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महिला आरक्षण का लम्पटवाद

एक  मुहावरा है — ‘जबरा मारे, रोवै न दे’। इसका मतलब ये है कि पहले किसी की पिटाई हो, फिर जब वो दर्द से रोने लगे, तब उसकी फिर इसलिए और पिटाई की जाए कि रोना बन्द करो, ख़बरदार जो मुंह से कोई आवाज़ निकली, वर्ना और पिटोगे। महिला आरक्षण विधेयक ने हमारे तमाम सांसदों की हालत ऐसी ही कर दी है। उनसे उनके ही नेताओं ने ‘डेथ-वारन्ट’ यानी ‘मौत के हुक्मनामे’ पर दस्तखत करवा लिये हैं। सब कुछ आधी आबादी को उसका हक़ देने के नाम पर हो रहा है। लेकिन विडम्बना देखिए, ‘दाता से ही उसके प्राण मांगे’ गये हैं। भस्मासुर उसी शिव को नष्ट करने की फ़िराक़ में है, जिसने उसे शक्तियां दीं। यहां भस्मासुर महिला आरक्षण है और शिव हैं बेचारे सांसद।

त्याग की ऐसी मिसाल भले ही विलक्षण लगे, लेकिन इसमें सियायत कूट-कूट कर भरी है। सियासी दांव उन्होंने भी खेला है, जो महिला आरक्षण के समर्थक हैं, और पैंतरे ही वो भी दिखा रहे हैं जो आरक्षण के तरीके के नाम पर विरोधी बने हैं। इसीलिए इस सियासत का पोस्टमार्टम ज़रूरी है कि कौन, कहां और क्यों खड़ा है?

शुरुआत  उन नेताओं की बातसे जो हर हाल में मौजूदा महिला आरक्षण बिल को ही परवान चढ़ाने पर आमादा हैं। दरअसल, सभी पार्टियों को उसके दो-चार शीर्ष नेता ही चलाते हैं। विधायिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से इनकी दुकानदारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बड़े नेता बहुत कम ही चुनाव हारते हैं। उनके लिए राज्यसभा और विधान परिषद का पिछला दरवाज़ा भी आसानी से खुद जाता है। उनकी मौजूदा सीट अगर महिला कोटे में चली गयी तो फिर वो अड़ोस-पड़ोस की दूसरी सीट से भी चुनाव लड़कर जीतने का माद्दा रखते हैं। ‘विनिबिलिटी फैक्टर’ यानी ‘जीतने के आसार’ के पैमाने पर वो नहीं परखे जाते क्योंकि वो तो खुद ही टिकट बाँटते हैं। यानी महिला आरक्षण से गाज़ गिरेगी तो उन छुटभय्यै नेताओं पर जो फ़िदाइन बनकर संसद में सारी मर्यादाएं तोड़ते नज़र आ रहे हैं।

बड़े  नेताओं के पास अभी ‘कठपुतली सांसदों’ के रूप में अगर मर्दों की संख्या ज़्यादा है तो महिला आरक्षण लागू होने के बाद वही भूमिका औरतों के हिस्से में चली जाएगी। बड़े नेताओं की सेहत पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। वो तो नारी सशक्तिकरण के बड़े से बड़े पैरोकार बनकर उभरना चाहते हैं। होड़ तो शुरू भी हो चुकी है कि महिला आरक्षण सरीखे क्रांतिकारी फैसले का सेहरा किसके सिर बंधना चाहिए? जिसने पहली कोशिश की थी, या जिन्होंने बाद में प्रयास जारी रखे या फिर जो अभी अगुवाई कर रहे हैं। सोनिया गांधी, लाल कृष्ण आडवाणी, वामपंथी नेता या फिर क्षेत्रीय पार्टियों के तमाम छोटे-बड़े नेता। नीतीश कुमार जैसे धुरंधर अचानक अपनी विचारधारा नहीं बदलते। सियासत की नब्ज़ जानने में माहिर हैं। बिहार के चुनाव सामने हैं। उन्हें भी आधी आबादी की परवाह है। विरोध तब समर्थन बन गया, जब लगा कि हवा का रुख बदलना नामुमकिन है। तो क्यों ना हवा का ही लुत्फ़ लिया जाए। यही सियासत है।

महिला आरक्षण से उन मर्दों की नेतागिरी के चौपट होने की आशंका है जो खुद को अपनी पार्टी का समर्पित सिपाही बताते नहीं थकते हैं। अपने नेता के लिए जीने-मरने की कसमें खाते हैं। इन्हीं नेताओं ने ही औरतों को आगे लाने के नाम पर मर्दों के लिए ऐसा व्हिप जारी किया, जो उनके लिए ‘डेथ-वारन्ट’ है। व्हिप नहीं मानेंगे तो पार्टी से रही-सही आस भी छोड़नी पड़ेगी। दूध की मक्खी की तरह बाहर कर दिये जाएंगे। मानेंगे, तो तय है कि एक तिहाई मर्द सांसदों को लोकसभा से बाहर रहना पड़ेगा।

दरअसल, संसदीय लोकतंत्र में व्हिप का कोई तोड़ नहीं है। बड़े नेताओं की ओर से जारी व्हिप उन सांसदों के लिए एनेंस्थीसिया का काम करता है, जिन्हें हम अपना प्रतिनिधि बनाते हैं। व्हिप, कठपुतली की वो डोर है, जो आला नेताओं के हाथ में होती है। जिसमें बड़े नेता की ख्वाहिश के आगे छुटभय्यै नेता की राय दम तोड़ देती है। व्हिप को मानिए, वर्ना सदन की सदस्यता गंवाइए। इसीलिए नेता इसकी तुलना आत्महत्या बनाम शहीद की तरह कर रहे हैं।

