तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं। इतिहास की गवाही देती हैं। भविष्य की दिशा बताती हैं। खुशी, ग़म, बेबसी, घमंड … एक अच्छी तस्वीर बिना कुछ कहे बहुत कुछ सुना जाती है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिंदू में महिला आरक्षण बिल से जुड़ी ऐसी ही तस्वीरें छपी हैं। द हिंदू की तस्वीर आर वी मूर्ति ने खींची है और टाइम्स ऑफ इंडिया की तस्वीर किस फोटो जर्नलिस्ट की है यह अख़बार में नहीं छपा है। नाम से तस्वीर की अहमियत पर फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन उस फोटो पत्रकार का नाम होता तो अच्छा लगता। बहरहाल, भविष्य में हममें से जब भी कोई इन पर नज़र डालेगा तो अतीत तपाक से उसके सामने आकर खड़ा हो जाएगा। यह कहने के लिए हम और आप महिलाओं के हक़ में हुए इस बदलाव के गवाह रहे हैं।
ये दोनों तस्वीरें बताती हैं कि दक्षिणपंथ हो या वामपंथी – तमाम विचारधाराओं में बंधी महिलाओं में बहुत कुछ समान होता है। महिलाएं असली दलित हैं। सबसे अधिक समय से पुरुषों के जुल्मों की शिकार। पुरुषों की बनाई इस व्यवस्था में सबसे लंबा दासत्व उन्हीं का है। यही दर्द उन्हें जोड़ता है। जाति, धर्म, क्षेत्र, बोली, वर्ग और विचारधारा अलग होने के बावजूद उनके रिश्ते को टूटने नहीं देता।
यही संदेश बयां करती इन दोनों तस्वीरों को आप देखें। इसमें दक्षिणपंथ की प्रतीक सुषमा स्वराज और वामपंथ की प्रतिनिधि वृंदा करात गले मिल रही हैं। द हिंदू में छपी तस्वीर में नजमा हेपतुल्ला भी मौजूद हैं।
अरविंद
March 10, 2010 at 4:44 pm
http://www.mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=26&tid=2275
http://www.mediakhabar.com/binaryimage.aspx?fp=~/DataFiles/ImageFiles/2275_DC.PNG&h=300&w=300
awesh
March 10, 2010 at 4:54 pm
महिलाएं असली दलित हैं ,क्या बात है ,इस माह की सर्वश्रेष्ठ पोस्ट |
अरविंद
March 10, 2010 at 7:19 pm
यह महज उत्साह का “मिलन” है, दर्द का नहीं…!
इशारा
March 10, 2010 at 7:35 pm
क्यों भई? इन सभी ने आपको फोन पर बताया था क्या? आपने जैसा लिखा है उससे तो लगता है कि दर्द सिर्फ़ आपको होता है… इन महिलाओं को कभी कोई दर्द हुआ ही नहीं होगा? कभी किसी ने इन्हें कोई चोट नहीं दी होगी? शायद बताया हो कि पुरुषवादी व्यवस्था में उन्होंने भी तमाम मर्दों की तरह ही बचपन से लेकर अबतक अपनी ज़िंदगी जी है? तभी तो आप इतने इत्मिनान से कह रहे हैं कि इन्होंने कोई दंश नहीं झेला है और यह “उत्साह” का मिलन है? थोड़ा इस पर विस्तार से रोशनी डालिए!!!!
अरविंद
March 11, 2010 at 2:12 pm
इशारा जी,
किसी ने फोन पर तो नहीं बताया, लेकिन मैं इनके “दर्द” को समझता हूं। इनमें से एक वही सुषमा स्वराज हैं, जो गुजरात दंगों के बावजूद नरेंद्र मोदी को नायक बनाने का कोई “मौका” नहीं गंवाया है। आप अगर इशारे में समझें तो यह बताना काफी होगा कि उस दंगे में बहुत सारी महिलाओं के साथ पहले बलात्कार किया गया, फिर उन्हें जिंदा आग में झोंका गया। (अखबारों और रिपोर्टों में अभी तक इतना ही आ सका है)।
