मैं अपनी बात को सामान्यीकृत नहीं करूंगा। मैं विशेष संदर्भ में बात करूंगा। जिससे बात का दायरा साफ दिखे। मैं आगे जो कुछ लिखूंगा वह सब एक मध्यम वर्गीय पृष्ठभूमि के अनुभव हैं। मूलतः बड़े किसानों, व्यावसायियों, उद्यमियों और सरकारी अफसरों के समाजिक लोक वृत्त के अनुभव हैं।
हम छोटे थे तो हमारी कालोनी में एक बैंक मैनेजर सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते रहते थे। क्योंकि उन्होंने एक बाद एक आठ लड़कियां पैदा कीं। एक बेटे की आस में। उनकी आस नौवें प्रयास में पूरी भी हो गयी। यह मामला बनारस शहर का है। देहात में ऐसा नहीं होता। कोई सात/आठ लड़कियों तक इंतज़ार नहीं करता। जहां भी वर पक्ष को शक हुआ कि वधु से लड़के की संभावना अभी दूर है, वह तुरंत बेटे की दूसरी शादी की चर्चा छेड़ देता है। या फिर यदि बच्चा न हुआ हो तो पुरुष की दूसरी शादी लगभग अवश्यंभावी ही मानी जाती है। ऐसा नहीं है कि यह सारा मामला पुरुषों का रचा हुआ है। या फिर उन महिलाओं का जो सास, ननद, भाभी की भूमिका में होती है। मनुष्य की विश्वदृष्टि उसके भौतिक जीवन के निर्णय का आधार बनती है। मैंने बहुधा देखा है कि जिन स्त्रियों को सिर्फ़ बेटियां हों या जिनके बच्चा न हो वो पति की दूसरी शादी के पक्ष में होती हैं। ज्यादातर विकल्पहीनता की लाचारी के तहत लेकिन कई बार इसे अपनी नियति मानकर प्रसन्नतापूर्वक इसे स्वीकार करती हैं।
सरकार ने बच्चे दो ही अच्छे का काफी प्रचार किया। इस प्रचार का असर भी हुआ था। फिर भी, यदि पहले दोनों बच्चे लड़कियां हो जाएं तो, इस प्रचार का कचुम्मर निकलते क्षणभर देर न लगती थी। इस प्रचार के मध्यमवर्गीय परिवारों में एक लड़का-एक लड़की ही आदर्श था। इस समीकरण में लड़के दो हो जाएं तो पूछो मत, सभी गदगद। यदि लड़की दो हो जाए तो………।
पितृसत्तात्मक समाज में सिर्फ़ बेटियां होना समाज में हीन बनाता है। ऐसे समाज में उपरोक्त पचड़े होते ही रहते हैं। आप एक ढूंढों दस उदाहरण मिलते हैं। बहुत हद तक ऐसी स्थितियां आज भी बनी हुईं हैं। इसके खिलाफ बहुत कुछ लिखा गया होगा। लिखा जाएगा। हम चाहते हैं कि आज महिला दिवस पर एक बिल्कुल नई-नई उभरती तस्वीर को सामने रखा जाय। श्याम पक्ष बड़ा हो तो क्या, श्वेत पक्ष ही हमारी उम्मीदों को जिंदा रखता है।
कहानी कुछ व्यक्तियों की है। ऐसे व्यक्तियों की जिन्हें मैं निजी कारणों से जानता हूं। मैं किसी वर्णन से बचते हुए दो टूक तथ्य रखूंगा। आप सब निर्णय करिएगा कि उन तथ्यों से क्या मायने निकलते हैं -
मेरी दीदी की एक ही बच्ची है। दीदी डिग्री कालेज में पढ़ाती है। दूसरे बच्चे को लेकर वह निश्चिंत है। मेरे भाई की अभी एक ही लड़की है। भाई इंजीनियर है। भाभी कहती है बच्चे दो ही अच्छे। चाहे लड़की हो या लड़के। भाई की सोच भी यही कहती है।
ऐसे और भी किस्से हैं। कम से कम आधे दर्जन तो मेरे रिश्तेदारों में। हाण्डी की स्थिति समझने के लिए दो दाने काफी हैं। अब एक दूसरे कोने में झांकते हैं।
