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संयम और शांति से काम लें तसलीमा

आस्था के प्रश्न ने कर्नाटक के दो शहरों – हसन और शिमोगा – को हिला दिया। परदे के सवाल पर विक्षुब्ध मुसलमान प्रतिवादियों ने जगह-जगह जुलूस निकाले और पुलिस को गोली चलानी पड़ी। दो आदमी मारे गए और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा। सरकार का कहना है कि स्थिति शांत हो चुकी है। दोनों शहरों में पुलिस के अलावा केंद्रीय बल तैनात हैं। पुलिस ने दो अखबारों पर, तसलीमा नसरीन पर तथा कुछ और लोगों पर केस दायर कर दिया है। जैसा कि होता है, दो-चार दिनों में माला रफा-दफा हो जाएगा। प्रश्न है, इस घटना से हासिल क्या हुआ?

तसलीमा नसरीन के जिस लेख को कन्नड़ भाषा के दैनिक कन्नड़ प्रभा ने छापा है, वह इंटरनेट से उठाया हुआ है। तसलीमा ठीक कहती हैं कि उन्होंने किसी भी कन्नड़ दैनिक के लिए कभी कोई लेख नहीं लिखा। लेकिन इंटरनेट पर इस्लाम से जुड़े सवालों तथा अन्य अनेक मुद्दों पर उनके लेख सहजता से उपलब्ध हैं। इंटरनेट की सामग्री को स्वामित्वविहीन माना जाता है और हर कोई उसका मुफ्त इस्तेमाल कर रहा है। सो कन्नड़ प्रभा ने भी तसलीमा का एक लेख वहां से लिया और कन्नड़ में अनुवाद कर उसे छाप दिया। फिर एक उर्दू दैनिक सियासत ने इसकी आलोचना करते हुए अपने यहां उसके कुछ अंश प्रकाशित कर दिए। अभी तक यह सामने नहीं आया है कि किसने क्या छापा। लेकिन अनुमान किया जा सकता है कि कन्नड़ प्रभा ने परदा प्रथा की वांछनीयता पर बहस शुरू करने के लिए ही तसलीमा का लेख छापा होगा। अनुमान यह भी किया जा सकता है कि उर्दू दैनिक सियासत की मंशा बहस को रचनात्मक स्तर पर आगे बढ़ाने की नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज को उत्तेजित करने की रही होगी।

इस तरह की यह पहली घटना नहीं है। तसलीमा नसरीन के लिए तो यह पता नहीं कौवीं घटना होगी। तसलीमा नास्तिक हैं। ईश्वर, धर्म, नमाज, रोजा आदि में उन्हें यकीन नहीं है। मुस्लिम धर्मग्रंथों की उन्होंने इस कोण से कटु आलोचना की है कि वे स्त्री की पराधीनता को बढ़ाते हैं और समाज में अंधविश्वास फैलाते हैं। अपने इन्हीं विचारों के कारण उन्हें अपनी मातृभूमि छोड़नी पड़ी और लगभग दो दशकों से दुनिया भर में मारी-मारी फिर रही है। उन्होंने भारत की नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदन कर रखा है। लेकिन भारत सरकार हिचक रही है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं और तसलीमा को भारत की नागरिकता देने से वे असंतुष्ट हो सकते हैं। बेशक सरकार का काम केवल अशांति रोकना नहीं है। उसका काम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है। भारत में स्वतंत्र बहस की बहुत लंबी परंपरा रही है। फिर, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मायने क्या रह जाएंगे, अगर लोगों को अपनी बात निर्भय हो कर कहने की आजादी नहीं होगी?

इस दृष्टि से मुसलमान ही नहीं, अन्य समुदायों के भी भाई-बहनों को समझना चाहिए कि बात-बात पर उत्तेजित होना उन्हें शोभा नहीं देता। संसार में कोई धर्म ऐसा नहीं है जिसका विकास नहीं होता रहा है तथा जिसमें अनेक मत न हों। ईसाइयत और हिन्दू धर्म की पता नहीं कितनी शाखाएं और उपशाखाएं हैं। स्वयं इसलाम के भीतर भी अनेक पंथ और शाखाएं हैं। अलग-अलग मुस्लिम देशों में अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसलिए कुरान वास्तव में क्या कहता है और क्या नहीं? कुरान और हदीस के बीच मतभेद हो, तो सच्चे मुसलमान का कर्तव्य क्या है? कई शताब्दियों से मुस्लिम समाज में जो प्रथाएं चल रही हैं, आज उनका औचित्य क्या है? आदि सवालों पर विचार-विमर्श जारी रहना चाहिए। ऐसे धर्माधिकारियों को सफल होने देना स्वयं मुस्लिम समाज के हित में नहीं है जो इस्लाम को एक ठहरी हुई जीवन व्यवस्था बनाना चाहते हैं। अगर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, मिस्र आदि मुल्कों में इस्लामी जीवन पद्धति के विविध पहलुओं पर गंभीर तथा कुछ हद तक कर्कश बहस जारी रह सकती है, तो भारत इस बहस से अछूता क्यों रहे?

