
मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में इन दिनों मोटे तौर पर तीन तर्क दिए जा रहे हैं।
ये समर्थक हुसैन… हुसैन… हुसैन चिल्ला कर छाती कूट रहे हैं। इनकी नज़र में हुसैन के “कतरी नागरिक” हो जाने से अभिव्यक्ति की आज़ादी छिन गई है। वो कह रहे हैं कि अब भारत उतना भी आज़ाद नहीं रहा जितना ईसा पूर्व था। अब भारत में कला गुलाम हो गई है। वो भारत सरकार और जनता से अपने लिए ऐसी आजादी मांग रहे हैं ताकि कई और नए खजुराहो की रचना कर सकें। पैगंबर के कार्टून बना सकें। अल्लाह की मूर्तियां गढ़ सकें। देवी-देवताओं के जिस्म के जरिए अपने दिलो-दिमाग में बैठी तमाम कुंठाओं और अकांक्षाओं में रंग भर सकें।
उन्हें आज़ादी इसलिए भी चाहिए कि अपनी विचारधारा और सहूलियत के मुताबिक जब चाहें जिस किसी ऐतिहासिक शख़्स को नंगा कर सकें। ठीक वैसे ही जैसे हुसैन ने वहशी… क्रूर हिटलर को नंगा किया है। मतलब कलाकारों के लिए पेंटिंग्स सियासी हथियार भी हैं लेकिन उनकी मांग है कि उनकी कलाकृतियों पर ओछी सियासत नहीं हो। जिस तरह हिटलर को नंगा करके हुसैन ने उसके प्रति अपनी नफ़रत जाहिर की, इस देश में बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें गांधी, अंबेडकर, लोहिया और जयप्रकाश नारायण से भी चिढ़ होगी। तो क्या उन्हें भी आज़ादी दे दी जाए कि वो जब चाहें… जैसे चाहें .. .अपनी नफरत का इजहार कर सकते हैं? फिर तनाव होगा तो क्या आप लोगों को यह समझाइएगा कि वो कलाकार की नीयत पर शक नहीं करे। उसके सिम्बॉलिज्म को समझे। भारतीय इतिहास और उसके दर्शन को समझे।
इतिहास से चित्र और मूर्तियां उठा कर शाब्दिक मायाजाल गढ़ने वाले तमाम विचारक यह भूल जाते हैं कि वो सभी चित्र और मूर्तियां सत्ता के संरक्षण में ही निर्मित हुई हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर मोर्य काल, गुप्त काल और मुगल काल सभी दौर सत्ता की तरफ से मिले संरक्षण पर ही वो महान रचनाओं का जन्म हुआ। कलाकार भले ही देश और समाज की मजबूरियों का ख्याल नहीं रखे, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों को इसका अहसास बखूबी रहता है। उन्हीं मजबूरियों के आधार पर कलाकार की आज़ादी का दायरा तय होता है। उसे अपने सपनों और विचारों में रंग भरने और आकार देने की हर छूट दी जाती है।
चाहे आप खजुराहो को ही क्यों नहीं लें। खजुराहो का निर्माण नौंवी और ग्यारहवीं शताब्दी के बीच हुआ है। खजुराहो चंदेलों की राजधानी थी। और हिंदुओं के आधिपत्य वाले उस इलाके में उन मंदिरों का निर्माण चंदेल शासकों के इशारे पर हुआ। उन्हीं के संरक्षण में खजुराहो की भव्य संरचना हुई। यह सोचने लायक बात है कि हिंदू समाज में हिंदू शासकों के संरक्षण में निर्मित कृति पर सवाल उठाने का साहस कौन कर सकता था? क्या तब वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था थी? क्या लोगों को विरोध जताने का हक़ था? क्या सत्ता के ख़िलाफ़ मुक़दमों का हक़ था? क्या अदालत में सरकारों को चुनौती देने का हक़ था?