एक साथी लेकिन काफी अनुभवी पत्रकार से मैंने पूछा कि आप के कितने बच्चे हैं तो उन्होंने कहा कि एक बेटी है। एक ही रहेगी। उन्होंने एक ही रहेगी पर ऐसा जोर दिया कि मुझे क्षणभर के लिए लगा कि इसकी बिटिया से खुशनसीब बेटी दूसरी न होगी।
यही कहानी दूसरे कई पत्रकारों/लेखकों की है। कम से कम चार को तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं कि जिनकी या तो एक बेटी है या दो बेटी या एक है दूसरा जो भी हो दो ही रहेंगे वाली बात है।
एक तीसरा कोना भी है। शायद छोटा है। लेकिन सबसे अधिक रोशनी इसी कोने में है। यहां मैं कुछ व्यक्तियों या घटनाओं की बात नहीं करने जा रहा। क्योंकि इस एक बात में युवा महिला पत्रकारों एवं दूसरे पेशेवर महिलाओं की नई सुखद एवं सकारात्मक सोच को समेट लिया गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक युवा महिला पत्रकार ने एक लेख में यह मिसरा लिखा।
तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके
अपने दिवाने को तू चूम सके
यह शेर बेटियों के लिए भारतीय मध्यवर्ग की बदलती सोच का बेहतरीन उदाहरण है। लेख में जाहिर किया गया है कि इस मिसरे को एक पिता ने अपनी बेटी के लिए लिखा था। यदि यह सच है तो इस शेर का वजन और भी बढ़ जाता है। इस वक्त मेरे दिमाग में उन तमाम युवा कवियों की बेटियों के लिए लिखी कविताएं घूम रही हैं। टाइम-स्पेस की बाध्यता से उनकी प्रस्तुती के लालच से खुद को रोक रहा हूं।
दहेज हत्या, बालात्कार, प्रताड़ना की बहुतयात उदाहरणों के बीच ये उदाहरण बहुत कम प्रतीत होते है। लेकिन विशाल अंधकार में भी नन्हे से दीपक के अस्तित्व को कोई झुठला नहीं सकता। साल के 365 दिनों के भीतर महिला दिवस एक पड़ाव की तरह है। जहां ठहर कर हम सोचते हैं कि पिछले साल कहां से चले थे। आज कहां तक पहुंच पाए हैं। आगे कैसे और कहां जाना है। आमतौर पर यह काम लोग पहली जनवरी को करते हैं। लेकिन महिला अधिकारो के लिए सचेत जनों के लिए नया साल 8 मार्च से शुरू होता है। महिला दिवस पर सभी महिलाओं के लिए समानता, स्वंतत्रता एवं बंधुत्व की कामना करता हूं।
((नोट- मैंने आज तक कभी भी किसी परिचित या अपरिचित से यह नहीं कहा कि मेरी फलां पोस्ट पर कमेंट करें। आज कह रहा हूं, यदि आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं तो इस विषय पर अपनी राय जरूर दें। आखिरकार एक जीवन में कम से कम चार स्त्रियों से तो हर पुरुष प्यार करता है, मां, बहन, बेटी और वो। ))
संजय ग्रोवर
March 8, 2010 at 7:31 pm
Bhai Rangnath, MaiN to aapke kahe bina hi comment karne wala tha. JahaN tak rai dene ki bat hai to uske liye thoda sochna samajhna pad-ta hai. Isliye thoda waqt to lagega hi.
shirish khare
March 8, 2010 at 7:36 pm
“एक तीसरा कोना भी है। शायद छोटा है। लेकिन सबसे अधिक रोशनी इसी कोने में है।”
- बहुत बढ़िया लिखा है.
