंटिंग के मामलों में अज्ञानी समझता था, समझता हूं. लेकिन बात कला की नहीं, उसके ग़लत इस्तेमाल की हो रही है. मौक़ापरस्त इंसान की हो रही है.
    मेरे नज़रिए से भी यह मौक़ापरस्ती है. देश के देवी देवताओं को उघाड़ कर करोड़ों, अरबों रुपये कमाने के बाद देश से बेवफ़ाई हुई है. मैं ख़ुद बरसों से भारत से बाहर हूं लेकिन भारतीय कहा जाना जो सम्मान और गर्व देता है, वह कुछ और नहीं दे सकता.
    भारत से बाहर इस देश में ऐसे भारतीयों को भी जानता हूं, जो 30-30 बरसों से यहीं रह रहे हैं. नागरिक बनने की शर्तें दशकों पहले पूरी कर चुके हैं लेकिन भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी है. ऐसी ही एक महिला से हाल में मुलाक़ात हुई, जो 38 साल से एक यूरोपीय देश में रह रही हैं. घर परिवार, शादी ब्याह सब कुछ भारत से बाहर. मैंने पूछा कि भारत का पासपोर्ट रखना तो मुश्किल भरा होता है, कहीं जाने के लिए वीज़ा लेना पड़ता है, हाल के दिनों में जांच का दायरा भी बढ़ गया है, आप इस अमुक देश की नागरिकता क्यों नहीं ले लेतीं. उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि प्रकृति ने मुझ पर सबसे बड़ा अहसान यही किया है कि मुझे भारत का नागरिक बनाया है, मैं क्या अहसानफ़रोस बन जाऊं. काश, हुसैन यहां होते और मुझे मौक़ा मिलता तो उन्हें इस भारतीय से मिलवा देता.

  4. समरेंद्र Reply

    March 3, 2010 at 6:54 pm

    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हुसैन के ख़िलाफ़ केवल तीन मामले हैं। वो भी दिल्ली की निचली अदालत में। बाकी को अदालतों ने खारिज कर दिया है। द हिंदू पर छपी इस रिपोर्ट में इसका कुछ ब्योरा दिया हुआ है। http://beta.thehindu.com/news/national/article113782.ece

    वैसे भी यह एक अदालती प्रक्रिया है। बहुत से लोग कानून का इस्तेमाल लोगों को परेशान करने के लिए, मानसिक उत्पीड़ देने के लिए करते हैं। हुसैन के मामले में भी कट्टरपंथियों ने यह साजिश रची है। लेकिन उसकी काट भी कानून में मौजूद है। हुसैन कोई छोटे आदमी नहीं हैं। वो चाहें तो कानून के रास्ते ही इनका जवाब दे सकते हैं। और देशहित में यह सही होता। एक बार वो लड़ कर खुद को सही साबित कर देते तो मामला ख़त्म हो जाता। उसके बाद फिर कोई उन्हें तंग करने की हिम्मत नहीं जुटाता। जहां तक सुरक्षा की बात है। सरकार भरोसा दे ही रही। लेकिन बात सहूलियत की है। बात कानून से ऊपर उठने की है। अब हुसैन जैसे ताक़तवर और बड़े लोग भागने की राह चुनेंगे तो निचले स्तर पर लड़ रहे आर्थिक और सामाजिक हैसियत में कमजोर लोगों के पास क्या उपाय बचेगा?

  5. प्रभात शंकर Reply

    March 3, 2010 at 9:05 pm

    ek achhe lekh ke liye badhai samarendra…..

  6. shobharam Reply

    March 3, 2010 at 9:35 pm

    samrendraji dho dala. agar apka lekh hussain sahab padhenge to allah se ye hi gujarish karenge ki jindgi ki antim saans apne watan me hi nikle. vese jise apne watan se pyar nahi wo kahin bhi rahe isse koi fark nahi padta.

  7. हुसैन जी पर यह लेख आपकी गहरी व पारखी नजर का द्द्योतक है. आपके द्वारा चिन्हित सभी बिन्दू सटीक व सही हैं. जितना उन्होनें इस देश को दिया है उससे कहीं अधिक उन्होंने यहां से पाया है फ़िर भी उनकी ललक व भूख नहीं मिटी और उन्होंने यहां के देशवासियों के दिलों को बार बार ठेस पंहुचाई है.

    आपने सही लिखा उन्हें यहां की गरीबी व भूख व अन्य समस्याऎं नजर नहीं आई अपितु उनकी कैन्वास पर सिर्फ़ चमकीले और ऐसे रंग उभरते रहे जो एक आम आदमी की समझ से काफ़ी दूर हैं.. और उन्ही पर उन्हें सम्मानित भी किया गया.

  8. अनुनाद सिंह Reply

    March 5, 2010 at 5:10 pm

    हुसेन ‘सच्चे भारतीय कम्युनिस्ट’ साबित हुए।

  9. shirish khare Reply

    March 5, 2010 at 7:24 pm

    एक कड़वी सच्चाई है, जिसे छिपाया जा रहा था. आपने सरेआम उजागर किया. आपकी बातों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.

    तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा हुसैन और तसलीमा को लेकर जिस तरह से दो तरह के पैमाने अपनाए जा रहे हैं, उससे आम जानता में उनका भरोसा डूबने की कगार तक पहुँच चुका है. अब मुश्किल यह कि आपने जैसे ही हुसैन के खिलाफ अपने तर्क रखने शुरू किए, आपको कहा जाएगा आप अज्ञानी है, फिर कहा जाएगा आप संघी हैं या हिन्दू हैं वगैरह. तो इनके हिसाब से केवल हुसैन के खिलाफ जाने का मतलब है संघी बन जाना. इस आधार पर अगर उनके तसलीमा के खिलाफ जाने को अगर नारीविरोधी कहा जाए तो कैसा लगेगा! यह तो आजकल के प्रगतिवादियों की प्रगतिशीलता है. यानी आप उनके हिसाब से उनके तर्कों को आगे बढाओ तब तक तो ठीक है, अन्यथा ऐसी की तैसी आपकी. तो अगर लाठियों को छोड़ तो इनमें और बजरंगियों में कोई ज्यादा फर्क नहीं दिखता है. अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा तो इनदिनों यही हो गया है कि आपने कट्टरपंथियों के खिलाफ कुछ बोला तो पिटाई होगी और अपने को बुद्धिजीवियों समझने वालों से अलग कुछ बोला तो अछूत बना दिया जाएगा.

  10. विवेक Reply

    March 6, 2010 at 2:30 am

    ठीक ऊपर लगी पेंटिंग में हिटलर की तरह ही नंगे हैं हुसैन। अब तो उनके नाम से चिढ़ सी होने लगी है।

  11. अभय तिवारी Reply

    March 6, 2010 at 8:17 am

    पौलिटिकली करेक्ट होने का मोह-संवरण छोड़ कर एक अच्छा विश्लेषण किया है आप ने! सेकुलरिज़्म के उत्साह में भाई लोग हुसैन को सर पर बिठा ले रहे हैं..
    आप की बात से सहमति के बावजूद मैं समझता हूँ कि उन्हे अपनी अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी होनी चाहिये.. जो उन्हे अब तक मिली हुई है.. या थी..
    जैसे डेनिश कार्टूनिस्ट को मुहम्मद का स्केच बनाने की आज़ादी है और सलमान रुश्दी को सैटैनिक वर्सेज़ लिखने की .. उसी तरह की आज़ादी हुसैन को भी मिलनी चाहिये.. ये मेरी राय है.. मगर सवाल ये भी है कि इन दूसरे मामलों में सरकार और हुसैन के समर्थको का क्या रुख़ है?

  12. vishnu Reply

    March 6, 2010 at 11:34 am

    समरेंद्र जी आप सही कह रहे हैं, जिस अभीव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते है, उसी में एक बात यह भी कही जाती है, अभीव्यक्ति एसी हो जिससे किसी जाति विशेष की भावना को ठेस नहीं पहूंचे। लेकिन हुसैंन सहाव ने जीभर के ठेस पहुंचाने का काम किया। मुझे आज तक ये बात नहीं समझ में नहीं आती कि इस कलाकार को सिर्फ देवी देवता की पेटिंग्स में ही क्यों कला दिखाई देती है,जबकि हमारे आप-पास इतना कुछ पेटिंग करने के लिए है। मुझे कोई मलाल नहीं है कि अब वो हिंदुस्तान के नागरिक हैं, हिंदुस्तान ने हैसेन नहीं खोया है, बल्की एसएफ हुसैन ने हिंदुस्तान खो दिया है। और ये उनकी बदकिस्मती है। यहां एक बात और में कहना चाहुंगा कि जिस देश (क़तर) में उनको नागरिकता दी है, तो क्या वो उस देश के भी देवी-देवताओं की भी पेंटिंग्स बनाए कि हुम्मत एमएफ हुसैन जुटा पाएंगे।

  13. Sanjeet tripathi Reply

    March 9, 2010 at 1:01 am

    samrendra jee, phali baar, pahli baar aapki lekhni se bahut hi andar tak prabhavit hua, ekdam dhansu, binshaq, kabhi ambarish kumar jee se bat ho to mere bare me jankari aap le sakte hain……

  14. अजित वडनेरकर Reply

    March 9, 2010 at 5:04 am

    अच्छा लिखा है समरेन्द्र।
    यही कहूंगा कि विवाद के लिए हमें हुसैन याद रहते हैं जिसके खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं। जो हैं वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनाकर्म से जुड़े हैं। क्या हमें शर्म आती है कि जिस शक्तिकपूर की हक़ीक़त कास्टिंग काऊच में सामने आती है, कुछ महीनों में हम कॉमेडी शो में उसकी बेशर्म हंसी में साथ देते हुए अपनी जांघें और बगलें खुजाते हुए खुद के हास्यप्रिय होने का सबूत पूरे परिवार को देते नज़र आते हैं?

    दुर्घटना में दिवंगत एक विवादास्पद नेता के पेज-थ्री पुत्र जब बाप की मौत के चंद रोज भीतर माननीय सांसद के लिए तय बंगले में भारतीय करेंसी की बत्ती बनाकर, उसमें नशीला पाऊडर भरकर पीने के बाद पहले अस्पताल, फिर सीखचों में पहुंचते हैं। इस कांड में एक मौत भी होती है। हमें उनकी करतूतें याद रहते हुए भी याद नहीं रहतीं और उनकी नई करामातें, नए अवतार देखने की एक और बेशर्म होड़ में हम सब शरीक होते हैं।

    क्या ये हुसैन के गुनाह से बड़ा गुनाह है? कभी इस पर हम लिखेंगे? क्या इसकी भर्त्सना होगी?
    तुमने यक़ीनन बहुत अच्छा, तार्किक और सुलझा हुआ पक्ष रखा है। मैं एक अलग आयाम पर सोच रहा था। यहां आने में देर हो गई, पर यह विचार यहीं दर्ज कर रहा हूं।
    शुभकामनाएं
    जैजै

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