और ये वही सुषमा स्वराज हैं, जिनके आरएसएस के सभी समाज-सूत्र शिरोधार्य हैं। आरएसएस, यानी महान हिंदू परंपरा, यानी इस महान हिंदू परंपरा में “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते” और समाज के वंचित वर्ग की स्त्रियों के लिए इस तरह के लिए प्रचलित और व्यवहार में भी स्थापित वाक्य कि “बकरी को को कभी दूहा जा सकता है और दलित महिला के साथ कभी भी कहीं भी सोया जा सकता है…।”
आपके लिए अगर इस “बकरी” वर्ग की महिलाओं का दर्द और सुषमा स्वराज का “दर्द” एक है, तो मुझे इसके बाद कुछ नहीं कहना। सुषमा स्वराज को एक प्रतिनिधि के चेहरे के तौर पर अगर आप देखते हैं तो यह आपकी महानता होगी। सब इतने ही महान हो जाएं, यह इस देश की महान हिंदू संस्कृति के पुरोधाओं और झंडाबरदारों की सदियों से सदिच्छा है।
आपने विस्तार से “रोशनी” डालने के लिए कहा है, लेकिन इशारे में फिलहाल इतनी ही रोशनी काफी होनी चाहिए आपके लिए।
इससे ज्यादा की जरूरत है, तो अपने उसी “उत्साह” और “ताकत” के साथ जाइए दूरदराज के गांवों में और देखिए कि आज इक्कीसवीं सदी में भी “नीच” जातियों की महिलाओं को “ऊंची” जाति की महिलाएं किस निगाह से देखती हैं और उनके बैठने के लिए कौन-सी जगह तय की गई है। फिर आपको “दर्द” के भिन्न प्रकार भी दिखेंगे, अगर कहीं से खुद के भीतर संवेदनशीलता का कोई छोटा-सा सिरा भी पैदा कर सके हों। “प्रगतिशीलता” का पाखंड जितना हमने देखा-भोगा है, उससे ज्यादा आपने जीया होगा, इसलिए इस पर ज्यादा और क्या कहना। हां, इससे आपसे किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं है कि मैंने अगर इस “मिलन” को “उत्साह” का मिलन कहा है तो इससे मेरे भीतर स्त्री का पक्ष कमजोर हुआ है या मजबूत…।
एक बात और, जाति सवर्णों के लिए कोई समस्या नहीं है, यह उनके लिए समस्या है, जिन्हें सिर्फ इसी वजह से इस समाज की तमाम जलालतें झेलनी पड़ती हैं और इसके दंश के कारण बार-बार मरना पड़ता है।
संजय ग्रोवर
March 11, 2010 at 2:58 pm
यहां अरविंद शेष से सहमति बनती है। जिस देश में आज तक सास-बहू और ननद-भाभी का दर्द एक नहीं हो पाया वहां एक चित्र से ऐसी व्याख्या कर लेना या तो भावुकता है या हड़बड़ी या कुछ और ही है। और इन सबमें तर्क पीछे छूट जाता है। हमने तो ऐसे चित्र भी देखें हैं जहां भविष्य की वैज्ञानिक, समाजसेवी और शिक्षाविद महिलाएं, वर्तमान के अजीबोगरीब चरित्र वाले लोगों से मालाएं और पुरस्कार लेते वक्त गर्वपूर्वक मुस्करा रही होतीं हैं। ऐसे भी देखें जहां नाचने वालियां बाहुबलियों के साथ थिरक रही होतीं हैं। याद करेंगे तो ऐसे न जाने कितने चित्र आपको याद आ जाएंगे। आप ही सोचिए किस तरह के चित्र आपने ज़्यादा देखें हैं।
कल यह आरक्षण बैसाखी था तो आज सखी कैसे हो गया ? कल जिस आरक्षण के खिलाफ़ महिलाएं उछल-उछल कर वी.पी. सिंह को गालियां दे रहीं थीं ज़्यादातर वही आज सोनिया गांधी की बलाएं क्यों ले रहीं हैं ? कल तक जो पुरुष सारे काम-धाम छोड़कर आरक्षण में कमियां निकालने में जुटे थे वही आज इस आरक्षण पर भांगड़ा क्यों कर रहे हैं !?
जो मांग दूसरों को उठानी चाहिए थी वे यादव उठा रहे हैं तो क्या मांग ग़लत हो गयी ? दिलीप मंडल क्या यादव हैं ? यादव-बुद्धिजीवी (?) ख़ुदको यादव कहें न कहें दूसरे ज़रुर कहेंगे क्योंकि उनका फ़ायदा बीमारी को बनाए रखने में ही है। वैसे यह ऐसा या वैसा बुद्धिजीवी होने का सर्टीफिकेट/आरक्षण कहां से जारी होता जिससे कोई स्वघोषित बुद्धिजीवी न बन सके !?