दूसरी ओर, जो लेखक और बुद्धिजीवी इस्लाम की कुछ चीजों से सहमत नहीं हैं, उन्हें भी धार्मिक प्रश्नों पर तीव्र संवेदनशीलता को आंख-ओट नहीं करना चाहिए। धर्म का मामला बहुत ही नाजुक होता है और छोटी-सी बात पर भी बड़ा-सा उपद्रव खड़ा किया जा सकता है। यह सच है कि साधारण जनता सहनशील होती है और दंगा भड़काने का काम कठमुल्ले, वे चाहे जिस धर्म के हों, और राजनीतिक दल ही करते हैं। लेकिन इनकी शक्ति को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि लेखक और बुद्धिजीवी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपने ही समान लेखकों और बुद्धिजीवियों की सभा में बैठा हुआ है और उनसे शास्त्रार्थ कर रहा है, जिसके दौरान कोई भी बात बेधड़क हो कर कही जा सकती है। शुद्ध तर्क तो ऐसी ही सभाओं में चल सकता है। जब आप जनसाधारण के बीच धर्म से संबंधित कुछ रेडिकल बातें कहते हैं, तो कहने की शैली ऐसी होनी चाहिए जो सोच-विचार करने के लिए लोगों को प्रेरित करे, न कि उनमें उत्तेजना पैदा करे और वे सोच-विचार का रास्ता छोड़ कर हल्ला-गुल्ला या दंगा-उपद्रव करने लगें।

राजकिशोर

राजकिशोर

तसलीमा नसरीन अकसर पते की बात करती हैं, लेकिन बाज दफा उनकी शैली मजाक उड़ानेवाली और चिढ़ानेवाली होती है। इसका भी उन्हें अधिकार है। लेकिन अगर वे यह भुला देती हैं कि वे किस समाज को संबोधित कर रही हैं, तो उनके लेखन का असर जो भी हो, परिणाम वह नहीं हो सकता जो वे चाहती हैं। बेशक यह एक विडंबना है, लेकिन जब कोई विडंबना है, तो इसका ध्यान न रखना बुद्धिमानी की बात नहीं है। जवानी के जोश में तसलीमा ने पहले जैसा भी लिखा हो, अब वे प्रौढ़ हैं और उनका अनुभव संसार बहुत बड़ा है। अब उन्हें संयम तथा शांति से काम लेना चाहिए।

((राजकिशोर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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6 Responses to संयम और शांति से काम लें तसलीमा

  1. अरविंद शेष Reply

    March 5, 2010 at 2:16 pm

    “जो लेखक और बुद्धिजीवी इस्लाम की कुछ चीजों से सहमत नहीं हैं, उन्हें भी धार्मिक प्रश्नों पर तीव्र संवेदनशीलता को आंख-ओट नहीं करना चाहिए। धर्म का मामला बहुत ही नाजुक होता है और छोटी-सी बात पर भी बड़ा-सा उपद्रव खड़ा किया जा सकता है। यह सच है कि साधारण जनता सहनशील होती है और दंगा भड़काने का काम कठमुल्ले, वे चाहे जिस धर्म के हों, और राजनीतिक दल ही करते हैं। लेकिन इनकी शक्ति को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि लेखक और बुद्धिजीवी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपने ही समान लेखकों और बुद्धिजीवियों की सभा में बैठा हुआ है और उनसे शास्त्रार्थ कर रहा है, जिसके दौरान कोई भी बात बेधड़क हो कर कही जा सकती है। शुद्ध तर्क तो ऐसी ही सभाओं में चल सकता है। जब आप जनसाधारण के बीच धर्म से संबंधित कुछ रेडिकल बातें कहते हैं, तो कहने की शैली ऐसी होनी चाहिए जो सोच-विचार करने के लिए लोगों को प्रेरित करे, न कि उनमें उत्तेजना पैदा करे और वे सोच-विचार का रास्ता छोड़ कर हल्ला-गुल्ला या दंगा-उपद्रव करने लगें।

