Subscribe by Email

महिला आरक्षण बिल सवर्णों की क्रूर साज़िश है

यह एक बड़ी हक़ीक़त है कि महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पास हो गया है। इसलिए बहस का यह मुद्दा कतई नहीं हो सकता कि महिलाओं को आरक्षण दिया जाए या नहीं। देर सवेर यह आरक्षण उन्हें मिलना ही है। इसलिए बहस इस पर होनी चाहिए कि क्या दलितों-आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों, को उनका हक़ दिया जाए या नहीं। यह हक़ दिया ही जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तब फिर यह इस देश की बहुसंख्य आबादी के साथ बहुत बड़ा धोखा होगा। और महिला आरक्षण को सकारात्मक कदम की जगह अवर्णों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सवर्णों की क्रूर साज़िश के तौर पर जाना जाएगा।

इस बहस के केंद्र में एक और सवाल है जिस पर चर्चा होनी चाहिए। आखिर वो वजहें कौन सी हैं जिनकी वजह से यह सरकार दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की मांगों को खारिज कर रही है। यह एक पेंचीदा सवाल है और इसका जवाब सीधा और सरल नहीं हो सकता।

संसदीय व्यवस्था में दलितों और पिछड़ों को आरक्षण पहले से तय है। उनके लिए सीटें आरक्षित पहले हैं। अभी इसी साल फरवरी में 109वें संशोधन के जरिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ाया गया है। ऐसे में महिला आरक्षण बिल में भी बिना कहे उनके लिए प्रावधान किया जाना चाहिए था। लेकिन यह प्रावधान नहीं किया गया।

यहां पर बहुत से लोग यह कहते हैं कि महिलाएं भी दलित हैं और जिस तरह दलितों को बांटना सही नहीं है, वैसे ही महिलाओं को भी बांटना सही नहीं होगा। बात पूरी तरह सही है। मर्दों की बनाई इस दुनिया में महिलाएं सबसे बड़ी दलित हैं। आबादी और जुल्म दोनों लिहाज से। एक पंडित भी अपने घर की महिला का शोषण करता है और एक दलित भी अपने घर की महिला को दलित बना कर रखता है। डिग्री का फर्क हो सकता है। लेकिन महिलाएं किसी तबके में आज़ाद नहीं है।

लेकिन इस तर्क के साथ यह भी एक सनातन सत्य है कि महिलाएं हिंदू भी होती हैं और मुसलमान भी। महिलाएं पंडित भी होती हैं और दलित भी। महिलाएं ठाकुर भी होती हैं और आदिवासी भी। जब समाज में यह विभाजन पहले से मौजूद है तो आरक्षण में इसका प्रावधन कर देने से कौन का अंतर पड़ जाएगा? यही नहीं जो नेता महिला आरक्षण में विभाजन का विरोध कर रहे हैं उनमें से बहुतों ने अपने शासन में इसी तरह का विभाजन किया और करवाया है। नीतीश कुमार ने बिहार में सियासी फायदे के लिए अति पिछड़ों का नारा दिया। यह क्या था? पिछड़ों को बांटने की कोशिश। ठीक उसी तरह राजस्थान में गुर्जरों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की सिफारिश और बाद में अलग से प्रावधान करने का कदम बीजेपी के शासन काल में हुआ था। यह क्या था? इसलिए विभाजन की दलील बेहद बेतुकी और बेबुनियाद है। सभी संवेदनशील लोगों को इस दलील का विरोध करना चाहिए।

दरअसल, महिला आरक्षण बिल में दलितों और आदिवासियों के लिए भी प्रावधान नहीं किए जाने का एक ख़ास मकसद है। अगर इस बिल में यह प्रावधान किया गया तो उससे महिलाओं को विभाजित नहीं करने की दलील ख़त्म हो जाएगी। ऐसा हुआ तो पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के बागी तेवर को संभालना आसान नहीं होगा। सियासत का चेहरा मौकापरस्त चेहरा है। अगर पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का दबाव अधिक बढ़ा तो मजबूरी में उनके लिए भी प्रावधान बनाना पड़ सकता है। अगर महिला आरक्षण में यह प्रावधान किया गया तो बाकी बची सीटों पर भी पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को उसी अनुपात में हिस्सेदारी देनी पड़ेगी। सवर्ण सांसद और हुक्मरान इतनी बड़ी कीमत चुकाने को फिलहाल तैयार नहीं। और इसी से उनका जातिवादी चेहरा सामने आ जाता है।