और बामन-ठाकुरों और दलित-आदिवासियों की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों में आज भी ज़मीन-आसमान का अंतर है जिसे अनदेखा करना चालाकी तो है ही और भी कुछ हो सकता है।
मैं यहां आरक्षण के खि़लाफ़ नहीं दोहरे मानदण्डों के खि़लाफ़ लिख रहा हूं।
बाक़ी अगले कमेंट में।
इशारा
March 11, 2010 at 3:01 pm
अरविंद जी,
कहते हैं भैंस का पूंछ उठाओगे तो गोबर ही देगी, गाना थोड़े गाएगी। लगता है कि आपका भी वही हाल है। आप तो घोर सामंती किस्म के आदमी हैं। आपको ऊंची जाति के महिलाओं का दर्द भी दिखाई नहीं देता। आपके हिसाब से जिन घरों में पैसे हैं वहां सब ठीक है। या फिर पैसे हो या नहीं हो जिनकी जाति ऊंची है, उनके घरों में सभी महिलाएं मजे में होंगी? ऊंची जाति की महिलाओं का बलात्कार नहीं होता होगा? ऊंची जाति की महिलाओं को घर से बाहर निकलने की पूरी आज़ादी होगी? ऊंची जाति की महिलाओं के लिए उनके पुरुषों ने कामयाबी और शोहरत हासिल करने के लिए सारी सुविधाएं मुहैया करा दी होंगी? अपनी जातिगत और आपकी ही तरह की सामंती सोच का त्याग कर दिया होगा? यही सब कहना चाहते हैं न आ?
िस आधार पर मायावती को क्या कहिएगा? रामविलास पासवान को क्या कहिएगा? करुणानिधि को क्या कहिएगा? ममता को क्या कहिएगा? ये सभी बीजेपी के साथ रह चुके हैं? नीतीश कुमार भी? और तो और आप मोदी के बारे में क्या जानते हैं? क्या मोदी ब्राह्मण है? राजपूत है? भूमिहार है? लाला है? आखिर है क्या? आपको मालूम है या मैं बताऊं?
नरेंद्र मोदी भी पिछड़ी जातियों से हैं। तो क्या उस मोदी के सारे अपराध के लिए पिछड़ी जातियों को बलात्कारी, व्याभीचारी बता दीजिएगा? उन दंगों में सबसे अधिक कत्लेआम आदिवासियों ने मचाया था, तो क्या आप सभी आदिवासियों को क़ातिल, नरसंहारक, हिंसक, बलात्कारी बता दीजिएगा? थोड़ा तो दिमाग का इस्तेमाल कीजिए। या जाति से ऊपर उठ कर कुछ भी सोचने की शक्ति ही नहीं है? अगर नहीं है तो फिर आपसे क्या बात होगी?
बहुत से ऊंची जाति के बच्चे भी आपकी ही तरह स्वार्थी दलील देते हैं। खासकर वो जो सरकारी नौकरी हासिल नहीं कर पाते। वो ऊंची जाति के नेता भी ऐसी ही दलील देते हैं जिनकी सीट आरक्षित हो जाती है। वो भी कहते हैं कि आरक्षण का दंश जितना उन्होंने झेला है उतना आप लोग मलाई खा रहे हैं। ऐसी बातों का कोई अंत है भला? अंत हो तो बताएं?
अरविंद
March 11, 2010 at 4:25 pm
आपकी पहली टिप्पणी में कुछ कहने की गुंजाइश थी, लेकिन आपकी इस टिप्पणी के बात मैं आपको कोई भी जवाब देने लायक नहीं मानता और सचमुच आप जैसे लोगों के लिए मुझे अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है।
अगर आरएसएस के गर्भनाल से जुड़ी भाजपा और उसके समाजशास्त्र की झंडाबरदारों के बारे में आपकी यही समझ है तो बस, मैं आपको विजेता घोषित करता हूं। आप खुशी-खुशी सेलिब्रेट कर सकते हैं।
फिर भी, अगर सोच सकने लायक जमीन पर खड़े हों, तो संजय ग्रोवर की इस बात पर गौर कीजिएगा कि-
बामन-ठाकुरों और दलित-आदिवासियों की आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों में आज भी ज़मीन-आसमान का अंतर है जिसे अनदेखा करना चालाकी तो है ही और भी कुछ हो सकता है।
मैं यहां आरक्षण के खि़लाफ़ नहीं दोहरे मानदण्डों के खि़लाफ़ लिख रहा हूं।
बाकी आप होशियार है, इशारे-इशारे में ही कुछ कह और समझ सकते हैं। आगे क्या कहना। आपने तो मेरे सामंती चरित्र और दृष्टि के बारे में सब कुछ कह ही दिया। हां, इसे स्वीकार करना या नहीं करना मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। मैं तो चला किसी भैंस के पीछे उसकी पूंछ उठाने। सुना है गोबर बड़े काम का होता है। हालैंड भी अपना गोबर हमारे देश में भेज रहा है। आपको तो नहीं ही चाहिए होगा। आपको तो गाय के पवित्र गोबर की आदत होगी। है न…। उम्मीद है कि इशारे को इशारा जी समझ रहे होंगे…
अरविंद
March 11, 2010 at 6:20 pm
