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तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं

इस्लामिक कट्टरता और पुरुष के पुरुष होने के ख़िलाफ़ किसी भी आम मुस्लिम स्त्री के भीतर चल रही लड़ाई उतनी ही पैनी हैं जितना तसलीमा के उपन्यासों का कथानक। उनमें नया कुछ अगर है तो वो सिर्फ़ सेक्स है। “का” से लेकर “अमर मेयेबेला” तक उनके लिखे उपन्यासों को पढ़कर उतनी ही उत्तेजना महसूस होती है जितनी जेम्स हेडली चेईस के किसी उपन्यास या फिर लोलिता को पढ़कर। जिस वक़्त उनकी कहानियां उत्तेजित नहीं कर रही होती, मन मस्तिष्क में इस्लामिक कट्टरता के ख़िलाफ़ हमले का वर्चुअल वर्ल्ड तैयार करती दिखती हैं। लज्जा को पढ़कर संभव है आप अपने मन में कितने ही अनदेखे चेहरों की आंखें फोड़ डाले या फिर उनका सर कलम कर दें। कभी-कभी मुझे उन्हें पढ़कर मोनिका लेविंस्की की भी याद आती है। जिसके और बिल क्लिंटन के सेक्स संबंधों के किस्से आज भी चाव से पढ़े जाते हैं ।

मोनिका और बिल क्लिंटन के रिश्तों के खुलासे के बाद पश्चिम में सेक्स की उन्मुक्तता और उसके सरलीकरण को लेकर हमारे विचार और भी ज्यादा पृष्ठ हो गए थे। वही काम तसलीमा ने बंगलादेश और फिर हिंदुस्तान में किया। तसलीमा भी लेविंस्की की तरह सेक्स और शोहरत के रिश्ते को जानती हैं। अंतर सिर्फ़ ये है कि तसलीमा के लिए सेक्स संबंधों का ताना बना कभी कट्टरता तो कभी पुरुष की भोगवादी प्रवृति को उधेड़ने का जरिया बन जाता है और वो खुद को कभी प्रगतिशील तो कभी स्त्री चेतना के संवाहक के रूप में प्रस्तुत करने में सफल हो जाती है। मगर मोनिका लेविंस्की के लिए उनके सेक्स सम्बंध सिर्फ़ एक किस्सागोई है जिसमे अमेरिका का राष्ट्रपति अपने देश के सामने टेसुए बहाने को मजबूर हो जाता है।

जिस किसी ने भी तसलीमा के 2003 में प्रतिबंधित किये गए उपन्यास “को” को या फिर “अमर मेयेबेला” को पढ़ा होगा संभव है एक बार में ही पूरी किताब चाट गया हो और सेक्स कल्पनाएं करने लगे। तसलीमा को पढने, सुनने और उनके बारे में बतियाने की जरूरत सिर्फ़ इसलिए महसूस की जाती रही है क्यूंकि वो विवादित हैं। और उनमें वो सारे मसाले मिलते हैं जिन्हें एक आम पाठक पढना चाहता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि उनमें वेद प्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत के उपन्यासों के सारे तत्व मौजूद हैं और संभव है प्रभा खेतान और नासिर शर्मा को पढने वाले तसलीमा को पहली बार पढ़कर ही खारिज कर दे।

जब कभी मैं प्रभा खेतान और तसलीमा के बारे में साथ साथ सोचता हूं तो पाता हूं प्रभा जैसी थी वैसा लिखती थी, लेकिन वे कट्टर स्त्रीवादी नहीं थीं। वे स्त्री को केंद्र में रखकर समग्र समाज को पारदर्शी बनाने की कोशिश करती थीं। औरत का मानवीय रूप सहोदरा कही जाने के बावजूद स्वीकृत नहीं है, ये सच वो जानती थी और इसी के विरुद्ध खड़ी थीं। उनकी रचनाएं इस गैरबराबरी को ख़त्म करने के लिए थी और यही एक चीज उन्हें महान लेखक बना देती है। दूसरी तरफ तसलीमा इस गैरबराबरी के ख़िलाफ़ सिर्फ़ पुरुषों को हारते नहीं देखना चाहती वो उन्हें घुटने के बल जमीन पर टीके देखना चाहती हैं। वे अपनी कुंठाओं का परिमार्जन भी पुरुषों के माध्यम से करने कि कोशिश करने लगती हैं। ऐसे में स्त्री अधिकारों की बात करते वक़्त उनका अपना व्यक्तित्व ही नज़र आता है और स्त्रियों का समूह गायब हो जाता है।

इस्लामिक कट्टरता को लेकर तसलीमा ने “लज्जा ” और फिर उसके बाद के अन्य उपन्यासों में जो लिखा उनमें और “सामना” एवं पांचजन्य सरीखे अख़बारों के कालमों में कोई ख़ास अंतर नज़र नहीं आता। जब वो कट्टर पंथियों के ख़िलाफ़ लिखती हैं तो कभी प्रवीण तोगड़िया नज़र आते हैं तो कभी उमा भारती। जब वो नारी स्वातंत्र्य या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करती है तो उनके उपन्यास डेबोनेयर के पन्नों में तब्दील हो जाते हैं। मेरे एक मित्र कहते हैं उनके पास सेक्स है, बाज़ार है और सबसे बड़ी बात वो औरत हैं। एक ऐसे समाज में जहां महिलाओं की सेक्स में भागीदारी को लेकर चर्चाएं करना कभी संभव नहीं हो सका, तसलीमा बैलोस अपने अनुभवों को वर्णित करती हैं और वैचारिक क्रांति का प्रतीक बन जाती हैं।

मेरी एक पत्रकार मित्र कहती हैं जब मैंने पहले पहल “लज्जा ” पढ़ी थी, मेरे मन में कट्टरता के प्रति विषाक्तता के भाव तो उपजे ही थे उनमे आक्रोश भी था। निस्संदेह तसलीमा कामयाब हो रही थी। “अमर मेयेबेला” का एक दृश्य मेरी आंखों के सामने अभी भी गुजर रहा है तसलीमा अपने उपन्यास में पीर अमिरुल्लाह का जिक्र करती हैं जिससे उन्हें घृणा है। 1971 के युद्ध के दौरान नौमहल में 10 हिन्दुओं के घर जलाकर ख़ाक किया जा चुके हैं। पीर साहब हांथ उठाकर खुदा का शुक्र अदा करते हुए कहते हैं इस्लाम की रक्षा के लिए ये जरुरी था। क्या साबित करना चाहती हैं तसलीमा? क्या ये जरुरी है की कट्टरता के खिलाफ किये जा रहे संघर्ष में दूसरे धर्म को ढाल बनाया ही जाए? लज्जा में जो हुआ वो गुजरात से कम खौफनाक था? क्या हिन्दू लड़की के बलात्कार में मुस्लिम लड़के को और मुस्लिम लडकी के बलात्कार में हिन्दू लड़के को लिखकर कोई नयी बात की जा रही है? बलात्कार की परिभाषा क्या धरम के जुड़ जाने के बाद बदल जाती है?

