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	<title>Comments on: खजुराहो के गर्भ में अटक गए हैं हुसैन के अंध समर्थक</title>
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	<description>बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे</description>
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		<title>By: कलाप्रेमी</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-599</link>
		<dc:creator>कलाप्रेमी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Mar 2010 19:41:00 +0000</pubDate>
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		<description>मेरी गुजारिश है कि विकास की टिप्पणी को लेख की तरह अलग से पोस्ट करें...ये दरअसल एक मुकम्मल लेख है। टिप्पणी नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरी गुजारिश है कि विकास की टिप्पणी को लेख की तरह अलग से पोस्ट करें&#8230;ये दरअसल एक मुकम्मल लेख है। टिप्पणी नहीं।</p>
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		<title>By: कलाप्रेमी</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-598</link>
		<dc:creator>कलाप्रेमी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 09 Mar 2010 19:38:49 +0000</pubDate>
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		<description>बेहद संतुलित, ईमानदार और दिल से लिखा गया लेख है। इसमें बौद्धिकता का बोझ नहीं है, दो टूक बात है, जो सीधे दिल को छूती है। बधाई हो विकास...ऐसे ही लिखना जारी रखें...जनतंत्र पर आपके और लेखों का भी इंतज़ार रहेगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद संतुलित, ईमानदार और दिल से लिखा गया लेख है। इसमें बौद्धिकता का बोझ नहीं है, दो टूक बात है, जो सीधे दिल को छूती है। बधाई हो विकास&#8230;ऐसे ही लिखना जारी रखें&#8230;जनतंत्र पर आपके और लेखों का भी इंतज़ार रहेगा।</p>
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		<title>By: ठाकुर पद्म सिंह</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-597</link>
		<dc:creator>ठाकुर पद्म सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 19:14:47 +0000</pubDate>
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		<description>हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।

वाह ! विकास जी वाह ! आपने चंद शब्दों में इतनी सटीक बात कह दी कि और कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।</p>
<p>वाह ! विकास जी वाह ! आपने चंद शब्दों में इतनी सटीक बात कह दी कि और कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं</p>
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		<title>By: समरेंद्र</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-596</link>
		<dc:creator>समरेंद्र</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 11:53:25 +0000</pubDate>
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		<description>मैं आपकी बातों से सहमत हूं विकास जी। हुसैन पर हमले का विरोध होना चाहिए। किसी को भी उनकी अभिव्यक्ति की राह में रोड़े अटकाने का हक़ नहीं है। जो भी उन पर या फिर उनकी पेटिंग्स पर हमला करता है उससे सख्ती से निपटना चाहिए। उन सभी हिंसक तत्वों को उठा जेल में ठूंस देना चाहिए। लेकिन इससे हुसैन का अपराध कम नहीं होता। हुसैन एक बीमार मानसिकता के व्यक्ति हैं। एक मौकापरस्त और लालची प्रवृति के इंसान हैं। उन्होंने कतर जाने का फैसला लालच और सुविधा की वजह से लिया है। इसलिए उनके इस फैसले को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे हुसैन पर आंसू बहाने की जरूरत नहीं है। अच्छा हुआ वह चले गए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं आपकी बातों से सहमत हूं विकास जी। हुसैन पर हमले का विरोध होना चाहिए। किसी को भी उनकी अभिव्यक्ति की राह में रोड़े अटकाने का हक़ नहीं है। जो भी उन पर या फिर उनकी पेटिंग्स पर हमला करता है उससे सख्ती से निपटना चाहिए। उन सभी हिंसक तत्वों को उठा जेल में ठूंस देना चाहिए। लेकिन इससे हुसैन का अपराध कम नहीं होता। हुसैन एक बीमार मानसिकता के व्यक्ति हैं। एक मौकापरस्त और लालची प्रवृति के इंसान हैं। उन्होंने कतर जाने का फैसला लालच और सुविधा की वजह से लिया है। इसलिए उनके इस फैसले को अभिव्यक्ति की आज़ादी से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे हुसैन पर आंसू बहाने की जरूरत नहीं है। अच्छा हुआ वह चले गए।</p>