एक और बात कहना चाहता हूं। दर्द को अगर देखने की चीज समझेंगे तो इसी तरह विभ्रम में अपना जीवन गुजार देंगे। इसे महसूस करिए, तब पता लगेगा कि सचमुच समान अत्याचारों का दुख किसी भी जाति-वर्ग की स्त्री के लिए बराबर है। लेकिन वह कौन-सी व्यवस्था है, जो यह फैसला देने को मजबूर करती है कि ऊंची जाति के पुरुष किसी ”नीच” जाति की महिला के साथ बलात्कार कर ही नहीं सकते, क्योंकि वे तो उसे छू (छुआछूत के संदर्भ में) भी नहीं सकते।
जहां तक सामंती सोच का सवाल है, आज के समय में यह आप जैसे लोगों के गले की ऐसी हड्डी बन चुका है कि इसे उन लोगों के सिर पर थोपना आपकी मजबूरी बन चुकी है जो सवाल उठाएं। सारी लड़ाई पोजिशनिंग की है, इशारा जी…। अपना पोजिशन किसी भी तरह कमजोर हो, यह आप कैसे स्वीकार करेंगे।
इस ओर शीबा जी ने बहुत कम में बहुत कुछ साफ शब्दों में कहा है। मेरे दिमाग की तो आपने सीमा ही बता दी है, उनसे कुछ समझने की कोशिश करें, इशारा जी…
असहमत
March 11, 2010 at 3:01 am
संयोग है या दुर्योग कि पहली तस्वीर में दो पंडित महिलाएं गले मिल रही हैं और नीचे की तस्वीर में चार अपकास्ट महिलाएं जश्न मना रही हैं।
इशारा
March 11, 2010 at 9:25 am
गनीमत है कि आपने यह तो माना कि दो महिलाएं भले ही पंडित गले मिल रही हैं। आपकी इतनी दयादृष्टि काफी है।
विनीत कुमार
March 11, 2010 at 7:20 am
संयोग है या दुर्योग कि पहली तस्वीर में दो पंडित महिलाएं गले मिल रही हैं और नीचे की तस्वीर में चार अपकास्ट महिलाएं जश्न मना रही हैं।..इंसान के भीतर सही सॉफ्टवेयर डला हो तो इंसान पता नहीं क्या,क्या खोज ले?
awesh
March 11, 2010 at 10:10 am
@VINEET कोई अपनी ही नजर से तो हमें देखेगा ,एक कतरे को समुन्दर नजर आये कैसे
jyoti
March 11, 2010 at 12:31 pm
मैं आप से सहमत हूं विनीत,
अखिलेश्वर
March 11, 2010 at 11:27 am
तसवीरको बैलेंस करने के लिए कृपया दो यादव और एक मुस्लिम महिला को जोड़ा जाय तो ‘असहमत’ जी को तसवीर पूरी नजर आएगी।!
ससंद मंे जो गुण्डा-गर्दी की गई है वो सिर्फ ससंद में ही की जा सकती है। अन्य किसी सरकारी या प्राइवेट संस्था में वैसा व्यवहार करने पर नौकरी से तत्काल हाथ धोना पड़ जाता। यादव-वाद के समर्थक एक भी स्वघोषत बुद्धिजीवी ने इनके घोर आपत्तिजनक व्यवहार की निंदा नहीं की।
ओबीसी कोटा की मलाई खा-खा कर मोटे हो चुके वर्ग की पहचान करने का समय आ गया है। अखबार में जिन सांसदो ने गुण्डागर्दी की उनके नाम देखें। देखें कि किस जाति का बहुमत है। ओबीसी के भीतर जब अतिपिछड़ा की बात की गई तो आरक्षणवादी बिदक पड़ते हैं। उनको ओबीसी की एकता टूटती दिखती है। यही हाल दलितों के बीच कुछ खास जातियों द्वारा मलाई मार लेने को लेकर है। इस देश के एसटी आरक्षण में कितनी मलाई मीणा भाईयों ने मारी और फिर पंेदी में बची हुई कितनों को नसीब हुई… जांच हो. (जेएनयू में कई लोग कहते हैं कि जहां जाओगो वहां एक मीणा मिलेगा -आरक्षण पाने के बाद मीणा भाईयों का झक सफेद रंग और दूधिया सफेद होता जा रहा है।)
मुद्दा यह है कि दलित/पिछड़ा को कब तक ब्लैंकेंट टर्म के रूप में प्रयोग किया जाता रहेगा। यादव तो हर जगह अपने को हर जगह ठाकुरों के समकझ रखते हैं। यही हाल कुछ हद तक मीणाओं का भी है। फिर इन लोगों द्वारा आरक्षण मंे सबसे ज्यादा मलाई मारते जाना बताता है कि आरक्षित वर्गों में भी कुछ जातियों की स्थिति दूसरी जातियों से काफी बेहतर होती है। अतः आरक्षण का लाभ उठाने के मामले में वो अपने ही वर्ग की दूसरी जातियों से काफी आगे क्यों होते हैं।
इस देश में दलितों और आदिवासियों के संग जो भी हुआ है। उसका कोई जवाब नहीं है। उन्होनंे बहुत सहा है। लेकिन क्या यही बात यादव,कुर्मी,कोईरी भाई कह सकते हैं। ये तो सवर्णों के बर्तन में खाते रहे हैं। अपने-अपने क्षेत्रों के रोजगार में इन भाईयों का कब्जा रहा है। इनको पढ़ने से कब और किसने रोका था ? ये दलितों सी स्थिति में कब थे ??
