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हुसैन का जाना सामूहिक कायरता का नतीजा है

मकबूल फिदा हुसैन अब कानूनन भारतीय नहीं रहे! इससे हुसैन को क्या फर्क पड़ा? वे मुंबई के अपने स्टूडियो में बैठ कर चित्र बनाते थे, अब कतर के स्टूडियो में बैठ कर बनाते हैं। काम के प्रति उनकी दीवानगी, उनकी गहराई और उनकी प्रतिबद्धता वैसी ही है जैसी तब थी, जब इक्यासी साल की उम्र में भारत छोड़ कर वे कहीं और पनाह लेने गए थे। यह वही दौर था जब बांग्लादेश से इसी प्रकार, वैसी ही जुनूनी जमात के कायराना हमलों से क्षत-विक्षत लेखिका तसलीमा नसरीन भारत में पनाह लेने की जद्दोजहद में थीं। तसलीमा के साथ बांग्लादेश में जो हुआ और वहां की सरकार ने उनके साथ जो किया, हुसैन के साथ भी ऐसा ही हुआ और हमारी सरकारों ने उनके साथ वैसा ही किया। बड़े अजीब, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से इतिहास मनुष्यों को पाठ पढ़ाता है।

तसलीमा और हुसैन के रास्ते से उसने हमें फिर से याद दिलाया है कि ऐ हिंदुस्तानियो-बांग्लादेशियो-पाकिस्तानियो, तुमने मुल्क भले तोड़ लिए, लेकिन तुम सब हो एक ही परंपरा की निकम्मी औलाद! इतिहास का यह पाठ हम पढ़ और समझ सके या नहीं यह तो हमें ही सोचना और तय करना है। उस रोज कलाकार-रचनाकार होने का दावा करने वाले एक सज्जन बड़े तैश में यह सवाल पूछे जा रहे थे कि बताइए, क्या हुसैन से बड़ा कोई कलाकार है ही नहीं अपने देश में? मैंने धीरे से सिर्फ इतना पूछा: हुसैन से बड़ा- बहुत-बहुत बड़ा-कोई दूसरा कलाकार अगर भारतमाता की वह तस्वीर बनातब जिसे आप नंगी भारतमाता कह रहे हैं तब क्या आप उसे ससम्मान और पूरी अजादी के साथ भारत में रहने देते?

हुसैन बड़े कलाकार हैं या नहीं, इसका इस सवाल से कोई लेना-देना है ही नहीं कि वे भारत में रह सकते हैं या नहीं। हुसैन मन-वचन-कर्म से और भारतीय संविधान से भारतीय हैं और उन्हें पूरे अधिकार, सम्मान और स्वतंत्रता के साथ भारत में रहने की आज़ादी है।

मनुष्य ने मनुष्य के नाते जीने की खोज में कुछ ऐसे मूल्यों का आविष्कार किया है जिनकी रक्षा के लिए वह अपनी जान भी निछावर करता आया है। मनुष्य के नाते मनुष्य का निष्कंप सम्मान एक ऐसा ही मूल्य है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद यह मर्यादा-रेखा खिंच ही जानी चाहिए थी कि आ आगे से इस देश में असहमति के कारण किसी की जान नहीं ली जाएगी। लेकिन हम मनुष्य के रूप में ऐसी सांस्कृतिक यात्रा पूरी नहीं कर पाए हैं और बौने ही रह गए हैं, मकबूल फिदा हुसैन इसके प्रतीक हैं।

मकबूल फिदा हुसैन भारत के लिए नया नाम नहीं है। महाराष्ट्र के सबसे पवित्र धर्मस्थल पंढरपुर में जन्मा यह मुसलमान आदमी अपनी समस्त हस्ती से जितना भारतीय बना, बना रहा और आज भी है वैसा दूसरा उदाहरण खोजना आसान नहीं है। अगर हम हुसैन की कूची से भारतीय रंग-रेखाएं-प्रतीक-परंपराएं-गंधरू पाकार निकाल लें तो हुसैन न बनते हैं, न बचते हैं। वे जो कुछ भी हैं इन्हीं अवदानों से बने हैं। इसलिए बहुत फर्क नहीं पड़ता कि वे भारत में रह कर तस्वीरें बनाते हैं कि कतर में रहकर, कि वे भारतीय पासपोर्ट पर दुनिया भर में आते जाते हैं या कतरी पासपोर्ट पर। सच तो यह है कि हुसैन जो रच गए हैं और कह गए हैं, उसे वे चाहें तो भी मिटा नहीं सकते हैं। उनकी रेखाएं उनसे अधिक अमिट हैं। राष्ट्र व्यक्तियों से बड़े होते हैं यह जितना सच है उतना ही सच यह भी है कि बारहा कुछ लोग राष्ट्र आदि की सीमाओं से बड़े हो जाते हैं।