    तसलीमा नसरीन अकसर पते की बात करती हैं, लेकिन बाज दफा उनकी शैली मजाक उड़ानेवाली और चिढ़ानेवाली होती है। इसका भी उन्हें अधिकार है। लेकिन अगर वे यह भुला देती हैं कि वे किस समाज को संबोधित कर रही हैं, तो उनके लेखन का असर जो भी हो, परिणाम वह नहीं हो सकता जो वे चाहती हैं। बेशक यह एक विडंबना है, लेकिन जब कोई विडंबना है, तो इसका ध्यान न रखना बुद्धिमानी की बात नहीं है। जवानी के जोश में तसलीमा ने पहले जैसा भी लिखा हो, अब वे प्रौढ़ हैं और उनका अनुभव संसार बहुत बड़ा है। अब उन्हें संयम तथा शांति से काम लेना चाहिए।”

    सही है। किसी भी व्यक्ति के प्रौढ़ होने और समय के साथ अनुभव संसार बढ़ते जाने के साथ अपनी बातों से प्रभावित होने के व्यावहारिक तरीके निकालने की उम्मीद करनी चाहिए। ऐसा तो नहीं होना चाहिए कि जो हमारी बातों से सहमत नहीं हैं, उनके प्रति घृणा जाहिर कर दें या उनकी खिल्ली उड़ा दें तो वह हमारी बातों सहमत हो जाएगा।

    बहुत सारे लोग “DDDSE” जैसे फार्मूले ईजाद करके लोगों को अपनी वे बातें समझाने में कामयाब हो जाते हैं, जिन पर सोचना भी हमारे समाज में “पाप” समझा जाता है।

  2. अजय यादव Reply

    March 5, 2010 at 2:20 pm

    जवानी का जोश और प्रौढ़-राजकिशोर जी आपने दुखी कर दिया। इन नसीहतों का विकल्प सिर्फ मुंह बंद रखने की सलाह जैसा है। मांफ कीजिए… आप के घर, साथ या कुछ लोगों के साथ मीठी-मीठी, प्यारी-प्यारी सी चर्चा से किसी का भला नहीं होने वाला। भले ही आदमी समाज की ईकाई क्यों न हो, बिना इंसानी आजादी के सब बेमानी है। समाज गैरजिम्मेदार है तो उसे तस्लीमा के जिम्मे क्यों सौप रहे हैं? सौहार्द सत्ता का शिगूफा है-बोलिए और बोलने दीजिए, नहीं तो जीवन सिर्फ धार्मिक अनुवाद बन कर रह जाएगा…

  3. veerendra jain Reply

    March 5, 2010 at 8:08 pm

    धर्म के पागलखाने में अगर कोई बात कहनी है तो उस पागलखाने के डाक्टरों को साथ लेकर ही कहना चाहिये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुये सम्बोधित की समझ को समझ कर ही भाषा, बिम्ब और प्रतीक चुने जाते हैं तब ही सम्वाद सम्भव होता है। तस्लीमा नासमझों की उत्तेज़नाओं की ताकत को डाइवर्ट कर अपने कैरियर और व्यापारिक लाभों में स्तेमाल करने के खतरनाक प्रयोग करती रहतीं हैं। पता नहीं यह तरीका समाज को कहाँ ले जायेगा जो कभी तो ठंडे समाज में विचार विमर्श की चिनगारी देने जैसा लगता है किंतु जब विचारकों का समाज पर कोई नियंत्रण ही नहीं है तो ऐसा प्रयास किसी ऐसे असामाजिक व्यक्ति का प्रयास लगता है जैसा कि कोई उत्तेज़ित आदमी सामने आने वाले किन्हीं भी सौ पचास निर्दोष लोगों को गोली से उड़ा कर शांति महसूस करता है।
    खेद है कि जो लोग राजनीति में धर्म का प्रयोग नहीं भी कर रहे हैं वे भी वैज्ञानिक समझ विकसित करने के लिये गम्भीर प्रयास नहीं कर रहे हैं। अब समय है कि सरकारी मशीनरी में केवल धर्म निरपेक्ष लोगों को ही स्थान मिले तथा धार्मिकों को मुख्य धारा से हटा कर एक किनारे लगाया जाये जिससे वे अपना धार्मिक कृत्य करते हुये दोसरों की आस्थाओं को नुकसान न पहुँच सकें

  4. रंगनाथ सिंह Reply

    March 6, 2010 at 3:03 am

    लेख किसी और ने चुराया,उसका भड़काऊ प्रतिरोध किसी दूसरे ने किया, न जाने किन लोगांे को भावनाएं पलक झपकते इतनी भड़क गईं कि वो हत्या और आगजनी पर उतर आए ?? लेकिन यह सारा दोषा तसलीमा का है ? संयम और शांति तसलीमा को रखना होगा ?

