बिहार का जिक्र आते ही जेहन में जैसे दो तस्वीरें बनती हैं। पहली सुनहरे अतीत की, जिसमें महावीर हैं। बुद्ध हैं। सम्राट चंद्रगुप्त हैं। अशोक हैं। चाणक्य हैं। गांधी का चंपारण है। बाबू राजेंद्र प्रसाद हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण आदि हैं। इसके उलट दूसरा बिंब बदहाली का उभरता है। एक घायल और मदद के लिए पुकारता बिहार। इधर पिछले कुछ दिनों से उत्साहजनक ख़बरें आई हैं कि देश का यह सर्वाधिक संवेदनशील सूबा करवट ले रहा है। अपहरण अब यहां उद्योग नहीं रहा। बड़े-बड़े अपराधी सलाखों के पीछे हैं। सड़कों के गड्ढ़े भर चले हैं और शहरों पर छाई मुर्दनी की कालिख धुल चली है। यहीं सवाल उठता है कि विकास की इस कदमताल को ओलंपिक की फर्राटा सी गति कैसे दी जाए? यहां की तरुणाई को वो जोश और जुनून कैसे दिया जाए कि वेअपनी जमीन पर रहकर उसे और मजबूत करने की कोशिश करें?
इसके लिए हिंदुस्तान एक बार फिर से पहल कर रहा है। एक जिम्मेदार अख़बार होने के नाते हम आपके साथ बिहार की विकास यात्रा पर निकलना चाहते हैं। इसके लिए शुरुआती तौर पर पटना संस्करण में महत्वपूर्ण तब्दीलियां की गई हैं। अब हम प्रतिदिन चार पृष्ठों का एक अतिरिक्त परिशिष्ट अपने पाठकों को दिया करेंगे। इसका नाम होगा “युवा”। रोज़ाना छपने वाले इन चार पृष्ठों में हम युवाओं के चौतरफा विकास की सामग्री देंगे। उनकी शिक्षा, सेहत, संस्कृति और यहां तक कि मनोरंजन का भी ख्याल रखा जाएगा। साथ ही उल्लास के प्रतीक रंगीन पृष्ठों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। अब हिंदुस्तान होगा ज़्यादा रंगीन, पहले से अधिक जोशीला। यह एक गंभीर अख़बार का अपने नौजवान पाठकों के लिए उपहार है। यह युवा बिहार की उस यात्रा को भी समर्पित है जो पिछले कुछ सालों से यहां के लोगों ने शुरू की है। हम उम्मीदों को बढ़ाने और नाउम्मीदी की बादल छांटने के लिए कोई कोशिश उठा नहीं रखेंगे। पटना से शुरू हुई यह यात्रा प्रदेश के अंतिम आदर्श तक जरूर पहुंचेगी। संतोष तो इस बात का है कि आंकड़े हमें ढांढस बंधाते हैं।
दिल्ली में बैठे हुक्मरां आंकड़ों पर चलते हैं। उन्हें इस प्रदेश की बदहाली की तस्वीर तब और बदरंग नज़र आने लगती है जब वे 67 प्रतिशत महिलाओं को एनीमिया और 55 प्रतिशत बच्चों को कुपोषण का शिकार पाते हैं। हमारे घरों में औरत को लक्ष्मी कहा जाता है और बच्चों को भविष्य। घर की लक्ष्मी बीमार हो और बच्चे कमजोर, तो फिर उस जगह का भविष्य ही क्या? पर बिहार के लोग हारते नहीं हैं। उन्होंने अपने लिए कभी स्वर्णिम अतीत गढ़ा था। अब वे फिर से नए बिहार को बनाने में जुट गए हैं। पिछले राच सालों में बिहार की विकास दर 11.3 प्रतिशत रही है। इस दौरान उत्तराखंड ने 9.3, उड़ीसा ने 9.31 और झारखंड ने 8.45 प्रतिशत की बढ़त दर हासिल की। और तो और गर्वीला गुजरात 11.05 प्रतिशत के साथ हमसे बहुत आगे नहीं है। हमें उम्मीद है कि “हिंदुस्तान” और बिहार की यह यात्रा एक बार फिर पूरे देश में नई रोशनी फैलाने का काम करेगी।
मुझे कहने में संकोच नहीं है कि बिहार के सेहतमंद हुए बिना देश का भला नहीं हो सकता। भरोसा न हो तो देश का नक्शा उठाइए, उसमें बिहार को देखिए और उसकी तुलना अपने शरीर से कीजिए। लगेगा जैसे हमारी देह में दिल की जो जगह है, वही स्थान भारतीय राष्ट्र राज्य में बिहार का है। अगर दिल मजबूत है तो सब बढ़िया। दिल कमजोर तो सब बेकार। आइए, आज से बिहार की विकास यात्रा पर चलें। बिहार को मजबूत करें। देश के दिल को दमदार बनाएं। (हिंदुस्तान से साभार)
((वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर हिंदुस्तान के प्रधान संपादक हैं। पटना में कल हिंदुस्तान की नई प्रेस का उद्घाटन हुआ है। उसी मौके पर आज उनका यह संदेश पटना संस्करण में छपा है।))
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