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		<title>By: VIKAS MISHRA</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-595</link>
		<dc:creator>VIKAS MISHRA</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 10:30:14 +0000</pubDate>
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		<description>बचपन में एक कहानी सुनी थी (माफ कीजिएगा पढ़ी नहीं थी)कि बीरबल ने अकबर से कहा कि वो ऐसा कपड़ा पहनाएंगे, जो सिर्फ उनको दिखेगा, जो अपने पिता की औलाद हैं। शहर में ढिंढोरा भी पिटवा दिया कि सिर्फ अपने पिता की औलाद ही ये कपड़े देख पाएगी। बीरबल ने अकबर को नंगे ही बाहर निकाल दिया। सारी प्रजा ने नंगे अकबर के कपड़ों की तारीफ की। ये कहानी बताने का संदर्भ हुसैन के प्रसंग में ही है। पूरे प्रकरण को देखिए, दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचिए। फिर दिल पर हाथ रखकर कहिए कि क्या आप वाकई हुसैन का समर्थन करेंगे। अकबर की प्रजा की तरह से भेद खुलने के डर से मत बोलिए। धर्म निरपेक्षता सनातन मार्ग है, लेकिन उसे बीमारी मत बनने दीजिए। मेरा धर्म के ठेकेदारों से कोई लेना-देना नहीं है। संघी विचारधारा में कोई आस्था नहीं है। लेकिन दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचता हूं, देखता हूं तो हुसैन नंगे दिखते हैं। धर्म के ठेकेदारों से डरकर जिस देश में वो गए हैं,वहां आप किसी देवी देवता की एक तस्वीर लेकर भी नहीं जा सकते। हुसैन चाहें तो भी कतर में हिंदू देवी देवताओँ के चित्र नहीं बना सकते।
सवाल ये नहीं कि धर्म के ठेकेदारों ने हुसैन पर हमला किया। सवाल ये था कि क्या हुसैन ने वाकई आस्था पर चोट की थी। अगर नहीं की थी तो कम से कम इतना कह देते कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। लोगों ने कब किसको माफ नहीं किया है। आस्था बेहद निजी चीज है। चोट लगती है तो तकलीफ होती है। डेनमार्क के कार्टूनिस्ट ने पैगंबर मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने की हिमाकत की थी। (वही कार्टून मैग्जीन में छापने के चलते वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जेल यात्रा भी कर ली।) कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर करोड़ों का इनाम घोषित कर दिया गया। इनाम घोषित करने वालों का विरोध नहीं हुआ। चोट आस्था पर हुई थो तो विरोध हुआ। मैं ये भी नहीं चाहता कि हुसैन और उस कार्टूनिस्ट को जोड़कर देखा जाए। क्योंकि हुसैन का मामला अलग है। हुसैन इस देश की आन बान और शान बढ़ाने वाले इंसान हैं, लेकिन हुसैन ने वो मौका खो दिया कि लोग उन पर गर्व करें। सुरक्षा और आजादी यहां सबका हक है। अगर अपने देश से तिरस्कृत तसलीमा नसरीन को यहां सुरक्षा मिल सकती है तो हुसैन साहब तो अपने थे। शाहरुख और बाल ठाकरे के बीच क्या हुआ। बात आस्था की नहीं थी, ठाकरे का हमला गलत था, शाहरुख अगर झुकते तो हिंदुस्तान झुकता, इंसानियत झुकती। शाहरुख का क्या बिगाड़ लिया ठाकरे और उनकी सेना ने। अलबत्ता शाहरुख की फिल्म तो सुपरहिट हो गई। सवाल ये है कि आप हमले के डर से घर बार छोड़ देंगे? अपना देश छोड़ देंगे? अगर सभी देशवासी ऐसे सोचते तो देश में सिर्फ चोर डाकू बचेंगे।
हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बचपन में एक कहानी सुनी थी (माफ कीजिएगा पढ़ी नहीं थी)कि बीरबल ने अकबर से कहा कि वो ऐसा कपड़ा पहनाएंगे, जो सिर्फ उनको दिखेगा, जो अपने पिता की औलाद हैं। शहर में ढिंढोरा भी पिटवा दिया कि सिर्फ अपने पिता की औलाद ही ये कपड़े देख पाएगी। बीरबल ने अकबर को नंगे ही बाहर निकाल दिया। सारी प्रजा ने नंगे अकबर के कपड़ों की तारीफ की। ये कहानी बताने का संदर्भ हुसैन के प्रसंग में ही है। पूरे प्रकरण को देखिए, दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचिए। फिर दिल पर हाथ रखकर कहिए कि क्या आप वाकई हुसैन का समर्थन करेंगे। अकबर की प्रजा की तरह से भेद खुलने के डर से मत बोलिए। धर्म निरपेक्षता सनातन मार्ग है, लेकिन उसे बीमारी मत बनने दीजिए। मेरा धर्म के ठेकेदारों से कोई लेना-देना नहीं है। संघी विचारधारा में कोई आस्था नहीं है। लेकिन दिल और दिमाग दोनों लगाकर सोचता हूं, देखता हूं तो हुसैन नंगे दिखते हैं। धर्म के ठेकेदारों से डरकर जिस देश में वो गए हैं,वहां आप किसी देवी देवता की एक तस्वीर लेकर भी नहीं जा सकते। हुसैन चाहें तो भी कतर में हिंदू देवी देवताओँ के चित्र नहीं बना सकते।<br />
सवाल ये नहीं कि धर्म के ठेकेदारों ने हुसैन पर हमला किया। सवाल ये था कि क्या हुसैन ने वाकई आस्था पर चोट की थी। अगर नहीं की थी तो कम से कम इतना कह देते कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। लोगों ने कब किसको माफ नहीं किया है। आस्था बेहद निजी चीज है। चोट लगती है तो तकलीफ होती है। डेनमार्क के कार्टूनिस्ट ने पैगंबर मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने की हिमाकत की थी। (वही कार्टून मैग्जीन में छापने के चलते वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जेल यात्रा भी कर ली।) कार्टूनिस्ट का सिर कलम करने पर करोड़ों का इनाम घोषित कर दिया गया। इनाम घोषित करने वालों का विरोध नहीं हुआ। चोट आस्था पर हुई थो तो विरोध हुआ। मैं ये भी नहीं चाहता कि हुसैन और उस कार्टूनिस्ट को जोड़कर देखा जाए। क्योंकि हुसैन का मामला अलग है। हुसैन इस देश की आन बान और शान बढ़ाने वाले इंसान हैं, लेकिन हुसैन ने वो मौका खो दिया कि लोग उन पर गर्व करें। सुरक्षा और आजादी यहां सबका हक है। अगर अपने देश से तिरस्कृत तसलीमा नसरीन को यहां सुरक्षा मिल सकती है तो हुसैन साहब तो अपने थे। शाहरुख और बाल ठाकरे के बीच क्या हुआ। बात आस्था की नहीं थी, ठाकरे का हमला गलत था, शाहरुख अगर झुकते तो हिंदुस्तान झुकता, इंसानियत झुकती। शाहरुख का क्या बिगाड़ लिया ठाकरे और उनकी सेना ने। अलबत्ता शाहरुख की फिल्म तो सुपरहिट हो गई। सवाल ये है कि आप हमले के डर से घर बार छोड़ देंगे? अपना देश छोड़ देंगे? अगर सभी देशवासी ऐसे सोचते तो देश में सिर्फ चोर डाकू बचेंगे।<br />
हुसैन को बहुत ज्यादा समझने की जरूरत नहीं है। उनकी कला को कला समीक्षक समझें। लेकिन हुसैन की इंसानियत को समझने में किसी को ज्यादा देर नहीं लगेगी। कला ने उन्हें अरबपति-खरबपति बनाया। सुख सुविधाऔं और ऐश के वो आदी हैं। दुबई में पूरा मल्टीप्लेक्स बुक करके अकेले माधुरी की फिल्में देखते हैं। अपनी संवेदनाएं बचाकर रखिए, उस दिन के लिए जब कोई मजलूम, जब कोई गरीब धर्म और समाज के ठेकेदारों की वजह से देश छोड़ने को मजबूर होगा। कतर की नागरिकता की बख्शीश लेकर हुसैन ने सिर्फ देश का अपमान किया है और कुछ नहीं।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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		<title>By: अमित सिंह</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-594</link>
		<dc:creator>अमित सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 02:13:10 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन अक्ल के अंधों के आगे बीन बजाने जैसा नहीं लग रहा है क्या़?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छा लिखा है. लेकिन अक्ल के अंधों के आगे बीन बजाने जैसा नहीं लग रहा है क्या़?</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-593</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 08 Mar 2010 01:45:52 +0000</pubDate>
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		<description>एक हुसैन ठेला घसीटता है
और सामान जरुरत मंदों को पहुँचाता है
एक हुसैन सुबह सुबह
म्युनिसिपैलिटी की गाड़ी आने के पहले
कचरे में से काम की चीजें बीनता है
उस की रोटी के जुगाड़ के लिए
एक हुसैन भिश्ती
दोपहर नालियाँ धोता है
कि बदबू न फैले शहर में
एक हुसैन सुबह अपनी बेटी को छोड़ कर आता है स्कूल
दसवीं कक्षा के इम्तिहान के लिए
एक हुसैन अंधेरे मुँह गाय दुहता है
और निकल पड़ता है
घरों को दूध पहुँचाने
एक और हुसैन ........
