सोनभद्र। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के बीच उत्तर प्रदेश का आदिवासी इलाका। जिस आरक्षण से देश के करोड़ों दलितों और आदिवासियों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार मिले, आरक्षण की उसी नीति में खामियों की वजह से यह इलाका अब धीरे-धीरे नासूर बनता जा रहा है। ग्रामसभाओं से लेकर संसद तक चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित आदिवासी अब माओवादी बन रहे हैं। “बैलेट नहीं तो बुलेट” का नारा बुलंद हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के जिस जिले में सबसे अधिक आदिवासी हैं, विधानमंडल में वहां से एक भी आदिवासी प्रतिनिधि का नहीं होना काफी कुछ कहता है। यह बताता है कि आरक्षण के नाम पर हित साधने में जुटे हमारे हुक्मरान कितने दोमुंहे, मूर्ख और भ्रष्ट हो सकते हैं। यहां माहौल इतना ख़राब है कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने की कोशिश से जातिगत तनाव बढ़ जाता है और हिंसा शुरू हो जाती है।
अगर आप कभी झारखण्ड, बिहार मध्य प्रदेश ,छतीसगढ़ की सीमा पर अवस्थित सोनभद्र आये तो संभव है आपको लगे आप किसी औद्योगिक तीर्थ में आये हैं। लेकिन अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य और बिजलीघरों की चकाचौंध के पीछे बेहद खौफनाक दास्तां छिपी हुई है। ऐसा लगता है कि सोनभद्र का आदिवासी सोनभद्र का ही नहीं है।
यहां पर ग्रामसभा की 501 सीट, विधानसभा की दो सीट और लोकसभा की एक सीट है। ये सीटें शुरू से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रही हैं। 2004 से पूर्व जनपद के आदिवासियों को जनजाति का दर्जा नहीं मिला था। वो सभी अनुसूचित जाति के दायरे में थे। तब वो इन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ा करते थे।
बेहद लम्बी लडाई लड़ने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में यहां की नौ आदिवासी जातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया। इनमें गोंड़, खरवार, बैगा, चेरो, पनिका, अगरिया, मांझी, पठारी और पहरिया शामिल हैं। इसके साथ ही सोनभद्र की बहुसंख्य आबादी अनुसूचित जनजाति हो गई, लेकिन सियासी सीटों पर आरक्षण व्यवस्था ज्यों की त्यूं रखी गई। नतीजा यह हुआ कि मान्यता प्राप्त जनजातियां चुनाव लड़ने के अधिकार से ही वंचित हो गयीं।

मजाक सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं हुआ। सरकार ने धांगर, बंसोर, घसिया, कोल, बैसवार समेत अन्य 15 आदिवासी जातियों को इस आरक्षण से अलग रखा गया, जबकि इन्हें भी जनजातियों में शामिल करने की मांग आजादी के बाद से ही की जा रही थी। दूसरी तरफ जिन जातियों को मान्यता दी भी गयी उनमें भी जमीनी वास्तविकताओं की जानबूझ कर अनदेखी की गयी। गोंड और मांझी सोनभद्र में एक ही आदिवासी जातियां हैं पर इन्हें अलग-अलग मान्यता दी गयी है।
सोनभद्र में इस प्रशासनिक गड़बड़ी का नतीजा बेहद अजीबोगरीब हुआ। शायद आप यकीन न करें, मगर यह सच है कि यहां कई ग्राम सभाएं ऐसी हैं जहां पर एक ही परिवार के लोग ग्राम प्रधान भी हैं और सदस्य भी। लगभग चार दर्जन ग्राम सभाओं में चुनावों के दौरान ग्राम प्रधान निर्विरोध चुन लिया गया क्यूंकि वहां अनुसूचित जाति का अन्य कोई प्रत्याशी नहीं मिला। आदिवासी गिरिजनों के अधिकारों के लिए लम्बी लड़ाई लड़ने वाले पूर्व विधायक विजय सिंह गोड़ को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। वहीं संसद और विधानसभाओं में अपनी पारी की बाट जोह रहे तमाम आदिवासी नेताओं को वापस जंगलों की ओर लौटना पड़ा।
जब हमने पूर्व विधायक विजय सिंह गोड़ से इस मामले में बात कि तो वो अनायास ही रो पड़े। उन्होंने कहा कि लखनऊ से दिल्ली तक सब जानते हैं सोनभद्र के आदिवासियों का क्या हाल है… वो आज भी दाने दाने को मोहताज है, आप ही बताइए क्या कसूर है इनका? वो बताते हैं कि “इस मामले को लेकर हम उच्चतम न्यायालय गए थे न्यायालय में केंद्र सरकार ने कहा कि अगर चुनाव आयोग सोनभद्र की जनजातियों को चुनाव लड़ने की इजाजत दे देता है तो हमें कोई आपति नहीं होगी। लेकिन लोकतंत्र के इस उत्सव को चुनाव आयोग ने भी हमारे लिए मर्सिया बना डाला, उन्होंने हमें चुनाव लड़ने देने की इजाजत देने से इनकार कर दिया ।“
परसवार गांव के अम्हां बैगा कहते हैं कि “जमीन लेही लीहन, खेत भी, अब हमन चुनावों नाही लर पारित। जब लड़िका पार्टी में जाए बंदूको मारत हयन। तब एमे का गलती बा (जमीन भी ले लिए, खेत भी अब हम चुनाव भी नहीं लड़ सकते, ऐसे में जब हमरे बच्चे हांथ में बंदूक थाम नक्सलवादी बन जाते हैं तो इसमें क्या गलत है)?” अम्हां बैगा के ये शब्द ख़तरनाक बदलाव का संकेत दे रहे हैं।
