विभूति का झूठ और कारुण्यकारा का सच
यह प्रोफेसर एल कारुण्यकारा का दूसरा ख़त है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसर कारुण्यकारा ने इस ख़त में कुलपति विभूति नारायण राय के झूठ से पर्दा उठाया है। वीएन राय का कहना है कि दलित छात्र कांबले को पीएचडी में दाखिला इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वो सीट ओबीसी के लिए रिजर्व थी। जबकि कारुण्यकारा का कहना है कि वो सीट कांबले को दी जा सकती थी और लायजन ऑफिसर की कमेटी ने इसकी सिफारिश भी की थी। लेकिन सिर्फ़ जिद की वजह से वो सीट कांबले को नहीं दी गई और आज भी वो सीट खाली पड़ी है। आप कारुण्यकारा का यह जवाब पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया दें। – मॉडरेटर

प्रोफेसर एल कारुण्यकारा
प्रति
श्री विभूति नारायण राय
कुलपति
मगांअंहिंविवि, वर्धा
विषयः राहुल कांबले के पीएचडी में नामांकन के मामले में मोहल्ला लाइव वेबसाइट पर की गई आपकी टिप्पणियों के संबंध में
महाशय,
इस पत्र का संदर्भ आपके उस टेपरिकार्डेड इंटरव्यू से है, जो मोहल्ला लाइव नामक वेबसाइट पर 21 फरवरी, 2010 को ‘कारुण्यकारा ने ब्राह्मणों को गाली दी’ शीर्षक से छपा था और एक दूसरे शीर्षक से 20.02.2010 को जनतंत्र डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ था. इंटरव्यू में आपने राहुल कांबले के पीएचडी में नामांकन के मामले में अनेक बयान दिए थे, जिनके बारे में मुझे लगता है कि वे तथ्यसंगत नहीं हैं. इस विषय में निम्नलिखित बातें कहना चाहता हूं.
- आपने कहा है कि आरक्षण के मामले में एससी/एसटी लायजन अधिकारी की कोई भूमिका नहीं होती और एससी/एसटी सेल कमेटी इस मामले को देखेगी. तथ्य यह है कि एससी/एसटी आरक्षण और लायजन अधिकारी के कर्तव्यों के संबंध में भारत सरकार के नियम और आरक्षण पर यूजीसी के दिशानिर्देश साफ तौर पर बताते हैं कि यह लायजन अधिकारी का कर्तव्य होता है कि वह आरक्षण से जुड़े मामलों और एससी/एसटी की शिकायतों को देखे. लायजन अधिकारी ‘एससी/एसटी के हित में समय-समय पर दिए गए आरक्षण संबंधी आदेशों के समुचित पालन को सुनिश्चत करें और (छात्रों तथा) इस वर्ग के कर्मचारियों की शिकायतों के निबटारे को भी सुनिश्चित करें.’ (स्वामीज रिजर्वेशन एंड कशेसन 2008, पेज न 80-81)
- आपने कहा है कि एससी/एसटी सेल कमेटी आरक्षण से जुड़े मामलों को देखेगी. जबकि यूजीसी के दिशानिर्देशों के अनुसार तथ्य यह है कि एससी/एसटी सेल कमेटी एक एडवाइजरी स्टैंडिंग कमेटी है, जो एससी/एसटी मामलों की समीक्षा के लिए साल में दो बार मीटिंग करती है. सेल का काम एससी/एसटी के रोजमर्रा के मामलों को देखना नहीं है, और इसे लायजन अधिकारी के मातहत रखा गया है.
- आपने कहा है कि मैंने राहुल कांबले के पीएचडी में नामांकन के मामले को देखने के लिए गठित कमेटी की एक बैठक में कानूनी सलाह लेने पर जोर दिया था. यह सच से कोसों दूर है. कमेटी में चार सदस्य है. तीन सदस्यों के साथ-साथ कमेटी के अध्यक्ष, जो प्रोवीसी हैं, भी पूरी बैठक के दौरान कानूनी सलाह के जोर देते रहे, जिसके लिए आखिरकार मैं सहमत हो गया था.
- आपने कहा है कि प्रोवीसी कमेटी ने कांबले के मामले में कानूनी सलाह की सिफारिश की थी. जबकि कमेटी के मिनट्स के अनुसार सच्चाई यह है कि यह कहा गया था कि कानूनी सलाह लेकर कमेटी के समक्ष सिफारिशों के लिए रखी जाए. इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कानूनी सलाह को प्रोवीसी कमेटी के समक्ष अब तक नहीं रखा गया है और कमेटी ने अपनी रिपोर्ट अब तक विश्वविद्यालय को नहीं सौंपी है. दूसरे शब्दों में प्रोवीसी कमेटी को कानूनी सलाह के बारे में कुछ नहीं पता. प्रोवीसी कमेटी ने अब तक कांबले को नामांकन देने या नहीं देने के बारे में भी विवि को कोई सिफारिश नहीं भेजी है. अगर कानूनी सलाह विवि को मिल गई है तो इसे प्रोवीसी कमेटी के सामने उसकी सिफारिश के लिए रखा जा सकता था.