आइंस्टीन जर्मनी से निकल आए तो जर्मनी ही छोटा पड़ गया, आइंस्टीन के अपने कद में कोई फर्क नहीं आया। अपनी कला-साधना में हुसैन उस जगह पहुंचे हैं। इसलिए अगर हुसैन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली है और कानूनन वे भारतीय नहीं रह गए हैं तो इसका वैसा ही अफसोसनाक अहसास भारत को होना चाहिए जैसा हुसैन को है। हुसैन ने कतर में राजनीतिक शरण नहीं मांगी थी और न वहां की नागरिकता के लिए आवेदन किया था। वे भारत छोड़ने को विवश हुए तो कतर पहुंचे जैसे तसलीमा भारत पहुंचीं। वे कितने वक्त कतर में रहते हैं और कितने वक्त अमेरिका, फ्रांस और इंग्लैंड में रहते हैं, कहना कठिन है।

नब्बे से ज्यादा साल का नंगे पांव घूमने-भटकने वाला यह आदमी पहले भी यायावर ही रहा है, आज भी है। हुआ इतना ही कि कतर ने उनके रहने, काम करने की सुविधा बना दी और लंबे समय बाद उसने उन्हें अपनी नागरिकता देने का प्रस्ताव भी रखा। हुसैन चाहते तो वह प्रस्ताव अस्वीकार भी कर सकते थे। अगर वे ऐसा करते तो आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में वे किस तरह रहते-घूमते-काम करते? देश से बाहर निकलते और देश में आते समय जितनी तरह के कागजात की आज हर नागरिक को जरूरत पड़ती है, वह तो उनके पास भी होना जरूरी था। इसलिए उन्हें नागरिकता की जरूरत थी और कतर वह देने को तैयार था, जबकि भारत उन्हें अपनी सरहद में सुरक्षित-स्वतंत्र रहने की परिस्थिति बनाने में भी अक्षम था।

भारत अक्षम क्यों हुआ? क्या इसलिए कि भारत के अधिकतर लोग हुसैन और उनकी कला को उसी नजर से देखते हैं जिस नजर से मुट्ठी भर आंख के अंधे नाम नयनसुख वाले देखते हैं? ऐसा न तब था और न आज है। हुसैन की रेखाओं में ऐसी ताकत है और उनके रंगों में ऐसी आध्यात्मिक रोशनी है कि नग्नता, उथलापन, बाजारूपन आदि कहीं टिकते नहीं हैं। कला की कसौटी पर हुसैन के कमजोर काम भी हैं लेकिन वे हिंदू-मुसलमान के आधार पर कमजोर नहीं हैं।

लोकप्रियता और प्रचार का भटकाव भी हुसैन पर कभी-कभार हावी हुआ है। सत्ताधीशों के प्रति एक गलत किस्म का आकर्षण आमतौर पर खास कलाकारों में दिखाई देता है और वह उनकी कला को उस हद तक गिराता भी है। आपातकाल की जेल में बैठे-बैठे जा मैंने देखा कि इंदिरा गांधी को हुसैन ने दुर्गा के रूप में चित्रित किया है तो एक तीखे अहसास से मन भर उठा और लगा कि हुसैन के साथ हम सब कुछ हार गए हैं। लेकिन हुसैन वहीं रुके नहीं और अपना संतुलन साधते हुए आगे बढ़े।