एक और हुसैन.........
और एक हुसैन.........
कितने हुसैन हैं?

लेकिन याद रहा सिर्फ एक
जिसने कुछ चित्र बनाए
लोगों ने उन्हें अपनी संस्कृति का अपमान समझा
उसे पत्थर मारे
और उसे यादगार बना दिया
ठीक मजनूँ की तरह।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक हुसैन ठेला घसीटता है<br />
और सामान जरुरत मंदों को पहुँचाता है<br />
एक हुसैन सुबह सुबह<br />
म्युनिसिपैलिटी की गाड़ी आने के पहले<br />
कचरे में से काम की चीजें बीनता है<br />
उस की रोटी के जुगाड़ के लिए<br />
एक हुसैन भिश्ती<br />
दोपहर नालियाँ धोता है<br />
कि बदबू न फैले शहर में<br />
एक हुसैन सुबह अपनी बेटी को छोड़ कर आता है स्कूल<br />
दसवीं कक्षा के इम्तिहान के लिए<br />
एक हुसैन अंधेरे मुँह गाय दुहता है<br />
और निकल पड़ता है<br />
घरों को दूध पहुँचाने<br />
एक और हुसैन &#8230;&#8230;..<br />
एक और हुसैन&#8230;&#8230;&#8230;<br />
और एक हुसैन&#8230;&#8230;&#8230;<br />
कितने हुसैन हैं?</p>
<p>लेकिन याद रहा सिर्फ एक<br />
जिसने कुछ चित्र बनाए<br />
लोगों ने उन्हें अपनी संस्कृति का अपमान समझा<br />
उसे पत्थर मारे<br />
और उसे यादगार बना दिया<br />
ठीक मजनूँ की तरह।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: SHAMBHUKSINGH</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-592</link>
		<dc:creator>SHAMBHUKSINGH</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 Mar 2010 02:11:58 +0000</pubDate>
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		<description>समरेंद्र

हुसेन एक सफल कारीगर है बस और कुछ नहीं... मकबूल साहब पॉर्न फिल्मों का धंधा क्यों नहीं कर लेते... लेकिन एक सवाल है भारत में कानूनी तौर पर धंधा बैन है... इसलिए उन्हें लास वेगास जाना होगा... मैं किसी धंधे के खिलाफ नहीं हूं... बस उसमें आपको महारात हासिल होना चाहिए... मॉडरेटर महोदय अगर आपको मस्तराम की किताब अच्छी लगती है तो फिर आप उसे ही पढ़े... हम आपको जबरदस्ती थोड़े ही कहेंगे की आप गीता पढ़िए... अगर वो नंगी तस्वीर बनाते हैं तो हम थोड़े ही कहेंगे की आप कपड़े वाली तस्वीर बनाइये... हां व्यक्तिगत रुप से वो तस्वीर किसी की नहीं होनी चाहिए... वैसे भी भगवानों की तस्वीरों और चेहरे का किसी ने पेटेंट तो करवाया नहीं है... इसलिए वो बनाए... खूद भगवान आकर विरोध जताएंगे... और हां मैं हुसेन साहब का न तो फैन हूं... और न ही विरोधी... इतना साफ है कि उनका एक बाजार है... जहां वो इस देश के किसी भी सफल उद्यमी से ज्यादा चालाक और बड़े उद्यमी हैं... मुझे नहीं लगता की हुसेन के देश से बाहर रहने से अस्सी करोड़ लोगों की गरीबी पर कोई असर पड़ेगा... या वो और गरीब हो जाएंगे... या उनके आने से गरीबी दूर हो जाएगी... इसलिए ये मुद्दा उतना बड़ा नहीं है कि आप जैसे लोग इसमें पिसने लगे... हां ये बात जरूर है कि अगर हुसेन में राष्ट्रीयता की भावना होती तो वो यहां संघर्ष करते... लेकिन वो तो बाजार के सबसे सफल कारीगर है... जिस तरह से हर साल हजारों भारतीय यहां के पैसे से पढ़कर विदेश चले जाते हैं... और हम उन्हें ज्यादा सफल मानते हैं... लड़कियां भी लाइन लगाकर खड़ी होती है... वो अब पैसे की वजह से वोट भी कर पाएंगे... उसी तरह ये कारीगर भी चला गया.... लेकिन