- इसका उल्लेख करना यहां उचित होगा कि कांबले के नामांकन के मामले और इस मामले में आंबेडकर स्टूडेंट फोरम की तरफ से संजय बघेल द्वारा भेजे गए पत्र में उनके द्वारा उपयोग की गई भाषा को देखने के लिए वीसी के निर्देश पर प्रोक्टर द्वारा एक कमेटी का गठन किया गया था. यह एक तीन सदस्यीय कमेटी थी जिसमें डॉ एचए हुंगुंद और संदीप सपकाल और एससी/एसटी सेल के लायजन अधिकारी, यानी मैं, शामिल थे. इस कमेटी का समन्वयक मैं था. लायजन अधिकारी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में, पत्रांक संख्या 16/ एससीटी-सेल/08, तारीखः 07.12.2009, में सर्वसम्मति से सिफारिश की कि ‘राहुल कांबले को हिंदी कार्यक्रम (अनुवाद तकनीक) में पीएचडी में नामांकन दिया जा सकता है.’
- आपने कहा है कि दो सीटें हों तो एक सीट पर एससी/एसटी को आरक्षण नहीं मिलता है. इसी कारण से कांबले को नामांकन नहीं मिला. वास्तविकता यह है कि अगर दो सीटें हों तो कोई भी सीट न सिर्फ एससी/एसटी के लिए बल्कि ओबीसी के लिए भी आरक्षित नहीं रह जाती. ऐसा कोई नियम नहीं है कि दो सीटों में से एक सीट को किसी भी श्रेणी के लिए आरक्षित किया जा सके. ओबीसी आरक्षण सिर्फ 27 प्रतिशत है. एससी/एसटी और ओबीसी को मिला कर 50 प्रतिशत होता है. एसे में किसी भी श्रेणी के लिए एक सीट को आरक्षित करने का मतलब होगा कि कुल 50 प्रतिशत एक ही खास समुदाय को दे दिया गया है. यह कानूनसम्मत नहीं है. आरक्षण में एससी के हिस्से (15%) को एसटी के हिस्से (7.5%) के साथ मिलाया जा सकता है, इस तरह एससी/एसटी की आरक्षित सीटें कानूनन आपस में बदली जा सकती हैं. लेकिन सीट को ओबीसी के लिए आरक्षित करने के लिए एससी/एसटी के आरक्षण के प्रतिशत ( जो 15 प्रतिशत और 7.5 प्रतिशत है) को ओबीसी के आरक्षण के प्रतिशत (27 प्रतिशत) के साथ नहीं मिलाया जा सकता. दूसरे शब्दों में एक दलित समुदाय से आनेवाले प्रतिभाशाली छात्र को एक सीट से वंचित रखने के लिए एक सीट को ओबीसी के लिए आरक्षित करना कानून के तहत मैं उचित नहीं मानता. इसलिए बहस का विषय बनी एक खाली सीट सामान्य सीट है और इसे प्रतिभा (मेरिट) के आधार पर भरा जा सकता है न कि किसी कोटे के तहत. कांबले जेनरल मेरिट लिस्ट में तीसरे विद्यार्थी हैं. चूंकि दूसरे उम्मीदवार ने नामांकन लेने से मना कर दिया है, इसलिए स्वाभाविक रूप से कांबले ने इस सीट के लिए अपना दावा किया है. अतः एक लायजन अधिकारी के रूप में मेरा मत है, जो पहले भी कहा जा चुका है, कि कांबले को खाली सीट पर जेनरल मेरिट के आधार पर, न कि किसी आरक्षित कोटे के तहत नामांकन दिया जा सकता है.
- यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि विश्वविद्यालय में पीएचडी के एससी/एसटी उम्मीदवारों को अपने मामलों में संवेदनहीनता के कारण भूख हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है. 2008-09 के अकादमिक सत्र के दौरान संतोष कुमार बघेल को भी पीएचडी में नामांकन देने से मना कर दिया गया था और वे इंसाफ के लिए भूख हड़ताल पर बैठे थे. यहां तक कि तीन दिनों की भूख हड़ताल के बाद भी उन्हें नामांकन नहीं दिया गया. यूजीसी के दिशानिर्देशों के तहत पीएचडी में भी बघेल समेत एससी/एसटी छात्रों को आरक्षण दिया गया है. 2009-10 के अकादेमिक सत्र के दौरान राहुल कांबले को नामांकन से मना कर दिया गया, जबकि वह मेरिट के तहत इसका हकदार है. उसे विवि परिसर में 24 दिनों तक 20 से अधिक छात्रों के साथ भूख हड़ताल पर रहना पड़ा. फिर भी दुर्भाग्य से आज तक उसे पीएचडी में नामांकन नहीं मिला है.
इसलिए कृपया सीट को जल्दी भर कर उसे खाली रखने से हो रही राष्ट्रीय क्षति को रोकें.
सादर
आपका
एल कारुण्यकारा
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