ऐसे में एक ही उपाय बचता था कि महिला आरक्षण बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता। अगर ऐसा होता तो इस पर किसी को एतराज नहीं होता। न पिछडों को, न दलितों, न आदिवासियों और न ही अल्पसंख्यकों को। देश के ज़्यादातर सांसद इससे खुश भी रहते। लेकिन सोनिया गांधी समेत चंद नेताओं ने सियासी फायदे के लिए इस बिल को आगे बढ़ा दिया।

महिलाओं को आरक्षण का मुद्दा एक और लिहाज से अनूठा है। नौकरियों में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं के बराबर है। शिक्षा संस्थानों में भी यही हाल है। देश की ज़्यादातर लड़कियों को अपनी पढ़ाई दसवीं से पहले ही छोड़ देनी पड़ती है। जरूरत उनके लिए आर्थिक योजनाएं शुरू करने की थी। नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में उनके लिए सीटें आरक्षित करने की थीं। कानून और व्यवस्था सुधारने की थी ताकि वो घरों से बाहर निकलते वक़्त सुरक्षित महसूस कर सकें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्हें सीधे संसद में हिस्सेदारी दी जा रही है। इन तमाम स्थितियों पर गौर करने पर बस एक ही जवाब आता है। महिला आरक्षण बिल कुछ और नहीं है, सिर्फ़ और सिर्फ़ ताक़तवर सवर्णों की सियासी साज़िश है। और इस साज़िश में कांग्रेस, बीजेपी के साथ लेफ्ट भी शामिल है।

Share This Post

17 Responses to महिला आरक्षण बिल सवर्णों की क्रूर साज़िश है

  1. अजय यादव Reply

    March 13, 2010 at 10:24 am

    समरेन्द्र जी,
    कैसा होता जब मुस्लिम महिला सांसदों के घर भी सभी जातियों और धर्मों के लोगों का दरबार लगता…
    कैसा होता जब बीजेपी को भी मुस्लिम महिला उम्मीदवार लड़ाने पड़ते…
    कैसा होता वो साम्प्रदायिक मुद्दा, जब सभी पार्टियों में मुस्लिम कार्यकर्ता होते
    कैसा होता जब भारत की संसद में व्यापक प्रतिनिधित्व देखा जाता

    परिणाम की चिंता छोड़े तो ऐसा देखना तो अच्छा लगता ही…

  2. समरेंद्र Reply

    March 13, 2010 at 10:53 am

    अजय जी,

    यकीनन अच्छा लगता। अच्छा लगेगा भी। थोड़ा समय लग रहा है, लेकिन यह बदलाव तो होना ही है। बीते साठ साल में काफी कुछ बदला है। हजारों साल पुरानी सामंती व्यवस्था की चूलें हिल गई हैं। आने वाले साठ साल में और भी तेज बदलाव होंगे।

    वैसे मैं महिला आरक्षण विधेयक के बहुत समर्थन में नहीं हूं। क्योंकि मैं मानता हूं इससे महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं होने जा रहा। सिर्फ़ संसद में एक्स फैक्टर थोड़ा बढ़ जाएगा और कुछ नहीं होगा। कुछ और वसुंधरा … कुछ और मीरा कुमार।

    लेकिन यह भी मानता हूं कि अगर आरक्षण देना ही है तो फिर उसमें यह बंटवारा जरूर होना चाहिए कि कितनी सीट किस जातिगत वर्ग को दी जाएगी। ऐसा नहीं हुआ तो यह दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के साथ धोखा होगा। एक क्रूर साज़िश।