अविनाश
March 8, 2010 at 7:39 pm
बहुत सुंदर लेख। अच्छा लगा। मेरी भी एक बेटी है। उसका नाम सुर है। आगे चल कर स्कूल में उसका नाम श्रावणी लिखवाने की योजना है। वो जीवन की एक अपरिहार्य स्थिति हो गयी है। उसके बिना बाहर मन नहीं लगता। घर में उधम मचाकर जीना हराम किये रहती है। क्या करूं? बताइए…
रंगनाथ सिंह
March 8, 2010 at 8:48 pm
अविनाश जी, इन नन्हें तानाशाहों के आगे बड़े-बड़े तुर्रम खाँ को भी झुक कर घोड़ा बनना पड़ता है। आप कुछ नहीं कर सकते। आप क्या संग क्या करना है इसका चुनाव वही करते हैं ! सुर के हाथ मंे आपके सुख की कंुजी जो है। हाँ,सुर और श्रावणी दोनों नाम बहुत ही प्यारे हैं।
shilpi
March 9, 2010 at 11:14 pm
nice ….
अविनाश
March 8, 2010 at 7:40 pm
इस लेख पर भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए सोचना-समझना पड़ेगा संजय ग्रोवर जी…
संजय ग्रोवर
March 8, 2010 at 7:45 pm
Aapko smiley lagaane ki zarurat nahiN Avinash ji, Aapka mand-mand muskata fotu dekhkar vaise hi tabiyat khush ho jati hai
रंगनाथ सिंह
March 8, 2010 at 8:50 pm
इस लेख पर मेरे ब्लाग के कमेंटबाक्स से एक कमेंट लगाने के लालच से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ:
मेरे दो बेटियां हैं और दो ही रहेंगी – पंकज श्रीवास्तव
जगदीश्वर चतुर्वेदी
March 8, 2010 at 9:41 pm
रंगनाथजी,बेटी के बहाने स्त्री संवेदना की बातें अच्छी लगीं,संभवत :आपके और अविनाश के प्रतिवादी स्वर की धुरी है स्त्री संवेदना।बहुत अच्छा लगा।
समरेंद्र
March 8, 2010 at 11:00 pm
मॉ़डरेटर होने की वजह से आमतौर पर यहां छपे लेखों पर सीधी टिप्पणी करने से बचता हूं। लेकिन इस लेख पर अपनी राय देने से मैं खुद को रोक नहीं सका। लाजवाब लेख है। सीधे शब्दों में बहुत गहरी बात। रंगनाथ जी ने इसमें जिन लोगों का उदाहरण दिया है। काश बेटियों के मामले में सभी उनकी तरह सरल और सच्चा फैसला ले पाते। अगर ऐसा होगा तो यह दुनिया बहुत प्यारी हो जाएगी।
ठाकुर पद्म सिंह
March 9, 2010 at 12:37 am
मान्यवर रंगनाथ जी
आपकी पोस्ट बहुत संवेदनशील और प्रासंगिक है
मै ऊपर लिखे मिसरे को कई बार पढ़ गया … अद्भुत है
मै ये बताना चाहता हूँ कि मेरे दो बेटियां है जिनमे से छोटी लगबग दस बरस की हो गयी है और बचपन में दिमागी बुखार के कारण मानसिक रूप से अल्प विकसित है…नाम रखा है खुशी
उसकी जान बचाने के लिए मैंने धरती आसमान एक कर दिया पर जितना नुक्सान होना था हो चुका..