तसलीमा अपने साक्षात्कार में बार बार कहती हैं वो कट्टरपंथ के ख़िलाफ़ हैं क्या कट्टरता के मायने हिंदुस्तान में अलग और बांग्लादेश में अलग हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि पहले बांग्लादेश और फिर हिंदुस्तान में तथाकथित मुस्लिम फिरकापरस्ती को कलम बंद करते वक़्त जानबूझ कर तसलीमा ने कट्टरपंथ के दूसरे पहलु को नजरअंदाज किया? आप कह सकते हैं कि हर देश में अल्पसंख्यकों दर्द और संत्रास एक जैसा है, क्या बांग्लादेश क्या हिंदुस्तान, मगर इसका क्या जवाब होगा कि एक ऐसे देश में जहां कट्टरता हिन्दुओं और मुस्लिमों में बराबर बंटी हुई है तसलीमा सिर्फ़ एक सिरा ही क्यों देख पाती हैं? कहीं वो हिंदुस्तान की उस नब्ज को पकड़ने कि तो कोशिश नहीं कर रही हैं जिस नब्ज पर आर.एस.एस का ताना बना टिका है। और जिस नब्ज को पकड़कर अरुण शौरी पत्रकार से नेता बन गए।

यक़ीनन तसलीमा ने बांग्लादेश में जो दिन बिताये वो बेहद कष्टप्रद रहे होंगे। उनकी साहसिक अभिव्यक्ति की सराहना की जानी चाहिए। मगर उनमें ईमानदारी कितनी थी ये तय किया जाना अभी बाकी है। बांग्लादेशी साहित्यकारों के बिस्तरों पर पड़ी सलवटों की दास्तान हो या फिर कट्टर मुल्लाओं की कहानियां, उनमें बेईमानी नहीं आनी चाहिए। बिस्तर पर अपनी मर्जी से सोना और फिर उन अंतरंग पलों को शब्द देकर बाजार की चीज बना देना… खुद तीन तीन शादियों के बाद मुस्लिम समाज में बहु विवाह और उससे जुड़ी पुरुष की व्यभिचारिक प्रवृति के ख़िलाफ़ क्रांति छेड़ने की बात निस्संदेह ईमानदारी नहीं है।

((लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। आवेश से आप awesh29@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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21 Responses to तसलीमा को पढ़ कर मोनिका लेविंस्की याद आती हैं

  1. रंगनाथ सिंह Reply

    March 6, 2010 at 8:37 pm

    सबसे पहले तो तसलीमा की मोनिका लेविंस्की से तुलना बहुत ही अश्लील है। लेकिन इस मामले पर बाद में बात होगी। आवेश तिवारी ने बाद में जो बातें कही हैं पहले उनपर बात हो जाए।

    इस लेख में पूरा संघी लाइन आफ आर्ग्युमेंट है। संघ यही करता आया है। जिसने भी हिन्दु चरमपंथियों के खिलाफ लिखा उनसे संघी लोगों ने कहा कि वो मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ लिख कर दिखाएं ?? आवेश तिवारी यही बात तसलीमा से कह रहे हैं। अभी भी हुसैन को लोग कह रहे हैं कि वो मोहम्मद की तस्वीर बनाकर दिखाएं !!

    जिसने जिस सांप्रदायिकता को भीतर पैठ के जाना हो उसी के खिलाफ क्यों न लिखे ? राजेन्द्र यादव से लोगों ने मांग की कि आप मुस्लिमों के खिलाफ क्यों नहीं लिखते ? अंततोगत्वा उन्हें लिखना पड़ा। लेकिन लेखक कोई प्रयोगशाला में पड़ा उपकरण नहीं होता जिसपर लोग हमेशा कुछ न कुछ परखते रहें। लेखक कोई मदारी का बंदर नहीं होता कि लोग उसे कहते रहे हैं कि ऐसे कूदा तो कूदा,अब जरा वैसे कूद के दिखाओ !

    क्या यह बार-बार समझाने की बात है कि किसी भी देश में बहुसंख्यक की कट्टरता अल्पसंख्यक की कट्टरता से ज्यादा ज्यादा खतरनाक होती है। बांग्लादेश में तसलीमा ने बहुसंख्यक की कट्टरता का सामना किया। हिन्दुस्तान में उस जैसे बहुत से लेखक कर रहे हैं।

    कुछ लोगों बार-बार इस संघी लाजिक को प्रयोग कर रहे हैं कि तसलीमा का लेख हिन्दु मन को तुष्ट करता है। ठीक इसी लाजिक के अनुसार संघ सदैव वामपंथियों को खारिज करता रहा है कि उनका बौद्धिक कर्म मुस्लिम मन को तुष्ट करता है। कई ऐसी घटनाएं स्वयं वामपंथ के भीतर जेरेबहस रहीं। तसलीमा का भारत से निष्कासन ऐसी घटना का ताजा उदाहरण है।

    तसलीमा से ऐसी मांग तब की जा रही है जब उसने साफ कहा है कि वो किसी भी देवी-देवता या पैगम्बर में यकीन नहीं करती। इसके बाद भी उन्हें हिन्दु खाते में ढकेला जा रहा है। मैं कब से कह रहा हूं कि लोग तसलीमा के उन बयानों का सामने लाएं जो उसने हिन्दु चरमपंथियों के पक्ष में दिए हों। अब यदि उसके मुस्लिम चरमपंथियों के खिलाफ दिए बयान से हिन्दु चरमपंथि खुश होते हैं तो इसमें वो या कोई और लेखक क्या कर सकता है ??