आज आदिवासी अंचलों में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बीच खूनी संघर्ष छिड़ा हुआ है। पिछले चुनावों में कई इलाकों में प्रत्याशी दहशत की वजह से नामांकन नहीं भर पाए। वहीं चुनाव न लड़ पाने गुस्से में जनजातियों ने चुनाव का बहिष्कार किया। हमारे पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि माओवादियों ने भी इस गैरबराबरी का जमकर अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। बैठकों में माओवादी नेता आदिवासियों को उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों से वंचित किये जाने के बारे में बताते रहे। नतीजा यह हुआ कि बहुत सारे आदिवासियों ने हथियार उठा लिया।
आरक्षण के इस बेमेल समीकरण की वजह से ‘बैलेट नहीं तो बुलेट” का नारे के साथ सोनभद्र में माओवादी कैडर का विस्तार हुआ है। जनजाति आयोग से जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार वर्ष 2026 से पूर्व यहां के आदिवासियों को संसद और विधानसभा में प्रतिनिधित्व मिलना मुमकिन नहीं। नए सिरे से जनगणना होने के बाद ही इन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार दिया जा सकता है जो कि इससे पूर्व संभव नहीं।
यहां ये बताना आवश्यक है कि आज उत्तर प्रदेश की नब्बे फीसदी जनजातियां सोनभद्र -मिर्जापुर-चंदौली में ही निवास करती हैं। गरीबी… बदहाली और बेबसी में जी रहे इन आदिवासियों को उनके लोकतान्त्रिक अधिकारों से वंचित किये जाने की इस घटना को एक उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। इस उदाहरण के जरिए संसदीय व्यवस्था में आरक्षण की वजह से बहुसंख्य आबादी के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन की मीमांसा की जा सकती है। पता लगाया जा सकता है कि सियासी आरक्षण से लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई है या कमजोर? वैसे भी जब आरक्षण के नाम पर हर क्षेत्र की बहुसंख्य आबादी को चुनाव लड़ने से रोका जाएगा तो लोकतंत्र के प्रति विश्वास को बचाए रखने का आधार क्या होगा?
((लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ब्यूरो प्रमुख। आवेश से आप awesh29@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))
shefali
March 11, 2010 at 12:30 pm
इस रिपोर्ट को देखा, आरक्षण के कई अनछुए पहलुओं को जानने का मौका मिला, आपकी बात से सहमत भी हूँ, लेकिन साथ ही यह भी कहना चाहूंगी कि स्थितियां धीरे धीरे ही सुधरती हैं, और निश्चित तौर से यह भी एक ना एक दिन बदलेगी.
jenny shabnam
March 11, 2010 at 1:08 pm
आवेश जी,
बिल्कुल सही और वाज़िब लिखा है आपने| देश में चाहे जितने कानून बने, आरक्षण और अधिनियम बने, स्थिति कहीं से नहीं बदलती| आदिवासी क्षेत्र में प्रगति और सुधार की सुगबुगाहट भी नहीं| सभी जगह बाहुबलियों का वर्चस्व है, ऐसे में अपने अधिकार की बात किससे करें, कौन सुनेगा| जो कोई हक़ की बात किया उसे नक्सली घोषित कर दिया गया| मजबूरन नक्सली बन जाते| दोनों स्थिति में ज़िन्दगी तो उनकी हीं दाँव पर लगी| उनकी लड़ाई और उनकी बात आगे बढ़े हीं नहीं इसलिए न तो मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जाती न चुनाव में उन्हें उनका अधिकार दिया जाता|
आदिवासियों की वास्तविक स्थिति का आकलन और चित्रण बहुत स्पष्टता से आपने किया है| आपके लेख के ज़रिये उनका सच देश की जनता जाने समझे, उनके प्रति निसंवेदी तंत्र में थोड़ी चेतना जागे, शुभकामनाएं!
प्रेम दास
March 11, 2010 at 3:20 pm
आवेश जी, बहुत बढ़िया रिपोर्ट है। आरक्षण के मुद्दे पर आपने एक नई रोशनी डाली है। आरक्षण भी दलितों और आदिवासियों की तरफ फेंका हुआ रोटी का टुकड़ा है। उसी टुकड़े के लिए वो आपस में लड़ रहे हैं। यह लड़ाई दिन ब दिन विभत्स होगी। दलित दलित से लगेड़ा। पिछड़ा पिछड़ों से। आदिवासी आदिवासियों से। ये ऊंची जाति के ख़तरनाक लोग हमारी लड़ाइयों को देखकर खुश होंगे। पचास फीसदी पर तो उनके हिस्से है ही बाकी हमको तोड़ कर वो राज करते रहेंगे।
रंगनाथ सिंह
March 11, 2010 at 9:59 pm
बहुत अच्छी रिपोर्ट है।
शहरोज़
March 12, 2010 at 7:45 am
आवेश ने बहुत ही मौजूं सवाल उठाया है.ऐसे सिर्फ सोनभद्र में ही या आदिवासियों के साथ ही सौतेला व्यवहार नहीं हो रहा है.देश के और हिस्से में बसते तिल-तिल मरते और भी लोग हैं जिन्हें सरकारी सुविधाओं का लाभ कोसों दूर है.
Paul Marandi
March 12, 2010 at 2:21 pm
ye bahut bada sach hai… sabhi daliton aue adivasiyon ki kimat per chandi kaat rahe hain. hame hamara hak do tum log