समरेंद्र, आप हुसेन की काबिलियत पर उंगली नहीं उठा पाएंगे...क्योंकि वो अपने फन में माहिर है... हां उससे समाज की भलाई में योगदान की आशा रखना बेवकूफी है... हम आप जैसे चंद लोगों की यही समस्या है कि हम सबको इमानदारी और समाजवाद की कसौटी पर कसना चाहते हैं... अरे जाने दीजिए... लाखों करोड़पति के बीच वो भी एक करोड़पति देश से चला गया... वैसे भी इस देश के अमीर कितना इस देश के हिसाब से चलते हैं... वो रहते जरूर भारत में है लेकिन उनके घर का हर एक तिनका सात समुंदर पार से आता है... ये देश के प्रति प्यार,  अपनापन, सब बस कहने की बात है... नहीं तो हम जैसे कुछ गरीब और चुतियम सलफेट के लिए हैं... आप से बहुत आशा है... समाज को आप आर्थिक रूप से तो नहीं लेकिन वैचारिक रूप से आग देने वाले हैं... इस देश में आप जैसे लोगों की जरूरत है... लेकिन निरा हुसेन को लेकर अविनाश सर और आप में दूरी देखने को मिल रही है... ये मीडिया के लिए टीआरपी बहस है...जनतंत्र और मोहल्ला जैसे पवित्र और क्रांतिकारी जगहों को समाज के दूसरे जरूरी मुद्दों के लिए रखिए... हुसेन यहां रहे या वहां रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता... हां वो एक सफल कारीगर है... इसलिए उसकी पूछ रहेगी... खुजराहो के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए शुक्रिया... वो गुलामों के जमाने की तस्वीर है... और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के साथ जोड़ना सचमुच घिनौना है... इस मौलिक विचार के लिए धन्यवाद...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>समरेंद्र</p>
<p>हुसेन एक सफल कारीगर है बस और कुछ नहीं&#8230; मकबूल साहब पॉर्न फिल्मों का धंधा क्यों नहीं कर लेते&#8230; लेकिन एक सवाल है भारत में कानूनी तौर पर धंधा बैन है&#8230; इसलिए उन्हें लास वेगास जाना होगा&#8230; मैं किसी धंधे के खिलाफ नहीं हूं&#8230; बस उसमें आपको महारात हासिल होना चाहिए&#8230; मॉडरेटर महोदय अगर आपको मस्तराम की किताब अच्छी लगती है तो फिर आप उसे ही पढ़े&#8230; हम आपको जबरदस्ती थोड़े ही कहेंगे की आप गीता पढ़िए&#8230; अगर वो नंगी तस्वीर बनाते हैं तो हम थोड़े ही कहेंगे की आप कपड़े वाली तस्वीर बनाइये&#8230; हां व्यक्तिगत रुप से वो तस्वीर किसी की नहीं होनी चाहिए&#8230; वैसे भी भगवानों की तस्वीरों और चेहरे का किसी ने पेटेंट तो करवाया नहीं है&#8230; इसलिए वो बनाए&#8230; खूद भगवान आकर विरोध जताएंगे&#8230; और हां मैं हुसेन साहब का न तो फैन हूं&#8230; और न ही विरोधी&#8230; इतना साफ है कि उनका एक बाजार है&#8230; जहां वो इस देश के किसी भी सफल उद्यमी से ज्यादा चालाक और बड़े उद्यमी हैं&#8230; मुझे नहीं लगता की हुसेन के देश से बाहर रहने से अस्सी करोड़ लोगों की गरीबी पर कोई असर पड़ेगा&#8230; या वो और गरीब हो जाएंगे&#8230; या उनके आने से गरीबी दूर हो