  2. रंगनाथ सिंह Reply

    March 6, 2010 at 9:16 pm

    न जाने किन-किन घासलेटी साहित्य के साथ आवेश जी ने तसलीमा की तुलना कर दी है। खैर, मैं उनके द्वारा उल्लेखित साहित्यिक कृतियों के संदर्भ में ही अपनी बात करुंगा। लोलिता का हवाला खुद आवेश जी ने दिया है। लेडी चैटर्ली लवर को तो अदालत में अश्लील साबित कर दिया गया था। मण्टो और चुगताई पर कई मुकदमें चले थे। उग्र का बचाव तो गांधी जी को करना पड़ा था। खैर,मैं ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊँगा। उम्मीद है साहित्य और अश्लीलता को लेेकर पाठकों में वैसा मतिभ्रम न होगा जैसा आवेश जी के लेख में है।

    घासलेटी साहित्य से तुलना करते वक्त आवेश जी कल्पना की उड़ान को प्रेरित करने वाले प्रसंगों की बात की है। उनका कहा पढ़कर मुझे मोहल्लापर कुछ दिन पहले आया वह कमेंट याद आ गया जिसमें किसी अज्ञात व्यक्ति ने बताया था कि किस तरह उसकी कल्पना देवियों के चित्र देखकर उड़ान भरती थी !! अतः यह मामला पूरी तरह सापेक्षिक है। इसपर इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना।

    आवेश जी प्रभा खेतान से तसलीमा की तुलना की है। प्रभा जी का सबसे हंगामाखेज कदम एक विवाहित एवं उम्र में काफी बड़े व्यकित से संबंध बनाना। प्रभा जी का राजेन्द्र जी से भी जोड़ कर थोड़ी सुगबुगाहट की जाती रही। लेकिन तसलीम ने ऐसा कुछ नहीं किया। उसने तो पहला प्यार एक कवि से किया। जो क्राँतिकारी कविताएं लिखता था। जबकि व्यवहार में वह सामंती महिलाविरेाधी कामकुंठित मर्द था। तसलीमा की कहानी संधर्ष और शोषण की कहानी है। प्रभा को ऐसा कुछ नहीं सहना पड़ा। प्रभा की मुसीबतें में उनके अपने चुनाव की बड़ी भूमिका थी। तसलीमा को धोखा मिला। प्रभा को उनके डाक साहब ने कभी भी छोड़ा नहीं। तसलीमा का हर किसी ने सिर्फ उपभोग करना चाहा। यह तुलनात्मक अध्ययन काफी लम्ब हो जाएगा। संक्षेप में बस यह जान लीजिए कि इन दोनों महिलाओं का संघर्ष अलग प्रकृति का था। दोनों को अपने-अपने लिए लड़ना पड़ा।

    आपको लगता है कि प्रभा महान लेखक बन जाती है जिसके लिए आपने कुछ वायवीय कारण बताएं हैं। काश की ठोस कारण भी गिनाते। तसलीमा के बारे में यही कहुंगा कि तसलीमा जिस तरह के प्रतिरोध को झेल कर दरबदर हो कर टिकी हुई है वैसा माद्दा तो हाल-फिलहाल किसी भी महिला या पुरुष ने नहीं दिखाया है। इस मुद्दे पर इतना ही शेष फिर कभी।

  3. jenny shabnam Reply

    March 6, 2010 at 9:52 pm

    आवेश जी,
    आपका आलेख पढ़ी, समझ नहीं आ रहा कि क्या प्रतिक्रिया दूँ, पर कुछ लिखने से ख़ुद को रोक भी नहीं सकती| तसलीमा नसरीन के उपन्यास को पढ़कर आपने जो लिखा है मैं कतई सहमत नहीं हूँ| एक पुरुष प्रधान समाज में किसी स्त्री का इस तरह लिखना सहज ग्राह्य नहीं होता है| अगर होता तो उन्हें देश निकाला और गुमनामी के साथ हीं बेहद कष्टमय जीवन नहीं गुजरना पड़ता| अगर यही उपन्यास कोई पुरुष लिखता तो न तो इस पर कोई बवाल होता न हीं इसे इस रूप में देखा जाता| और शायद आप जैसे निष्पक्ष और प्रगतिशील पत्रकार ऐसा नहीं लिखते|
    धार्मिक कट्टरता के खिलाफ़ कुछ भी लिखना सच में बहुत साहसिक कार्य है, जिसे तसलीमा ने किया है| और ऐसे मामले में हिन्दू मुस्लिम या इसाई नहीं बल्कि सिर्फ मानवीय सोच होना चाहिए| जिस तरह तसलीमा नसरीन ने अपने नज़रिए से उपन्यास लिखा आपने इसे पढ़कर अपना नज़रिया बताया| वैसे हीं आपके लेख पढ़कर मैंने अपने विचार लिखे, सहमति और असहमति होना लाज़िमी है दो विचारधारा के बीच| आप अपनी बात बेहद सहजता और गंभीरता से लिखते हैं, लिखते रहें, शुभकामनाएं!

  4. रंगनाथ सिंह Reply

    March 6, 2010 at 10:18 pm

    आवेश जी को यह नहीं ध्यान रहा कि मुस्लिम नारीवादी एक-एक कर चार शादी का विरोध नहीं करती। बल्कि वो मर्द के एक साथ चार औरतों के साथ शादी करने का विरोध करती हैं। इस विरोध का सबसे रोचक और तीखा उदाहरण हाल की नादीन अलबदैर का लेख “मैं और मेरे चार शौहर” बना।

    आवेश जी एक पति को छोड़ने के बाद दूसरे पति से पत्नि से शादी करने का अधिकार दुनिया के हर देश में है। आवेश जी आपने इसी आधार पर तसलीमा द्वारा पुरूष की व्याभिचारी प्रवृत्ति के खिलाफ क्राँति छेड़ने की ईमानदारी पर शक किया है। कोई तीन शादी करे या एक-एक कर तेरह शादी…..क्या उसके आधार पर व्याभिचार विरोध खारिज किया जा सकता है ? व्याभिचार की परिभाषा क्या है भाई ?

  5. Uttama Reply

    March 7, 2010 at 9:07 am

    तस्लीमा और उनकी ईमानदारी पर लंबी बहस लंबे समय से जारी है लेकिन क्या एक महिला और वो भी मुस्लिम होकर लिखने की वजह से उनका विरोध ज्यादा नहीं हो रहा। आपके विचारों पर सहमति जता पाना मुश्किल लग रहा है हालांकि कहीं-कहीं आप सच्चे भी प्रतीत होते हैं। तस्लीमा ने सच्चाई शुरू से लिखी जबकि प्रभा खेतान को उनके जीवन ने बेबाक किया। प्रभा को बात बहुत देर से समझ आई जो शायद सामाजिक तानेबाने में अंतर की वजह से हुआ होगा। हिंदू और मुस्लिम समाज में जमीन-आसमान का अंतर है। क्यों अगर तस्लीमा हिंदू होतीं तो क्या विरोध इतना होता। कई सवाल हैं और लगभग सभी अनुत्तरित। हम बचते हैं या अपने तर्क गढ़कर पलायन कर जाते हैं।