हमारे पड़ोसी गाँव के दलित तो ठाकुरों-बाभनों से ज्यादा अहिरों से त्रस्त हैं। ऐसे उदाहरण दूसरे भी मिल जाएगें।
अब वक्त आ गया है कि पिछड़ा की गठरी खोली जाय और देखा जाय कि इसके भीतर कौन-कौन छिपा बैठा है ?
यदि एक ठाकुर-बाभन अतिपिछड़ों के हित के पैरोकार नहीं स्वकारे जा सकते तो यादव भाईयों को क्यों इस पूरे वर्ग की मलाई खानी दी जाय ?
सभी आरक्षित वर्गों मंे ब्राह्मण-वर्ग उभर चुका है। इन्हें इनके चेहरे से नकाब हटाने का समय आ गया है। जिससे इनका असली चेहरा सामने आ जाय।
अखिलेश्वर,जेएनयू
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Sheeba Aslam Fehmi
March 11, 2010 at 5:43 pm
इस तस्वीर को देखते ही सबसे पहले गुजरात ही याद आया था. भंवरी देवी और ताज़ा-ताज़ा खैरलांजी भी. इन अपराधों पर मीडिया, न्यायधीश और जार्ज फ़र्नान्डिस की टिप्पणियां भी याद आईं.
महिला आयोगवालियों (वर्तमान या भूतपूर्व), को देख कर भी ऐसी ही गिजगिजाहट होती है.
बेशर्म तमाशा!
रौ में बहने का वक़्त है, धारा के उलट कहने की ज़रुरत कमज़ोर को पड़ती है और कमज़ोर जुर्रत करे कैसे? अरविन्द शेष जी पर भद्दी फब्ती कसी गयी है जिसका मैं सख्त विरोध करती हूँ. इशारा जी क्या आपको इसका अफ़सोस होगा?
दिलीप मंडल जी सही हैं. संजय ग्रोवर जी ने बेहतर ढंग से समझाया है, उनकी बात सभी पढ़ें.
इस मुद्दे पर सत्तावान जातिवालों की मासूम इंसानियत परस्ती पर ताजुब नहीं होना चाहिए. कितने नेक-नियत लोग हैं ये!
रोटी के अभाव में केक खाने की सलाह पुरानी है.
शीबा असलम फ़हमी
इशारा
March 11, 2010 at 7:10 pm
अरविंद जी, शीबा जी, संजय ग्रोवर जी,
एक-एक करके आप सभी लोग पीछे पड़ गए हैं। शीबा ने इसमें दिलीप मंडल को खींच लिया है। दिलीप कहां से और कैसे कूद पड़े यह समझ में नहीं आ रहा। फिर भी जब सवाल उठे हैं तो बात हो ही जाए। आज के दौर में आप किसी भी पार्टी को भाजपा से अलग नहीं कर सकते। हर पार्टी में छोटे-छोटे कई भाजपा हैं। कांग्रेस में सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर हैं। खुद गांधी परिवार है। जिसके माथे पर सिख दंगों का दाग है। लेफ्ट के खाते में नंदीग्राम, सिंगूर है। वहां भी विरोधियों के दमन के लिए हर हथकंडे अपनाए जाते रहे हैं। आज जो भी महिला बिल के समर्थन और विरोध में खड़े हैं उनमें से ज़्यादातर का रिश्ता बीजेपी और सुषमा स्वराज के साथ रह चुका है। मंच पर साथ बैठ चुके हैं। विरोध करने वाले ढेरों नेता ऐसे हैं जो बीजेपी के साथ सत्ता का सुख भोग चुके हैं। फिर किन आदर्शों की बात कर रहे हैं आप लोग?