वह एक सामंती व्यवस्था थी। जिसमें एक राजा पूरी जनता को नाध कर अपने लिए महल बनवाता था। शिल्पकारों को कह कर अपने सपनों को साकार करवाता था। वैसी व्यवस्थाओं में बहुत से कलाप्रेमी और अय्याश राजाओं के इशारे पर बहुत सी उनमुक्त रचनाएं हुईं। खजुराहो और छत्तीसगढ़ का भोरमदेव मंदिर समेत ऐसी ढेरों मिसालें मिल जाएंगी। लेकिन अगर कोई कहे कि वो रचनाएं अभिव्यक्ति की आज़ादी नमूना हैं तत्कालीन समाज का आईना नहीं तो इससे अधिक मूर्खता क्या हो सकती है।
आज जो भी खजुराहो का हवाला देते हैं या फिर यक्षणी की नग्न मूर्तियों को उठा कर अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग करते हैं क्या वो यह कह सकते हैं कि उस वक़्त उन मूर्तियों और कलाकृतियों की रचना सत्ता और समाज से विद्रोह के कारण हुई होगी। अगर ऐसा है तो फिर आज उन मूर्तियों और कलाकृतियों को रचने वाले कलाकारों का इतिहास क्यों नहीं मिलता? इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो रचनाएं तभी हुई होंगी जब सत्ता और समाज ने वैसी छूट दी होगी।

दरअसल, उनमुक्त आज़ादी की मांग करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आज़ादी की कुछ सीमाएं क्यों निर्धारित की जाती हैं? अगर कोई भी देश और समाज यह तय करता है कि जाति, धर्म, बोली और क्षेत्र की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो उसका एक खास मकसद होता है। यह मकसद समाज के कमजोर तबकों की रक्षा के लिए होता है। आज अगर उनमुक्त आज़ादी दे दी जाएगी तो ताक़तवर समुदाय के कट्टरपंथी कलाकृतियों और लेखों के जरिए कमजोर समुदायों की भावनाओं को हर रोज दमित किया करेंगे। अगर उन लेख और कलाकृतियां की वजह से हिंसा भड़की तो यह तय है कि उस हिंसा में जीत ताक़तवर समुदाय की होगी। वो कमजोर समुदायों के ज़्यादा लोगों को क़त्ल करेंगे और उन्हें इलाका छोड़ने पर मज़बूर करेंगे। इसका दंश यह देश भोग चुका है।
भारत में धर्म और जाति का मसला बेहद संवेदनशील है। ऐसा क्यों है? आप इस पर सवाल कर सकते हैं लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं फेर सकते। इस सच्चाई को भी नहीं ठुकरा सकते कि देश में हजारों-लाखों लोगों का क़त्ल इसी धर्म की आड़ में हुआ था। असम से लेकर पंजाब और जम्मू कश्मीर से लेकर केरल तक कई बार धर्म के नाम पर दंगें हुए हैं। बम फोड़े गए हैं… गोलियां बरसाई गई हैं। लहू बहाया गया है। ऐसे देश में अगर कोई कलाकार संयत नहीं है और वह भारत की इस मजबूरी को समझने और मानने से इनकार करता है … तो यह नादानी उसकी है।
खजुराहो और शिवलिंग के नाम पर उनमुक्त आज़ादी की मांग करने वाले लोगों को भारत की मौजूदा ढांचे पर गौर करना चाहिए। यह भी गौर करना चाहिए की अभिव्यक्ति की आज़ादी किस लिए चाहिए। धार्मिक उनमुक्तता को प्रदर्शित करने के लिए या फिर सत्ता तंत्र की तानाशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन के लिए? इतिहास पुरुषों को नंगा करके उनके समर्थकों को आहत करने के लिए या फिर जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए? कला के नाम पर जनता की हिंसक भावनाओं को भड़काने के लिए या फिर ताक़तवर लोगों द्वारा जनता के साथ हो रहे विश्वासघात से पर्दा उठाने के लिए?