  6. awesh Reply

    March 7, 2010 at 10:10 am

    रंगनाथ जी ,निरपेक्षता की बात कहते वक़्त आप एकपक्षीय होकर नहीं हो सकते ,और न ही एक पक्षीय होकर कोई क्रन्तिकारी विचारधारा प्रस्तुत की जा सकती है,आप लोगों के साथ समस्या ये है कि तसलीमा के साथ यही समस्या है|कट्टरता एक व्यापक शब्द है इससे कोई भी धर्म अछूता नहीं है ,लेकिन जब कभी वो कट्टरता की बात करती हैं तो केवल इस्लाम की बात करती हैं जब पुरुष की बात करती हैं तो सिर्फ मुस्लिम पुरुष की बात करती हैं|मैंने ये नहीं कहा कि कि किसी भी देश में बहुसंख्यक की कट्टरता अल्पसंख्यक की कट्टरता से ज्यादा खतरनाक होती है हाँ मैंने ये जरुर कहा कि कि हर देश में अल्पसंख्यकों का दर्द और संत्रास एक जैसा है |कट्टरता का दर्द और संत्रास से नाता है पर उसकी व्याख्या फिर कभी |यहाँ बात सिर्फ ये है कि अगर बांग्लादेश में बहुसंख्यकों की कट्टरता के खिलाफ तसलीमा आवाज उठा रही थी तो फिर क्या वजह थी बार बार हिंदुस्तान समेत दुनिया के तमाम देशों में रहने के बावजूद उन्होंने वहां की परिस्थितयों में मौजूद कट्टरता को व्याख्यंकित क्यूँ नहीं किया ,इसके बावजूद अगर आप उनके उपन्यासों को साहित्य की श्रेणी में रखते हैं तो मुझे इससे घोर असहमति है ,तसलीमा दुनिया भर में इस्लाम और उस पर जबरन थोपी जा रही कट्टरता के संलयन से पैदा हुए बाजार को समझती हैं ,यही काम सलमान कर रहे थे |
    प्रभा और तसलीमा में सबसे बड़ी भिन्नता ये है कि प्रभा प्रेम करती हैं और तसलीमा सम्बंध बनाती हैं, हलाकि आपने उलटी बात कही है |अंत में होता भी यही है डाक साहब प्रभा को नहीं छोड़ते ,तसलीमा एक एक करके सबको छोड़ जाती हैं ,जिनके साथ पूर्ण सहमति से बिस्तर बांटती है ,उन्हें भी भरे बाजार में सिर्फ इसलिए नंगा खड़ा कर देती हैं क्यूंकि ये बात उनकी बाजार से जुडी समझ को सही लगती है ,वे इसे बेईमानी नहीं मानती उल्टे अतिसाहस का दंभ भरने लगती हैं |
    रंगनाथ जी आप कितनी शादियाँ करने का साहस रखते हैं ? इस्लाम में कोई भी पुरुष जब जी में आये तलाक देकर दूसरी शादी कर सकता है ,मेरी नजर में ये भी व्याभिचार है,आपने शायद किताबों में पढ़ा हो ,मैंने मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं की स्थिति को बेहद नजदीक से देखा है और उनके दर्द को जाना है|वही काम तसलीमा कर रही हैं अनत सिर्फ ये वो पुरुषों के खिलाफ कर रही हैं और ये बात बेबाकी से कहते हुए कि वो मेरे अनुकूल नहीं था तो उसे छोड़ दिया फिर उससे प्यार किया फिर उसे छोड़ दिया, फिर उससे किया उसे भी छोड़ दिया ..जब प्यार किया तो वो क्रन्तिकारी था! नहीं नहीं उसमे सामंती मर्दों वाली प्रवृति थी |
    अब बात अश्लीलता की तसलीमा नसरीन के शब्दों में ———–

    Haseena’s hoarse voice heated up, “I understand all that, but I am talking of fulfillment, why don’t I get it!”The pen in my hand moved shiftily, once at my cheek, then chin, once on my hair.“Is there ejaculation?”Sitting with her legs hanging from the bed, swinging them back and forth, she tried to reduce her harsh voice to a whisper, and couldn’t. Any sound coming out of her mouth was like the beat of a drum. So that no one could enter the room unexpectedly and hear this secret conversation, and so that less sound would be heard outside, I bolted the door from the inside.“What is ejaculation?”“Semen secretion.”“What’s semen?”“What are you saying? You don’t know what is semen? The secretion from the male organ is called semen.”“Yes, that happens.

    ““I am getting the right feelings during sex. But at one point, there is a feeling of fulfillment, that I don’t get.”“What is the difference?” I get pleasure during sex. But at that time it is something else. Having sex and getting that is not the same.”“Doesn’t your partner get it either, this fulfillment you are talking about?”“Arrey, of course, he does.”“If he gets it, why can’t you?”“His getting it is not the same as my getting it.”“Why shouldn’t it be the same? The whole thing is mutual.”“I’m telling you, it isn’t the same.”

    2-

    MASTURBATION
    (A woman without man is like a fish without a bicycle.)

    A woman can’t live without a man?
    Ha, what logic, the logic of a ghost! Bah bah!
    Throw the ball,
    Don’t let orchids embrace you at all,
    Don’t go to poisonous ant bushes.
    Push yourself into sensuousness.
    You have the bow, you have the arrow.
    Do it girl, masturbate.