हम चार भाइयों में केवल एक भाई के दो बेटे हैं
बाकी तीनो के लड़कियां ही है
ऐसी परिस्थिति में घर का ज़बरदस्त दबाव और आकांक्षा यही रहती है कि एक लड़का आवश्यक है
आपको बताऊं कि खुशी के प्रति हमारा प्यार और देखरेख कहीं कम न हो जाए इस लिए आज तक हमने बेटे के बारे में सोचा भी नहीं … यद्यपि कभी कभी मन मचलता है जब मै सामाजिक परिप्रेक्ष्य में खुद को देखता हूँ
पर मुझे अपनी खुशी की खुशी से अधिक किसी चीज़ की परवाह नहीं
बस एक ही ख्वाहिश है जीवन में… यदि मै खुशी को स्वावलंबी बना पाया तो सुख से मर सकूंगा
ईश्वर मेरी कामना पूरी करे
रंगनाथ सिंह
March 9, 2010 at 1:27 am
पद्म जी जिस परिस्थिती में आप हैं उसमें रहते हुए खुशी के लिए आपका संघर्ष और समर्पण प्रेरक है। निश्चय ही आप जैसे पिता पर किसी भी बेटी को अभिमान होगा। पारिवारिक दबाव के बारे में यही कहँुगा कि निराशा के क्षणों में आप स्वयं को हम जैसों की नजर से देखिएगा। जिनकी नजर में आपका यह पुत्री प्रेम सर्वथा स्तुत्य है। आप को अत्यधिक पसंद आने वाला वह मिसरा पत्रकार मनीषा पाण्डे का है। खुशी के उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित।
संजय ग्रोवर
March 9, 2010 at 10:45 am
काफ़ी सोच-विचार के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहंुचा कि इस लेख की तारीफ़ करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
“”"”देहात में ऐसा नहीं होता। कोई सात/आठ लड़कियों तक इंतज़ार नहीं करता। जहां भी वर पक्ष को शक हुआ कि वधु से लड़के की संभावना अभी दूर है, वह तुरंत बेटे की दूसरी शादी की चर्चा छेड़ देता है। या फिर यदि बच्चा न हुआ हो तो पुरुष की दूसरी शादी लगभग अवश्यंभावी ही मानी जाती है।”"”"
रंगनाथ की बताई इस हक़ीकत को पढ़कर जिस्म में हल्की सी झुरझुरी हुई। पता नहीं कब यह मेरे दिमाग़ से निकल गया था।
“”"”तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके
अपने दिवाने को तू चूम सके”"”"
मनीषा पांडेय की उक्त पंक्तियों को (किसी अन्य ब्लाग पर) पढ़कर मैं भी भावुक हो गया था।
किसी ने मुझसे यह भी कहा कि रजनीश अगर आज जीवित होते जो इन पंक्तियों को पढ़कर कितना ख़ुश होते !
ऋषि कुमार सिंह
March 9, 2010 at 11:31 am
लेख संवेदनशीलता और समझ को बढ़ाने में मददगार है..तो सजग टिप्पणीकर्ताओं की टिप्पणी मनोबल को सशक्त करने का काम कर रही है..
fauziya
March 9, 2010 at 1:00 pm
kya kahun…ladki hona itna bada gunah hai ki uske apne mata pita uske janm ko bojh samajhte hain…ek bete ke intzar mein betiyan paida karte rehna koi badi baat nahi hai
arvind shesh
March 9, 2010 at 1:41 pm
ghar me internet nahi hai. aaj off hota hai. cafe me dekh saka hoon.
yah behtareen lekh hai aur mere jaise bahut saare logon ke man ki baat hai, jo is samaaj ke man ki baat ho jaaye, yahi ichchaa hai.
Rajni
March 9, 2010 at 4:39 pm
Mai bhi esi hi ek bahan hun…bhaiyon k intzar me panch bahno me se ek..bahut pahle ki bat nahi h!aur bahut door ki bat nahi h!delhi k ek gao me 1981 me janmi hun.tadap hoti h dekhkr ki yaha internet aur kitabon ki duniya me kitna kuchh badal gay h.lekin sachmuch ki duniya me itna nahi…Bhaiyon k intzar me jo ladkiyan janm le leti hn vo kya kuchh jhelti hn.. kitne dukhte hue jakhm unke vajood ka hissa ho jate hn..kash ki virtual duniya k sath sachmuch ki duniya bhi is bare me savedavsheel ho sake!