अब  बात विरोधियों की। विरोध  भी निराला है। औरतों को आरक्षण देने के हक़ में  तो हैं, लेकिन औरतें कैसी हों, ये पहले तय होना चाहिए? उसकी जाति और मज़हब तय होना चाहिए। शिक्षा और सम्पन्नता का स्तर तय होना चाहिए। नैन-नक्श और अगड़े- पिछड़े का स्तर तय होना चाहिए। भले ही मर्दों ने अपने मामले में कभी ऐसा कुछ नहीं किया। लेकिन अगर औरतों को आरक्षण की ‘खैरात’ दी जाएगी तो मर्द तय करेंगें कि औरतें कैसी होनी चाहिए? यही सिरासत का लम्पटवाद है।

अरे भई! जिस नियम के तहत गरीब, अशिक्षित, पिछड़ा और दलित मर्द चुनाव में अमीर, शिक्षित, प्रभावशाली और ऊंची जाति वालों को पछाड़कर, जनता का भरोसा जीतकर जनप्रतिनिधि बनता है, उसी नियम के तहत महिलाएं राजनीति में आगे क्यों नहीं आ सकतीं? निर्वाचन क्षेत्र ही तो महिला के लिए आरक्षित होगा। पार्टियों की बाकी आज़ादी तो वैसी ही रहेगी, जैसी कि अभी के मर्दों के लिए है।

दलील  है कि नेतागिरी के लिए सक्षम  महिलाओं की कमी है। एक तो ऐसा है नहीं। लेकिन  थोड़ी देर के लिए अगर  मान भी लिया जाए तो ऐसा  सभी पार्टियों के लिए है। आप जैसे लोगों को ढूंढेंगे, आपको वैसे ही हर पार्टी में मिल जाएंगे। किसी भी पार्टी में न तो शोषितों के नुमाइंदगी की कमी है और ना ही सम्पन्नों का अकाल। ऐसा नहीं है कि इस मामूली सी बात को हमारे ‘विद्वान नेता’ नहीं समझते हैं। ऐसे ही नेतागिरी नहीं कर रहे हैं। करोड़ों लोगों का समर्थन उनके पीछे है। इन्हीं समर्थकों के नाम पर उन्हें अपनी सियासत चमकानी हैं। उनमें अपनी ‘कॉन्स्टीचुयेन्सी’ को ये बताने की हो़ड़ है कि दलितों, पिछड़ों और मुसलमान महिलाओं का उनसे बड़ा पैरोकार कोई और नहीं है। ऐसे समाज के ही बड़े वोट-बैंक से उनकी सियासत चलती है। इसीलिए वो इन महिलाओं की खातिर संसद में किसी भी सीमा तक जाने पर आमादा हैं।

इसी सियासत का जबाव महिला आरक्षण का समर्थन करने वाले नेताओं ने संसद में अपने संख्या-बल के ज़रिये दिया है। आगे  भी वो यही करने पर आमादा  हैं। एक सवाल ये भी उठा है कि जब ऐसे ही जोर-जबरदस्ती करके कानून बनाना था तो फिर 14 साल से इसे लटकाये क्यों रखा? इसका उत्तर भी बहुत आसान है।

जोर-जबरदस्ती के लिए भी सही वक्त का इंतज़ार  ज़रूरी होता है। इसीलिए कई बार सरकार भी मुश्किल  मांगों को हड़ताल या चक्काजाम या तोड़फोड़ के बगैर नहीं मानती  है। डॉक्टर भी ऑपरेशन का तरीका  तभी अपनाते हैं, जब वही रास्ता बचा हो। अक्सर इंतज़ार करके ऑपरेशन के लिए उचित परिस्थितियां तैयार की जाती हैं। महिला आरक्षण के मामले में भी ऐसा ही हुआ है।

हां, जातिगत जनगणना की मांग से एक और बड़ा मुद्दा ज़रूर खड़ा हो रहा है। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में ही दमदार तर्क हैं। पक्षधरों की राय है कि जब जाति के आधार पर तमाम बातें तय करनी हैं तो इसके आंकड़े तो होने ही चाहिए। भविष्य में अगर आरक्षण में आरक्षण देने की नौबत आएगी तो फॉर्मूला कैसे तय होगा! जबकि विरोधियों का कहना है कि 80 साल पहले अंग्रेजों ने जो आखिरी जाति आधारित जनगणना की थी, उसी दौर में देश को धकेल देना हमारे सामाजिक ताने-बाने के लिए कहीं घातक साबित हो सकता है। देश को ऐसे ही अंतहीन सियासी पैंतरों से जूझना है।

((मुकेश कुमार सिंह ज़ी न्यूज़ में विशेष वरिष्ठ संवाददाता हैं। आप उनसे mukesh1765@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।))

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3 Responses to महिला आरक्षण का लम्पटवाद

  1. rakesh kummar singh Reply

    March 13, 2010 at 3:41 pm

    well conceived article. this is regarding political aspect. I am in of the view that the this reservation should be extended to government jobs including civil police of the state and central government.

  2. rakesh kumar singh Reply

    March 13, 2010 at 3:43 pm

    well conceived article. this is regarding political aspect. I am in of the view that the this reservation should be extended to government jobs including civil police of the state and central government.

  3. Vijay Reply

    March 13, 2010 at 6:03 pm

    Bahut Umda.

    I, as a layman, has been much enlightened on the manner of political machinations of our esteemed netas. It does, in a lucid manner, unravel the quagmire of the much publicized and often brow beaten Mahila Arakshan Bill, which has often been the browny point score of both the national parties.

    Vijay

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