भारतीय परपंरा में हमने देवी-देवताओं को बहुत हद तक मानवीय रूप दिया है और उनके साथ कुछ मानवीय छूट भी ली है जिसे हमारे समाज ने स्वीकार भी किया है। कलाकारों और कवियों ने हर तरह की मानवीय भावनाओं के साथ देवी-देवताओं को जोड़ा और उन पर आधारित रचनाएं की हैं। इससे हमारा सांस्कृतिक-नैतिक आधार मजबूत हुआ है। इस परंपरा से खुद को जोड़ने का हक हर भारतीय को है चाहे उसका धर्म, उसकी जाति कुछ भी हो। कोई क्यों नहीं आपत्ति करता कि जिस परंपरा में खुदा, बंदगी आदि के बारे में पुनर्विचार की कोई धारा बही नहीं, उसमें रह कर, उससे अलग परंपरा का सहारा संत कबीर क्यों ले रहे हैं?

नहीं, परंपराएं अगर दीवार उठाने का नाम होता तो संस्कृतियों का मेल हो ही नहीं सकता था। लेकिन यह होता रहा है, तभी तो रसखान कृष्णलीला साकार कर सके। किसी ने बुतपरस्ती का या खुदा के अलावा किसी दूसरे की बंदगी का सवाल रसखान के सामने खड़ा नहीं किया और किया भी हो तो संपूर्ण भारतीय समाज ने उसे सिरे से अस्वीकार कर दिया! सभ्यताएं ऐसे ही घुलती-मिलती, प्रौढ़ होती हैं। इसलिए कोई करण नहीं कि हम हुसैन से पूछें कि वे इस्लाम की पूज्य हस्तियों के वैसे चित्र क्यों नहीं बनाते जैसे चित्र हिंदू देवी-देवताओं के बनाते हैं? वे क्या बनाएं, क्या न बनाएं यह हुसैन का निजी फैसला ही हो सकता है और भारतीय संविधान हमें निजता की जितनी आजादी देता है, उतनी आजादी हुसैन के पास भी है।

दूसरा यह कि अगर हुसैन को इस्लामी परंपरा में वह इंसानी जगह नहीं मिलती जहां वे देवी-देवताओं से बातें कर सकें या उन्हें हमसे बातचीत करने के लिए आंक सकें तो कौन कहता है कि उन्हें हिंदू परंपरा में आसन जमाने का अधिकार नहीं है जो उनकी भी उतनी ही है जितनी किसी दूसरे हिंदुस्तानी की? अगर हुसैन नकली होते या कि परंपरा की आड़ में परंपराओं को कलंकित करने का घटिया खेल खेल रहे होते तो अब तक बेपर्दा हो चुके होते! लेकिन हुसैन टिके हैं और कतर में रहते हुए भी भारतीय मन को झकझोर पा रहे हैं तो इसमें उनकी आस्था को नापने का एक बड़ा आधार हमें मिलता है।

भारत अक्षम इसलिए हुआ कि हुसैन पर जब चौतरफा हमले हो रहे थे, सरकारों ने कभी आगे आकर उन हमलों को खुद पर झेलने की हिम्मत नहीं दिखाई। इससे उंगलियों पर गिने जा सकने वाले छुटभैए मनमानी करने लगे। हुसैन की चित्रकार बिरादरी ने भी अपना हाथ उठाने में बहुत कायरता का परिचय दिया, हालांकि वहां सवाल हुसैन को अपने से बड़ा कलाकार मानने का था ही नहीं, सवाल तो था कि इस देश में आबध अभिव्यक्ति का अधिकार संविधान से मिलता है या किसी की, किसी सेना से? हमारे समाज का बौद्धिक तबका हमेशा से विवादों और असहमतियों के बीच कुछ ज्यादा ही सतर्कता बरतता है। और यह भी सच है कि मनमानी करने वाली जमातों में यहां- वहां इस बिरादरी के लोग भी शामिल रहते हैं। आ बचे थे अकेले हुसैन, जो अपनी आंतरिक शक्ति से यह लड़ाई लड़ सकते थे और जीत भी सकते थे। वे लड़ने को उतर पड़ते तो उनके साथ देश का विवेक भी उठ खड़ा होता। लेकिन हुसैन कुछ लड़खड़ाते-भटकते रहे। इससे वह लड़ाई लगातबर कमजोर पड़ती गई और भटकती भी गई जिसे तभी के-तभी लड़ लेने की जरूरत थी।