ghughutibasuti
March 9, 2010 at 5:32 pm
आज वृद्ध हो चुके कुछ माता पिता भी अपनी बेटियों को लिए ऐसी ही पंक्तियाँ चाहते रहे हैं। सब बेटियों को अच्छे माता पिता मिलें।
घुघूती बासूती
shilpi
March 9, 2010 at 11:33 pm
waise me to jyada kuch janti nahi likhne ke baare me par apne “WOMEN’S DAY” par itna sundar aur pyara article likha hai ki laga ki kuch me bhi likh du.
ladko ke intezar me ladkiya paida karna to sadiyon se chala aa raha h aur aisa nahi hai ki aaj khatm ho gaya hai aaj bhi kae jagah sunne aur dekhne ko milta hai,jo ki bahut dukh ki baat hai,aur ek ladki ke lie to ye aur bhi jyada dukh ki baat hai ki uska janm ek ladke ke intezar me hua..warna nahi hota kyonki shayad uski unke maata pitaah aur samaj ko zarurat nahi thi…
hamare yaha ek aurat(aurat kya ek 22-23 saal ki ladki hi samajhie) khana banane aati hai,uski 4 ladkiya hai aur pati thoda mentally disturbed hai..bahut dukhi rahti hai wo to maine pucha ki jab itni pareshani thi to kyo 4 bachhe paida ki to usne bola ki-kya kare didi ladke ke intezar me na..uska mann nahi tha phir bh ghar ke baaki logo ke dabav pe use karna pada-kuch aisa uska kehna tha..
shayad bahut jagah ladkiyon ko ye sab dabaav me bhi karna padta hai..
na jane kab ye samaj samjhega ki ladki rahegi tabhi ladka bhi aayega……..
thnx..
KP
March 10, 2010 at 1:11 am
rangnath ji shabdo ko kafi achhi tarah se buna hai aapne me aapki prashansha krta hun kintu jo charitra aapne udaharan ke taur par prastut kiye hai vo log ya to koi degree college me padate hai ya koi patrakar hai ya koi jo bhi hai shikshit hai, to jaha tak me sochta hun ye sara mamla shiksha se juda huaa hai. ye log aisa nahi sochte ki ladaka jaroori hai, kyu? isaka mukhya karan kya hai.
kyuki ye log ladakiyo ka bhavishya bhi achha dekhte hai. ye jante hai ki inaki ladakiyo ka bhvishya bhi vaisa hi hoga jaisa ki inaka ldaka hone par hota aur aisa hai bhi.. me sochta hun ye log aur inaki tarah sochne wale logo ki tarah hi sab sochne lagenge yadi ve bhi shikhsit ho aur unhe ladako ke sath sath ladakiyo ka bhi bhavishya vaise hidikhe…
rashmi ravija
March 10, 2010 at 3:45 pm
रंगनाथ जी,
आपके ब्लॉग,’बना रहें बनारस’ पर यह पोस्ट पढने की कई बार कोशिश की पर ब्लॉग नहीं खुल रहा था….आज मनीषा जी के ब्लॉग पर पढ़ी ये पंक्तियाँ देखकर क्लिक किया तो आपकी ही पोस्ट निकली.
बहुत धीमे पर ज़माना बदल रहा है…यहाँ मुंबई में मेरी कई सहेलियां हैं जिनकी एक ही बेटी है…और यह उनका निर्णय है कि एक ही रहें. कुछ मेरे जानने वालों ने लडकियां ही गोद ली हैं. एक क्रिश्चयन पडोसी ने तो एक अपनी बेटी के बाद भी एक बेटी ही गोद ली है.
मेरे दो लड़के ही हैं पर मुझे यह भी संतोष है कि इन्हें मैं लड़कियों और स्त्रियों का सम्मान करना,उन्हें बराबरी का दर्ज़ा देने जैसी बातें सिखा सकती हूँ.
रंगनाथ सिंह
March 10, 2010 at 5:00 pm
रश्मि जी हमने भी ऐसे ही सीखा है।