  7. awesh Reply

    March 7, 2010 at 10:54 am

    संशोधित {पुनः टंकित }

    रंगनाथ जी ,निरपेक्षता की बात कहते वक़्त आप एकपक्षीय होकर नहीं रह सकते ,और न ही एक पक्षीय होकर कोई क्रन्तिकारी विचारधारा प्रस्तुत की जा सकती है,तसलीमा के साथ यही समस्या है|कट्टरता एक व्यापक शब्द है इससे कोई भी धर्म अछूता नहीं है ,लेकिन जब कभी वो कट्टरता की बात करती हैं तो केवल इस्लाम की बात करती हैं जब पुरुष की बात करती हैं तो सिर्फ मुस्लिम पुरुष की बात करती हैं|मैंने ये नहीं कहा कि कि किसी भी देश में बहुसंख्यक की कट्टरता अल्पसंख्यक की कट्टरता से ज्यादा खतरनाक होती है हाँ मैंने ये जरुर कहा कि कि हर देश में अल्पसंख्यकों का दर्द और संत्रास एक जैसा है |कट्टरता का दर्द और संत्रास से नाता है पर उसकी व्याख्या फिर कभी |यहाँ बात सिर्फ ये है कि अगर बांग्लादेश में बहुसंख्यकों की कट्टरता के खिलाफ तसलीमा आवाज उठा रही थी तो फिर क्या वजह थी बार बार हिंदुस्तान समेत दुनिया के तमाम देशों में रहने के बावजूद उन्होंने वहां की परिस्थितयों में मौजूद कट्टरता को व्याख्यंकित क्यूँ नहीं किया ,इसके बावजूद अगर आप उनके उपन्यासों को साहित्य की श्रेणी में रखते हैं तो मुझे इससे घोर असहमति है ,तसलीमा दुनिया भर में इस्लाम और उस पर जबरन थोपी जा रही कट्टरता के संलयन से पैदा हुए बाजार को समझती हैं ,यही काम सलमान कर रहे थे |
    प्रभा और तसलीमा में सबसे बड़ी भिन्नता ये है कि प्रभा प्रेम करती हैं और तसलीमा सम्बंध बनाती हैं, हलाकि आपने उलटी बात कही है |अंत में होता भी यही है डाक साहब प्रभा को नहीं छोड़ते ,तसलीमा एक एक करके सबको छोड़ जाती हैं ,जिनके साथ पूर्ण सहमति से बिस्तर बांटती है ,उन्हें भी भरे बाजार में सिर्फ इसलिए नंगा खड़ा कर देती हैं क्यूंकि ये बात उनकी बाजार से जुडी समझ को सही लगती है ,वे इसे बेईमानी नहीं मानती उल्टे अतिसाहस का दंभ भरने लगती हैं |
    रंगनाथ जी आप कितनी शादियाँ करने का साहस रखते हैं ? इस्लाम में कोई भी पुरुष जब जी में आये तलाक देकर दूसरी शादी कर सकता है ,मेरी नजर में ये भी व्याभिचार है,आपने शायद किताबों में पढ़ा हो ,मैंने मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं की स्थिति को बेहद नजदीक से देखा है और उनके दर्द को जाना है|वही काम तसलीमा कर रही हैं अनत सिर्फ ये वो पुरुषों के खिलाफ कर रही हैं और ये बात बेबाकी से कहते हुए कि वो मेरे अनुकूल नहीं था तो उसे छोड़ दिया फिर उससे प्यार किया फिर उसे छोड़ दिया, फिर उससे किया उसे भी छोड़ दिया ..जब प्यार किया तो वो क्रन्तिकारी था! नहीं नहीं उसमे सामंती मर्दों वाली प्रवृति थी |
    अब बात अश्लीलता की तसलीमा नसरीन के शब्दों में ———–

    Haseena’s hoarse voice heated up, “I understand all that, but I am talking of fulfillment, why don’t I get it!”The pen in my hand moved shiftily, once at my cheek, then chin, once on my hair.“Is there ejaculation?”Sitting with her legs hanging from the bed, swinging them back and forth, she tried to reduce her harsh voice to a whisper, and couldn’t. Any sound coming out of her mouth was like the beat of a drum. So that no one could enter the room unexpectedly and hear this secret conversation, and so that less sound would be heard outside, I bolted the door from the inside.“What is ejaculation?”“Semen secretion.”“What’s semen?”“What are you saying? You don’t know what is semen? The secretion from the male organ is called semen.”“Yes, that happens.

    ““I am getting the right feelings during sex. But at one point, there is a feeling of fulfillment, that I don’t get.”“What is the difference?” I get pleasure during sex. But at that time it is something else. Having sex and getting that is not the same.”“Doesn’t your partner get it either, this fulfillment you are talking about?”“Arrey, of course, he does.”“If he gets it, why can’t you?”“His getting it is not the same as my getting it.”“Why shouldn’t it be the same? The whole thing is mutual.”“I’m telling you, it isn’t the same.”

    2-

    MASTURBATION
    (A woman without man is like a fish without a bicycle.)

    A woman can’t live without a man?
    Ha, what logic, the logic of a ghost! Bah bah!
    Throw the ball,
    Don’t let orchids embrace you at all,
    Don’t go to poisonous ant bushes.
    Push yourself into sensuousness.
    You have the bow, you have the arrow.
    Do it girl, masturbate.

    Reply

  8. शहरोज़ Reply

    March 7, 2010 at 11:55 am

    @ aawesh
    -हर देश में अल्पसंख्यकों दर्द और संत्रास एक जैसा है,
    -यक़ीनन तसलीमा ने बांग्लादेश में जो दिन बिताये वो बेहद कष्टप्रद रहे होंगे। उनकी साहसिक अभिव्यक्ति की सराहना की जानी चाहिए। मगर उनमें ईमानदारी कितनी थी ये तय किया जाना अभी बाकी है। बांग्लादेशी साहित्यकारों के बिस्तरों पर पड़ी सलवटों की दास्तान हो या फिर कट्टर मुल्लाओं की कहानियां, उनमें बेईमानी नहीं आनी चाहिए। बिस्तर पर अपनी मर्जी से सोना और फिर उन अंतरंग पलों को शब्द देकर बाजार की चीज बना देना…
    @rangnath
    -लेकिन लेखक कोई प्रयोगशाला में पड़ा उपकरण नहीं होता जिसपर लोग हमेशा कुछ न कुछ परखते रहें। लेखक कोई मदारी का बंदर नहीं होता कि लोग उसे कहते रहे हैं कि ऐसे कूदा तो कूदा,अब जरा वैसे कूद के दिखाओ !

    उपरोक्त बातों से सहमत!

    असहमति हैं भाई रंगनाथ के इस कथन से कि बांग्लादेश में तसलीमा ने बहुसंख्यक की कट्टरता का सामना किया। हिन्दुस्तान में उस जैसे बहुत से लेखक कर रहे हैं।
    भाई किसी एक लेखक विशेष कर हिंदी लेखक का नाम बताने का कष्ट करेंगे जिसने तसलीमा जैसी बेबाकी के साथ अपने उपन्यास में यहाँ की बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता या संघी करतूतों का वर्णन किया हो.एकाध कहानी है हलकी फुल्की या उपन्यास में महज़ झलकी भरी उपस्थिति ..और क्या है..इसका जवाब!!!
    इस अर्थ में तसलीमा तो बड़ी लेखक हैं.
    हाँ आवेश की इस बातमें गलत क्या है की तसलीमा का साहित्य बहुत ही ऊंचे दर्जे का नहीं है.या घासलेटी है.
    इस्मत की कहानी से आपने जो मिसाल दी है फ़िज़ूल है.वैसी ज़बान कहाँ तसलीमा की.आम और ख़ास का यही फर्क है.लिहाफ कहानी पढ़ा है कई बार!! मुझे कहीं अश्लीलता नहीं लगती लेकिन तस्लीम के ब्योरे में ऐसा लगता है.