यह सही है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी चाहिए। और किसी को भी दूसरों पर हमले की इजाजत नहीं दी जा सकती। हुसैन और हुसैन की कलाकृतियों पर जिन्होंने भी हमला किया है उन्होंने बड़ा अपराध किया है। उन्होंने वतन का नाम और माहौल ख़राब किया है। उन सभी के ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आना चाहिए। लेकिन उनकी करतूतों से हुसैन की ग़लती को सही नहीं ठहराया जा सकता। खजुराहो को हर ग़लती और अपराध को जायज ठहराने का औजार नहीं बनाया जा सकता। वैसे भी समाज की हक़ीक़त पर पर्दा डाल कर रोमैन्टेसिज्म में जीने से कुछ हासिल नहीं होता।
सुशील देव मिश्र
March 6, 2010 at 3:32 pm
हुसैन के अंध विरोध में आपकी भाषा कितनी अश्लील हो गयी है जनाब? हुसैन के समर्थकों को खजुराहो का खुला खेल खेलने की चाहना रखने वालों की श्रेणी में रख कर आप हंस रहे होंगे – लेकिन आपकी हंसी से खोखली ध्वनि फूट रही है – आप खुद देखिए। आपको इतिहास और कला की अपनी समझ के बारे में पुनर्विचार करना चाहिए। आपकी स्थिति वही है कि जब क्रांति, समाजवाद और जनांदोलन की सतही व्याख्या किसी नये मुल्ले के हाथ लगती है तो वह उछल पड़ता है और उसी व्याख्या के सहारे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हांक देता है। संभालिए अपने आपको, अन्यथा आपको गहरे अवसाद का सामना करना पड़ेगा।
समरेंद्र
March 6, 2010 at 4:18 pm
सुशील जी,
सुझाव के लिए धन्यवाद। कोशिश करुंगा की सारी परिभाषाएं आपके हिसाब से समझ सकूं। लेकिन आप कुछ व्याख्या समझाएं तो सही। आप तो आए… मुझे नया मुल्ला घोषित किया और चले गए। ऐसे तो आपकी बातें आप जैसे ही ज्ञानी समझ सकेंगे। मेरे जैसे मूर्खों को थोड़ा विस्तार में बताइए। समाजवाद की परिभाषा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, वगैरह … वगैरह … इन सभी मुद्दों पर गहरी रोशनी डालिए। मुझे गहरे अवसाद से बचाइए।
प्रभात शंकर
March 6, 2010 at 8:27 pm
समरेन्द्रजी
खजुराहो को हुसैन से जोडना ‘कहीं का ईंट कहीं का रोडा’ की तरह है। सच कहा आपने, खजुराहोसत्ता और समाज से िचद्रोह की ही अभिव्यक्ति है। एक गरीब ब्राह्मण की युवा बेटी ऋतुमती होने के बाद नदी में स्नान कर रही थी कि दुष्ट और कामी चन्द्रमा की उस पर नजर पडी। चन्द्रमा ने उस युवती से बलात्कार किया और वह गर्भवती हो गई। समाज का लांछन झेलती वह युवती भटकती रही। चन्द्रमा ने भी उसे स्वीकार नहीं किया। अंतत:
उसने पुत्र को जन्म दिया। पुत्र को जंगलों में भटकते हुए पाला-पोसा और युद्घ कला में प्रवीण किया। यही युवक आगे चलकर पहला चन्द्रवंशी राजा बना और उसने ही खजुराहो के मंदिरों का निर्माण आरम्भ करवाया। इन मंदिरों की मूर्तियों में उस बलात्कार की पीडा की घ्वनियां भी शामिल हैं। हुसैन के चित्रों में सिर्फ और सिर्फ हिंसा है। प्रतीकों को बेचकर धन अर्जित करनेवाली हिंसा।
SHAMBHUKSINGH
March 7, 2010 at 7:41 am
समरेंद्र
हुसेन एक सफल कारीगर है बस और कुछ नहीं… मकबूल साहब पॉर्न फिल्मों का धंधा क्यों नहीं कर लेते… लेकिन एक सवाल है भारत में कानूनी तौर पर धंधा बैन है… इसलिए उन्हें लास वेगास जाना होगा… मैं किसी धंधे के खिलाफ नहीं हूं… बस उसमें आपको महारात हासिल होना चाहिए… मॉडरेटर महोदय अगर आपको मस्तराम की किताब अच्छी लगती है तो फिर आप उसे ही पढ़े… हम आपको जबरदस्ती थोड़े ही कहेंगे की आप गीता पढ़िए… अगर वो नंगी तस्वीर बनाते हैं तो हम थोड़े ही कहेंगे की आप कपड़े वाली तस्वीर बनाइये… हां