हुसैन का निर्वासन हम सबकी सामूहिक विफलता और कायरता का परिणाम है। अब कोई चिदंबरम कहें कि हम उनकी वापसी पर उन्हें पूरी सुरक्षा देंगे तो यह कोई मतलब नहीं रखता है। हम हुसैन को वहीं रहने दें जहां वे आज हैं और उन्हें अपना वह सारा काम करने दें जिसमें वे डूबना चाहते हैं। वे जब भी चाहें, भारत आ सकते हैं, यह उन्हें भी मालूम है और हमें भी। तब तक के लिए हम सब चुप रहें और इस पीड़ा को आत्मसात करें तो ज्यादा बेहतर होगा। हुसैन अपने देश में कार्यरत हैं जिसकी कोई सरहद नहीं, जिसका कोई एक नाम नहीं है। (जनसत्ता से साभार)

((वरिष्ठ पत्रकार कुमार प्रशांत गांधीवादी विचारक और सर्व सेवा संघ के मुखपत्र सर्वोदय जगत के प्रधान संपादक हैं।))

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8 Responses to हुसैन का जाना सामूहिक कायरता का नतीजा है

  1. एन. नंदा Reply

    March 11, 2010 at 12:13 pm

    फिर वही हा हुसैन तुम न रहे :)

    इस लेख के साथ का चित्र देखिये। हनूमान के मुख का रंग काला (हनूमान वानर थे लंगूर नहीं), नग्न सीता का हनूमान की पूछ से चिपकना और हनूमान का मशाल ले कर उडना? हे अभिव्यक्ति की पराकाष्ठा को समझने वाले गांधीवादी कुमार प्रशांत जी रामायण में एसा उल्लेख कहाँ मिलता है? सीता को हनूमान ने किसी सर्ग में, किसी कांड में पूँछ पर बैठाया हो तो बताईये? चलिये आप की बात बानते हैं कि यह अभिव्यक्ति की आजादी है और कलाकार को हक है वह धर्म की अपनी व्याख्या करे और चित्र बनाये तो उस महान हुसैन से एक आध मुहम्मद साहब के लिये भी एसा ही कुछ अब तक क्यों नहीं बना?

    हुसैन टैक्स बचाने और मोटी कमाई करने के लिये कतर के नागरिक हुए हैं और यह उसका निजी फैसला है। इसकी केवल भर्त्सना ही हो सकती है।
    हुसैन न मन से, न क्रम से और न वचन से भारतीय हैं और पासपोर्त लौटाने के बाद तो हर्गिज नहीं। वह स्वेच्छा से विदेशी है और यही अब उसकी पहचान मानी जानी चाहिये।

    हुसैन नें एसा क्या बनाया जो केवल अमीरों के ड्राईग रूम के लिये नहीं था या कि उसकी नंगी मानसिकता से अलग था? हुसैन ने एसा क्या बनाया जो क्रांतिकारी या समाज परिवर्तक हो? हुसैन नें एसा क्या बनाया जो जमीन से जुडा हो और बिकाउ न हो? हुसैन कुशल व्यापारी था और अपनी दूकानदारी समझता था।

    उसे एक धर्म की मान्यताओं की इतनी फिक्र थी कि अपनी फिल्म ही थियेटर से हटा ले तो उसे दूसरे धर्म की मान्यताओं की भी फिक्र करनी चाहिये थी। उसने सिद्ध किया कि वह ठरकी था और उसकी मानसिकता कुत्सित थी। उसने जान बूझ कर देश के साम्प्रदायिक सौहार्द को चोट पहुँचाई है।

    हमने अपने देवी देवताओं को मानवीय रूप दिया है लेकिन हर स्वरूप के पीछे कोई आख्यान, कथा अथवा किंवदंति है। हुसैन तो बहुत आगे की चीज हैं :) बहुत सही तर्क है कि वह जो बनाये उसकी आजादी है तो फिर आप यह क्यों नहीं समझते कि हुसैन का विरोध भी आजादी ही है उसकी नंगी सोच के खिलाफ अभिव्यक्ति की आजादी। वह कायर है और आप जैसे समर्थक दर असल उसे द्रौपदी की साडी पहनाने की असफल कोशिश कर रहे हो।