    आवेश की इस बात से असहमति है कि इस्लाम में कोई भी पुरुष जब जी में आये तलाक देकर दूसरी शादी कर सकता है .
    मैं यहाँ ज़रा संशोदन करूँगा..इस्लाम की जगह सिर्फ मुस्लिम समाज में.
    और मुस्लिम समाज ने ही अपनी करतूतों से इस्लाम को बार बार बदनाम किया है.चाहे जिहाद की गलत व्याख्या हो या तलाक़ का मामला.
    और लोग मुस्लिम को देख कर ही इस्लाम को समझने लगते हैं.
    इस्लाम में भैया तलाक़ इतना आसान नहीं है की नमक कम और पत्नी को तलाक़.बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है.जल्द ही इस पर एक लेख लिखने का मन है.यूँ कभी जनसत्ता में लिख चुका हूँ विस्तार से.

  9. रंगनाथ सिंह Reply

    March 7, 2010 at 1:23 pm

    आवेश जी सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने कहीं भी निरपेक्षता की बात नहीं की। सापेक्षतावाद या निरपेक्षतावाद दोनों विपरित ध्रवों से चलकर एक ही बिन्दु पर पहंचते हैं। मैं तथ्य और तर्कों की बात करता हूं। किसी मुद्दे पर मैं उपलब्ध तथ्यों के प्रस्तुत विश्लेषण पर अपना पक्ष रखता हूं। इस मुद्दे पर मेरा पक्ष साफ है। आपको इस बात के लिए भी कोटी-कोटी आभार की आपने अपना जवाब संवाद शैली में दिया है। यहां तो लोग पहली असहमति पर ही निजी गालियां देने लगते हैं।

    आपने तसलीमा की रचनाओं को साहित्य ही नहीं माना है। अतः यह मुद्दा लम्बी बहस का हो गया है। फिर भी कुछ बातें रखना चाहंुगा। जिनका नाम लुंगा उन्हें कोट नहीं करूंगा क्योंकि स्थानाभाव है। ऐसी बांग्ला कविताओं के उदाहरण कई हैं जिनपर आपको आपत्ति होगी। मैं हिन्दी की बात करता हूं। धूमिल ने मुट्ठ मारने,लाल-लाल मुट्ठ, कविता लिखी है। राजकमल चैधरी जैसा विलक्षण प्रतिभाशाली ने लिखा है कि मैं हर छिद्र के साथ संभोग करना चाहता हूं। हिन्दी अकविता आंदोलन के कवियों की कविताएं मैं कोट करने लगुं तो शुचितावादीयों को बड़ी ही लाज आएगी कि ये सब उन्हीं के भाईयों ने लिखी है। मीर के बारे मे ंकहा जाता है कि उनकी अच्छी कविताएं बहुत अच्छी है। गंदी कविताएं बहुत गंदी। उग्र ने जब लौण्डेबाजी पर चाकलेट जैसी रचना लिखी तो गांधी जी ने शुचितावादियों से उनका बचाव किया। कालिदास,जयदेव,भर्तृहरि,जयदेव,बिहारी,विद्यापति, जैसे क्लासिक उदाहरण तो सभी जानते हैं। निराला की जूही की ककली से उत्तेजक और मांसल कविता किसने लिखी है। पंत ने चोटी और…..को लेकर जो लिखा है उसका क्या ? कहां तक गिनाऊँ ?? तसलीमा तो बांग्ला भाषा की लेखिका है। जो भाषा भारतीय कविता में आधुनिकता की अगुआ रही है। आपकी बातों से इतना ही जाहिर हुआ कि आप साहित्य के क्षेत्र में कम दखल रहते हैं। मैं आपकी मोहल्ला या अन्य जगहों पर पड़ी रिर्पोटें पढ़ी हैं। अतः मैं यह भी जानता हूं कि आप उस क्षेत्र में बहुत अच्छी दखल रखते हैं। मैं बनारस का हूं लेकिन उस जोन पर आपका लेख पढ़ा तो लगा था कि मैं वहां का होकर आप जितना नहीं जानता। लेकिन मैं साहित्य के बारे मंे कुछ जानकारी रखता हूं। आपसे अनुरोध है कि तसलीमा के साहित्य के मसले पर आप सहानुभूति पूर्वक विचार करें। मैं पहले भी कह चुका हूं कि तसलीमा अपनी आत्मकथाओं के लिए याद की जाएंगी। मैंने आत्मकथाएं भी काफी पढ़ी है। मुझे लगता है कि तसलीमा की आत्मकथा श्रेष्ठ आत्मकथाओं में से एक है। यदि सिर्फ महिलाओं लेखकों की आत्मकथा की बात किया जाय तो तसलीमा के समानांतर बहुत कम लेखिकाएं आ सकेंगी। वर्जिनिया वुल्फ ने ए रूम आफ वन ओन्स की बात क्यों कही है इसे भारतीय संदर्भ में समझने के लिए तसलीमा से अच्छा साहित्यिक उदाहरण दूसरा नहीं होगा। इस मुद्दे पर इतनी ही। शेष आप आप जानते ही हैं।

    यदि आपको गोपन विषयों के वर्णन मात्र से एतराज नहीं है तो मैं पूछना चाहुंगा कि क्या तसलीमा ने आपके द्वारा प्रस्तुत अंश में कोई चटखारा लिया है ? कोई हवाई उड़ान भरी है ? जैसी हुसेन भरते हैं ? तसलीमा ने घटना को हूबहू प्रस्तुत किया है। कोई लेखकीय छूट नहीं ली है। मैं हिन्दी की उन तमाम लेखिकाओं के उपन्यास से वो अंश कोट नहीं कर सकता जो तसलीमा के इस अंश से बोल्ड और एक्सप्लीसिट हैं। मैं उन लेखिकाओं का नाम लेने से जानबूझ कर बच रहा हूं। जरूरत पड़ी तो फिर वह भी प्रस्तुत कर दूंगा। इस मुद्दे पर मैं जानबूझ कर विदेशी लेखकों के उदाहरण नहीं दे रहा हूं। क्योंकि मैं अपनी जमीन,अपनी संस्कृति के उदाहरण को ही काफी समझता हूं।