दरअसल, या तो आप लोग इतने भोले हैं कि सियासत के बारे में कुछ भी नहीं जानते या फिर जानबूझ कर समझना नहीं चाहते। सत्ता की सियासत में आदर्श और उसूल कोई मायने नहीं रखते। सारा खेल नफा नुकसान है। जिसे जिस दांव में फायदा लग रहा है वही दांव आजमा रहा है।
जब वीपी सिंह ने मंडल लागू किया और उच्च शिक्षा संस्थानों में अर्जुन सिंह ने पिछड़ों को आरक्षण दिया तो वो क्या अवर्ण थे? और क्या वो अवर्णों का मसीहा बनना चाहते थे? नहीं वह एक सियासी दांव था। और अपनी सियासत चमकाने के लिए उठाया गया था।
जब इसी कांग्रेस के शासन काल में पिछड़ों को उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण दिया गया तब वो मसीहा थे और आज महिला आरक्षण बिल में उनकी बात नहीं मानी जा रही है तो खलनायक हैं। ऐसा सोचना, सियासत की कमजोर समझ के अतिरिक्त कुछ नहीं।
अरविंद जी, आपकी बातों से लगता है कि आप गांवों में रहे हैं। आपको मालूम होना चाहिए कि भैंस का गोबर भले ही गाय के गोबर के बराबर पवित्र नहीं माना जाता हो, लेकिन उससे उस गोबर की अहमियत ख़त्म नहीं होती। उपले भैंस के गोबर से भी बनते हैं और गाय के गोबर से भी और खाना दोनों पर ही पकता है। उसी खाने को सब खाते हैं।
Sheeba Aslam Fehmi
March 11, 2010 at 7:34 pm
इशारा जी,
अब गोबर आख्यान होगा क्या?
कभी कभी आवेश में कुछ ग़ैर-मुनासिब मुंह से निकल जाता है, हर इंसान इसका शिकार होता है. ‘ग़लती हुई, माफ़ करें’, कहने से कोई क़द नहीं कम हो जाता. आप विमर्श-चिंतन की दुनिया के आदमी हैं. क्या ये बताने की ज़रुरत है की शब्दों से ज़ख्म न लगाए जाएँ, बल्कि इनसे मरहम का काम लिया जाऐ तो, हमारा समाज कितना बेहतर होगा. इस दुनिया में दो ही दुःख हैं इंसानियत के – भूक और अपमान, दोनों एक ही की झोली में डाले गए हैं. आरक्षण का आधार भी यही हैं. मुझे अभी भी आप पर भरोसा है की एक साथी के प्रति जो ग़लती हुई आप उस पर उस स्तर से उठ कर सोचेंगे जिस से उठने की सलाह आप आरक्षण समर्थकों को देते रहे.
अरविंद
March 11, 2010 at 8:21 pm
इशारा जी,
आपको खुश होना चाहिए कि आपकी अमूर्त्त पहचान के बावजूद सामने खड़े आपके तीन “दुश्मन” आपके विभ्रम की स्थिति में परोसे गए “तर्कों” के बरक्स आपको “सलाह” देने की कोशिश में लगे हैं और आपके “पीछे पड़ गए हैं…।”
पहले स्त्री-पुरुष, फिर समाज और अब राजनीति- यानी इंसानी समाज की तीन सार्वजनिक पहलुओं पर आपने अपने “कीमती” विचार तो जाहिर कर दिए, लेकिन इससे एक मुश्किल यह खड़ी हो गई कि अब आप यह भी कह सकने की हालत में नहीं रहे कि दूसरे क्यों आपकी बातों पर गौर करें। आपके ही विचार आपके सामने रखता हूं-
“सत्ता की सियासत में आदर्श और उसूल कोई मायने नहीं रखते। सारा खेल नफा नुकसान है। जिसे जिस दांव में फायदा लग रहा है वही दांव आजमा रहा है।”
आपके इस महान निष्कर्ष के बाद भी आप दर्द की परिभाषा और जगह बताने की स्थिति में रह गए हैं क्या? सारा खेल नफा-नुकसान का। जिसे जिस दांव फायदा लग रहा है, वह वही दांव आजमा रहा है।
और आप भैंस की पूंछ उठा कर गोबर हथियाने की दुहाई देंगे?