    जहां तक आरक्षण की बात है, संसदीय लोकतंत्र में बहुत ज़्यादा आरक्षण का एक ख़तरनाक असर भी होता है। आप अपनी बहुसंख्य आबादी को सक्रिय हिस्सेदारी से रोकते हैं। अगर कोई चाहे भी तो चुनाव नहीं लड़ सकता है, अगर उस श्रेणी में नहीं है तो। यहां कुछ लोग दलील दे सकते हैं कि किसने रोका है बलिया का आदमी गाजीपुर से जाकर चुनाव लड़ ले। बलिया का वही आदमी गाजीपुर से चुनाव लड़ सकेगा जिसके पास अकूत पैसा होगा। जो पैसे के बल पर कुछ साल के भीतर ही वहां अपने लिए माहौल तैयार कर सके। हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। जो काम के बदल पर दस-पंद्रह साल खर्च करके एक क्षेत्र में अपने लिए माहौल तैयार करेगा और वो सीट रोटेशन पॉलिसी के तहत आरक्षित हो गई तो उसकी तो सारी जमापूंजी चली जाएगी।

    ऐसे में थोपे हुए उम्मीदवारों की चांदी होगी। कोई अहमद पटेल, कोई अरुण जेटली, कोई … कोई ..

    नौकरियों में आरक्षण का मसला दूसरा है। शिक्षा में आरक्षण का मामला दूसरा है। वहां आरक्षण से भाग लेने का हक नहीं छिन जाता है। पांच ही सीट हो, उस सीट पर सभी अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन सियासत में आरक्षण से भाग लेने का हक़ छिन जाता है। स्थानीय स्तर पर अब कोई भी दूसरी जाति का उम्मीदवार चुनाव नहीं लड़ सकता। जब किसी क्षेत्र में बहुसंख्य आबादी को भाग लेने ही नहीं दिया जाएगा तब लोगों का संसदीय व्यवस्था में यकीन कैसे रहेगा?

    आपको मैं अपने गांव का उदाहरण देता हूं। वह गांव ठाकुरों का है। दूसरे नंबर पर वहां पिछड़ों की संख्या है। फिर ब्राह्मण आते हैं और फिर दलित। लेकिन ग्राम प्रधान की सीट दलित के लिए आरक्षित है। दलितों की बमुश्किल तीस-चालीस घर होंगे। अब वहां की बहुसंख्य आबादी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकती। वहां उन जातियों का ग्राम प्रधान नहीं हो सकता। इससे उनके बीच गहरी नाराजगी है। अब कोई कहे कि किसने रोका है दूसरे इलाके में जाकर चुनाव लड़ ले। कहीं ग्राम पंचायत का चुनाव दूसरे इलाके में जाकर लड़ा जाता है क्या?

    अब आप इसी तरह का एक दूसरा उदाहरण सोचिए। किसी भी क्षेत्र में किसी भी जाति की अधिक से अधिक आबादी कितनी हो सकती है? एक दो अपवादों को छोड़ दें तो भी पचास फीसदी से अधिक नहीं होगी। इस लिहाज से जैसे ही कोई सीट किसी जातिगत वर्ग के लिए आरक्षित की जाती है, चुनाव में पचास फीसदी जनता की सक्रिय भागीदारी समाप्त हो जाती है। क्या यह किसी भी लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।

    सियासत स्थानीय होती है। पंचायत की पंचायत स्तर पर। विधानसभा की विधानसभा के स्तर पर। लोकसभा की सियासत लोकसभा स्तर पर। ऐसा मेरा मानना है।

    • ajay yadav Reply

      March 13, 2010 at 12:29 pm

      kyaa aarakshit seet par pure gaon ka bhag n lena apman-janak nahi hai…aise to aap kaise ummeed kar sakte hain ki jis bharat ne abhi tak logon ko thaga, use log kaise vote den….

      • समरेंद्र Reply

        March 13, 2010 at 12:52 pm

        अजय जी,

        अपमान है। बहुत बड़ा अपमान है। लेकिन यह किसी भी जाति के अपमान से ज़्यादा बड़ा अपमान भारतीय लोकतंत्र के लिए है।

  3. ajay yadav Reply

    March 13, 2010 at 12:20 pm

    aapki baaten sahi hain……………. lekin tabhi tak, jab tak log bharteeya loktantra se apeksha rakh rahe hain

    • समरेंद्र Reply

      March 13, 2010 at 12:50 pm

      अजय जी,
      उम्मीद है तभी तो यह सब लिखा-बोला जा रहा है। जिस दिन उम्मीद नहीं होगी, उस दिन यह सब छोड़-छाड़ कर चले जाना ही बेहतर होगा। उम्मीद के सहारे ही तो हजारों की संख्या में लोग जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। उम्मीद को जिंदा रखना है। उसे किसी भी सूरत में मरने नहीं देना है।