व्यक्तिगत रुप से वो तस्वीर किसी की नहीं होनी चाहिए… वैसे भी भगवानों की तस्वीरों और चेहरे का किसी ने पेटेंट तो करवाया नहीं है… इसलिए वो बनाए… खूद भगवान आकर विरोध जताएंगे… और हां मैं हुसेन साहब का न तो फैन हूं… और न ही विरोधी… इतना साफ है कि उनका एक बाजार है… जहां वो इस देश के किसी भी सफल उद्यमी से ज्यादा चालाक और बड़े उद्यमी हैं… मुझे नहीं लगता की हुसेन के देश से बाहर रहने से अस्सी करोड़ लोगों की गरीबी पर कोई असर पड़ेगा… या वो और गरीब हो जाएंगे… या उनके आने से गरीबी दूर हो जाएगी… इसलिए ये मुद्दा उतना बड़ा नहीं है कि आप जैसे लोग इसमें पिसने लगे… हां ये बात जरूर है कि अगर हुसेन में राष्ट्रीयता की भावना होती तो वो यहां संघर्ष करते… लेकिन वो तो बाजार के सबसे सफल कारीगर है… जिस तरह से हर साल हजारों भारतीय यहां के पैसे से पढ़कर विदेश चले जाते हैं… और हम उन्हें ज्यादा सफल मानते हैं… लड़कियां भी लाइन लगाकर खड़ी होती है… वो अब पैसे की वजह से वोट भी कर पाएंगे… उसी तरह ये कारीगर भी चला गया…. लेकिन
समरेंद्र, आप हुसेन की काबिलियत पर उंगली नहीं उठा पाएंगे…क्योंकि वो अपने फन में माहिर है… हां उससे समाज की भलाई में योगदान की आशा रखना बेवकूफी है… हम आप जैसे चंद लोगों की यही समस्या है कि हम सबको इमानदारी और समाजवाद की कसौटी पर कसना चाहते हैं… अरे जाने दीजिए… लाखों करोड़पति के बीच वो भी एक करोड़पति देश से चला गया… वैसे भी इस देश के अमीर कितना इस देश के हिसाब से चलते हैं… वो रहते जरूर भारत में है लेकिन उनके घर का हर एक तिनका सात समुंदर पार से आता है… ये देश के प्रति प्यार, अपनापन, सब बस कहने की बात है… नहीं तो हम जैसे कुछ गरीब और चुतियम सलफेट के लिए हैं… आप से बहुत आशा है… समाज को आप आर्थिक रूप से तो नहीं लेकिन वैचारिक रूप से आग देने वाले हैं… इस देश में आप जैसे लोगों की जरूरत है… लेकिन निरा हुसेन को लेकर अविनाश सर और आप में दूरी देखने को मिल रही है… ये मीडिया के लिए टीआरपी बहस है…जनतंत्र और मोहल्ला जैसे पवित्र और क्रांतिकारी जगहों को समाज के दूसरे जरूरी मुद्दों के लिए रखिए… हुसेन यहां रहे या वहां रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता… हां वो एक सफल कारीगर है… इसलिए उसकी पूछ रहेगी… खुजराहो के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए शुक्रिया… वो गुलामों के जमाने की तस्वीर है… और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के साथ जोड़ना सचमुच घिनौना है… इस मौलिक विचार के लिए धन्यवाद…
दिनेशराय द्विवेदी
March 8, 2010 at 7:15 am
एक हुसैन ठेला घसीटता है
और सामान जरुरत मंदों को पहुँचाता है
एक हुसैन सुबह सुबह
म्युनिसिपैलिटी की गाड़ी आने के पहले
कचरे में से काम की चीजें बीनता है
उस की रोटी के जुगाड़ के लिए
एक हुसैन भिश्ती
दोपहर नालियाँ धोता है
कि बदबू न फैले शहर में
एक हुसैन सुबह अपनी बेटी को छोड़ कर आता है स्कूल
दसवीं कक्षा के इम्तिहान के लिए
एक हुसैन अंधेरे मुँह गाय दुहता है
और निकल पड़ता है
घरों को दूध पहुँचाने
एक और हुसैन ……..
एक और हुसैन………
और एक हुसैन………
कितने हुसैन हैं?
लेकिन याद रहा सिर्फ एक
जिसने कुछ चित्र बनाए
लोगों ने उन्हें अपनी संस्कृति का अपमान समझा
उसे पत्थर मारे
और उसे यादगार बना दिया
ठीक मजनूँ की तरह।
अमित सिंह
March 8, 2010 at 7:43 am
बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन अक्ल के अंधों के आगे बीन बजाने जैसा नहीं लग रहा है क्या़?