    तसलीमा जैसों का दुर्भाग्य है कि इस देश की चोखेरबालियां (विडंबना की यह शब्द बांग्ला साहित्य से लिया गया है,बदकिस्मती तसलीमा उसी भाषा की लेखिका है) भी उसे हिन्दु-मुस्लिम भेड़ियों के जबड़े में अकेला छोड़ चुकी है। मैंने तसलीमा की सारा लेखन नहीं पढ़ा है लेकिन आज तक मुझे उसका ऐसा कोई लेख नहीं मिला जिसमें उसने इस्लाम के खिलाफ लिखा हो। जिसमें उसने हिन्दु धर्म को महिमामण्डित किया हो। अब यदि पर्दा प्रथा के खिलाफ लिखना,अव्यस्क बच्ची से विवाह के खिलाफ लिखना,बहुविवाह के खिलाफ लिखना ही किसी धर्म के खिलाफ लिखना है तो फिर बात दूसरी है ! विधवा विवाह के पक्ष में लिखना,तलाक लेने के अधिकार के पक्ष में लिखना,दहेज के खिलाफ लिखना,बाल विवाह के खिलाफ लिखना,सती प्रथा के खिलाफ लिखना यदि हिन्दु धर्म के खिलाफ लिखना होता है तो हुआ करे !! पहले भी लोगों ने लिखा है। अब भी लिखेंगे।

  10. संजय ग्रोवर Reply

    March 7, 2010 at 2:10 pm

    हांलांकि यहां प्रभा और तसलीमा की तुलना का कोई अर्थ नहीं लगता फ़िर भी हमारे पास यह पता लगाने का क्या ज़रिया है कि प्रभा ने जो किया वह प्रेम था ! ‘हंस’ में जब यह आत्मकथा छपी तो इसकी हर क़िस्त के साथ मेरा मुंह उतर जाता था कि जिस लेखिका को मैं हद दर्ज़े की विद्रोही महिला समझता था, उसने एक आम औरत से भी ज़्यादा मजबूर ज़िंदगी बिताई। अगर आपको याद हो तो ‘हंस’ मे बहुत-सी प्रतिक्रियाएं भी इसी हैरानी और निराशा का प्रतिनिधित्व करतीं थीं। ‘डाक’ साहब कुछ भी करते रहे, प्रभा बिना किसी विद्रोह या विरोध के उनके साथ बनी रहीं। ‘बने रहने’ की इस मजबूरी को हमारे यहां प्रेम की मान्यता दी जाती है, यह बात अलग है। लेकिन बुद्धिजीवी का काम रुढ़ मान्यतायों के हिसाब से सोचना नहीं होता। मान्यता तो भगवान कृष्ण के प्रेम को भी है, बल्कि औरों से ज़्यादा ही है। इस मान्यता को मानें तो तसलीमा के प्रेम को मान्यता ख़ुदबख़ुद मिल जाती है। एक को छोड़कर दूसरे को पकड़ना प्रेम है या दो के साथ एक ही समय में रहना प्रेम है, यह कैसे तय होगा !? आप प्रेम की जो परिभाषा कर रहे हैं वो मोटे तौर पर विवाह संस्था की रुढ़िवादी परिभाषा है। जो राजा-महाराजा एक ही वक़्त में कई-कई रानियां रखते थे, उन्हें भी इस हिसाब से व्यसनी और दुराचारी ही मानना पड़ेगा। उनमें बहुत से महान नाम हैं। समानता यह है कि सबके सब पुरुष थे।
    प्रभा ने आत्म-कथा उम्र के उस मोड़ पर लिखी या छपवाई जब खोने को बहुत कुछ नहीं होता। तसलीमा तब लिख रही हैं जब कैरियर शुरु हो रहा होता है और उसे बनाए रखना होता है। दोनों ने किस कदर भिन्न परिस्थितियों में रह कर लिखा, वह तो सबको मालूम है।

  11. रंगनाथ सिंह Reply

    March 7, 2010 at 2:18 pm

    आवेश भाई, आपने तलाक के बारे में जो कुछ कहा है वो असत्य है। आपको मालूम ही होगा हिन्दु विवाह अधिनियम 1956 के तहत कोई व्यक्ति तलाक लेकर दूसरी शादी कर सकता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुसलमान ही तलाक लेते हैं। किसी दूसरे धर्म में तलाक की बारंबारता कम या ज्यादा हो सकती है। लेकिन आज किसी धर्म में इसका अभाव नहीं है। यदि धर्म के कोण से देखा जाय तो हिन्दु धर्म में तलाक का कोई प्रावधान नहीं है। लेकिन हिन्दुओं ने इसे कानूनी और सामाजिक रूप में स्वीकार करके इस बात की पुष्टि की कि धर्म के संस्थागत,आचार-व्यवहारगत स्वरूप बदलते रहते हैं। इनके आधार पर किसी का धर्म या आस्था नहीं जांची जा सकती।

    फिर भी आप इस आधार पर ही तसलीमा को परखना चाहते हैं तो मैं आपको प्रेमचंद,राहुल सांकृत्यायन,धर्मवीर भारती,राजेन्द्र यादव जैसे उदाहरण देना चाहुंगा। आदरणीय जैनेन्द्र जी ने तो एक पत्नी-एक रखैल का साहित्य-सिद्धांत ही दे दिया था। तसलीमा ने जनसत्ता के हालिया लेख में रश्दी के हवाले इस मुद्दे को उठाया है। हुसैन तो उस उम्र में रंगीन है जिसमें….। क्या कहुं ? तसलीमा महिला है इसलिए लोगों के प्रतिमान बदल गए हैं। मुझे लगता है सभी मर्दो को मन्नु भण्डारी लिखित करतूते मर्दां जरूर पढ़ना चाहिए। यदि वह खुद को बुद्धिजीवी समझता है तो जरूर जरूर पढ़ना चाहिए। औरत और मर्द कलाकार/बुद्धिजीवी/संस्कृतिकर्मियां को लेकर मैंने बहुत सलीके से उदाहरण दिए हैं। जान बूझ कर विदेशी या हिन्दी से इतर भाषाओं के नाम नहीं लिया है। तसलीमा जिस भाषा बांग्ला में लिखती है उसका उदाहरण भी रहने दिया है। वरना उस भाषा के गुुरूदेव माने जाने वाले साहित्यकार भी इसकी आंच से नहीं बच पाएंगे।

  12. indian citizen Reply

    March 7, 2010 at 2:25 pm

    सब कुछ तो कह दिया है रंगनाथ जी ने. इसके बावजूद कोई मुखालफत करता है तो सिर्फ मुखालफत के लिये. खामखयाली में भी कुछ लोग जीते हैं. अहं ब्रह्मास्मि पढ़ना चाहिये लेखक आवेश जी को. बाकी हिन्दू को गरियाना तो फैशन में. डेनिश कार्टूनिस्ट के चित्र लगाकर लिखो तो जाने कि आप दोनों पक्षों को बराबर देखते हैं.