आपके गोबर-आख्यान की असलियत यह है कि भैंस और गाय के गोबर की तुलना करते वक्त आप इतना भी नहीं समझते कि गाय के गोबर को पवित्री की हैसियत का सिरा आखिरकार किन सामाजिक प्रभुओं से जुड़ता है। और गोबर के उपले में और गोबर के पिंडी में बहुत फर्क होता है, इशारा जी…। कभी गोवर्धन “पूजा” से लेकर अपनी “महान हिंदू परंपरा” में कायम रीति-रिवाजों में गोबर-आख्यान का अध्ययन करने की कोशिश कीजिए, फिर गोबर के मिसाल को असली संदर्भों में रख सकेंगे।
लेकिन यह उम्मीद भी इसलिए नहीं, क्योंकि हम लोग तो इतने भोले हैं कि सियासत के बारे में कुछ भी नहीं जानते। सियासत की सारी समझ की फसल तो आपकी “लुटियंस जोन” में उगती है। लेकिन इस फसल से पहले अच्छी खिचड़ी बनाना सीखिए। अभी तक आपके विभ्रम का बर्तन आपकी फसल से ठीक से सियासती खिचड़ी भी नहीं बना पा रहा है। शायद इसके लिए आपने गलती से गाय के गोबर से बने उपलों का इस्तेमाल कर लिया है, भैंस के गोबर के उपलों का इस्तेमाल करके देखिए। सारे विभ्रम दूर हो जाएंगे और “दर्द” की असलियतें सचमुच दिखने नहीं, महसूस होने लगेंगी।
शीबा जी की इस सलाह पर गौर करने की सलाह मैं भी दे रहा हूं कि-
“इस दुनिया में दो ही दुःख हैं इंसानियत के– भूख और अपमान। दोनों एक ही की झोली में डाले गए हैं। आरक्षण का आधार भी यही हैं।”
(भैंस या गाय के गोबर से बने उपलों से बने खाने पर एक नोटः ये कहीं मजबूरी है और कहीं पिकनिक कार्यक्रम में ग्रामीण छौंक सूंघने का इंतज़ाम। समझे इशारा जी…)
क्या अब भी इशारों-इशारों में बात करने की जरूरत रह गई है, इशारा जी…
संजय ग्रोवर
March 11, 2010 at 8:39 pm
कम-अज़-कम मैंने तो सियासत का कोई ज़िक्र नहीं किया। मैंने तो जनता के ‘स्वाभाविक’ बुद्विजीवियों की बात की थी कि एक से दूसरे आरक्षण के बीच इतना बड़ा ‘हृदय-परिवर्तन’ कैसे हो गया। भाजपा को लेकर आज की तारीख में किसी से कुछ छुपा रह नहीं गया। कांग्रेस के चैरासी का भी ज़िक्र आए दिन होता है। अब तो वामपंथ ही रह गया है, सिंगूर से लेकर तसलीमा तक जिसकी पोल आए दिन खुल रही है।
किन्हीं अखिलेश्वर जी ने यादव बुद्विजीवियों का प्रसंग छेड़ा तो संदर्भ में मैंने दिलीप जी का ज़िक्र कर दिया।
पर आप ज़रा ग़ौर से तो देखें, जो ख़ुशी वृंदा और सुषमा के चेहरों पर है वो नज़मा हेपतुल्ला के पर नहीं है। ग़लत कह रहा हूं क्या ?
अखिलेश्वर
March 12, 2010 at 10:06 am
संजय जी गोबर-विमर्श में उलझे लोगों मंे से एक आप ही हैं जिसने मेरी टिप्पणी का संज्ञान लिया। आपने सही कहा कि सिर्फ यादवो के उठाने से कोई बात गलत नहीं हो जाती। ठीक वैसे ही जैसे सिर्फ सवर्णों के उठाने से कोई बात गलत नहीं हो जाती। यह तो उस बात का जवाब है जो मैंने नहीं कही थी कि लेकिन आपने मेरी समझकर उसका जवाब दिया।
मेरा मूल प्रश्न था कि यादव एवं कुछ अन्य गिनी चुनी जातियां ही पिछड़े एवं दलितों का अजेंडा तय कर रही है। क्या मेरा यह प्रश्न गलत है कि हमेशा से अपने को उच्च समझने वाली जातियां आरक्षण के कारण खुद को आदिवासी तक मनवाने की जिद पर अड़ी हैं।
यहां पर जिस तरह का जातिवादी विमर्श चल रहा है उससे लगता है कि हर किसी को अपनी जाति बताकर ही विमर्श में उतरना चाहिए। क्योंकि कोई ब्राहम्ण पिछड़ो के लिए नहीं सोच सकता तो कोई तथाकथित पिछड़ा दलितों के लिए नहीं सोच सकता। और ये सब मिलकर महिलाओं के लिए नहीं सोच सकते। बिहार में तीन प्रमुख दल तीन जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनमें कोई भी दल सवर्णवादी नहीं है।
मैं ये बातें इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरी यादवों से कोई शत्रुता है। मैं एक सामाजिक तथ्य की तरफ इशारा करना चाह रहा हूं। पिछड़ो और दलितों में जो ब्राह्मण उभर चुके हैं उनके खिलाफ इन वर्गों के भीतर असंतोष बढ़ता जा रहा है। समय रहते हम नहीं चेते तो स्थिति विस्फोटक ही होगी। उत्तर प्रदेश में सोनेलाल पटेल ने जब अपनी जाति के लिए बिगुल फूंका तो बहुत सी सीटों का भाग्य बदल गया। कल्याण सिंह आज भी लोध नेता हैं। ऐसे दूसरे उदाहरण भी हैं। आप जानते होंगे।