VIKAS MISHRA
March 8, 2010 at 4:00 pm
बचपन में एक कहानी सुनी थी (माफ कीजिएगा पढ़ी नहीं थी)कि बीरबल ने अकबर से कहा कि वो ऐसा कपड़ा पहनाएंगे, जो सिर्फ उनको दिखेगा, जो अपने पिता की औलाद हैं। शहर में ढिंढोरा भी पिटवा दिया कि सिर्फ अपने पिता की औलाद ही ये कपड़े देख पाएगी। बीरबल ने अकबर को नंगे ही बाहर निकाल दिया। सारी प्रजा ने नंगे अकबर के कपड़ों की तारीफ की। ये कहानी बताने का संदर्भ हुसैन के प्रसंग में ही है। पूरे प्रकरण को देखिए, दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचिए। फिर दिल पर हाथ रखकर कहिए कि क्या आप वाकई हुसैन का समर्थन करेंगे। अकबर की प्रजा की तरह से भेद खुलने के डर से मत बोलिए। धर्म निरपेक्षता सनातन मार्ग है, लेकिन उसे बीमारी मत बनने दीजिए। मेरा धर्म के ठेकेदारों से कोई लेना-देना नहीं है। संघी विचारधारा में कोई आस्था नहीं है। लेकिन दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचता हूं, देखता हूं तो हुसैन नंगे दिखते हैं। धर्म के ठेकेदारों से डरकर जिस देश में वो गए हैं,वहां आप किसी देवी देवता की एक तस्वीर लेकर भी नहीं जा सकते। हुसैन चाहें तो भी कतर में हिंदू देवी देवताओँ के चित्र नहीं बना सकते।
सवाल ये नहीं कि धर्म के ठेकेदारों ने हुसैन पर हमला किया। सवाल ये था कि क्या हुसैन ने वाकई आस्था पर चोट की थी। अगर नहीं की थी तो कम से कम इतना कह देते कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। लोगों ने कब किसको माफ नहीं किया है। आस्था बेहद निजी चीज है। चोट लगती है तो तकलीफ होती है। डेनमार्क के कार्टूनिस्ट ने पैगंबर मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने की हिमाकत की थी। (वही कार्टून मैग्जीन में छापने के चलते वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जेल यात्रा भी कर ली।) कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर करोड़ों का इनाम घोषित कर दिया गया। इनाम घोषित करने वालों का विरोध नहीं हुआ। चोट आस्था पर हुई थो तो विरोध हुआ। मैं ये भी नहीं चाहता कि हुसैन और उस कार्टूनिस्ट को जोड़कर देखा जाए। क्योंकि हुसैन का मामला अलग है। हुसैन इस देश की आन बान और शान बढ़ाने वाले इंसान हैं, लेकिन हुसैन ने वो मौका खो दिया कि लोग उन पर गर्व करें। सुरक्षा और आजादी यहां सबका हक है। अगर अपने देश से तिरस्कृत तसलीमा नसरीन को यहां सुरक्षा मिल सकती है तो हुसैन साहब तो अपने थे। शाहरुख और बाल ठाकरे के बीच क्या हुआ। बात आस्था की नहीं थी, ठाकरे का हमला गलत था, शाहरुख अगर झुकते तो हिंदुस्तान झुकता, इंसानियत झुकती। शाहरुख का क्या बिगाड़ लिया ठाकरे और उनकी सेना ने। अलबत्ता शाहरुख की फिल्म तो सुपरहिट हो गई। सवाल ये है कि आप हमले के डर से घर बार छोड़ देंगे? अपना देश छोड़ देंगे? अगर सभी देशवासी ऐसे सोचते तो देश में सिर्फ चोर डाकू बचेंगे।
हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।
समरेंद्र
March 8, 2010 at 5:23 pm
मैं आपकी बातों से सहमत हूं विकास जी। हुसैन पर हमले का विरोध होना चाहिए। किसी को भी उनकी अभिव्यक्ति की राह में रोड़े अटकाने का हक़ नहीं है। जो भी उन पर या फिर उनकी पेटिंग्स पर हमला करता है उससे सख्ती से निपटना चाहिए। उन सभी हिंसक तत्वों को उठा जेल में ठूंस देना चाहिए। लेकिन इससे हुसैन का अपराध कम नहीं होता। हुसैन एक बीमार मानसिकता के व्यक्ति हैं। एक मौकापरस्त और लालची प्रवृति के इंसान हैं। उन्होंने कतर जाने का फैसला लालच और सुविधा की वजह से लिया है। इसलिए उनके इस फैसले को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे हुसैन पर आंसू बहाने की जरूरत नहीं है। अच्छा हुआ वह चले गए।
ठाकुर पद्म सिंह
March 9, 2010 at 12:44 am
हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।
वाह ! विकास जी वाह ! आपने चंद शब्दों में इतनी सटीक बात कह दी कि और कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं
कलाप्रेमी
March 10, 2010 at 1:08 am
बेहद संतुलित, ईमानदार और दिल से लिखा गया लेख है। इसमें बौद्धिकता का बोझ नहीं है, दो टूक बात है, जो सीधे दिल को छूती है। बधाई हो विकास…ऐसे ही लिखना जारी रखें…जनतंत्र पर आपके और लेखों का भी इंतज़ार रहेगा।
कलाप्रेमी
March 10, 2010 at 1:11 am
मेरी गुजारिश है कि विकास की टिप्पणी को लेख की तरह अलग से पोस्ट करें…ये दरअसल एक मुकम्मल लेख है। टिप्पणी नहीं।