  13. शहरोज़ Reply

    March 7, 2010 at 2:41 pm

    main rangnath ji aur indian citizen se chahunga ki vo meri nayi post padhen.husain tasleem rushdi aur cartoon k mudde par

  14. रंगनाथ सिंह Reply

    March 7, 2010 at 2:47 pm

    आपने मुझसे पूछा है कि आप कितनी शादी का साहस करेंगे ? भाई, यदि मैं शादी करने का ही साहस न करूं तो क्या शादी करने को ही व्याभिचार मान लूं। हमारे देश में तो ब्रह्मचर्य की भी अपरंपरपार महिमा बताई गयी है। उकसा क्या ?

    इसी संदर्भ में एक अन्य प्रश्न है कि क्या शादी करके पत्नि-पु़त्र छोड़ कर सन्यासी न बन जाना भी किसी महिला पर एक तरह का अत्याचार हो सकता है ? जिसका हमारे देश के महापुरुषों ने अनुसरण किया है। तो इस अपराध में आसानी से बुद्ध और महावीर तक को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। विश्वामित्र की तपस्या भंग एक अप्सरा कर सकती है। एक महानकवि राज-पाट,हाथी-घोड़े छोड़कर एक लौंडी कुरंगी को मांग सकता है। उसके संग के लिए सामाजिक बहिष्कार स्वीकार सकता है। यदि एक किशोरवय मत्सकन्या कन्या एक अस्सी साला ऋषि का शिकार बनती है। और ऐसे शारीरिक संबंध से कोई व्यास जैसा मेधावी पुत्र पैदा हो और वह कालांतर में महाभारत लिखे,वेदों का संचयन करे तो यह पूरा मामला पेचीदा हो जाएगा। अतः इस मुद्दे का मैं फिलवक्त यहीं छोड़ रहा हूं।

  15. रंगनाथ सिंह Reply

    March 7, 2010 at 3:10 pm

    तसलीमा ने तीन शादियां कीं। 1982 में पहली की और 1992 में तीसरी से तलाक ले लिया। आप उसे जिस तरह से चरित्रहीन बताने की कोशिश किए जा रहे हैं उसे देखकर यह भी कहना पड़ेगा कि 1992 से 2010 तक उसका अविवाहित एकाकी जीवन के बारे में आपकी क्या राय है ? इस मुद्दे पर मैं अपनी राय साफ कर सका हूं। उम्मीद है आप समझेंगे।

    आपने तसलीमा के प्रेम की सच्चाई पर भी संदेह किया है। ऐसा लगता है कि आपको तसलीमा का इतिहास नहीं पता। जैसा प्रेम तसलीमा ने जिया वैसा प्रेम नेरूदा,पुश्कीन या तसलीमा के वश की बात है। तसलीमा ने उदात्त प्रेम किया। सबसे शर्मनाक विश्वासघात झेला। तसलीमा कोई बेसकूफ या फटेहाल महिला नहीं थी। एक डाक्टर प्रोफेसर की बेटी थी। डाक्टरी पढ़ रही थी। शुरू से साहित्यिक अभिरूचियां रखती थी। लिखती थी।

    पे्रम से ज्यादा व्यक्तिगत कोई दूसरा विषय नहीं होगा। फिर भी आपके दबाव में कहना चाहुंगा कि प्रभा के प्रेम में ऐसी कोई उदात्ता नहीं थी जैसी तसलीमा में थी। प्रभा का प्रेम बहुत हद तक मन्नु भण्डारी के प्रेम की तरह था। जो मोहासक्त,पतिव्रता भारतीय प्रतिमान के करीब ठहरता है। जिसमें सहना स्त्री के जिम्मे होता है। अत्याचार करना पुरुष के जिम्मे। बहुधा कई स़्ित्रयों भी पतियों के अत्याचार सह जाने को समपर्ण समझती है। कभी कभी तो कुछ महिलाएं मैसोइज्म की शिकार होे जाती हैं। दुख में आनन्द पाने लगती है। प्रभा खेतान या मन्नु जी का मनोविश्लेषण करने का मेरा फिलवक्त कोई इरादा नहीं। लेकिन तसलीमा का प्रेम झूठा था या किसी का प्रेम झूठा था यह कहने का साहस मुझमें नहीं है।

  16. काजल कुमार Reply

    March 7, 2010 at 4:30 pm

    ऐसा लिखना इनका धंधा है..
    और उसपर तुर्रा ये कि यह धंधा चोखा भी चल रहा है तो परहेज़ कैसा !

    • awesh Reply

      March 7, 2010 at 6:00 pm

      काजल भाई ,धंधे की बड़ी समझ है आपको ,हम जानते हैं आप यही करते आये हैं ,धन्धा हमारा चोखा चल रहा है अपने ब्लॉग पर करोड़ों डालर आपने जमा करके रखे हैं|है न ?सच्ची बोलिए ?जानते हैं वो सिर्फ विजेट नहीं है ,धंधे की समझ का प्रतीक है ,मौका मिले तो हम भी सीखेंगे

  17. anil kapoor Reply

    March 7, 2010 at 6:08 pm

    hello, aawesh g aapne jo bhi likha hai tark k liye bahut achha hai par zara ye batayenge ki is tarah k subjects par likhe jane wale novels me kya sambhav hai ki bina aise apnee baat rakhi ja sake…………….

    • awesh Reply

      March 7, 2010 at 8:53 pm

      बिलकुल कही जा सकती है ,आप एक काम करें अनिल भाई ,प्रभा खेतान अनुदित सिमोन द बोआवर की “स्त्री उपेक्षिता” ले आयें और उसे पढ़ें

  18. jenny shabnam Reply

    March 11, 2010 at 2:38 pm

    awesh ji,
    aaj dubara aapki is posting par aai, kyunki aapki baat se meri asahmati thee, ya yun kahun ki ab bhi asahmat hun. sabhi logon ke vichaar yahan padhi. mera bas yahi manna hai ki lekhak purush ho ya mahila, vishay chahe jo bhi ho, kuchh baaten saanketik likhi jaye to hin bhali lagti hai. ashleel shabdon ke lekhan ya warnan par aapki raaye se main sahmat hun, parantu kisi aurat ne likha is baat se aapki asahmati se main sahmat nahi. shubhkaamnayen.

  19. Vibha Rani Reply

    May 19, 2010 at 4:52 pm

    सेक्स, प्रेम, सम्भोग की बातें आते ही कितनी कलमें चलने लगती हैं? और विषय लाइये- कमेंट की आशा? ढूंढते रह जाओगे. आखिर मन की कुंठा कहां जाएगी?

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