    हुसैन किसी के मन को नही झकझोड रहे बल्कि चंद वामपंथी ही उसके साथ खडे हैं वरना सारा देश प्रसन्न है। हुसैन का निर्वासन सामूहिक प्रसन्नता का कारण है और अभिव्यक्ति की उस आजादी की जीत है जो कहती है कि कलाकार को खुदा हो जाने से पहले जमीन पर अपने पैर रखने भी आने चाहिये। हुसैन राष्ट्रीय शर्म थे और पूरी शान से छाती ठोंक कर यह कहते हुए स्वेच्छा से विदा हुए हैं कि कतर में टैक्स बचेगा :) । एक और बात उसे किसी नें निकाला नहीं है। उसका विरोध हुआ, उसे अदालत में खडा किया गया जो लोकतंत्र में सबका अधिकार है लेकिन उस पर न तो तस्लीमा की तरह के हमले हुए न ही होते। आप लोगों नें जबरन उसे महान बनाने के लिये कहानिया जरूर बनायी हुई हैं।

    खैर आपसे कोई शिकायत नहीं आपका मुहर्रम जारी रहे चीखते रहिये -हा हुसैन अब तुम न रहे :)

    • harsh Reply

      March 14, 2010 at 11:48 pm

      makbul fida husain ko ager himmat hai to pagamber mohammadji ki tasbir banayen,

  2. P.C.Godiyal Reply

    March 11, 2010 at 12:30 pm

    बकवास मानसिकता का द्योतक है ! इस बारे में दूसरों को कायर बताने से पहले तनिक अपने गिरवान में तो झाँक लिया होता !

  3. भारतीय नागरिक Reply

    March 11, 2010 at 1:18 pm

    कुछ लोगों के दिमाग पर चढ़ा मुलम्मा कभी नहीं उतरता..
    हे गांधीवादी विचारक, क्यों भला गांधी जी को स्वर्ग में भी चैन से नहीं रहने देते…
    भईया जी आप लोग सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश में जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्षता क्यों नहीं समझाते और सैटेनिक वर्सेज की किताबें बांटते……

  4. मिहिरभोज Reply

    March 11, 2010 at 1:49 pm

    हुसैन एक हद दर्जें के कट्टर मुसलमान है…..कला को धर्म के चश्में से देखना ये कट्टरता की पहली निशानी है….जब उनकी कलाचर्या सीता और दुर्गा की नग्न तस्वीरें बना सकती हैं…..तो मुहम्मद की या उनकी अम्मी की क्यों नहीं….पर वहां उनका वो धर्म आङे आ जाता है जिसमें वो आस्था रखते हैं….

  5. मिहिरभोज Reply

    March 11, 2010 at 1:51 pm

    ऐसे व्यक्ति के बारे मैं रोना धोना बंद करो भाई….ये रहीम और रसखान के देश मैं किस लंपट के रो रहे हैं आप…..

  6. vivek Reply

    March 11, 2010 at 3:23 pm

    gandgi saaf ho gayee husain ke jane se

  7. पद्म सिंह Reply

    March 13, 2010 at 4:41 pm

    गाँधी वादी..??? संपादक?? आपके इस लेख को देख कर दोनों बातें गले से नहीं उतरती हैं… एकदम बकवास… हिंदुस्तान को कोई शर्म नहीं है हुसैन के जाने से… और अगर आप अपने आपको भारत मानते हैं तो बात अलग.
    आप शायद हुसैन की मानसिकता नहीं पढ़ पाए हैं अभी तक … वो शुद्ध रूप से व्यापारी है और पैसा ही उसका मज़हब… अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में फिल्मों के पोस्टर रंगने से ले कर करोडोँ की पेंटिंग तक हुसैन की मानसिकता वहीँ की वहीँ रही.
    आप हुसैन कि तुलना कबीर, रसखान और रहीम से कर रहे हैं … जो उनका अपमान ही है
    वैसे आप संपादक है बुद्धिजीवी समझते होंगे अपने आपको परन्तु आप अपने नज़रिए से पूरे भारत की मानसिकता पर लांछन नहीं लगा सकते.
    हुसैन न दिल से कभी भारतीय था और न है …
    इस तरह के लोगों का चले जाना ही श्रेयस्कर है
    बधाई …… हर भारत से प्यार करने वाले को

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