जाएगी&#8230; इसलिए ये मुद्दा उतना बड़ा नहीं है कि आप जैसे लोग इसमें पिसने लगे&#8230; हां ये बात जरूर है कि अगर हुसेन में राष्ट्रीयता की भावना होती तो वो यहां संघर्ष करते&#8230; लेकिन वो तो बाजार के सबसे सफल कारीगर है&#8230; जिस तरह से हर साल हजारों भारतीय यहां के पैसे से पढ़कर विदेश चले जाते हैं&#8230; और हम उन्हें ज्यादा सफल मानते हैं&#8230; लड़कियां भी लाइन लगाकर खड़ी होती है&#8230; वो अब पैसे की वजह से वोट भी कर पाएंगे&#8230; उसी तरह ये कारीगर भी चला गया&#8230;. लेकिन<br />
समरेंद्र, आप हुसेन की काबिलियत पर उंगली नहीं उठा पाएंगे&#8230;क्योंकि वो अपने फन में माहिर है&#8230; हां उससे समाज की भलाई में योगदान की आशा रखना बेवकूफी है&#8230; हम आप जैसे चंद लोगों की यही समस्या है कि हम सबको इमानदारी और समाजवाद की कसौटी पर कसना चाहते हैं&#8230; अरे जाने दीजिए&#8230; लाखों करोड़पति के बीच वो भी एक करोड़पति देश से चला गया&#8230; वैसे भी इस देश के अमीर कितना इस देश के हिसाब से चलते हैं&#8230; वो रहते जरूर भारत में है लेकिन उनके घर का हर एक तिनका सात समुंदर पार से आता है&#8230; ये देश के प्रति प्यार,  अपनापन, सब बस कहने की बात है&#8230; नहीं तो हम जैसे कुछ गरीब और चुतियम सलफेट के लिए हैं&#8230; आप से बहुत आशा है&#8230; समाज को आप आर्थिक रूप से तो नहीं लेकिन वैचारिक रूप से आग देने वाले हैं&#8230; इस देश में आप जैसे लोगों की जरूरत है&#8230; लेकिन निरा हुसेन को लेकर अविनाश सर और आप में दूरी देखने को मिल रही है&#8230; ये मीडिया के लिए टीआरपी बहस है&#8230;जनतंत्र और मोहल्ला जैसे पवित्र और क्रांतिकारी जगहों को समाज के दूसरे जरूरी मुद्दों के लिए रखिए&#8230; हुसेन यहां रहे या वहां रहे कुछ फर्क नहीं पड़ता&#8230; हां वो एक सफल कारीगर है&#8230; इसलिए उसकी पूछ रहेगी&#8230; खुजराहो के बारे में जानकारी बढ़ाने के लिए शुक्रिया&#8230; वो गुलामों के जमाने की तस्वीर है&#8230; और उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा के साथ जोड़ना सचमुच घिनौना है&#8230; इस मौलिक विचार के लिए धन्यवाद&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रभात शंकर</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-591</link>
		<dc:creator>प्रभात शंकर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Mar 2010 14:57:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=4955#comment-591</guid>
		<description>समरेन्‍द्रजी
खजुराहो को हुसैन से जोडना &#039;कहीं का ईंट कहीं का रोडा&#039; की तरह है। सच कहा आपने, खजुराहोसत्‍ता और समाज से ि‍चद्रोह की ही अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक गरीब ब्राह्मण की युवा बेटी ऋतुमती होने के बाद नदी में स्‍नान कर रही थी कि‍ दुष्‍ट और कामी चन्‍द्रमा की उस पर नजर पडी। चन्‍द्रमा ने उस युवती से बलात्‍कार कि‍या और वह गर्भवती हो गई। समाज का लांछन झेलती वह युवती भटकती रही। चन्‍द्रमा ने भी उसे स्‍वीकार नहीं कि‍या। अंतत:
उसने पुत्र को जन्‍म दि‍या। पुत्र को जंगलों में भटकते हुए पाला-पोसा और युद्घ कला में प्रवीण कि‍या। यही युवक आगे चलकर पहला चन्‍द्रवंशी राजा बना और उसने ही खजुराहो के मंदिरों का नि‍र्माण आरम्‍भ करवाया। इन मंदि‍रों की मूर्ति‍यों में उस बलात्‍कार की पीडा की घ्‍वनि‍यां भी शामि‍ल हैं। हुसैन के चि‍त्रों में सि‍र्फ और सि‍र्फ हि‍ंसा है। प्रतीकों को बेचकर धन अर्जि‍त करनेवाली हि‍ंसा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>समरेन्‍द्रजी<br />
खजुराहो को हुसैन से जोडना &#8216;कहीं का ईंट कहीं का रोडा&#8217; की तरह है। सच कहा आपने, खजुराहोसत्‍ता और समाज से ि‍चद्रोह की ही अभि‍व्‍यक्‍ति‍ है। एक गरीब ब्राह्मण की युवा बेटी ऋतुमती होने के बाद नदी में स्‍नान कर रही थी कि‍ दुष्‍ट और कामी चन्‍द्रमा की उस पर नजर पडी। चन्‍द्रमा ने उस युवती से बलात्‍कार कि‍या और वह गर्भवती हो गई। समाज का लांछन झेलती वह युवती भटकती रही। चन्‍द्रमा ने भी उसे स्‍वीकार नहीं कि‍या। अंतत:<br />
उसने पुत्र को जन्‍म दि‍या। पुत्र को जंगलों में भटकते हुए पाला-पोसा और युद्घ कला में प्रवीण कि‍या। यही युवक आगे चलकर पहला चन्‍द्रवंशी राजा बना और उसने ही खजुराहो के मंदिरों का नि‍र्माण आरम्‍भ करवाया। इन मंदि‍रों की मूर्ति‍यों में उस बलात्‍कार की पीडा की घ्‍वनि‍यां भी शामि‍ल हैं। हुसैन के चि‍त्रों में सि‍र्फ और सि‍र्फ हि‍ंसा है। प्रतीकों को बेचकर धन अर्जि‍त करनेवाली हि‍ंसा।</p>
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	<item>
		<title>By: समरेंद्र</title>
		<link>http://jantantra.com/2010/03/06/khajuraho-hussain-and-their-supporters/comment-page-1/#comment-590</link>
		<dc:creator>समरेंद्र</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 Mar 2010 10:48:17 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://janatantra.com/?p=4955#comment-590</guid>
		<description>सुशील जी,
सुझाव के लिए धन्यवाद। कोशिश करुंगा की सारी परिभाषाएं आपके हिसाब से समझ सकूं। लेकिन आप कुछ व्याख्या समझाएं तो सही। आप तो आए... मुझे नया मुल्ला घोषित किया और चले गए। ऐसे तो आपकी बातें आप जैसे ही ज्ञानी समझ सकेंगे। मेरे जैसे मूर्खों को थोड़ा विस्तार में बताइए। समाजवाद की परिभाषा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, वगैरह ... वगैरह ... इन सभी मुद्दों पर गहरी रोशनी डालिए। मुझे गहरे अवसाद से बचाइए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सुशील जी,<br />
सुझाव के लिए धन्यवाद। कोशिश करुंगा की सारी परिभाषाएं आपके हिसाब से समझ सकूं। लेकिन आप कुछ व्याख्या समझाएं तो सही। आप तो आए&#8230; मुझे नया मुल्ला घोषित किया और चले गए। ऐसे तो आपकी बातें आप जैसे ही ज्ञानी समझ सकेंगे। मेरे जैसे मूर्खों को थोड़ा विस्तार में बताइए। समाजवाद की परिभाषा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, वगैरह &#8230; वगैरह &#8230; इन सभी मुद्दों पर गहरी रोशनी डालिए। मुझे गहरे अवसाद से बचाइए।</p>
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