संजय ग्रोवर
March 12, 2010 at 5:16 pm
अखिलेश्वर जी मैं बिलकुल सहमत हूं कि ब्राहमणवाद हर जाति में उभर आता है। मैं इसको इस तरह देखता हूं कि जैसे मजदूरों में से कोई चालू, तिकड़मी या तेज़ मजदूर एक दिन यूनियन लीडर या कांट्रेक्टर बन जाता है और बाकियों की पीढ़ियां पत्थर फोड़ते गुज़र जातीं हैं। या दहेज़ के खि़लाफ़ बने क़ानूनों का ज़रुरतमंदों का तो पता ही नहीं चलता और फ्राड किस्म के लोग इसका फ़ायदा उठा ले जाते हैं। लेकिन यह इन क़ानूनों का दोष नहीं, व्यवस्था ही हमारी कुछ ऐसी है कि सही चीज़ सही जगह नहीं पहंुचती। दूसरे, क्रीमी लेयर के प्रावधान में भी मैं कोई बुराई नहीं देखता। मैं इससे भी सहमत हूं कि कोई भी संवेदनशील इंसान दूसरे के हित में सोच सकता है, भले वह उस लिंग, जाति, वर्ग, वर्ण, पेशे का हो न हो। पर दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ऐसे उदाहरण अपवादस्वरुप ही देखने की मिलते हैं।
aradhana
March 11, 2010 at 11:06 pm
वैसे तो मैं भी संजय जी, अरविन्द जी और शीबा की बातों से सहमत हूँ, पर जब तक इस आरक्षण के भीतर आरक्षण नहीं मिलता, तब तक यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं है. मेरे ख्याल से इस बात का फ़ैसला औरतों को ही करना होगा कि वे इसे कैसे लेती हैं ? इसे अपनी ताकत बनाती हैं या अपरकास्ट लोगों के लिये एक और मौका. और…अभी से कोई निष्कर्ष निकाला भी कैसे जा सकता है? अभी तो बहुत कुछ होना बाकी है.
ऐसे में अपने एक मित्र का एक वाक्य याद आ रहा है ” महिलाओं को आरक्षण मिल जायेगा…सोचना है कि हँसे कि रोयें ?”
अभी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है.
अखिलेश्वर
March 12, 2010 at 10:15 am
http://en.wikipedia.org/wiki/Yadav
dear everybody, prior to respond me plz see this link once
Rekha Srivastava
March 12, 2010 at 10:33 am
मेरी दृष्टि से हर ब्लॉगर एक संवेदनशील और प्रबुद्ध व्यक्ति होता है और इसी लिए वह तस्वीर का विश्लेषण करने में व्यक्ति को लेकर कहाँ से कहाँ तक कि व्याख्या कर जाता है. आरक्षण अभी मिला नहीं है और जो इस आरक्षण से सबसे बड़े विरोधी है वे स्वयं आरक्षण लिए बैठे हैं लेकिन दूसरे को क्यों लेने दें? इस महिला आरक्षण में दलित महिला आरक्षण कि मांग के बारे में किसी ने विचार किया है? शायद नहीं. इस को विस्तार से वर्णित करने का प्रयास करूंगी वैसे अधिकांश प्रबुद्धजन इसको समझ ही चुके होंगे.
कल्पना
March 12, 2010 at 6:17 pm
न नारी एक है और न ही हर नारी की समस्या, दर्द और खुशी एक। जो ऐसा मानता है वो यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि जाति, धर्म और क्षेत्र के बारे में नारी की अपनी कोई सोच नहीं होती। वो इन सबसे या तो बंधी ही नहीं या फिर अगर बंधी थी तो ऊपर उठ चुकी है। जबकि ऐसा है नहीं।
दलित नारी की पीड़ा को दलित स्त्री की समझ सकती है। इन खाए-पीए सपन्न घरों की महिलाएं उस दर्द को क्या समझेंगी। ये कभी दूसरों के खेतों और घरों में काम करने पहुंची हो तो पता हो।
जिज्ञासु
March 15, 2010 at 4:00 am
अऱविंद जी,
“यह महज उत्साह का “मिलन” है, दर्द का नहीं…!”
आपकी इस टिप्पणी पर अच्छी-खासी बहस छिड़ गयी…काफी विचारोत्तेजक बहस रही…यहां तक कि ये बहस गोबर और ‘भैंसबर’ को भी नये नज़रिये से देखने का सलीका सिखा गयी…इस बढ़िया बहस के लिए धन्यवाद…
लेकिन एक सवाल प्रारंभिक टिप्पणी को लेकर है…ये मिलन दर्द का नहीं है, ये तो साफ है…मोदी समर्थक सुषमा स्वराज के साथ मोदी विरोधी विचारधारा वाली वृंदा और मोदी के भुक्तभोगी अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली नज़मा हेपतुल्ला का भला दर्द का मिलन हो भी कैसे सकता है। (ये अलग बात है कि नज़मा जी पद के लालच में बीजेपी के साथ गलबहियां पहले भी डाल चुकी हैं। इस अवांतर के बावजूद बात तो सोलह आने ठीक लगती है।) लेकिन ये आपको मिलन, जिस उत्साह का मिलन लग रहा है, वो उत्साह क्या है..किस बात का है…इस पर भी कुछ रौशनी डालें, तो अच्छा रहेगा…