  4. अजय यादव Reply

    March 13, 2010 at 5:47 pm

    समरेन्द्र जी,
    सच में,एक उम्मीद ही है कि आपके भीतर का इंसान मुझे अच्छा लगता है, अपने भीतर के आदमी के लिए लड़ना मुझे अच्छा लगता है, कितना अच्छा होता कि पूरी दुनियां जंगल और जानवरों से भरी रहे और आदमी इस धरती की सबसे सुंदर रचना साबित हो, लेकिन यह बहुत भयावह है कि जंगल और जानवर का अस्तित्व खतरे में है और इनका विस्तार आदमी के दिमाग में हो रहा है…अब जानवर हमारे मुहावरा नहीं रहे, उनका नेचर आदमियों में बहुत तेजी से घुस रहा है-शोले फिल्म के उस डायलॉग को मजाक में मत लीजिए, सो जा बेटा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा-ये फिल्मी जानवर सभी को अच्छा लगा…

    “जब भी कोई कहता है
    ‘सुनो आदमी’
    समझ में आता है
    कि अपने भीतर के
    जंगल और जानवर को मारो,
    जब भी कोई कहता है
    ‘बनो आदमी’
    समझ में आता है
    कि मेरे भीतर
    कितना बचा है
    जंगल और जानवर?”…

    एक उम्मीद ही तो थी कि दुनिया बेहतर बनाने के लिए लोग लड़े हैं
    एक उम्मीद ही है कि जरूर एक दिन आदमी के भीतर का जंगल और जानवर खत्म होगा…

    • समरेंद्र Reply

      March 13, 2010 at 7:17 pm

      अजय जी,
      उम्मीदें हमें जोड़ती हैं। हममें लड़ने का हौसला भरती हैं। बसों में धक्के खाते हुए, भीड़ भरी सड़कों पर दौड़ते हुए, रोजी-रोटी की चिंता के बीच ये उम्मीदें ही हैं जो हमें ज़िंदा रखती हैं। यह अहसास दिलाती हैं कि अब भी हमारे भीतर कुछ है जो सांस लेता है, और जिसे हम बचा सकते हैं। यह भी, यह दुनिया फिलहाल भले ही सुंदर नहीं है, लेकिन इसे सुंदर बनाया जा सकता है। जिस दिन उम्मीद की यह डोर टूट गई, उस दिन हमारे भीतर का इंसान मारा जाएगा। फिर हम और आप हो सकता है कि ख़तरनाक लोगों की फेहरिस्त में शामिल हों या फिर उनसे भी ज़्यादा ख़तरनाक हों। इसलिए हो सके तो उसे ज़िंदा रखिए।

      ऊपर की पंक्तियों के लिए शुक्रिया।

      “जब भी कोई कहता है
      “सुनो आदमी”
      समझ में आता है
      कि अपने भीतर के
      जंगल और जानवर को मारो,
      जब भी कोई कहता है
      “बनो आदमी”
      समझ में आता है
      कि मेरे भीतर
      कितना बचा है
      जंगल और जानवर?”

      ये पंक्तियां बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं। किसने लिखी है?

      • अजय यादव Reply

        March 13, 2010 at 9:51 pm

        मेरी ही कविता का एक छोटा सा हिस्सा है…..

  5. Bharat anjaan Reply

    March 13, 2010 at 6:23 pm

    Reservation mein reservation ki baat karne waale basically MahilA virodhi hain. Daliton ke kandhe par bandook rakh kar apna nishaana saadh rahe hain. Kya betuki baat hai, jab reservation pahle se hai to yakeenan Dalit mahila bhi aayengi aur backward bhi. Ab ismein ek aur reservation ka Kya matlab hai. Yadav trio ki Tarah kuch pseudo media block bhi hai, Jo kisi nayee ya behtar cheez ko nahin promote karna chahta. Use bhi apne aham ko thes lagti dikhti hai.

    • अजय यादव Reply

      March 13, 2010 at 6:34 pm

      महिला हित के नाम पर दिख रही आपकी तड़प…..????????????