    न जाने तसलीमा ने क्या लिखा था ? न जाने कन्नड़ अखबार ने उसका क्या अनुवाद किया ? न जाने वो कौन सी पंक्तियां थीं कि जिनसे दंगा भड़क गया ?? राजकिशोर जी को चाहिए कि पाठकों के सामने वो पंक्तियां पेश करें। जिससे पाठक जाने सकें कि आखिर दंगा भड़का देने वाली पंक्तियां होती कैसी हैं ?

    कही वो पंक्तियांे की वही गत तो नही जो पुलिस द्वारा घोषित नक्सलवादी साहित्य की है ? यानि जो बात आलू की तरह सामान्य है उसे ही झोले में भर के नक्सलवादी साहित्यिक बम बताया जा रहा है।

    आस्थाओं को लेकर जो बातें राज किशोर ने कही है ठीक वही बात हिन्दु चरमपंथी हुसैन के लिए कह रहे हैं । हुसैन के चित्रों पर राजकिशोर जी के विचार जगजाहिर हैं। जनतंत्र उस लेख को पाठकों के लाभ के लिए राज किशोर और के विक्रम सिंह के उन लेखों को यहां प्रस्तुत करे तो बेहतर।

    राजकिशोर जी का कहना है कि तसलीमा अक्सर बात पते कि कहती हैं लेकिन बाज दफा उनकी शैली उनकी मजाक उड़ाने वाली और चिढ़ाने वाली होती है। राजकिशोर जी खुद या उनके अनुयायी यह बताएं कि क्या यही बात दुनिया के बहुतेरे महान चिंतकों के लिए नहीं सही है। और क्या यह कोई ऐसा दोष है ? कबीर ने किसकी आस्था का ख्याल रखा ??

    क्या राजकिशोर जी को अब यह भी बताना पड़ेगा कि परिवर्तनकामी साहित्य मिश्री के घोल में कलम डूबो कर नहीं लिखा जाता। उसमें तल्खी होती ही होती है। पाठक कहंे तो प्रमाणस्वरूप धर्म पर लिखे भगत सिंह के एकाध लेख प्रस्तुत करूं !

  5. संजय ग्रोवर Reply

    March 6, 2010 at 10:35 am

    बुद्ध किसका मज़ाक उड़ते थे ? जीसस किसका मज़ाक उड़ाते थे ? क्या गैलीलियो विनम्र नहीं थे ? मेधा पाटकर ने किसका मज़ाक उड़ाया था जब उन्हें पीटा गया ? एक ही बात हर संदर्भ में सही नहीं होती .

    कितना हास्यास्पद है कि एक कट्टरपंथ के विरोध में दूसरे कट्टरपंथ को हवा दी जा रही है और हवाला यह दिया जा रहा है कि अगर हुसैन के विरोधियों को नहीं समझा गया तो फ़ासीवाद को बल मिलेगा। बेहतर होता कि तसलीमा के साथ-साथ हुसैन के समर्थकों से भी संयम से काम लेने की अपील की जाती। कम-अज़-कम यह तो न लगता कि यह अपील किन्हीं पूर्वाग्रहों के तहत की गयी है।
    अन्यथा तो घटनाएं जिस तरह से घट रही है, तसलीमा के विरोध में कोई ‘बिजूका’ या ’डमी’ तसलीमा खड़ी करने की कोशिश की जाए तो भी कोई बड़ी बात नहीं।

  6. indian citizen Reply

    March 6, 2010 at 4:03 pm

    क्या दोहरा रवैया अपनाते हैं आप लोग. एक ओर गांधी भगत सिंह की बात करते हैं. कभी उन्हें पढ़ा भी है? इन लोगों ने दोनों को ही नसीहत दी थी न कि एक पक्ष को. जबकि आप लोगों का रवैया ही निराला है. बड़े लोगों के नाम भर याद कर लेने से उनके बराबर नहीं आ जाते. एक तरफा सोच ही असली फासिस्टवादी सोच है. छ्द्म्म आवरण को हटाइये और खामखयाली को अपने दिमाग से दूर रखिये उसके बाद ही सोच व्यापक होगी. आप लोग तो क्रांतिकारियों के बलिदानों को सार्थक बनाने में योगदान दीजिये.

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