पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का आगे आना इसलिए जरूरी है कि वे परिवार और समाज का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था ने पुरुषों को आगे बढ़ने के कई मौके दिए हैं पर वह महिलाओं के हक के लिए नहीं लड़ते और न ही महिलाओं के मुद्दों से उनका कोई सरोकार है। कितने पुरुष सांसद है जो दुष्कर्म, छेड़खानी जैसे मामलों को छोड़कर महिलाओं की बुनियादी जरूरतों के बारे में सोचते हैं? सरकारी अस्पतालों में गरीब महिलाएं किस तरह बच्चे को जन्म देती हैं, इसके बारे में कितने सांसद सोचते हैं? यदि महिलाओं के लिए अब तक कुछ किया भी गया है तो केवल राजनीतिक फायदे के लिए। अब जब सरकार संसद और विधायिका में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखा रही है तो इस विधेयक का विरोध करने वाले दलों को शांत मन से इस विधेयक का समर्थन करना चाहिए।
पिछले तेरह साल से यह विधेयक पारित होने की प्रतीक्षा में है पर हर बार कुछ खास राजनीतिक दलों के पुरुष सांसदों की किंतु-परंतु इसमें व्यवधान डालती आ रही है। केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार सालों से लंबित इस विधेयक को स्वीकृत करवाने का पूरी तरह मन बना चुकी है लेकिन यह बेहद हर्ष की बात है कि सरकार को इस बार भाजपा और वाम दलों का सहयोग मिल रहा है । इस स्थिति की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि यह विधेयक इस बार पारित हो ही जाए। सभी दलों में इस विधेयक को लेकर आम राय भले ही नहीं हो लेकिन जहां तक संख्या की बात है सरकार को यह विधेयक पारित कराने में कोई दिक्कत नहीं होगी।
दरअसल, इस विधेयक का विरोध करने वाले पुरुष सांसदों को इस बात का डर सता रहा है कि यदि लोकसभा में 181 महिलाएं एक साथ आ गईं तो उनका वर्चस्व टूट जाएगा और वह अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। मुलायम सिंह यादव हों या लालू प्रसाद यादव हर किसी से पूछा जाना चाहिए कि आप लंबे समय से चुनाव लड़ते रहे हैं, आपने अपने संसदीय क्षेत्र में ऐसा कौन सा बदलाव ला दिया है जो आपको लगता है कि वैसा बदलाव एक महिला नहीं ला सकती, जबकि स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण ने जमीनी स्तर पर क्रांति ला दी और यदि इस बात की तहकीकात की जाए कि जहां महिलाएं स्थानीय निकाय और पंचायतों की अगुआई कर रही हैं उन क्षेत्रों में क्या परिवर्तन आया है । इसकी जांच-पड़ताल के जो नतीजे आएंगे उनसे तो पुरुषों की आंखें स्वयं खुल जाएंगी।
आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात कर भी राजनीतिक दल महिलाओं को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। असल में उनकी मंशा महिलाओं को आरक्षण देने की है ही नहीं इसलिए आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात करके इस विधेयक को पारित होने में बाधा डालने के मकसद से यह मांग उठाई जा रही है। जबकि महिलाओं के लिए यह मुद्दा नहीं कि कौन दलित है और कौन अल्पसंख्यक। मैं मानती हूं कि आप पहले महिलाओं को आगे आने का मौका दीजिए, संसदीय परंपरा में उनकी भागीदारी मजबूत होने दीजिए और फिर देखिए दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के बीच की दूरी अपने आप मिट जाएगी। संभावना तो इस बात की हमेशा बनी रहेगी कि यदि दलितों और अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की जरूरत महसूस की गई तो बाद में उस कानून में संशोधन भी किया जा सकता है। फिलहाल आरक्षण के अंदर आरक्षण देने की जिद करने वाले राजनीतिक दलों को अपनी यह जिद छोड़ देनी चाहिए
केवल इसलिए किसी महिला को संसद में नहीं भेजा जाना चाहिए कि वह महिला है या किसी की बेटी, बहू या पत्नी है। जिसे संसद में भेजा जा रहा है उसकी योग्यता और क्षमता को ध्यान में रखें। ऐसी स्थिति उत्पन्न न होने दी जाए जिससे कि संसद में जब महिलाएं पहुंचें तो वे अपने सहयोगियों का मुंह ताकें । उनमें इतनी क्षमता हो कि वे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात रख सकें । इसके लिए महिलाओं को प्रशिक्षित करने की भी जरूरत हैं। साथ ही, राजनीतिक दलों में भी इस इच्छाशक्ति को मजबूत करने की जरूरत है। टिकट बंटवारे के समय ईमानदार और मेहनती महिला कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दें तभी महिला आरक्षण का फायदा ग्रामीण और पिछड़े इलाके और तबके की महिलाएं भी उठा सकेंगी। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में तो दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक हर तरह की महिलाएं विकास की मुख्यधारा से अब भी बहुत पीछे हैं। यदि राजनीतिक दल स्वयं इन महिलाओं को आगे बढ़ाए तो आरक्षण के अंदर आरक्षण की जरूरत किसे है?
महिलाओं के संसद में पहुंचने से उन समस्याओं का निदान आसानी से निकल सकेगा जिनसे हर महिला जूझती है। घर से बात शुरू करें तो एक महिला को अपने बच्चे की शिक्षा और उसके रोजगार, रसोई का खर्च और परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य की चिंता सताती रहती है। ये मुद्दे ऐसे हैं जिसके नीति निर्धारण में यदि महिलाओं की राय को तवज्जो दी जाए तो बुनियादी स्तर पर बदलाव लाए जा सकते हैं और सरकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की व्यावहारिक तौर पर निगरानी हो सकेगी। निश्चित तौर पर एक महिला जब शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और किसानों की समस्याओं पर नीति निर्धारण के समय अपना दखल रखेगी तो उसमें उन छोटे-छोटे बिंदुओं का ध्यान भी रखा जाएगा जिनकी तरफ आमतौर पर पुरुषों का ध्यान नहीं जाता या जिसकी परवाह वे नहीं करते।
भारत लैंगिंक आधार पर भेदभाव और विषमताएं अब भी जारी हैं और महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के साथ ही इस बात आशा जगेगी कि महिलाएं स्वयं इस भेदभाव को खत्म करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। कल्पना कीजिए, जब हर पांच साल पर चुनाव के बाद लोकसभा में 33 फीसदी महिलाएं चुन कर पहुंचेंगी तो भारत विश्व का पहला ऐसा देश बन जाएगा जहां चुनी हुई सरकार में महिलाओं की यह भागीदारी सुनिश्चित होगी। सामाजिक पिछड़ेपन और पुरुषों के दबाने के बाद भी हालांकि महिलाओं कने आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है, लेकिन यह प्रगति सार्थक तभी होगी जब इसका लाभ समाज के सभी वर्गों को खातौरपर वंचित तबकों को मिलेगा और महिलाओं को राजनीतिक रूप से ऊपर उठाने के लिए यह अति आवश्यक है कि महिला आरक्षण विधेयक चालू सत्र में पारित हो जाए।
((नई दुनिया से साभार))
((मोहिनी गिरी। महिलाओं के हक में लड़ने वाली कार्यकर्ता। समाज सेविका। गिल्ड ऑफ सर्विस की चेयरपर्सन। और राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी हैं। उनका यह लेख आज नई दुनिया में छपा है।))
आशुतोष कुमार सिंह
March 9, 2010 at 5:28 pm
बहुत अच्छा. महिलाओं के साथ धोखा कब तक होता रहेगा?