    • समरेंद्र Reply

      March 13, 2010 at 7:30 pm

      भारत अनजान जी,

      कभी तीन ब्राह्मण नेता किसी मुद्दे पर एकमत हों तो क्या कोई चैनल या अख़बार यह लिखता है क्या कि ब्राह्मण ब्रिगेड ने रास्ता रोका। इसमें तुकबंदी भी है। ब से ब मिल रहा है। लेकिन ऐसा नहीं होता। गोया ब्राह्मण तो जातिवादी होते ही नहीं। यह एक कंस्ट्रक्ट होता है। व्यवस्था के शीर्ष पर मौजूद जातियों ने ज्‍यादातर लोगों के जेहन में यह बातें भर दी हैं। और सवर्णों के अलावा कोई भी दूसरी जाति का व्यक्ति गोलबंद होता है, भले ही कितनी भी जायज मांगों पर गोलबंद क्यों नहीं हुआ हो, उन्हें जातिवादी करार दे दिया जाता है। इसलिए अगर हो सके तो इस मामले को ऐसे सोचिएगा।

      और हां आपने कहा है कि दलित और पिछड़ी महिलाएं भी हिस्सा ले सकती हैं। इस लिहाज से दलित पुरुष आज़ादी के बाद भी हिस्सा ले सकते थे, फिर उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था क्यों की गई? ज़रा इस पर सोचिए… आगे की बात तब होगी।

  6. indian citizen Reply

    March 13, 2010 at 10:51 pm

    ?

  7. Jyoti Reply

    March 14, 2010 at 2:02 pm

    भारत में ये जात-पात ऊंच-नीच कब तक चलेगी?
    दुख है कि आप जैसे काबिल लेखक और पत्रकार भी जाति से आगे नहीं सोचते हैं.

  8. संजय कुशवाहा Reply

    March 15, 2010 at 4:48 am

    महिला आरक्षण पर बहस बड़ी जटिल और उलझी हुई लग रही है। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा कि इस पर खुश हुआ जाए या दुखी…जब पहले दिन आरक्षण लागू हुआ, तो लगा कि बहुत बड़ी खुशखबरी है।

    लेकिन अब जनतंत्र और अखबारों में तरह-तरह के लेख पढ़कर काफी कनफ्यूज हो गया हूं…अगर महिलाओं को आरक्षण देने से दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के साथ नाइंसाफी हो रही है, तब तो ये वाकई बहुत बुरी बात है। लेकिन अब तक ठीक-ठीक ये समझ नहीं पा रहा हूं कि ये नाइंसाफी किस तरह हो रही है। मेरे कुछ सवाल हैं, जिनका अगर आप विद्वान लोग जवाब देने की कृपा करेंगे, तो मेरा ही नहीं, शायद मेरे जैसे कई और लोगों का भी दिमाग साफ होगा….

    1. महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं?

    2. क्या महिला आरक्षण के भीतर दलितों, आदिवासियों के लिए अलग से आरक्षण कर दिया जाए, तो ये मसला सुलझ जाएगा?

    3. क्या महिला आरक्षण के भीतर पिछड़ों के लिए भी आरक्षण कोटा होना चाहिए? (ये सवाल इसलिए कि अब तक चुनाव में दलितों-आदिवासियों की तो सुरक्षित सीटें हैं, लेकिन पिछड़ों की नहीं हैं। और बिना आरक्षण के भी संख्या और सामर्थ्य के आधार पर राजनीति में पिछड़ों का काफी बोलबाला है।)

    4. महिलाएं अपने आपमें एक वर्ग हैं या नहीं? तसलीमा को पढता रहा हूं, उनके लेखों से तो यही लगता है महिला वाकई एक अलग वर्ग है। सिमॉन द बुआ का लेखन भी कुछ ऐसा ही बताता है।

    5. जिस हिंदू समाज में जाति का संघर्ष सबसे ज्यादा है, उसमें एक मान्यता ये भी है कि महिला की कोई जाति नहीं होती। उसकी जाति का निर्धारण पहले पिता और फिर पति की जाति से होता है। सारे धर्म पुरुष सत्तावादी हैं, लिहाजा ऐसी मान्यता कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। ये मान्यता कुछ वैसी ही है, जैसे ये सोच कि महिला को कभी स्वाधीन नहीं रहना चाहिए…पिता, भाई, पति और पुत्र के तौर पर कोई न कोई पुरुष उसके नियंता के तौर पर रहना ज़रूरी है। ये पुरुष सत्तावादी सोच धर्म और जाति की मौजूदा व्यवस्था में बड़ी गहराई तक पैबस्त है। महिलाएं इसकी सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं। उनका दंश और दर्द कहीं से भी दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग के पुरुषों से कम नहीं, बल्कि ज्यादा ही है।

    6. मुझे जहां तक समझ में आता है, महिला की ये हालत सभी जातियों के भीतर है। अगर वो जातिवादी सोच की शिकार है, तो वो भी पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था की ही एक विकृति है। जाति और वर्ण की जो व्यवस्था अवर्णों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाती है, वही व्यवस्था महिलाओं को भी तीसरे-चौथे दर्जे का नागरिक बनाती है। महिला जिस भी जाति के परिवार में ‘बंधी’ हो, उसकी हैसियत परिवार के पुरुषों से कमतर ही होती है। सवर्ण घर की महिला अपने घर के पुरुषों के ‘नीचे’ होती है और अवर्ण घर की महिला अपने पुरुषों के…पिछड़ी जाति के परिवार की महिला अपने घर के पुरुषों से दबी रहती है और दलित महिला अपने घर के पुरुषों से…अगर कोई पुरुष पिछड़ा है तो उसके परिवार की महिला अति-पिछड़े वर्ग की है…अगर कोई पुरुष दलित है, तो उसकी महिला अति-दलित है।

    7. क्या महिलाओं की ये स्थिति आर्थिक और राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी के बिना बदल जाएगी?

    8. भारत में दलितों-आदिवासियों-पिछड़ों को कम से कम कानूनी तौर पर तो बराबरी का हक़ हासिल है। उन्हें भेदभाव और उत्पीड़न से बचाने के लिए भी कानूनी प्रावधान किए गए हैं। लेकिन कानून के जानकार बताते हैं कि देश के बहुत से कानूनों में अब भी महिलाओं की स्थिति पुरुषों के बराबर की नहीं हैं। पर्सनल लॉ ही नहीं, कई और संदर्भों में भी ये कानूनी भेदभाव जारी है। क्या इस हालत को बदलने के लिए कानून बनाने वाली संस्थाओं, यानी संसद और विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना ज़रूरी नहीं है?

    9. अगर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है और आरक्षण के बिना ये काम आजादी के साठ सालों में भी नहीं हो पाया, तो अब आरक्षण को आजमाकर देखने में क्या बुराई है?

    10. क्या महिला आरक्षण विधेयक में आरक्षण का लाभ सिर्फ सवर्ण महिलाओं को ही देने की बात कही गयी है? अगर नहीं, तो इससे दूसरों के अधिकार कैसे छिन जाएंगे? महिलाओं के लिए आरक्षण सीटों पर पिछड़ी जाति की महिलाएं भी चुनाव लड़ सकती हैं और दलित-आदिवासी भी। फिर दिक्कत क्या है?

    11. हमारा लोकतंत्र संख्याबल के आधार पर चलता है। और इसी संख्याबल के आधार पर जिस तरह पिछड़े सांसद-विधायक बिना आरक्षण के चुनाव जीतते हैं, उसी तरह पिछड़े वर्ग की महिलाएं भी जीत सकती हैं। और दलितों-आदिवासियों का आरक्षण तो खत्म किया ही नहीं जा रहा है। तो भला महिला आरक्षण के कारण सवर्णों का दबदबा कैसे बढ़ जाएगा और पिछड़ों का कैसे घट जाएगा?

    कुल मिलाकर सीधी सी बात ये है कि महिलाएं तो हर घर में हैं…हिंदू, मुसलमान, सवर्ण, अवर्ण, दलित, आदिवासी…सभी परिवारों में…तो भला सर्वव्यापी महिलाओं को आरक्षण देने से किसी खास वर्ग को फायदा और दूसरे को नुकसान कैसे हो जाएगा?

  9. neelesh Reply

    September 4, 2011 at 12:13 pm

    mahila aarakshan bill pass hona hi chaiye verna iss desh kaa kuch nahi ho sakta.

    • prabhat Reply

      September 4, 2011 at 12:18 pm

      oye neelesh u r absolutely right………………………………………………………………….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>